कविवर परिमल्ल
हिंदी साहित्य के संवर्धन में अनेक जैन कवियों का योगदान रहा है।जिन्होंने अपनी सर्जना से साहित्य को समृद्ध किया और हिंदी भाषा को जनप्रिय बनाने में अपना रचनात्मक अवदान दिया। 'श्रीपाल चरित' एक ऐसी ही पठनीय और संग्रहणीय रचना है जो अपने समय में काफी चर्चित हुई और जिसका प्रणयन वरहिया जाति के रत्न कुम्हरिया गोत्रोत्पन्न कवि परिमल्ल ने किया है। कविवर परिमल्ल 16वीं -17वीं शती के कवि हैं।उनका जन्म ग्वालियर में हुआ।यहीं उनका बाल्यकाल बीता और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई। लेकिन उनके जीवन का उत्तरार्ध आगरा में बीता।कविवर परिमल्ल के पिता का नाम आशकरण चौधरी था जो शास्त्रों के ज्ञाता और मर्मज्ञ थे।उनके प्रपितामह चन्दन चौधरी ग्वालियर के महाराजा मानसिंह (सन 1480-1516 ई.)द्वारा सम्मानित नगर श्रेष्ठी थे और उनका बहुत बहुमान था। यही कारण है कि कुम्हरिया गोत्रीय कविवर परिमल्ल के परिवार को समाज में प्रमुखता प्राप्त होने के कारण सम्मान स्वरूप चौधरी नाम से संबोधित किया जाता था। जो उनकी विशिष्ट सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
श्रीपाल का कथानक जैन जगत में बहुत लोकप्रिय है।श्रीपाल और मैना सुंदरी अटूट धर्म- निष्ठा और विश्वास का ऐसा अनुपम उदाहरण है जो धर्मप्राण लोगों को अक्षय ऊर्जा प्रदान करता रहा है।यही कारण है कि अनेक जैन कवियों और विद्वानों ने इस विषय पर अपनी लेखनी चलाई है लेकिन जितनी लोकप्रियता महाकवि परिमल्ल के 'श्रीपाल-चरित' को मिली ,उतनी किसी अन्य विद्वान् की इस विषयक कृति को नहीं मिली।यही कारण है कि जैन शास्त्र भंडारों में परिमल्ल के श्रीपाल-चरित की पांडुलिपियां सर्वाधिक संख्या में प्राप्त हुई हैं।
'श्रीपाल-चरित' की भाषा व्रजभाषा है।चूँकि आगरा व्रजभाषा का केंद्र रहा है इसलिए कवि ने व्रजभाषा को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में चुना।इस विषय पर लिखी गई अन्य कृतियों के साथ कवि परिमल्ल कृत 'श्रीपाल-चरित' की तुलना करने पर यह कृति भाषा ,काव्य और प्रस्तुति सभी दृष्टियों से अत्यंत प्रभावशाली है।कवि ने नायक नायिका के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं और उससे जुड़ी अंतर्कथाओं का बहुत प्रभावशाली और सहज बोधगम्य चित्रण किया है जो मनोमुग्धकारी है।कवि ने अपनी तूलिका से आख्यान के सभी पात्रों को जीवन्त कर दिया है।
कवि परिमल्ल ने अपने पूर्वजों का इस प्रकार उल्लेख किया है --
गोवर गिरि गढ़ उत्तम थान,शूरवीर तहां राजा मान।
ता आगे चन्दन चौधरी,कीरति सब जग में विस्तरी।
जाति वरहिया गुन-गंभीर,अति प्रताप कुल राजे धीर।
ता सुत रामदास परवीन,नंदन आशकरण शुभ दीन।
ता सुत कुलमंडल परिमल्ल,बसे आगरा में तजि सल्ल।
कवि ने श्रीपाल-चरित की रचना मुग़ल बादशाह अकबर के काल में की है किन्तु उल्लेखनीय है कि व्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि परिमल्ल किसी के आश्रित नहीं थे।कवि ने श्रीपाल चरित की रचना आषाढ़ सुदी संवत 1651 में अष्टमी को प्रारंभ की थी।
संवत सोलह सौ ऊपरे ,सावन इक्यावन आगरे।
मास अषाढ़ पहुती आई ,वर्षा ऋतु को कहे बड़ाई।
पक्ष उजालो आठे जान,शुक्कर वार पार परवान।
कवि परिमल्ल शुद्ध करि चित्त,आरंभ्यो श्रीपाल चरित्त।


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