रविवार, 27 सितंबर 2026

वरहिया जैन : सिंहावलोकन


    दिगंबर जैन आम्नाय की चौरासी उपजातियों में से एक वरहिया उपजाति है जिसका भौगोलिक प्रसार क्षेत्र प्रमुख रूप से प्राचीन गोपाचल जनपद (म.प्र. स्थित वर्तमान ग्वालियर )का ग्राम्यांचल रहा है।वरहिया जाति सबसे प्राचीन जैन संघ मूलसंघ और बलात्कार गण(यहां बलात्कार शब्द का तत्समय प्रचलित अर्थ बलपूर्वक ग्रहण करें) के अंतर्गत है और कुंदकुदाम्नाय, सरस्वती गच्छ में परिगणित है। हालांकि कई फूलमाल पचीसी (जो वास्तव में जैन धर्मावलंबी समाजों की सूची है) में वरहिया जाति का उल्लेख नहीं है। फिर भी प्रमुख सूचियों में इस जाति का उल्लेख है।जिन फूलमाल पचीसी में वरहिया जाति का उल्लेख नहीं है उसका कारण उन ग्रंथकर्ताओं का दूरस्थ और ग्राम्य क्षेत्र में निवासरत वरहिया जाति से उनका अपरिचय ही है। 
         विक्रम की 15वीं 16वीं शताब्दी से इस समाज के विकास के बारे में पता चलता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर के बड़े मन्दिर में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा के पादलेख के अनुसार विक्रम सम्वत् 1545 में मूलसंघ, सरस्वती गच्छ में वरहिया कुलोद्भव साहू लक्खा के वंशजों ने यह प्रतिष्ठा कराई थी।
      गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया जिन्होंने समूचे हिंदी प्रदेश और उसके बाहर भी जैन न्याय और दर्शन की दुन्दुभी बजाई ,इसी उपजाति के गौरव-रत्न हैं ।वर्तमान में भारतवर्ष में जितने भी जैन विद्वान और मनीषी हैं या रहे हैं,उनमें से अधिकांश पंडित गोपालदास जी की शिष्य-प्रशिष्य परंपरा में आते हैं ।
            ग्राम्यांचल में निवास करने के फलस्वरूप अन्य जैन जातियों के साथ इसका सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर्विनमय न होने के कारण यह उपजाति अल्पज्ञात रही है ।इसके  मूल उद्गम स्थान को लेकर भी मतभेद  हैं।ग्वालियर निवासी श्री रामजीत जी जैन ने 'वरहियान्वय' नाम से वरहिया जाति का इतिहास लिखा है जो इस जाति के समाजशास्त्रीय अध्ययन का पहला व्यवस्थित प्रयास है ।हालांकि इसमें कई सारे प्रश्न अनुत्तरित रह गये हैं और मूल उद्गम स्थान के बारे में उनकी स्थापना भी ठोस अन्तःसाक्ष्यों पर आधारित न होने के कारण एकांगी है किन्तु फिर भी यह इस दिशा में पहला प्रयास होने के नाते उल्लेखनीय और स्तुत्य है।
         जनश्रुति के आधार पर 'वरहिया' पद की व्याख्या श्रेष्ठ हृदय वाले व्यक्ति के रूप में की जाती है ।यह एक गुणवाची पद है।वरहिया' जाति के वराहकच्छ या वराह क्षेत्र नामक भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े  होने की प्रबल तार्किक संभावना है। वराह क्षेत्र प्राचीन काल में उत्तरी-मध्य भारत में एक धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र रहा है ,जिसकी अवस्थिति  बुंदेलखंड और उसके आसपास के इलाकों में मानी जाती है।वरहिया जैन समुदाय की बसाहट मुख्य रूप से बुंदेलखंड, ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में रही है और आज भी यह इसका प्रवास क्षेत्र है। ऐतिहासिक रूप से वराह क्षेत्र अनेक क्षत्रिय जातियों और व्यापारियों का प्रवास क्षेत्र रहा है। 14वीं से 17वीं शती के बीच विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक कारणों से इन समूहों का निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रव्रजन हुआ और मूल स्थान से अपने जुड़ाव की स्मृति को संजोकर रखने के स्वाभाविक आग्रह के कारण वरहिया नाम से जैन जगत में पहचाने गए। यहां यह बात ध्यान रखने योग्य है कि अधिकांश जैन जातियां अपने मूल भौगोलिक निवास स्थान के नाम से ही जानी पहचानी जाती है। 
वरहिया शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के वर्ह: से हुई जान ‌पड़ती है जिसके सभी विवक्षित अर्थ अभीप्सित हैं। उत्कृष्ट और धर्मानुमोदित आचरण के कारण आर्हत-मत अनुगामियों  के समूह विशेष को धर्माचार्यों द्वारा यह अभिधान दिया गया।
एक किम्वदंती के अनुसार नरवर के प्रतापी नरेश राजा नल की वंश परम्परा में वीरमचंद्र देव नामक सामंत को वरहिया लोगों का पूर्वपुरूष बताया गया है।कालांतर में यही वरहिया वंश आठ गोत्रों में विभाजित हुआ।ये आठ गोत्र हैं-
-1 चौधरी ,2 कुम्हरिया,3 पलैया,4 भंडारी ,5 ऐछिया या ऐरछिया ,6 सेंथरिया या सिंहपुरिया ,7 पहाड़िया ,8 नोने या नोनेरिया |इन मूल आठ गोत्रों के पश्चात् कालान्तर में 28 अन्य गोत्र इस जाति में और समाहित हुए ,जिनकी सूची इस प्रकार है --
1 चौरिया ,2 वगेरिया ,3 पुनिहा ,4 निकोरिया ,5 भागी ,6 तरपटले या तरपटिया ,7 सिनरुखिया,8 सोनिया या सोनी ,9 अकलनया या इकलोने ,10 साहू ,11 कमोखरिया या केमोरिखिया ,12 उदयपुरिया ,13 अलापुरिया ,14 मेहरोटिया या मोरसिन्धु,15 गुलिया ,16 वेदिया,17 रोंसरिया ,18 इन्दुरिखिया ,19 किरोड़ या कारोडिया,20 धनोरिया ,21 वदरेठिया ,22 भटसंतानी ,23 वरैया ,24 पदमपेंथिया,25 सिंघई ,26 सेठिया ,27 तिलोरिया ,28 दाऊ।
इस प्रकार वरहिया जाति में गोत्रों की संख्या बढ़कर 36 हो गई। लेकिन इनमें से कुछ गोत्र इसलिए अल्पज्ञात हैं कि वे या तो अब मौजूद नहीं हैं या उनकी संख्या अत्यंत न्यून है। वरहिया जैन जाति की जनगणना का डाटा उपलब्ध होने पर इसका सटीक आकलन हो सकेगा।
वरहिया समाज की विभूतियों ,विशेष रूप से विद्वानों की यदि माला बनाएं तो उसके सुमेरु निर्विवाद रूप से पंडित गोपालदास जी वरैया ही हैं।इस माला के कुछ मनकों का निदर्शन यहां कराया है।कविवर परिमल्ल, पंडित छोटेलाल वरैया(जिनका मालवांचल में बहुत बहुमान है।)पंडित खच्चूराम जी, पंडित लेखराज जी, पंडित प्यारेलाल 'लाल', पंडित प्यारेलाल 'सुमन', पंडित भगवती प्रसाद, पंडित कपूरचंद वरैया,श्री होतीलाल 'हेती' और विशेष रूप से उल्लेखनीय नाम एडवोकेट श्री रामजीत जी जैन का है जिन्होंने वरहिया समाज के इतिहास के बिखरे सूत्रों को संजोने का श्रमसाध्य कार्य किया।
वरहिया समाज के धर्म साधकों में मुनिश्री क्षीरसागर, क्षुल्लक श्री पद्म सागर, क्षुल्लक श्री आदि सागर, ब्रह्मचारी खेमचंद, क्षुल्लक श्री कीर्ति सागर, ब्रह्मचारी जतनलाल, मुनिश्री पुष्पदंत सागर, आर्यिका पद्मश्री, क्षुल्लिका आदिमति, साध्वी लीलावाई, ब्रह्मचारिणी द्रौपदी बाई,मुनिश्री प्रेक्षा सागर, मुनिश्री प्रभाव सागर, मुनिश्री विश्वनायक सागर, मुनिश्री प्रवीर सागर, मुनिश्री दया धर्म सागर, मुनिश्री विश्वानुत्तर सागर, मुनिश्री पूज्यतीर्थ सागर, मुनिश्री अध्यात्म मणि रत्न सागर, ब्रह्मचारिणी सरोज दीदी नाम स्मृति पटल पर हैं।
अतीत में और वर्तमान में जिन स्थानों पर वरहिया समाज के जिनालय रहे हैं,उनका विवरण इस प्रकार है-अलापुर,अमरोल,आमोल,आरोन,उरवा,उरवाहा,ऐसा,करहिया,कुर्राचित्तरपुर,कुलैथ,कैरुआ,कालावेही,गोपालपुरा,गनेशपुरा,देवरी,धिमसिरी,धौंआ,पठा,पार,भौरी,भौंती,मामोनी,रजियार,राई, रायपुर,,रौरा,चराई,चीनौर,छीमक, जौरा, डबरा, देवरी, धौलागढ़, नरवर,,बड़ा नगला,बरौआ,बनवार,बानमोर, मगरौनी,मोहना,,रिठौरा,स्याऊ, सुमावली,  सिमरिया,सतनबाड़ा,सांतऊ,सौजना,जिंदपुरा या चंदपुरा,पवा,वर का गांव, शमसाबाद, लश्कर, शिवपुरी। 

 अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा द्वारा ई.1914 में भारत की समस्त दिगंबर जैन जातियों की गणना कराई गई थी।इस जातीय जनगणना से दिगंबर जैन जातियों की जनसंख्या का पहली बार आधिकारिक रूप से एक स्थूल आकलन हो सका। यह डायरेक्टरी वेंकटेश्वर मुद्रणालय मुंबई से प्रकाशित हुई थी। इसमें सभी दिगंबर जैन जातियों की जनगणना के अलावा विभिन्न समाजों के प्रमुख लोगों की भी एक सूची तैयार की गई थी।इस उलेख्य सूची में वरहिया(वरैया) जैन समुदाय के 59 प्रमुख परिवारों को शामिल किया गया है। यह हमारे अतीत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।       
वरहिया जैन समुदाय की तत्समय जनसंख्या का ग्रामवार विवरण अकारादि क्रम से यहां प्रस्तुत है। इसके अनुसार कुल जनसंख्या 1512 थी।
1-अमरोल-23
2-आमोल-5
3-अलवर-20
4-अलापुर-20
5-अमोला-103
6-आरोन-27
7-इटावली-15
8-उज्जैन-9
9-करई -23
10-करहिया-311
11-कानीबहेरी-9
12-कुलैथ-23
13-गुलगांव(सलारतपुरा)-4
14-गोपालपुरा-8
15-घरसोदी-5
16-घाटीगांव-6
17-चंदपुरा-16
18-चिंदौनी-1
19-चीनौर-43
20-चुरैलखेरा-9
21-चैतनगर(चैतग्राम)-13
22-छड़ेर-8
23-छड़ेरा-8
24-छीमक-10
25-जिगसोली-5
26-जौरा-57
27-जौरासी-10
28-टिकटौली-36
29-दीमानगंज-8
30-धमकन-7
31-धौंआ-47
32-धौलागढ़-19
33-नरवर-53
34-नरेला-7
35-नवगांव-3
36-पनिहार-5
37-पार-10
38-बड़नगर(मालवा)-1
39-बनवार-34
40-बैरसिया-8
41-भौंती-2
42-भोपाल-10
43-मगरोनी-115
44-मुरैना-5
45-मोहना-39
46-मोहलिया-4
47-रायपुर(गिर्द)-11
48-रिठौरा-23
49-रेंहट-44
50-लीटिया -10
51-वरकेगांव-23
52-बिलोखो-2
53-बिहारिया-3
54-सांतऊ-11
55-सतनवाड़ा-18
56-सभराई-8
57-सिमरिया-21
58-सुमावली-85
59-सिरसा-6
60-शिवपुरी-30
61-हथरया-13

        इस जनगणना दस्तावेज में वरहिया जैन समुदाय के तत्समय के प्रमुख परिवारों का विवरण इस प्रकार है।
1-अमरोल(गिर्द)-श्री राधेलाल,फुंदीलाल जी-गल्ले का व्यापार
2-आमोल(नरवर)-श्री चुन्नीलाल, मोतीलाल जी-बजाजी
3-अलापुर(तवरघार)-श्री सेवालाल,ग्यासीराम जी -दुकान कठारखाना
4-आमोल(नरवर)-श्री मन्नूलाल, तुलाराम जी -साहूकारी
5-आमोल(नरवर)-श्री ताराचंद, खूबचंद जी-साहूकारी
6-आरोन(गिर्द)-श्री दुरगी,खूबी-साहूकारी
7-इटावली(ग्वा.रिया.)-हीरावन दे-बंजी
8-उज्जैन-श्री जुहारमल, पूनमचंद जी -परचून की दुकान
9-करई(गिर्द)-श्री रामलाल, गंगाराम जी -साहूकारी
10-करहिया(गिर्द)-श्री लेखराज,जगराम जी -साहूकारी
11-करहिया-श्री दीवानमल वृजलाल जी-साहूकारी
12-करहिया-श्री मिहरचंद, रामलाल जी -साहूकारी
13-कानीबहेरी(नरवर)-श्री दरयाब, रामलाल जी -बंजी
14-कुलैथ(ग्वा.रिया.)-कुल्लेमल पुत्र श्रीधर्मदास जी-बंजी
15-गुलगांव [सलामतपुर](भोपाल रिया.)-सेठ सुखलाल, रतनचंद जी -किराना
16-घरसोदी(गिर्द)-श्री काशीराम, परमसुख जी -बंजी
17-घाटीगांव(गिर्द)-श्री पन्नू,मानू-बंजी करना
18-चंदपुरा(ग्वा.रिया.)-श्री दौलती,ज्योति प्रसाद -बंजी
19-चिंदौनी(तवरघार)-श्री दुलीचंद खूबचंद जी -खेतीबाड़ी
20-चीनौर(गिर्द)-श्री धाराजीत, नंदलाल जी -साहूकारी
21-चुरैलखेरा(नरवर)-श्री दुल्ली, रामलाल जी -घी और गल्ले का व्यापार
22-चैतनगर(ग्वा.)-श्री भजनलाल, प्यारेलाल जी -साहूकारी
23-छड़ेर(तवरघार)-श्री शोभाराम,मनसाराम जी -दुकान कठारखाना
24-छड़ेरा(गिर्द)-श्री हरगोविंद, बालकिशन जी -बंजी
25-छीमक(गिर्द)-श्री सोनपाल, प्यारेलाल जी -साहूकारी
26-जिगसोली(ग्वा.रिया.)-श्री मूलचंद, राजाराम जी -बंजी
27-जौरा(तवरघार)-श्री मोहनलाल, महासुख जी-दुकानदारी
28-जौरासी(ग्वा.रिया.)-श्री रामलाल, पातीराम जी -बंजी
29-टिकटौली(ग्वा.रिया.)-श्री छीतरया, अमरजीत जी -बंजी, खेतीबाड़ी
30-धमकन(तवरघार)-श्री ललईं, मूलचंद जी -दुकानदारी
31-धौंआ(गिर्द)-श्री मोतीराम,रामजीमल जी -साहूकारी
32-धौलागढ़(नरवर)-श्री रतनलाल, बिहारीलाल जी -आढ़त,साहूकारी
33-नरवर(ग्वा.रिया.)-सेठ श्रीचंद पुत्र श्री इच्छाराम जी -साहूकारी
34-नरवर-सेठ चतुर्भुज पुत्र श्री किशुनचंद जी -साहूकारी
35-नरेला(तवरघार)-श्री गिरधारी लाल,गोलीराम जी -दुकान कठारखाना
36-नवगांव(गिर्द)-श्री कड़ोरेलाल,विनतीलाल जी -गल्ले का व्यापार
37-पार(गिर्द)-श्री उदैनंद,हरप्रसाद जी -साहूकारी
38-बनवार(गिर्द)-श्री बापूराम, रामलाल जी-बंजी
39-बनवार-श्री हरलाल, भोगीराम जी -साहूकारी
40-बैरसिया(भोपाल)-श्री धन्नालाल जी -हलवाईगीरी
41-मगरौनी(नरवर)-श्री मोतीलाल, पन्नालाल जी -साहूकारी
42-मुरैना(ग्वा.रिया.)-पं.गोपालदास जी -आढ़त
43-मोहना(गिर्द)-श्री पन्नूलाल,भूरासिंह जी-साहूकारी, गल्ले का व्यापार
44-रायपुर(गिर्द)-श्री चिरोंजी लाल, धनपाल जी-पटवारी
45-रिठौरा(तवरघार)-सेठ पन्नालाल, हीरालाल जी -साहूकारी
46-रेंहट(गिर्द)-श्री प्रतापचंद,कड़ोरेमल जी -साहूकारी
47-लीटिया(गिर्द)-श्री पातीराम,बहोरनलाल जी -साहूकारी, खेतीबाड़ी
48-वरकेगांव-(गिर्द)-श्री माणिकचंद, हंसराज जी -साहूकारी,बजाजी
49-बिलोखो(नरवर)-श्री गुलाबचंद, श्रीलाल जी -बंजी
50-विहारिया(उज्जैन)-श्री चुन्नीलाल जी -परचून की दुकान
51-सांतऊ[शांतक](गिर्द)-श्री दुर्गा प्रसाद, मोतीलाल जी -साहूकारी, खेतीबाड़ी
52-सतनवाड़ा(नरवर)-श्री गुलाबचंद, पन्नूलाल जी-साहूकारी,घी का व्यापार
53-सभराई(गिर्द)-श्री फोदलिया पुत्र श्री जानकीराम जी -साहूकारी,घी का व्यापार
54-सिमरिया(गिर्द)-श्री अमरचंद, नेकराम जी -गल्ले का व्यापार
55-सुमावली(ग्वा.रियासत)-श्री हरगोविंद, प्यारेलाल जी -साहूकारी
56-सुमावली-श्री फैलीराम,गुलजारी लाल जी -साहूकारी
57-सिरसा(गिर्द)-श्री झींगरीमल, कालूलाल जी -पंसारी
58-शिवपुरी(नरवर)-श्री गिरधारी भाई, पातीराम जी -हलवाईगीरी
59-हथरया(ग्वालियर रियासत)-श्री भागचंद, धनीराम जी -बंजी।
[यहां यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इस जनगणना में आगरा अंचल के शमसाबाद ,बड़ा नगला,वदेकेवास,डौकी,कुर्राचित्तरपुर,गढ़ी महासिंह आदि स्थानों में वरहिया जैन समाज के निवास का कोई उल्लेख नहीं है। जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि या तो ई.1914 में कोई वरहिया जैन इस क्षेत्र में निवास नहीं करता था या फिर जनगणना कार्य करने वाले लोगों से कोई भूल हुई है।जबकि जनगणना में कुर्राचित्तर पुर में एक जैसवाल परिवार के निवास का उल्लेख है यानी वे लोग इस क्षेत्र से परिचित थे। शमसाबाद में रहने वाले सिंघई परिवार तो बरौआ (गिर्द) से जाकर वहां बसे हैं। अन्य मामलों में भी शायद ऐसा ही रहा हो। 

वरहिया समाज को संगठित करने और सामाजिक स्तर पर समाज जनों के बीच सामंजस्य और सौहार्द स्थापित करने के पवित्र उद्देश्य से वरहिया समाज की सर्वोच्च प्रशासी संस्था अखिल भारतवर्षीय दिग. जैन वरहिया महासभा की स्थापना संवत् 2000 में स्याऊ जिला ग्वालियर हुई थी जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री नाथूराम जी धनोरिया डबरा एवं महामंत्री श्री होतीलाल जी भंडारी आगरा बने।उसके पश्चात महासभा कुछ वर्षों तक निष्क्रिय रही।सन् 1980 में श्री मोहनलाल जी ठेकेदार की सक्रियता से ग्वालियर में एक अधिवेशन कर श्री मक्खनलाल जी धौंआ वाले व श्री शीतलप्रसाद जी ग्वालियर को महासभा के पुनर्गठन का दायित्व सौंपा गया। जिसके फलस्वरूप उनके अथक प्रयासों से 23-11-1980 को महासभा का पुनर्गठन किया गया। जिसमें श्री राम भरोसीलाल जी अध्यक्ष व श्री चंद्रसेन जैन महामंत्री निर्वाचित हुए। तत्पश्चात श्री राजमल जैन वी.डी.ओ.(अध्यक्ष )और श्री शीतल प्रसाद जैन, ग्वालियर (महामंत्री)ने इसका नेतृत्व किया। इसके उपरांत श्री बालकृष्ण जैन (अध्यक्ष) व श्री रामस्वरूप जैन (महामंत्री) ने महासभा की कमान संभाली। इनके उत्तरवर्ती के रूप में श्री धर्मचंद जैन (अध्यक्ष) व श्री वीरेन्द्र जैन, नरवर (महामंत्री) तथा श्री माता प्रसाद भंडारी (अध्यक्ष) व श्री भरत जैन(महामंत्री) ने महासभा का दायित्व संभाला। इसके उपरांत श्री आई पी जैन (अध्यक्ष)व श्री वीरेन्द्र चौधरी, डबरा(महामंत्री )तथा श्री जवाहरलाल जैन(अध्यक्ष) व श्री वीरेन्द्र चौधरी, डबरा (महामंत्री) ने वरैया महासभा का नेतृत्व किया। इसके पश्चात श्री माता प्रसाद भंडारी(अध्यक्ष)व श्री नरेन्द्र सोनू(महामंत्री) ने महासभा का नेतृत्व किया और वर्तमान में श्री धर्मचंद जैन, मामोनी (अध्यक्ष) व श्री नरेन्द्र जैन नीरू (महामंत्री) के रूप में कार्यरत हैं। महासभा के पदाधिकारियों के कार्यकाल का व्यवस्थित काल क्रमिक ब्यौरा उपलब्ध नहीं हो सका।

 वरहिया समाज जिन संस्थाओं का प्रबंधन करता है उसमें सबसे प्रमुख सोनागिर स्थित भट्टारक कोठी सोनागिर है। भारतवर्ष में स्थापित भट्टारक पीठों में सोनागिर स्थित भट्टारक पीठ भी एक है |जिस पर प्रमुखतः बलात्कार गण शाखा का वर्चस्व रहा है |अनेक यशस्वी  भट्टारकों से सुशोभित इस पीठ के अंतिम भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी, जो वरहिया समुदाय से  थे -वि.सं.2001 में अभिषिक्त हुए ,जिनका वि.सं.2031 में देहांत हो गया |श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी पर भट्टारकों की गद्दी(गादी)  प्राचीन समय से चली आ रही थी। पूर्व में इस क्षेत्र का प्रबंधन दतिया के राजा के अधीन था। दतिया नरेश ने क्षेत्र का प्रबंधन जब श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र कमेटी को सौंपा था तब उस समय इस कोठी के मंदिर के सम्बन्ध में कमेटी की रिपोर्ट में उल्लेख आया है।जिसके अनुसार यह  मंदिर भट्टारक जी महाराज सोनागिर पट्टाधीश का बनवाया हुआ है। पर्वत के  चढ़ने के दरवाजे के सामने ही बना हुआ है। इसके साथ एक धर्मशाला भी है । भट्टारक हरेन्द्रभूषण जी सोनागिर तत्समय इस गद्दी के पट्टाधीश थे और इसका प्रबंधन करते थे और यहीं निवास करते थे। इस धर्मशाला में एक कुआं भी है।पर्वत राज के मंदिरों का प्रबन्ध इन्हीं के द्वारा होता था।पहले पर्वत का भंडार आप ही के यहाँ जमा होता था। उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार आगे उल्लिखित संस्थान 1- भट्टारक जी की कोठी ,2-खैरा वालों का,3-आचार्य वालों का,4- भगवानदास जी का,5- करहिया वालों का मंदिर,इनके प्रबंधनाधीन थे। जब सिद्धक्षेत्र सोनागिर कमेटी  का निर्माण हुआ तो इसके अध्यक्ष भी भट्टारक श्री हरेन्द्रभूषण ही थे। उनके उत्तराधिकारी के रूप में भट्टारक श्री चन्द्रभूषण जी महाराज इसके अन्तिम भट्टारक बने । योग्य शिष्य न मिलने के कारण भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी ने अपने जीवनकाल में ही वरहिया समाज के प्रमुख लोगों से विमर्श कर अपने नियंत्रणाधीन परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक प्रबंधकारिणी कमेटी का गठन किया था  जो भट्टारक गादी संस्थान के नाम से जानी जाती है।जिसमें मंदिर नं. 8 व 9, शांतिनाथ मंदिर तथा उससे  सम्बंधित अन्य सम्पत्ति, कोठी के सामने का चबूतरा, कुआं, आमौल वाली धर्मशाला, दक्खोबाई का मंदिर नं. 11, परमसुख,लखमीचंद धनोरिया करहिया वालों का मंदिर नं. 12, मंदिर  नं. 17 एवं उसकी धर्मशाला और उसका चबूतरा आदि की व्यवस्था जो भट्टारक जी के अधीन थी उसकी समुचित और सुचारू व्यवस्था करने के लिए वरहिया समाज की एक कमेटी बनाने का जो सुझाव भट्टारक जी ने रखा था, उसके अनुरूप वरहिया जैन समाज ने एक कमेटी  का गठन किया और उसका भट्टारक श्री चन्द्रभूषण महाराज संस्थान गादी  सोनागिर, दतिया (रजि.) नामकरण किया गया। यह संस्था म.प्र सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 (सन्‌ 1973 क्रं. 44) के अधीन दि. 30-10-1984 को पंजीबद्ध की गई।) और इसका प्रबंधन  दिगंबर जैन वरैया प्रबन्ध कार्यकारिणी कमेटी को सौंपा गया। भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी शेष जीवन पर्यन्त इस कमेटी के अध्यक्ष रहे।भट्टारक जी के निधन के पश्चात् से  श्री दिगंबर जैन वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी सोनागिर इस दायित्व का सुचारू रूप से निर्वहन कर रही है।  
     आमोल वाली धर्मशाला के प्रांगण में 105 भट्टारक सर्वश्री सुरेंद्र भूषण जी, जिनेन्द्र भूषण जी, हरेंद्र भूषण जी व अंतिम भट्टारक चंद्रभूषण जी की चरण छतरी बनी हैं।
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सोमवार, 29 जून 2026

सोशल मीडिया का जुनून

 

मल्टीमीडिया मोबाइल कमोबेश आज हर लड़के लड़की के हाथ में है। उन्हें और कुछ आता हो या न आता हो, ज्यादा पढ़े-लिखे हों या न हों लेकिन इंटरनेट ब्राउजिंग में उन्हें महारत है और उसकी बेसिक शब्दावली और तौर-तरीकों से वे वाकिफ हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक पर एक्टिव रहना उनका शगल है।उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश इंस्टाग्राम और फेसबुक सेंसेशन बनना है जिसके लिए वे पढ़ाई लिखाई और दूसरे जरूरी काम छोड़कर दिन-रात पूरी शिद्दत से लगे रहते हैं। सेलेब्रिटी बनने की चाहत में उनमें कुछ भी कर गुजरने का जुनून पैदा हो जाता है। दोस्तों के साथ गेट-टुगेदर और लेट नाईट पार्टी उनकी चर्या का हिस्सा बन जाती है।घाघ और शातिर लोग अपने काम करने का तरीका बदल चुके हैं और वे हाई प्रोफाइल और डिजिटल हो गए हैं।वे सोशल मीडिया पर सर्च कर ऐसे महात्वाकांक्षी बच्चों को टारगेट करते हैं और उनको फैशन परेड, अपैरल्स प्रमोशन, ब्यूटी प्रोडक्ट्स प्रमोशन के नाम पर शहर के बड़े होटलों में बुलाते हैं। जहां खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम होता है। बच्चों को फैंटेसी की चकाचौंध भरी इस मायावी दुनिया का आकर्षण पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लेता है। प्रायोजक इन्हीं पार्टियों में शिकार का चुनाव करते हैं।आप कब दल-दल में फंस गए, आपको खुद पता नहीं चलता।होटल की तिलस्मी दुनिया का सारा सच आपकी बेटियां आपको नहीं बताएंगी। क्योंकि हो सकता है आपकी बेटी की मर्जी न हो और वह ब्लेकमेलिंग का शिकार हो। इन प्रमोशन इवेंट के एवज में उन्हें बाकायदा कन्वेयेंस और मेकअप का खर्चा और कुछ नकद प्रतिफल  मिलता है। जिसका कुछ हिस्सा वह घर वालों को देते हैं जिससे उनका मुंह बंद रहे और वे ज्यादा  सवाल जबाव न करें। ज्यादा कमाई के झांसे में आकर गलत रास्ता न चुनें। सोशल मीडिया पर कमाई करना इतना आसान नहीं है। मोटी कमाई के लालच में बच्चे अक्सर गलत शाॅर्टकट चुन लेते हैं। इसलिए अपने बच्चों पर सतर्क नजर रखें। ज्यादा माडर्न और प्रोग्रेसिव बनने के चक्कर में कहीं वे घनचक्कर  न बन जाएं और कहीं के न रहें।आज अपराधियों ने अपना तरीका बदल दिया है। अब वे गली-मोहल्लों में नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर नजर गड़ाए बैठे हैं।







 

गुरुवार, 11 जून 2026

व्यापारिक बनाम नौकरीपेशा जिंदगी


 परंपरागत रूप से व्यवसाय करने वाले चाहे वो छोटे कस्बों में निवास करते हों  या किसी बड़े नगर में रहकर व्यवसाय करते हों, अपनी और अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर पाते हैं,भले ही उनका लाइफस्टाइल ज्यादा आधुनिक न हो और जिंदगी कठिनाईयों से भरी हो लेकिन वे पारिवारिक और सामाजिक जबावदेही से पीछे नहीं हटते। उनके पास जितने संसाधन होते हैं उतना ही वे अपनी इच्छाओं को विस्तार देते हैं यानी चादर के हिसाब से पांव पसारते हैं इसलिए सुखी जीवन जी पाते हैं लेकिन इसके उलट महानगरों में ऊंचा पैकैज पाने वाले  नौकरीपेशा लोगों की खुद की जरूरतें भी बमुश्किल पूरी हो पा रही हैं। सुरसा की तरह मुंह खोलती जाती इच्छाएं और मंहगाई के दंश के मारक असर के आगे छ: और सात अंकों में मिलने वाली मासिक पगार भी ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती है।महानगरों की भागम भाग भरी जिंदगी, दूसरों की निगाह में अपना स्टेटस ऊंचा दिखाने के लिए शो-ऑफ वाली महंगी चकाचौंध भरी लाइफस्टाइल के बोझ तले दबे लोग जिंदगी में आर्थिक प्रगति के चाहे जितने सोपान छू लें लेकिन उनकी सामाजिकता दम तोड़ने लगती है। वे आत्मकेंद्रित और आत्मसुख को लेकर प्रबल आग्रही हो जाते हैं। उनकी दुनिया खुद,बीबी और बच्चों तक सिमट कर रह जाती है।वे अपनी बनाई तिलस्मी दुनिया के कैदी बनकर रह जाते हैं।एक ओर वे लोग हैं जो व्यापार के जरिए दूसरों के लिए नौकरियों का सृजन कर रहे हैं,भले ही छोटे स्तर पर सही और दूसरी ओर वे लोग हैं जो जीवन-यापन के लिए दूसरों की नौकरी पर निर्भर हैं और उनके ताबेदार हैं। इनमें से किन्हें आप बेहतर समझते हैं। क्या पैसों के आगे सुकून की कोई अहमियत नहीं है।जो लोग अपनी बच्चियों के लिए व्यवसाय में दक्ष लोगों के बजाय नौकरीपेशा लोगों को वरीयता देते हैं उन्हें कम से कम एकबार तो इस नजरिए से सोचकर देखना चाहिए।

मंगलवार, 9 जून 2026

धर्म प्रभावना का स्वरूप


 धनिक धर्मानुरागी जैन श्रावक   जैन धर्म की प्रभावना के लिए अंत: प्रेरणा से और साधु-संतों की अनुप्रेरणा से सर्वदा सचेष्ट रहते आए हैं और आज भी पीछे नहीं है।जिसकी फलश्रुति देश भर में नये-नवेले भव्य जिनालयों और सर्वसुविधायुक्त जैन तीर्थों के अवतरण के रूप में हुई है। जिन्हें जैन पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान मिला है और वे वास्तुकला की दृष्टि से भी बेजोड़ हैं। इन्हें बनाने या विकसित करने में अनेकों करोड़ रुपए व्यय किए गए हैं।ये तीर्थ धर्म प्रभावना का निमित्त बनने के साथ-साथ उनके प्रवर्तक साधुओं के गौरव स्मारक भी है। प्रायः सभी साधुओं के अनुयायी वृंद ने अपने अपने श्रद्धाभाजन साधुओं के नाम पर कृतज्ञता ज्ञापन स्वरूप कोई न कोई तीर्थ उन साधुओं द्वारा निर्दिष्ट स्थान पर विकसित किया हैं। देश में जैन धर्मायतनों की कमी नहीं है।लेकिन धर्म प्रभावना के नाम पर नये नये तीर्थ जो अत्याधुनिक सर्वसुविधायुक्त पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किए जा रहे हैं, का सृजन करने के स्थान पर हाॅस्पीटल,काॅलेज जैसे सर्वोपयोगी संस्थान बनाए जाएं तो जैन धर्म और जैन धर्मालुओं दोनों का पर्याप्त रूप से संरक्षण ,संवर्धन होगा। क्योंकि श्रमण जीवन मूल्यों के केन्द्र के रूप में इन संस्थानों को विकसित करने के अभियान पर यह जो विपुल धनराशि पानी की तरह बहाई जा रही है वह तभी फलीभूत और सार्थक होगी जब उस धर्म के अनुयायी या अनुपालक समाज में मौजूद रहेंगे। जैन धर्म का अस्तित्व जैन स्मारकों पर नहीं बल्कि जैन श्रावकों के अस्तित्व पर निर्भर है। यदि जैन श्रावक सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम और समर्थ नहीं होंगे तो इस सांस्कृतिक परंपरा का उचित संवहन, संवर्धन कौन करेगा।आज भी देश में सैंकड़ों जिनालय उपेक्षित पड़े हैं जो हमारे समृद्ध अतीत की गौरवगाथा कह रहे हैं लेकिन वर्तमान की दुर्दशा पर भी आंसू बहा रहे हैं। क्योंकि जैन श्रावकों के न होने के कारण अनेकों स्थानों पर उपेक्षित पड़े  जिनालय अतिक्रमण का शिकार हो रहे हैं। उनकी समुचित देखभाल नहीं हो पा रही है।और जहां कहीं थोड़े-बहुत जैन श्रावक हैं भी वहां भी कई स्थानों पर पूजा, प्रक्षालन करने वाले श्रावक ढूंढे नहीं मिलते हैं।ऐसी स्थिति में इस विशाल थाती को कौन संभालेगा।कौन इसका संरक्षण करेगा।देश में जैन धर्मावलंबियों की संख्या यों भी नगण्य हैं और उनमें सभी जैन श्रावक संपन्न और धनवान नहीं हैं। उनमें से अधिकांश लोग रोज कुंआ खोदने और रोज पानी पीने वाली स्थिति में हैं। जिनके लिए आज के कठिन दौर में जीवन-यापन करना  दूभर हो रहा है।उनको संबल दिये बिना और उनका जीवन स्तर बेहतर बनाए बगैर इस महान श्रमण परम्परा का संवर्धन नहीं हो सकता है इसलिए जिनालयों के संरक्षण के साथ-साथ जैन श्रावकों का उन्नयन, संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।आज देश भर में जहां जैन श्रावकों की बहुसंख्या है जैन कम्यूनिटी द्वारा संचालित ऐसे स्कूल,काॅलेज और हाॅस्पीटलों की बेहद जरूरत है, जिनमें जैन श्रावकों को रियायती दरों पर जरूरी सुविधाएं सुलभ कराई जाएं। उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,बड़े शहरों और महानगरों में जैन प्रवासियों को उचित मूल्य पर ठहरने और भोजन की व्यवस्था, रियायती या उचित मूल्य पर रोगोपचार की सुविधा उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए जिससे जैन कम्यूनिटी के सामान्य लोग अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अन्य समुदायों के साथ प्रतियोगिता कर सकें। जैनत्व की दुंदुभी तभी बजेगी। हालांकि इस दिशा में काम हो रहा है लेकिन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो रहा।

सोमवार, 8 जून 2026

अति लाड़-प्यार का दुष्प्रभाव


 यों तो सभी माता-पिता अपने बच्चों को प्यार दुलार करते हैं लेकिन नये नये माता-पिता बने दंपति अपने बच्चे को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित रहते हैं।अपने नौनिहाल के साथ खेलते -खेलाते हुए वे आनंद के अतिरेक से भर जाते हैं।जो उनके लिए एक ऐसा अद्भूत और अनिर्वचनीय अनुभव होता है जिसे बार-बार दोहराना चाहते हैं। लेकिन कामकाज की व्यस्तता के चलते व्यावहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं होता है। जाहिर तौर पर अभिभावकों का बच्चे के साथ  बिताया वक्त  बहुत सुखद होता है जो उनकी बीच भावनात्मक बांडिंग को मजबूत करता है।यह एक ऐसी मनःस्थिति है जो कामकाज और अन्य कारणों से होने वाले मेंटल स्ट्रेस को कम करने में किसी मेडीसन से कम कारगर नहीं है।यह एक ऐसा  फील गुड फैक्टर है जो कार्यक्षमता को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।इसी कारण से माता-पिता बच्चों के साथ यथासंभव ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना पसंद करते हैं। चूंकि हर बात में एक मर्यादा और संतुलन जरूरी होता है लेकिन कुछ अभिभावक से अतिउत्साह में इस मामले में चूक हो जाती है और वे बच्चों पर कुछ ज्यादा ही लाड़ प्यार लुटा देते हैं। उनकी मनमानी और गलतियों को बच्चा समझकर अनदेखा करते हैं।यही अतिरिक्त लेकिन अनावश्यक लाड़ प्यार यानी ओवर पैंपरिंग बच्चों को चिड़चिड़ा, जिद्दी और अटेंशन-सीकर बना देता है।जो कई मामलों में बच्चों में पर्सनेलिटी डिसआर्डर के डेवलप होने की वजह बनता है। जिससे बच्चे हिस्ट्रयोनिक, नाटकीय और मूडी हो जाते हैं।इस अवांछित स्थिति के लिए ओवर-पैंपरिंग काफी हद तक जिम्मेदार है।कभी-कभी बच्चा अपने बड़ों के सानिध्य का इतना अभ्यस्त हो जाता कि वो चाहता हैं कि कोई उसे हर वक्त एंटरटेन करे जो मुमकिन नहीं होता। बच्चे की हर चाहत पूरी होने पर वह इस मामले में न केवल आग्रही हो जाता है बल्कि इससे उलट चाहत पूरी न होने पर उग्र बर्ताव करने लगता है।जो अभिभावक के लिहाज से एक अप्रिय स्थिति होती है। अक्सर इसकी वजह चाहत और जरूरत में फर्क न कर पाना होता है।कई बार तो छः-सात वर्ष या इससे बड़ी उम्र के बच्चों का भी इस तरह का रवैया देखने में आता है और उन्हें जो चीज पसंद आ जाती है वो उसे दिलाने की जिद करने लगते हैं।भले ही आप उस समय ऐसा कर पाने की स्थिति में न हों।यह कोई आकस्मिक स्थिति नहीं है बल्कि जाने अनजाने में धीरे-धीरे उनके अंदर पनपी होती है और उनके इस अनचाहे व्यवहार के लिए अभिभावकों की ओवर-पैंपरिंग यानी अति लाड़-प्यार ही जिम्मेदार  हैं।

रविवार, 7 जून 2026

वरहिया समाज की वैवाहिक चुनौतियां


 समाज में (यहां समाज से वरहिया समाज अभिप्रेत है।) ऐसे बहुत सारे अभिभावक हैं जो बेटियां तो विजातीय(जैन)समाज में ब्याहने को आतुर हैं लेकिन बेटों की गृहस्थी बसाने के लिए बहुओं के लिए समाज का मुंह जोहते हैं। क्योंकि दूसरे समुदाय के लोग (प्रेम-प्रसंग के अपवादों को छोड़कर)आपको अपनी बेटियां देना पसंद नहीं करते।बेटियां आनुपातिक रूप से पहले ही कम हैं। विजातीय समुदायों में भी कमोबेश यही स्थिति है। और यह भी एक सच है कि सामान्यतः सभी लोग विधिक रिश्तों के लिए सजातीय समाज को ही वरीयता देते हैं लेकिन किसी कारणवश सजातीय समुदाय में वधू न मिलने पर ही अन्य समुदाय का रुख करते हैं। हमारी विडंबना ये है कि हमें अपने समाज के युवा वर के रूप में जंचते ही नहीं हैं। दूसरे समुदाय के वर में हमें दर्जनों खूबियां नजर आती हैं। चूंकि उनके बारे में हम अनभिज्ञ रहते हैं और उनके बारे में हमें वे ही बातें पता चलती हैं, जो हमें इस मकसद से बताईं जाती हैं। वैसे भी अब कुलीनता और सामाजिक गौरव जैसी अवधारणाएं कोई मायने नहीं रखतीं। सबसे बड़ा फैक्टर अब पैसा है। तो बहरहाल समाज की लड़कियों के अन्य समाजों में ब्याहने के कारण पहले से ही लड़कियों की कमी से जूझ रही वरहिया समाज के सामने बड़ी दुविधा पूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार उन गांव या कस्बों में जहां वरहिया समाज निवासरत है, बड़ी संख्या में विवाहार्थी युवा विवाह की देहली सीमा पार कर चुके हैं। और उनके मां-बाप उनके गृहस्थी बसाने की उम्मीद संजोए बुढ़ाए जा रहे हैं। यदि यही सिलसिला बना रहा तो आने वाला वक्त इस लिहाज से बहुत मुश्किल वक्त होगा।मेरा इरादा किसी पर अंगुली उठाना या कठघरे में खड़ा करना नहीं है। सिर्फ स्थिति की गंभीरता और भयावहता की ओर इंगित करना भर है।जिसको लोग आज अनदेखा कर रहे हैं।क्योंकि विकल्प न होने या बहुत सीमित विकल्प होने से मजबूरन लोग वंशरक्षा के लिए यहां-वहां से बहुएं मैनेज कर रहे हैं और वह दिन दूर नहीं जब हम आयातित बहुओं से जन्मी आने वाली पीढ़ी के मामा का गोत्र एरियल में धुले कपड़े में दाग़ की तरह ढूंढते ही रह जाएंगे। आखिर इस सबके लिए उत्तरदायी कौन हैं? हम ही न!

 

गुरुवार, 12 मार्च 2026

पंडित कपूरचंद वरैया


 जैन शास्त्रों के परिशीलनकर्ता और वरहिया समाज के सहृदय समाजसेवी पंडित कपूरचंद जी वरैया का जन्म 10 अगस्त 1925 को लश्कर निवासी कुम्हरिया गोत्रीय श्री फूलचंद जी वरैया के घर हुआ था। सरलता और विनम्रता जैसे संस्कार उन्हें बचपन से ही अपने माता-पिता से घुट्टी में मिले थे।प्रारम्भ से ही जैन बोर्डिंग हाऊस लश्कर में अध्ययनरत रहने के कारण उनकी जैन धर्म में सहज रुचि और प्रवृत्ति रही। 1950 में आगरा विश्वविद्यालय से आपने अंग्रेजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और 1955 में साहित्यरत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की।लेकिन 1950 में ही आप महालेखाकार कार्यालय ग्वालियर में लिपिक के रूप में आपको नियुक्ति मिल गई थी।बाद में वे यहीं पर ऑडीटर के रूप में पदोन्नत हुए।पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वे अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति से कोसों दूर रहें।  विशुद्ध भारतीय संस्कृति के पोषक और  जिनवाणी माता की सेवा में सर्वदा दत्तचित्त होकर संलग्न रहने वाले पंडित कपूरचन्द जी वरैया अत्यंत सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। छात्र जीवन में ही ग्वालियर में जैन संत पूज्य वर्णी जी का मंगल सानिध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उनके चातुर्मास के प्रबंधनों से जुड़े रहने के कारण आपके हृदय में धर्म के प्रति जो उत्कट जिज्ञासा पैदा हुई, वह आजीवन उनकी उत्प्रेरक शक्ति बनी रही।वरैया जी वर्णी जी के प्रवचनों को नित्यप्रति पूरे मनोयोग से सुनते और गुनते थे और उन्हें अपनी डायरी में लिपिबद्ध करते थे जिसे उन्होंने 'सुख की झलक' नाम से संकलित किया। जो बाद में 15 भागों में स्वतन्त्र कृतियों के रूप में प्रकाशित हुई। साहित्य सेवा के क्षेत्र में यह आपका उल्लेखनीय योगदान है।आप गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के कृतित्व से बहुत प्रभावित थे।जिस कारण आपका गुरु जी के प्रति अगाध श्रद्धा भाव था। गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया स्मृति ग्रन्थ की रचना  में आपका बहुमूल्य योगदान रहा है।आप छात्रावस्था में ही भजनों के रूप में पद्यात्मक रचनायें करने लगे थे।आपके लगभग 30 लेख  विभिन्न जैन पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। 'भजन पीयूष' आपकी एक स्वतन्त्र पद्य-रचना है। आपने 'जैनधर्म और  विज्ञान' पुस्तक जिसमें प्रोफेसर घासीराम जैन के लेख संकलित हैं,का स्वतंत्र रूप से सम्पादन किया और 'ग्वालियर जैन  निर्देशिका' के सह-सम्पादक रहे।आपने पंडित लेखराज जी वरैया की कृति वरैया विलास की समीक्षात्मक भूमिका भी लिखी है।आपकी कथन शैली बहुत प्रांजल और सुबोध थी।आपने अपने सुकृत से उपार्जित द्रव्य का सदुपयोग कर लगभग 8 हजार रुपए दान स्वरूप दिए। जिससे भूखंड खरीदकर  1967 में दानाओली लश्कर में जैन भवन की नींव पड़ी।जो आज वरहिया समाज की एक बहुमूल्य सामाजिक धरोहर है।आपकी सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक सेवाओं के प्रतिफल में जैन समाज लश्कर ने 1967 में आपका सार्वजनिक अभिनन्दन कर 'धर्म भूषण'  की उपाधि से सम्मानित किया था ।आप वीर जैन छात्रावास, चम्पाबाग लश्कर के पाँच वर्ष  अधीक्षक भी रहे । आप एक गुणी श्रावक और ओजपूर्ण शैली के प्रभावी वक्‍ता रहे हैं। पंडित कपूरचंद जी वरैया दानाओली लश्कर स्थित जैन भवन की नींव का पत्थर रहे हैं।आज जब जैन भवन का पुनर्निर्माण हो रहा है तो उसमें जैन भवन के इस मूल स्वप्नद्रष्टा का नामोल्लेख किसी सहजदृश्य स्थान पर अवश्य होना चाहिए।