मंगलवार, 9 जून 2026

धर्म प्रभावना का स्वरूप


 धनिक धर्मानुरागी जैन श्रावक   जैन धर्म की प्रभावना के लिए अंत: प्रेरणा से और साधु-संतों की अनुप्रेरणा से सर्वदा सचेष्ट रहते आए हैं और आज भी पीछे नहीं है।जिसकी फलश्रुति देश भर में नये-नवेले भव्य जिनालयों और सर्वसुविधायुक्त जैन तीर्थों के अवतरण के रूप में हुई है। जिन्हें जैन पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान मिला है और वे वास्तुकला की दृष्टि से भी बेजोड़ हैं। इन्हें बनाने या विकसित करने में अनेकों करोड़ रुपए व्यय किए गए हैं।ये तीर्थ धर्म प्रभावना का निमित्त बनने के साथ-साथ उनके प्रवर्तक साधुओं के गौरव स्मारक भी है। प्रायः सभी साधुओं के अनुयायी वृंद ने अपने अपने श्रद्धाभाजन साधुओं के नाम पर कृतज्ञता ज्ञापन स्वरूप कोई न कोई तीर्थ उन साधुओं द्वारा निर्दिष्ट स्थान पर विकसित किया हैं। देश में जैन धर्मायतनों की कमी नहीं है।लेकिन धर्म प्रभावना के नाम पर नये नये तीर्थ जो अत्याधुनिक सर्वसुविधायुक्त पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किए जा रहे हैं, का सृजन करने के स्थान पर हाॅस्पीटल,काॅलेज जैसे सर्वोपयोगी संस्थान बनाए जाएं तो जैन धर्म और जैन धर्मालुओं दोनों का पर्याप्त रूप से संरक्षण ,संवर्धन होगा। क्योंकि श्रमण जीवन मूल्यों के केन्द्र के रूप में इन संस्थानों को विकसित करने के अभियान पर यह जो विपुल धनराशि पानी की तरह बहाई जा रही है वह तभी फलीभूत और सार्थक होगी जब उस धर्म के अनुयायी या अनुपालक समाज में मौजूद रहेंगे। जैन धर्म का अस्तित्व जैन स्मारकों पर नहीं बल्कि जैन श्रावकों के अस्तित्व पर निर्भर है। यदि जैन श्रावक सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम और समर्थ नहीं होंगे तो इस सांस्कृतिक परंपरा का उचित संवहन, संवर्धन कौन करेगा।आज भी देश में सैंकड़ों जिनालय उपेक्षित पड़े हैं जो हमारे समृद्ध अतीत की गौरवगाथा कह रहे हैं लेकिन वर्तमान की दुर्दशा पर भी आंसू बहा रहे हैं। क्योंकि जैन श्रावकों के न होने के कारण अनेकों स्थानों पर उपेक्षित पड़े  जिनालय अतिक्रमण का शिकार हो रहे हैं। उनकी समुचित देखभाल नहीं हो पा रही है।और जहां कहीं थोड़े-बहुत जैन श्रावक हैं भी वहां भी कई स्थानों पर पूजा, प्रक्षालन करने वाले श्रावक ढूंढे नहीं मिलते हैं।ऐसी स्थिति में इस विशाल थाती को कौन संभालेगा।कौन इसका संरक्षण करेगा।देश में जैन धर्मावलंबियों की संख्या यों भी नगण्य हैं और उनमें सभी जैन श्रावक संपन्न और धनवान नहीं हैं। उनमें से अधिकांश लोग रोज कुंआ खोदने और रोज पानी पीने वाली स्थिति में हैं। जिनके लिए आज के कठिन दौर में जीवन-यापन करना  दूभर हो रहा है।उनको संबल दिये बिना और उनका जीवन स्तर बेहतर बनाए बगैर इस महान श्रमण परम्परा का संवर्धन नहीं हो सकता है इसलिए जिनालयों के संरक्षण के साथ-साथ जैन श्रावकों का उन्नयन, संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।आज देश भर में जहां जैन श्रावकों की बहुसंख्या है जैन कम्यूनिटी द्वारा संचालित ऐसे स्कूल,काॅलेज और हाॅस्पीटलों की बेहद जरूरत है, जिनमें जैन श्रावकों को रियायती दरों पर जरूरी सुविधाएं सुलभ कराई जाएं। उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,बड़े शहरों और महानगरों में जैन प्रवासियों को उचित मूल्य पर ठहरने और भोजन की व्यवस्था, रियायती या उचित मूल्य पर रोगोपचार की सुविधा उपलब्ध कराना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए जिससे जैन कम्यूनिटी के सामान्य लोग अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अन्य समुदायों के साथ प्रतियोगिता कर सकें। जैनत्व की दुंदुभी तभी बजेगी। हालांकि इस दिशा में काम हो रहा है लेकिन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो रहा।

सोमवार, 8 जून 2026

अति लाड़-प्यार का दुष्प्रभाव


 यों तो सभी माता-पिता अपने बच्चों को प्यार दुलार करते हैं लेकिन नये नये माता-पिता बने दंपति अपने बच्चे को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित रहते हैं।अपने नौनिहाल के साथ खेलते -खेलाते हुए वे आनंद के अतिरेक से भर जाते हैं।जो उनके लिए एक ऐसा अद्भूत और अनिर्वचनीय अनुभव होता है जिसे बार-बार दोहराना चाहते हैं। लेकिन कामकाज की व्यस्तता के चलते व्यावहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं होता है। जाहिर तौर पर अभिभावकों का बच्चे के साथ  बिताया वक्त  बहुत सुखद होता है जो उनकी बीच भावनात्मक बांडिंग को मजबूत करता है।यह एक ऐसी मनःस्थिति है जो कामकाज और अन्य कारणों से होने वाले मेंटल स्ट्रेस को कम करने में किसी मेडीसन से कम कारगर नहीं है।यह एक ऐसा  फील गुड फैक्टर है जो कार्यक्षमता को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।इसी कारण से माता-पिता बच्चों के साथ यथासंभव ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना पसंद करते हैं। चूंकि हर बात में एक मर्यादा और संतुलन जरूरी होता है लेकिन कुछ अभिभावक से अतिउत्साह में इस मामले में चूक हो जाती है और वे बच्चों पर कुछ ज्यादा ही लाड़ प्यार लुटा देते हैं। उनकी मनमानी और गलतियों को बच्चा समझकर अनदेखा करते हैं।यही अतिरिक्त लेकिन अनावश्यक लाड़ प्यार यानी ओवर पैंपरिंग बच्चों को चिड़चिड़ा, जिद्दी और अटेंशन-सीकर बना देता है।जो कई मामलों में बच्चों में पर्सनेलिटी डिसआर्डर के डेवलप होने की वजह बनता है। जिससे बच्चे हिस्ट्रयोनिक, नाटकीय और मूडी हो जाते हैं।इस अवांछित स्थिति के लिए ओवर-पैंपरिंग काफी हद तक जिम्मेदार है।कभी-कभी बच्चा अपने बड़ों के सानिध्य का इतना अभ्यस्त हो जाता कि वो चाहता हैं कि कोई उसे हर वक्त एंटरटेन करे जो मुमकिन नहीं होता। बच्चे की हर चाहत पूरी होने पर वह इस मामले में न केवल आग्रही हो जाता है बल्कि इससे उलट चाहत पूरी न होने पर उग्र बर्ताव करने लगता है।जो अभिभावक के लिहाज से एक अप्रिय स्थिति होती है। अक्सर इसकी वजह चाहत और जरूरत में फर्क न कर पाना होता है।कई बार तो छः-सात वर्ष या इससे बड़ी उम्र के बच्चों का भी इस तरह का रवैया देखने में आता है और उन्हें जो चीज पसंद आ जाती है वो उसे दिलाने की जिद करने लगते हैं।भले ही आप उस समय ऐसा कर पाने की स्थिति में न हों।यह कोई आकस्मिक स्थिति नहीं है बल्कि जाने अनजाने में धीरे-धीरे उनके अंदर पनपी होती है और उनके इस अनचाहे व्यवहार के लिए अभिभावकों की ओवर-पैंपरिंग यानी अति लाड़-प्यार ही जिम्मेदार  हैं।

रविवार, 7 जून 2026

वरहिया समाज की वैवाहिक चुनौतियां


 समाज में (यहां समाज से वरहिया समाज अभिप्रेत है।) ऐसे बहुत सारे अभिभावक हैं जो बेटियां तो विजातीय(जैन)समाज में ब्याहने को आतुर हैं लेकिन बेटों की गृहस्थी बसाने के लिए बहुओं के लिए समाज का मुंह जोहते हैं। क्योंकि दूसरे समुदाय के लोग (प्रेम-प्रसंग के अपवादों को छोड़कर)आपको अपनी बेटियां देना पसंद नहीं करते।बेटियां आनुपातिक रूप से पहले ही कम हैं। विजातीय समुदायों में भी कमोबेश यही स्थिति है। और यह भी एक सच है कि सामान्यतः सभी लोग विधिक रिश्तों के लिए सजातीय समाज को ही वरीयता देते हैं लेकिन किसी कारणवश सजातीय समुदाय में वधू न मिलने पर ही अन्य समुदाय का रुख करते हैं। हमारी विडंबना ये है कि हमें अपने समाज के युवा वर के रूप में जंचते ही नहीं हैं। दूसरे समुदाय के वर में हमें दर्जनों खूबियां नजर आती हैं। चूंकि उनके बारे में हम अनभिज्ञ रहते हैं और उनके बारे में हमें वे ही बातें पता चलती हैं, जो हमें इस मकसद से बताईं जाती हैं। वैसे भी अब कुलीनता और सामाजिक गौरव जैसी अवधारणाएं कोई मायने नहीं रखतीं। सबसे बड़ा फैक्टर अब पैसा है। तो बहरहाल समाज की लड़कियों के अन्य समाजों में ब्याहने के कारण पहले से ही लड़कियों की कमी से जूझ रही वरहिया समाज के सामने बड़ी दुविधा पूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार उन गांव या कस्बों में जहां वरहिया समाज निवासरत है, बड़ी संख्या में विवाहार्थी युवा विवाह की देहली सीमा पार कर चुके हैं। और उनके मां-बाप उनके गृहस्थी बसाने की उम्मीद संजोए बुढ़ाए जा रहे हैं। यदि यही सिलसिला बना रहा तो आने वाला वक्त इस लिहाज से बहुत मुश्किल वक्त होगा।मेरा इरादा किसी पर अंगुली उठाना या कठघरे में खड़ा करना नहीं है। सिर्फ स्थिति की गंभीरता और भयावहता की ओर इंगित करना भर है।जिसको लोग आज अनदेखा कर रहे हैं।क्योंकि विकल्प न होने या बहुत सीमित विकल्प होने से मजबूरन लोग वंशरक्षा के लिए यहां-वहां से बहुएं मैनेज कर रहे हैं और वह दिन दूर नहीं जब हम आयातित बहुओं से जन्मी आने वाली पीढ़ी के मामा का गोत्र एरियल में धुले कपड़े में दाग़ की तरह ढूंढते ही रह जाएंगे। आखिर इस सबके लिए उत्तरदायी कौन हैं? हम ही न!

 

गुरुवार, 12 मार्च 2026

पंडित कपूरचंद वरैया


 जैन शास्त्रों के परिशीलनकर्ता और वरहिया समाज के सहृदय समाजसेवी पंडित कपूरचंद जी वरैया का जन्म 10 अगस्त 1925 को लश्कर निवासी कुम्हरिया गोत्रीय श्री फूलचंद जी वरैया के घर हुआ था। सरलता और विनम्रता जैसे संस्कार उन्हें बचपन से ही अपने माता-पिता से घुट्टी में मिले थे।प्रारम्भ से ही जैन बोर्डिंग हाऊस लश्कर में अध्ययनरत रहने के कारण उनकी जैन धर्म में सहज रुचि और प्रवृत्ति रही। 1950 में आगरा विश्वविद्यालय से आपने अंग्रेजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और 1955 में साहित्यरत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की।लेकिन 1950 में ही आप महालेखाकार कार्यालय ग्वालियर में लिपिक के रूप में आपको नियुक्ति मिल गई थी।बाद में वे यहीं पर ऑडीटर के रूप में पदोन्नत हुए।पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वे अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति से कोसों दूर रहें।  विशुद्ध भारतीय संस्कृति के पोषक और  जिनवाणी माता की सेवा में सर्वदा दत्तचित्त होकर संलग्न रहने वाले पंडित कपूरचन्द जी वरैया अत्यंत सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। छात्र जीवन में ही ग्वालियर में जैन संत पूज्य वर्णी जी का मंगल सानिध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उनके चातुर्मास के प्रबंधनों से जुड़े रहने के कारण आपके हृदय में धर्म के प्रति जो उत्कट जिज्ञासा पैदा हुई, वह आजीवन उनकी उत्प्रेरक शक्ति बनी रही।वरैया जी वर्णी जी के प्रवचनों को नित्यप्रति पूरे मनोयोग से सुनते और गुनते थे और उन्हें अपनी डायरी में लिपिबद्ध करते थे जिसे उन्होंने 'सुख की झलक' नाम से संकलित किया। जो बाद में 15 भागों में स्वतन्त्र कृतियों के रूप में प्रकाशित हुई। साहित्य सेवा के क्षेत्र में यह आपका उल्लेखनीय योगदान है।आप गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के कृतित्व से बहुत प्रभावित थे।जिस कारण आपका गुरु जी के प्रति अगाध श्रद्धा भाव था। गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया स्मृति ग्रन्थ की रचना  में आपका बहुमूल्य योगदान रहा है।आप छात्रावस्था में ही भजनों के रूप में पद्यात्मक रचनायें करने लगे थे।आपके लगभग 30 लेख  विभिन्न जैन पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। 'भजन पीयूष' आपकी एक स्वतन्त्र पद्य-रचना है। आपने 'जैनधर्म और  विज्ञान' पुस्तक जिसमें प्रोफेसर घासीराम जैन के लेख संकलित हैं,का स्वतंत्र रूप से सम्पादन किया और 'ग्वालियर जैन  निर्देशिका' के सह-सम्पादक रहे।आपने पंडित लेखराज जी वरैया की कृति वरैया विलास की समीक्षात्मक भूमिका भी लिखी है।आपकी कथन शैली बहुत प्रांजल और सुबोध थी।आपने अपने सुकृत से उपार्जित द्रव्य का सदुपयोग कर लगभग 8 हजार रुपए दान स्वरूप दिए। जिससे भूखंड खरीदकर  1967 में दानाओली लश्कर में जैन भवन की नींव पड़ी।जो आज वरहिया समाज की एक बहुमूल्य सामाजिक धरोहर है।आपकी सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक सेवाओं के प्रतिफल में जैन समाज लश्कर ने 1967 में आपका सार्वजनिक अभिनन्दन कर 'धर्म भूषण'  की उपाधि से सम्मानित किया था ।आप वीर जैन छात्रावास, चम्पाबाग लश्कर के पाँच वर्ष  अधीक्षक भी रहे । आप एक गुणी श्रावक और ओजपूर्ण शैली के प्रभावी वक्‍ता रहे हैं। पंडित कपूरचंद जी वरैया दानाओली लश्कर स्थित जैन भवन की नींव का पत्थर रहे हैं।आज जब जैन भवन का पुनर्निर्माण हो रहा है तो उसमें जैन भवन के इस मूल स्वप्नद्रष्टा का नामोल्लेख किसी सहजदृश्य स्थान पर अवश्य होना चाहिए।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

भट्टारक कोठी


 नियंत्रणाधीन समाज की जो भी थाती है।
 भट्टारक कोठी उनमें पहले आती है।


वरहिया समाज के गौरव की पहचान है ये।
पूरे समाज की आन-बान और शान है ये।


कोई आंच न आवे इसे, सभी का सपना है।
इसलिए इसे ,ऐसे हाथों में रखना है।


जो मन से और जतन से साज संभाल करे।कर्तव्य निबाहे बिना हिचक के ,बिना डरे।


जो कोठी के विकास के हित प्रतिबद्ध रहे।
उसकी संरक्षा को उद्यत, सन्नद्ध रहे।


यह बात सभी को अपने मन में गुनना है।
इसके निमित्त कर्मठ लोगों को चुनना है।


इस पर कोई छाया राजनीति की नहीं पड़े।
उन्नति के सोपानों पर यह दिन-रात चढ़े।
    



शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

उत्तरदायी कौन?

ब्याह हो गया, बहू आ गई, हुई पुरा में चर्चा।
घरवालों ने किया खुशी में, हाथ खोल के खर्चा।


पड़ा घूमना कहां-कहां,कितनों के पीछे-आगे।
जोड़े हाथ दलालों के,दिए दाम उन्हें मुंह मांगे।


पापड़ बेले ढेरों तब यह खुशी और बहू आई।
गूंजी बोहरे के घर में जाकर के तब  शहनाई।


ब्याह चुके विजाति में अपनी बेटी जो संभ्रांत।
उनके कारण ही समाज के लोग आज हैं क्लांत।


लड़के ज्यादा और लड़की कम,सो बिगड़ा अनुपात।
इस कारण ही बहुओं का करना पड़ता आयात।


गलती किसी और की लेकिन भरता कोई और।
विषम स्थिति है सचमुच,करिए इस पर कुछ गौर।


इस सामाजिक स्थिति का उत्तरदायी है कौन।
इसका उत्तर कठिन नहीं, फिर भी हैं सारे मौन।












 

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

जैन दृष्टि में कर्मकांड


 जैन धर्म मूलतः कर्मकांड प्रधान धर्म नहीं है। क्योंकि जैन साधना आत्मोत्थान केंद्रित रही है।भगवान महावीर और उनसे पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के समय में जैन धर्मावलंबियों का आग्रह आत्मशुद्धि, संयम,तप,ध्यान,अहिंसा और कर्मों की निर्जरा पर रहता था।आगम की दृष्टि में भाव, संयम और ज्ञान ही प्रमुख हैं।
इसलिए उनका सारा बल आंतरिक साधना पर था,बाह्य प्रदर्शन पर नहीं। प्राचीन काल में हवन,अनुष्ठान, पूजा विधि का स्वरूप भी आज से काफी भिन्न रहा है।फल की कामना के साथ आरती,पूजा-अर्चना, मंत्रपाठ करना यह सब उत्तरवर्ती विकास है।जो बौद्ध, वैदिक और लोक परंपराओं के प्रभाव के कारण और साधना को सामूहिक रूप देने के प्रयास में आगम सम्मत न होने के बावजूद यह शनै: शनै: अपने वर्तमान स्वरूप में विकसित हुआ है।
आगम में तो 'किरिया बहिया न मुक्खा' (बाह्य क्रिया मुख्य नहीं है) 'भावेण णिज्जरिज्जइ' (निर्जरा भाव से होती है) का स्पष्ट विधान है।बिना संयम के कोई भी क्रिया फलदायक नहीं होती। जैनागम में सदैव सामयिक,प्रतिक्रमण, ध्यान, स्वाध्याय और व्रत उपवास पर बल रहा है। 'अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य। अप्पा मित्तममित्तं च, तदुप्पट्ठिय सुप्पट्ठिओ।'आत्मा ही कर्मों का कर्ता और भोक्ता है।आत्मा को कर्मों से मुक्त करना ही साधना का मुख्य लक्ष्य है। जबकि कर्मकांड एक बाह्याचार है। वस्तुत:यह एक विचलन या स्खलन है और उसकी सीमित उपादेयता तभी है जब वह अहिंसा और संयम की ओर ले जाए, उसमें श्रद्धा दृढ़ करे।इस दशा में भी ये कर्मकांड साधन मात्र हैं ,साध्य नहीं। लौकिक फल प्राप्ति के लिए हवन, अनुष्ठान करना व  आराधना और स्तुति में मनोरथ पूर्ति की कामना या याचना करना अर्थात लौकिक अभीप्सा रखना जैनागम सम्मत नहीं है। लेकिन अज्ञानतावश हम यथार्थ से विमुख होकर कर्मकांड के इंद्रजाल में फंसे हुए हैं। आज यह एक स्थापित व्यवसाय बन गया है, जिससे कई लोगों के आर्थिक हित जुड़े हैं। कर्मकांड के इस इंद्रजाल का हमारे ऊपर इतना गहरा सम्मोहन है कि कुछ लोगों को ये खंडन-मंडन बेहद नागवार गुजर सकता है।