बुधवार, 21 मई 2025

आओ विचारें बैठकर

                             (चित्र : गूगल से साभार)
 

'हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें बैठकर हम ये समस्याएं सभी।'
दद्दा के शब्दों में कहूं मैं भी, तो क्या फिर हर्ज है।
लोगों को चेताना ही तो,कवियों का होता फर्ज है।
यों भी तो मुट्ठी भर हैं हम, संख्या हमारी न्यून है।
खांचों में उनको बांटना एक  खतरनाक जुनून है।
पहले तो पूर्वाग्रह हैं जो भी, सभी अपने  छोड़ दें।
 छोड़ें सभी कड़वाहटें दिल से दिलों को जोड़ दें।
हल खोजने की शर्त यह है दिल हमारे साफ हों।
गलती हुई हों अगर कुछ,वे गलतियां भी माफ हों।
क्यों न शुरू से प्रगति की, मिलकर इबारत हम लिखें।
बातों से और कामों से भी; सच्चे बनें,अच्छे दिखें।।
        ✍🏻 श्रीश राकेश जैन,लहार



 

 

सोमवार, 19 मई 2025

सास-बहू का मंदिर व तेली का मंदिर


    (चित्र : गूगल से साभार)

ग्वालियर दुर्ग परिसर में स्थित दर्शनीय स्मारकों में सास -बहू का मंदिर और तेली का मंदिर उल्लेखनीय हैं। सास-बहू का मंदिर जो सहस्रबाहु मंदिर का ही अपर नाम है 11 वीं सदी का जुड़वां मंदिर है।यह भगवान विष्णु और शिव को समर्पित है जिसका निर्माण 1093 ईस्वी में कच्छप घात वंशी नरेश महिपाल ने कराया था। सहस्रबाहु मंदिर के अद्वितीय शिल्प के अलावा उसका नाम भी लोगों में कुतूहल और उत्सुकता पैदा करता है।इस मंदिर में भगवान विष्णु को हजार हाथों के साथ दर्शाया गया था।जिस कारण इसका यह नाम पड़ा।कछवाहा नरेश महिपाल ने अपनी विष्णु भक्त पत्नी और शिवभक्त पुत्रवधू के निमित्त इन मंदिरों का निर्माण कराया था। मंदिर से एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जिससे यह तो ज्ञात होता है कि इस मंदिर को कछवाहा राजपूत राजा महिपाल ने 1093 ईस्वी में पूर्ण कराया लेकिन यह किस देवता को समर्पित है इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। परम्परागत रूप से लोग इन जुड़वां मंदिरों को विष्णु और शिव के मंदिर मानते हैं।
लेकिन इस विषय में ग्वालियर के विद्वान और जैन इतिहासकार श्री रामजीत जैन, एडवोकेट का अभिमत सर्वथा भिन्न है और वे इसे एक जैन मंदिर मानते हैं। उनके मतानुसार एक भक्त राजपूत ने अष्टान्हिका व्रत के उपलक्ष्य में नन्दीश्वर द्वीप की अनुकृति पर इस जैन मन्दिर का निर्माण कराया था।नन्दीश्वर द्वीप जाने वाले देव-देवियों की मूर्तियाँ नृत्य एवं विभिन्न मुद्राओं में मन्दिर के सभी भागों में उत्कीर्ण करायी गईं। संभवतया मुस्लिम काल में इन मूर्तियों का भंजन कर दिया गया।बड़े मंदिर के साथ बने छोटे मंदिर की भी यही परिणति हुई लेकिन हैं ये मूलतः जैन मंदिर ही।इनका निर्माण सेतवाल जैन जाति के सहस्रबाहु गोत्र के श्रेष्ठी ने कराया था।सेतवाल जाति जैन समाज की 84 जातियों में से एक है और इसके 18 गोत्रों में एक गोत्र सहस्रबाहु है।इस कारण इस मंदिर का नामकरण सहस्रबाहु का मंदिर हुआ था।
दुर्ग परिसर की सबसे ऊंची संरचनाओं में से एक तेली का मंदिर है जो द्रविड़ शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है और भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण ईसा की 9वीं शती में प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासनकाल में हुआ। बताते हैं कि तेल व्यापारियों द्वारा दिए गए दान के धन से इस मंदिर का निर्माण किया गया था।इस कारण इसका तेली का मंदिर या तेलिका मंदिर नाम पड़ा।कई विद्वान इस मंदिर का काल 8वीं शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दी के आरंभिक काल के बीच मानते हैं। इतिहासकार इसे एक हिंदू मंदिर मानते हैं और यह शिव, विष्णु और मातृकाओं (मातृदेवियों) को समर्पित है। मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है।
जैन इतिहासकार श्री रामजीत जैन एडवोकेट के अभिमतानुसार यह मंदिर राजा आम (जो कन्नौज के राजा यशोवर्मन के पुत्र थे) की वैश्य पत्नी से उत्पन्न राज कोठारी के वंशज तोलाशाह ने बनवाया था। राज कोठारी को 'आम' के गुरु जैनाचार्य वप्पभट्टि सूरी ने जैन धर्म में दीक्षित किया था जो ओसवाल जाति में सम्मिलित हो गया था। उसकी आठवीं पीढ़ी में तोलाशाह हुआ। यह बहुत बड़ा न्यायी, ज्ञानी, मानी और धनी था। जैन धर्म का बड़ा अनुरागी था। उन्होंने द्रविड़ शैली के इस भव्य जिनालय का निर्माण कराया था। तोलाशाह के मन्दिर का अपभ्रंश रूप 'तेली का मन्दिर' नाम कालान्तर में लोक में प्रसिद्ध हुआ। यह भी मूलतः एक जैन मन्दिर है।जो भगवान आदिनाथ को समर्पित है।इसके चारों ओर वराटिका (मुख्य भवन से संलग्न छोटा उपवन)में जैन मन्दिर या मन्दिरों के पाषाण स्तम्भ तथा तीर्थंकर मूर्तियाँ रखी हुई हैं। ये मूर्तियां किस मन्दिर की है तथा खुले मैदान में क्यों रखी गई है। यह ज्ञात नहीं है। श्री रामजीत जी जैन की मान्यता है कि यह पुरासामग्री तेली के मन्दिर और उसके निकट बने हुए एक जीर्ण मन्दिर की हैं। इस मन्दिर के निकट एक जीर्ण-शीर्ण कमरा बना हुआ है। सन् 1844 में कनिंघम ने इस 35 फुट लम्बे और 15 फुट चौड़े कमरे को जैनों के 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मन्दिर माना है।