'हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें बैठकर हम ये समस्याएं सभी।'
दद्दा के शब्दों में कहूं मैं भी, तो क्या फिर हर्ज है।
लोगों को चेताना ही तो,कवियों का होता फर्ज है।
यों भी तो मुट्ठी भर हैं हम, संख्या हमारी न्यून है।
खांचों में उनको बांटना एक खतरनाक जुनून है।
पहले तो पूर्वाग्रह हैं जो भी, सभी अपने छोड़ दें।
छोड़ें सभी कड़वाहटें दिल से दिलों को जोड़ दें।
हल खोजने की शर्त यह है दिल हमारे साफ हों।
गलती हुई हों अगर कुछ,वे गलतियां भी माफ हों।
क्यों न शुरू से प्रगति की, मिलकर इबारत हम लिखें।
बातों से और कामों से भी; सच्चे बनें,अच्छे दिखें।।
✍🏻 श्रीश राकेश जैन,लहार


