वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
गुरुवार, 12 मार्च 2026
पंडित कपूरचंद वरैया
जैन शास्त्रों के परिशीलनकर्ता और वरहिया समाज के सहृदय समाजसेवी पंडित कपूरचंद जी वरैया का जन्म 10 अगस्त 1925 को लश्कर निवासी कुम्हरिया गोत्रीय श्री फूलचंद जी वरैया के घर हुआ था। सरलता और विनम्रता जैसे संस्कार उन्हें बचपन से ही अपने माता-पिता से घुट्टी में मिले थे।प्रारम्भ से ही जैन बोर्डिंग हाऊस लश्कर में अध्ययनरत रहने के कारण उनकी जैन धर्म में सहज रुचि और प्रवृत्ति रही। 1950 में आगरा विश्वविद्यालय से आपने अंग्रेजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और 1955 में साहित्यरत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की।लेकिन 1950 में ही आप महालेखाकार कार्यालय ग्वालियर में लिपिक के रूप में आपको नियुक्ति मिल गई थी।बाद में वे यहीं पर ऑडीटर के रूप में पदोन्नत हुए।पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वे अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति से कोसों दूर रहें। विशुद्ध भारतीय संस्कृति के पोषक और जिनवाणी माता की सेवा में सर्वदा दत्तचित्त होकर संलग्न रहने वाले पंडित कपूरचन्द जी वरैया अत्यंत सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। छात्र जीवन में ही ग्वालियर में जैन संत पूज्य वर्णी जी का मंगल सानिध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उनके चातुर्मास के प्रबंधनों से जुड़े रहने के कारण आपके हृदय में धर्म के प्रति जो उत्कट जिज्ञासा पैदा हुई, वह आजीवन उनकी उत्प्रेरक शक्ति बनी रही।वरैया जी वर्णी जी के प्रवचनों को नित्यप्रति पूरे मनोयोग से सुनते और गुनते थे और उन्हें अपनी डायरी में लिपिबद्ध करते थे जिसे उन्होंने 'सुख की झलक' नाम से संकलित किया। जो बाद में 15 भागों में स्वतन्त्र कृतियों के रूप में प्रकाशित हुई। साहित्य सेवा के क्षेत्र में यह आपका उल्लेखनीय योगदान है।आप गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के कृतित्व से बहुत प्रभावित थे।जिस कारण आपका गुरु जी के प्रति अगाध श्रद्धा भाव था। गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया स्मृति ग्रन्थ की रचना में आपका बहुमूल्य योगदान रहा है।आप छात्रावस्था में ही भजनों के रूप में पद्यात्मक रचनायें करने लगे थे।आपके लगभग 30 लेख विभिन्न जैन पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। 'भजन पीयूष' आपकी एक स्वतन्त्र पद्य-रचना है। आपने 'जैनधर्म और विज्ञान' पुस्तक जिसमें प्रोफेसर घासीराम जैन के लेख संकलित हैं,का स्वतंत्र रूप से सम्पादन किया और 'ग्वालियर जैन निर्देशिका' के सह-सम्पादक रहे।आपने पंडित लेखराज जी वरैया की कृति वरैया विलास की समीक्षात्मक भूमिका भी लिखी है।आपकी कथन शैली बहुत प्रांजल और सुबोध थी।आपने अपने सुकृत से उपार्जित द्रव्य का सदुपयोग कर लगभग 8 हजार रुपए दान स्वरूप दिए। जिससे भूखंड खरीदकर 1967 में दानाओली लश्कर में जैन भवन की नींव पड़ी।जो आज वरहिया समाज की एक बहुमूल्य सामाजिक धरोहर है।आपकी सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक सेवाओं के प्रतिफल में जैन समाज लश्कर ने 1967 में आपका सार्वजनिक अभिनन्दन कर 'धर्म भूषण' की उपाधि से सम्मानित किया था ।आप वीर जैन छात्रावास, चम्पाबाग लश्कर के पाँच वर्ष अधीक्षक भी रहे । आप एक गुणी श्रावक और ओजपूर्ण शैली के प्रभावी वक्ता रहे हैं। पंडित कपूरचंद जी वरैया दानाओली लश्कर स्थित जैन भवन की नींव का पत्थर रहे हैं।आज जब जैन भवन का पुनर्निर्माण हो रहा है तो उसमें जैन भवन के इस मूल स्वप्नद्रष्टा का नामोल्लेख किसी सहजदृश्य स्थान पर अवश्य होना चाहिए।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2026
भट्टारक कोठी
नियंत्रणाधीन समाज की जो भी थाती है।
भट्टारक कोठी उनमें पहले आती है।
वरहिया समाज के गौरव की पहचान है ये।
पूरे समाज की आन-बान और शान है ये।
कोई आंच न आवे इसे, सभी का सपना है।
इसलिए इसे ,ऐसे हाथों में रखना है।
जो मन से और जतन से साज संभाल करे।कर्तव्य निबाहे बिना हिचक के ,बिना डरे।
जो कोठी के विकास के हित प्रतिबद्ध रहे।
उसकी संरक्षा को उद्यत, सन्नद्ध रहे।
यह बात सभी को अपने मन में गुनना है।
इसके निमित्त कर्मठ लोगों को चुनना है।
इस पर कोई छाया राजनीति की नहीं पड़े।
उन्नति के सोपानों पर यह दिन-रात चढ़े।
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
उत्तरदायी कौन?
ब्याह हो गया, बहू आ गई, हुई पुरा में चर्चा।
घरवालों ने किया खुशी में, हाथ खोल के खर्चा।
पड़ा घूमना कहां-कहां,कितनों के पीछे-आगे।
जोड़े हाथ दलालों के,दिए दाम उन्हें मुंह मांगे।
पापड़ बेले ढेरों तब यह खुशी और बहू आई।
गूंजी बोहरे के घर में जाकर के तब शहनाई।
ब्याह चुके विजाति में अपनी बेटी जो संभ्रांत।
उनके कारण ही समाज के लोग आज हैं क्लांत।
लड़के ज्यादा और लड़की कम,सो बिगड़ा अनुपात।
इस कारण ही बहुओं का करना पड़ता आयात।
गलती किसी और की लेकिन भरता कोई और।
विषम स्थिति है सचमुच,करिए इस पर कुछ गौर।
इस सामाजिक स्थिति का उत्तरदायी है कौन।
इसका उत्तर कठिन नहीं, फिर भी हैं सारे मौन।
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
जैन दृष्टि में कर्मकांड
जैन धर्म मूलतः कर्मकांड प्रधान धर्म नहीं है। क्योंकि जैन साधना आत्मोत्थान केंद्रित रही है।भगवान महावीर और उनसे पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के समय में जैन धर्मावलंबियों का आग्रह आत्मशुद्धि, संयम,तप,ध्यान,अहिंसा और कर्मों की निर्जरा पर रहता था।आगम की दृष्टि में भाव, संयम और ज्ञान ही प्रमुख हैं।
इसलिए उनका सारा बल आंतरिक साधना पर था,बाह्य प्रदर्शन पर नहीं। प्राचीन काल में हवन,अनुष्ठान, पूजा विधि का स्वरूप भी आज से काफी भिन्न रहा है।फल की कामना के साथ आरती,पूजा-अर्चना, मंत्रपाठ करना यह सब उत्तरवर्ती विकास है।जो बौद्ध, वैदिक और लोक परंपराओं के प्रभाव के कारण और साधना को सामूहिक रूप देने के प्रयास में आगम सम्मत न होने के बावजूद यह शनै: शनै: अपने वर्तमान स्वरूप में विकसित हुआ है।
आगम में तो 'किरिया बहिया न मुक्खा' (बाह्य क्रिया मुख्य नहीं है) 'भावेण णिज्जरिज्जइ' (निर्जरा भाव से होती है) का स्पष्ट विधान है।बिना संयम के कोई भी क्रिया फलदायक नहीं होती। जैनागम में सदैव सामयिक,प्रतिक्रमण, ध्यान, स्वाध्याय और व्रत उपवास पर बल रहा है। 'अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य। अप्पा मित्तममित्तं च, तदुप्पट्ठिय सुप्पट्ठिओ।'आत्मा ही कर्मों का कर्ता और भोक्ता है।आत्मा को कर्मों से मुक्त करना ही साधना का मुख्य लक्ष्य है। जबकि कर्मकांड एक बाह्याचार है। वस्तुत:यह एक विचलन या स्खलन है और उसकी सीमित उपादेयता तभी है जब वह अहिंसा और संयम की ओर ले जाए, उसमें श्रद्धा दृढ़ करे।इस दशा में भी ये कर्मकांड साधन मात्र हैं ,साध्य नहीं। लौकिक फल प्राप्ति के लिए हवन, अनुष्ठान करना व आराधना और स्तुति में मनोरथ पूर्ति की कामना या याचना करना अर्थात लौकिक अभीप्सा रखना जैनागम सम्मत नहीं है। लेकिन अज्ञानतावश हम यथार्थ से विमुख होकर कर्मकांड के इंद्रजाल में फंसे हुए हैं। आज यह एक स्थापित व्यवसाय बन गया है, जिससे कई लोगों के आर्थिक हित जुड़े हैं। कर्मकांड के इस इंद्रजाल का हमारे ऊपर इतना गहरा सम्मोहन है कि कुछ लोगों को ये खंडन-मंडन बेहद नागवार गुजर सकता है।
सोमवार, 19 जनवरी 2026
मृत्यु भोज निषेध
किसी व्यक्ति के निधन पर मृतक और शोक-संतप्त परिजनों के प्रति शोक व्यक्त करना,संवेदना प्रकट करना उचित और अपेक्षित लोकाचार है। लेकिन मृतक की आत्मशांति के नाम पर “मृत्यु भोज” की परंपरा का निर्वहन सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दृष्टि से कदापि उचित नहीं है।
मृत्यु भोज प्रायः समाजिक दबाव और दिखावे के कारण और परंपरा के नाम पर किया जाता है। लेकिन इससे शोकग्रस्त परिवार, जो पहले ही मानसिक पीड़ा में होता है, उस पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।कई गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार सक्षम न होने पर भी कर्ज लेकर भोज करने को मजबूर होते हैं, जो अनुचित है। मृत्यु भोज के दौरान मृतक के परिवार के सामाजिक स्टेटस के अनुसार सुस्वादु व्यंजनों का भोज आयोजित करना और अनेक तामझाम जोड़ना शोक की गरिमा को कम करता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर जीवन की असारता का चिंतन करना,मृतक का गुणानुवाद करना चाहिए न कि उत्सव जैसा वातावरण बनाना चाहिए।
धर्मशास्त्रों में भी मृत्यु के बाद,शौच ,संयम, साधना और आत्मशुद्धि पर बल दिया गया है, न कि भोज पर। इनके स्थान पर दान, ध्यान और तप को श्रेष्ठ माना गया है।
इसका एक नकारात्मक सामाजिक पहलू भी है। चूंकि आर्थिक दबाव के कारण मृत्यु भोज में सीमित संख्या में ही लोगों को बुलाया जाना संभव होता है इस कारण न बुलाए गए लोग खिन्न हो जाते हैं।जो आलोचना और मनमुटाव का कारण बनता है।
मृत्यु भोज में धन के साथ ही भोजन की भी बर्बादी होती है।जबकि उसी धन से गरीबों की सहायता, शिक्षा, चिकित्सा जैसे सेवा कार्य किए जा सकते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम लोग मृतात्मा की शांति के लिए वृक्षारोपण, रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर जैसे सामाजिक कार्य कर सकते हैं। क्योंकि मृत्यु भोज न तो अनिवार्य है और न नैतिक दृष्टि से ही उचित है।
इन दिनों मृत्यु भोज के स्थानापन्न के रूप में शांति विधान का प्रचलन बढ़ रहा है।विधान के समापन पर होने वाला अतिथि भोज भी प्रकारांतर से मृत्यभोज का ही अपर रूप है। क्योंकि भले ही वह शांति विधान की रसोई हो लेकिन उसकी टाइमिंग वही होती है। उठावनी के समय बहिरागत अतिथियों के लिए मेजबान परिवार द्वारा की जाने वाली भोजन- व्यवस्था में स्थानीय लोगों को भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए और यह एक स्थापित परंपरा होना चाहिए ताकि मेजबान को यह बात स्पष्ट रूप से विदित हो और उसके सामने कोई धर्मसंकट न हो। महासभा को इस बारे में क्रियात्मक और सार्थक पहल करनी चाहिए।साथ ही लोग स्वविवेक से भी यह संकल्प ले सकते हैं।
बुधवार, 31 दिसंबर 2025
कामना
नये वर्ष की, नई सुबह हो ~ मंगलमय।
सब हों सुखी,प्रसन्न ; न कोई भी हो भय।
पूर्ण मनोरथ हों, ~ जीवन में उन्नति हो।
त्यागें वैर,विरोध ; विमल सबकी मति हो।
एकसूत्र में बंधें ~ वरहिया जन सारे।
मनहर देव बनें, हम सब के रखवारे।
एक फर्श पर बैठें सभी, विचार करें।
जो भ्रांति पनपीं हैं,सबका परिहार करें।
भलीभांति होवे सबको, यह बात विदित।
निहित एकता में रहता है सब का हित।
हम पूज्य गुरुजी के ही सब अनुयाई हैं।
इस नाते हम सब एक और गुरु भाई हैं।
जब मंजिल सबकी एक चुनें क्यों राह अलग।
सब एक ओर ही चलें, रखें क्यों उलटे पग।
सोमवार, 27 अक्टूबर 2025
बतकही -शादी की रस्में
शादी विवाह की रस्मों में एक महत्वपूर्ण रस्म चढ़ाव की रस्म भी होती है। जिसमें वर पक्ष सप्तपदी से पहले जो शादी की प्रमुख और महत्वपूर्ण रस्म है, कन्यापक्ष के लोगों के सामने अपने पारिवारिक गहनों की नुमाइश करता है। जिससे कन्यापक्ष के लोग वरपक्ष की आर्थिक हैसियत का आकलन करते हैं।इस परिपाटी का उद्देश्य और औचित्य उस समय था जब रिश्ते नाई या मध्यस्थों के जरिए तय होते थे और आवागमन के सीमित साधनों की वजह से कन्यापक्ष से जुड़े सभी लोगों के लिए वर पक्ष के बारे में विशेष रूप से उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं होता था। चढ़ाव की यह नुमाइश वरपक्ष की आर्थिक सुदृढ़ता का कन्यापक्ष को एक अलिखित आश्वासन होता है। लेकिन आज के समय में जब लड़का लड़की और उनके परिवार वाले शादी तय होने के पहले कई बार औपचारिक और अनौपचारिक मुलाकातें करते हैं।एक दूसरे की सोशल मीडिया प्रोफाइल खंगालते हैं और विभिन्न सूत्रों से एक दूसरे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी जुटाते हैं तब ऐसी सूरत में चढ़ाव के जरिए दिए जाने वाले इस पारंपरिक आश्वासन का कोई औचित्य नहीं है। बेतहाशा मंहगाई के इस दौर में चढ़ाव ले जाना और शादी की गहमागहमी के बीच उनकी रखवाली करना बेहद जोखिम भरा काम है।कई बार दुर्घटनाएं भी हुईं है। चढ़ाव के गहनों से वर पक्ष की हैसियत का व्यवहारतया आकलन संभव भी नहीं है क्योंकि उन पर उनका नाम थोड़े ही अंकित रहता है और इस तात्कालिक प्रयोजन के लिए वे दूसरों से मांगकर जुटाए भी जा सकते हैं। इसलिए इस तरह की परिपाटी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
विवाह की सभी रस्में सामूहिक रूप से और समारोह पूर्वक निभाई जाती हैं।मटियाने की रस्म में शादी का खाना बनाने के लिए मिट्टी का चूल्हा बनाने के निमित्त गांव के बाहर जाकर किसी साफ स्थान से गाजे-बाजे के साथ मंगलाचार करते हुए मिट्टी लाने का रिवाज रहा है। आजकल मिट्टी के बने चूल्हों के बजाय गैस भट्ठी या लकड़ी व कोयले की रेडीमेड भट्ठियों का इस्तेमाल होता है लेकिन मटियाने की रस्म आज भी निभाई जाती है जो कालबाह्य हो चुकी है। इसका प्रयोजन इतना भर रह गया है कि मटियाने के बाद शादी वाले घर में न्यौत्हारियों के लिए औपचारिक रूप से सामूहिक रसोई शुरू हो जाती है।
शादी की विभिन्न रस्मों में हल्दी मेंहदी की रस्में भी बेहद महत्वपूर्ण रस्में हैं जिसमें समारोह और मंगलाचार पूर्वक यथास्थिति वर या कन्या को मेंहदी, हल्दी लगाई जाती है। पहले ये रस्में सादगी के साथ लेकिन आमोद पूर्ण ढंग से निभाई जाती थीं।लेकिन अब इसमें फिल्मी तड़का लग गया है। हल्दी मेंहदी की रस्मों के लिए खर्चीले भव्य सेट तैयार किए जाने लगे हैं।इनका एक अलग ड्रेस कोड लागू हो गया है जो टीवी सीरियलों की मेहरबानी है।यह शादी में आए मेहमानों के साथ ज्यादती से कम नहीं है क्योंकि उन्हें इन मौकों के लिए ड्रेस खरीदने पर गुंजाइश न होने के बावजूद अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। मूलत: शादी विवाह जो एक अनुष्ठान है, उसे अक्ल के अंधे लोग इवेंट में तब्दील करने पर आमादा हैं।
शादी विवाह के मौके पर खासकर वे लोग जिन्होंने नया-नया पैसा कमाया या कबाड़ा है,अपनी अमीरी का फूहड़ प्रदर्शन करने लगे हैं। पहले घर के बाहर गली में शामियाना लगाकर लोग शादी करते थे और फिर बाद में स्कूल भवन या मुहल्ले की किसी धर्मशाला से इस तरह के आयोजन करने लगे।इसी क्रम में विवाह- वाटिकाएं लोगों की अगली पसंद बनीं और अब लोगों पर रिसाॅर्ट का भूत सवार है।होड़ाहोड़ी में लोग दूसरों की नजर में अपना कद ऊंचा करने की ललक में खुद को कर्ज में धकेल रहे हैं। आयोजन स्थलों पर होने वाले बेतहाशा खर्च को नियंत्रित कर उस राशि का कोई अन्य रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है।हाल ही में ग्वालियर के एक कारोबारी जो अपनी बेटी की शादी को यादगार बनाने के लिए उसमें बॉलीवुड सिंगर बुलाना चाहते थे, ने मित्रों की समझाइश पर अपना इरादा बदलकर उसी मंडप से जहां वह अपनी बेटी की शादी धूमधाम से कर रहे हैं,11 साधनहीन परिवारों की बेटियों के हाथ पीले करने का सुखद और प्रेरणादायी निर्णय लिया है।
खाने के फेहरिस्त में भी जितना जोर व्यंजनों की रूपगत विविधता और क्वान्टिटी पर रहने लगा है उतना क्वालिटी पर नहीं है। क्योंकि दूसरों ने जो लकीर पहले से खींच रखी है उससे बड़ी लकीर खींचने की होड़ लगी है। इसलिए सलामी तोप की ही होगी फिर चाहे धमक से पूरा फाउंडेशन हिल जाए!
शुक्रवार, 19 सितंबर 2025
दर्शन(शास्त्र)
दर्शन(शास्त्र) या फिलासफी एक वैश्विक और समग्र विषय है। जैसे केमिस्ट्री और फिजिक्स वैश्विक और समग्र विषय हैं उसी तरह फिलासफी है। जीवन और जगत के बारे में मनुष्यों के मूलभूत प्रश्न, जिज्ञासाएं और चिंताएं साझी हैं।ग्रीक फिलॉसफर्स (प्लेटो, अरस्तू) और भारतीय ऋषि (याज्ञवल्क्य, कपिल) मूलतः एक ही तरह के प्रश्न पूछ रहे थे। दर्शन (Philosophy) का आधार मानव-चिंतन है जो सार्वभौम प्रश्नों पर मंथन कर समाधान खोजता है। सांसारिक दु:खों से मुक्ति की छटपटाहट और उनसे निपटने के उपाय खोजने की चाहत तमाम भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद सभी मनुष्यों में समान है लेकिन इनके उत्तर संस्कृति, भाषा, परंपरा और ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित होने और विशिष्ट सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के कारण अलग-अलग मिलते हैं। स्थूल रूप से सत्ता मीमांसा, ज्ञान मीमांसा और मानवीय मूल्यों का विवेचन दर्शनशास्त्र का केंद्रीय विषय या प्रयोजन रहा हैं। जैसे -
जगत का मूल क्या है?
ईश्वर, आत्मा, प्रकृति, चेतना आदि की वास्तविकता क्या है?
क्या वास्तव में अस्तित्व में है?
मनुष्य सत्य को कैसे जानता है?
इन्द्रिय, तर्क, अनुभूति और अंतःप्रज्ञा की भूमिका क्या है?
सत्य और भ्रान्ति में भेद कैसे किया जाए?
क्या अच्छा है और क्या बुरा?
नैतिक जीवन का आधार क्या होना चाहिए?
सौंदर्य, कला और आनंद का मान्य रूप क्या है?
ये सभी बिंदु दर्शनशास्त्र का केंद्रीय प्रयोजन रहे हैं दूसरे शब्दों में दर्शनशास्त्र मनुष्य और विश्व के बीच के गहनतम संबंधों को समझने का प्रयास है।
फिलासफी का स्वरूप वास्तव में वैश्विक है लेकिन क्षेत्रीय और भौगोलिक विविधता के फलस्वरूप विकसित हुए जीवन-बोध पर आधारित भिन्न सांस्कृतिक दृष्टियों के कारण दर्शनशास्त्र में अनेक विचार-सरणियों का विकास हुआ जो सामान्यतः school of philosophy कहलाते हैं। हिंदू स्कूल, बौद्ध और जैन स्कूल, इस्लामिक स्कूल इत्यादि दर्शनशास्त्र की विभिन्न विचार- सरणियां हैं जिन्हें बोलचाल में हिंदू दर्शन, बौद्ध या जैन दर्शन, इस्लामिक दर्शन कहा जाता है। जबकि वास्तव में ये school of thaught या दर्शन(शास्त्र) की शालाएं या प्रवृत्तियां हैं।अकादमिक जगत में ज़्यादातर विद्वान इसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं।
भारतीय परम्परा में दर्शन का लक्ष्य केवल सत्य की खोज न होकर मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति है। दर्शन शास्त्र को जीवन के दुःखों की निवृत्ति का एक वरेण्य साधन माना गया है।
आत्मा, परमात्मा, जगत, प्रकृति और पुरुष के बीच संबंध तथा 'सत्य या यथार्थ' क्या है और उसे पाने का साधन क्या है? व प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति आदि प्रमाणों के अध्ययन एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे आदर्शों को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है।
इसलिए भारतीय दर्शन में विवेच्य केंद्रीय विषय-आत्मा का यथार्थ स्वरूप और मोक्ष की प्राप्ति है।
जबकि पाश्चात्य परम्परा में दर्शन अधिकतर तार्किक विश्लेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित हुआ है। जहाँ दर्शन का विवेच्य विषय-सत्य और ज्ञान की वस्तुनिष्ठ खोज व मानव-जीवन के नैतिक-सौंदर्य संबंधी प्रश्नों का समाधान खोजना है।
बुधवार, 17 सितंबर 2025
वरहिया समाज और चुनौतियां
जिस समाज का सामाजिक अनुशासन शिथिल हो जाता है। उसका सामाजिक ताना-बाना कमजोर होकर बिखरने टूटने लगता है। वरहिया समाज में दिन-ब-दिन बढ़ती स्वेच्छाचारिता एक चुनौती बनकर उभर रही है। पंचों के परंपरागत अनुशासन तंत्र के निष्क्रिय और प्रभावहीन होने के कारण समाज के स्तर पर उच्छृंखलता बढ़ी है। प्रभावशाली लोग मनमानी कर सामाजिक मूल्यों को धता बता रहे हैं। इन सबकी कीमत गरीब और सामान्य व्यक्ति अपनी परेशानियों से अकेले जूझकर चुका रहा है। समाज के स्तर पर उसे किसी तरह का सहयोग न मिल पाने से वह और टूट जाता है।यह स्थिति चिंताजनक है।आज सामान्य समाजजनों की पारिवारिक सुख-शांति को भी जमाने की नजर लग गई है। अपने बच्चों की गृहस्थी बसाने की चिंता में दुबले हो रहे लोग जब किसी तरह इस चिंता से पार पा लेते हैं तो कुछ ही दिनों में उनकी खुशियों को ग्रहण लग जाता है और हंसता खेलता पारिवारिक जीवन वैवाहिक विवादों की भेंट चढ़ जाता है। व्यक्तिगत समस्या कहकर इन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। व्यक्ति परिवार की इकाई है और परिवार समाज की इकाई है। इसलिए इस श्रृंखला की कुछ कड़ियां भी यदि कमजोर होंगी तो उसका नकारात्मक प्रभाव पूरी श्रृंखला और उसकी मजबूती पर पड़ेगा।इन विवादों को सुलझाने में सामाजिक स्तर पर प्रमुख और प्रभावशाली लोगों को अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।समाज की इस आत्मघाती उदासीनता के कारण ही लोगों को जो उचित समझ में आ रहा है वो कदम वह उठा रहे हैं। भले ही उसका दीर्घकालिक प्रभाव समाज और उनके स्वयं के लिए नकारात्मक और प्रतिकूल हो। समाज के लोगों के प्रतिकूल रवैए और समाज में उन्हें उचित रिस्पांस न मिलने के कारण ही समाज से बाहर जाकर विवाह की प्रवृत्ति पनप और बढ़ रही है।जिस पर अंकुश लगना चाहिए लेकिन यह तभी संभव होगा जब इसके लिए समाज में उचित वातावरण तैयार होगा। लेकिन समाज के नियामक और प्रशासी पदों पर बैठे लोग अपना क्रेडिट स्कोर बढ़ाने की जुगत में दिखावे के आयोजनों में व्यस्त हैं और जमीनी हकीकत से अपनी नजरें चुरा रहे हैं।यह न केवल गलत है बल्कि घातक भी है। जिसकी कीमत हमारी पीढ़ियां चुकाएंगी।
शनिवार, 13 सितंबर 2025
विवाह -एक अनुचिंतन
यद्यपि सजातीय और सवर्ण विवाह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामाजिक स्तरण में तेजी से आ रहे बदलाव के परिप्रेक्ष्य में आज के समय में विवाह केवल 'कुलीनता' यानी वंश, जाति, आर्थिक स्तर आदि पर आधारित नहीं रह गया है।
जीवनसाथी का चयन अब अधिकतर विचारों के तालमेल समान शिक्षा और व्यवसाय जिससे उनके बीच सामंजस्य बन सके व एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने से उनके बीच के आपसी अच्छे बर्ताव जैसी व्यावाहरिक कसौटी पर होना उचित माना जाता है।केवल 'वंश और कुल' देखकर शादी करना, लेकिन स्वभाव/सोच में मेल न होना, जीवनभर की कठिनाइयाँ खड़ी कर सकता है।ऐसी स्थिति में विवाह पारिवारिक और सामाजिक उन्नति में सहायक होने के बजाय एक समझौता बन जाता है।इसलिए कुलीनता के नाम पर आत्मबलिदान के लिए विवश करने के स्थान पर वैवाहिक बंधन में बंधने वाले जोड़े की खुशी और संतुष्टि ज्यादा मायने रखती है।
धर्मशास्त्रीय नजरिए से देखें तो उच्च सामाजिक स्थिति वाले वर और निम्न सामाजिक स्थिति वाली कन्या के बीच विवाह को अनुलोम विवाह की श्रेणी में रखा जाता है और इसके विपरीत उच्च सामाजिक स्थिति वाली कन्या और निम्न सामाजिक स्थिति वाले वर के बीच विवाह को प्रतिलोम विवाह माना जाता है।धर्मशास्त्रों में अनुलोम विवाह को अपवाद स्वरूप स्वीकार किया गया है हालांकि श्रेयस्कर तो नहीं, उसे पर सहनीय माना गया।किंतु प्रतिलोम विवाह को सामान्यतः अशुभ और समाज विरोधी बताया गया है, क्योंकि इससे पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था बिगड़ने का भय है। प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न संतान को अवर्ण या वर्णसंकर कहा गया है।
हालांकि सामाजिक उच्चता और निम्नता की यह अवधारणा परंपरागत रूप से वर्णाधारित है। लेकिन आज के अर्थ युग में इसका पैमाना अब धन बनता जा रहा है। फिर भी आज की परिस्थिति में और उच्च शिक्षित लोगों के बीच अनुलोम/प्रतिलोम का यह पारंपरिक विभाजन व्यावहारिक रूप से अब बहुत मायने नहीं रखता।
विवाह का मूल उद्देश्य गृहस्थ जीवन की सुख-शान्ति, सहयोग और अगली पीढ़ी का सुचारु पालन-पोषण है। इसलिए यदि दोनों परिवार और दम्पति मानसिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं तो 'अनुलोम' या 'प्रतिलोम' का भेद गौण हो जाता है।
केवल 'कुलीनता' की जिद के कारण अविवाहित रहना व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिए आज के युग में श्रेष्ठ वही विवाह है जिसमें वर-वधू के विचार, शिक्षा, संस्कार और व्यवहार का मेल हो।
पराशर ऋषि ने पाराशर स्मृति के अध्याय 2 में कहा है कि कलियुग में वर्णसंकर विवाहों से यथासम्भव बचना चाहिए, परंतु यदि विवाह कठिन हो तो गुण, संस्कार और आचरण को प्राथमिकता देना चाहिए।इसमें यह भी कहा गया कि विवाह का उद्देश्य धर्मपालन और संतति की शुद्धता है, न कि केवल कुलगौरव।
महाभारत के अनुशासन पर्व में अध्याय 43 में भीष्म पितामह ने कहा है कि "गुणहीन कुलवती कन्या से विवाह करने से गुणवती अकुलीन कन्या से विवाह करना श्रेष्ठ है।"अर्थात् यदि कन्या का कुल उच्च है परन्तु गुणहीन है, तो गुणवान लेकिन अकुलीन कन्या का वरण करना श्रेष्ठ और उचित है।
इस प्रकार महाभारत और पाराशर स्मृति के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि कुल से बढ़कर गुण और संस्कार देखे जाने चाहिए।
इसलिए, यदि आज कुलीनता के कारण विवाह कठिन हो रहा है, तो धर्मशास्त्र और परम्परा दोनों यह मार्ग सुझाते हैं कि गुण, शिक्षा, आचरण और आपसी सामंजस्य को प्रमुख मानें।
शनिवार, 6 सितंबर 2025
क्षमावाणी/क्षमा दिवस
'खम्मामि सव्वे जीवाणां, सव्वे जीवा खमंतु मे,
मित्ति मे सव्व भूदेसु वैरं मज्झं ण केणवि'
(मूलाचार- 2/7)
'क्षमे सर्वजीवान् ,सर्वे जीवान् क्षमन्ताम् मम।
मैत्री मे सर्वभूतेषु ,वैरं मम न केनापि।'
मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ ,सभी जीव मुझे क्षमा करें।मेरा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव है। मेरा किसी से भी बैर नहीं है।
प्रकारांतर से यही बात इन पदों में कही है -
मिच्छामि दुक्कडं /
मिथ्यामि दुष्कृताम् /
मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हों
जाने-अनजाने जो कुछ भी भूल हुई हो।
या कोई प्रतिक्रिया किंचित प्रतिकूल हुई हो।
या राग-द्वेषवश कुछ भी अनुचित लिखा कहा हो।
मन में जिसके कारण चुभता शल्य रहा हो।
क्षमा-पर्व पर मांग रहा हूं क्षमा आपसे।
मुझे मिले उन्मुक्ति हुए इस महापाप से।
🙏🏻 श्रीश राकेश जैन
शनिवार, 23 अगस्त 2025
मंगल कलश
प्रायः सभी मांगलिक अवसरों पर कलश स्थापना की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। विवाह, गृहप्रवेश, व्रत, पर्व, पूजा जैसे मंगल प्रसंगों पर कलश स्थापना की जाती है। सभी भारतीय धर्मों में कलश स्थापना का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।कलश को अक्षय पात्र माना गया है। इसका आशय है कि जैसे कलश में जल भरा है, वैसे ही घर-परिवार में सुख, शांति और सम्पन्नता बनी रहे।नारियल,आम के पत्तों और जल से भरे कलश को "सजीव ब्रह्माण्ड" का प्रतीक माना जाता है।
कलश में रखा गया जल जीवन, शांति और समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए यह हर मांगलिक कार्य का प्रारम्भिक चरण है।
इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।कलश का आधार पृथ्वी, जल उसका जीवन, नारियल और पत्ते उसकी उर्वरता और सृजनशीलता का प्रतीक हैं। इससे मानव जीवन और ब्रह्माण्ड के बीच एकात्म का बोध कराया जाता है।कलश से जुड़े प्रतीकों में श्रीफल या नारियल और महत्वपूर्ण प्रतीक है।जिस प्रकार कलश जीवन और सृष्टि का प्रतीक है, उसी प्रकार श्रीफल पूर्णता और फलप्राप्ति का द्योतक है।नारियल का गोल आकार ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।इसके भीतर का जल जीवन का बीज माना गया है।
जब इसे कलश पर स्थापित किया जाता है, तो यह सृष्टि की निरंतरता और प्रजनन शक्ति का जीवंत प्रतीक बन जाता है।
आम के पत्तों से सज्जित श्रीफल आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।आम के पत्ते केवल सज्जा सामग्री नहीं है बल्कि ये पत्ते समृद्धि, शांति और शुभता का प्रतीक माने जाते हैं। कलश पर लगने वाले आम की पाँच पत्ते प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान इन पंचप्राण के प्रतिनिधि माने जाते हैं और ये हरे पत्ते नई ऊर्जा, उन्नति और उर्वरता के प्रतीक होते हैं।आम की पत्तियाँ वायु को शुद्ध करने और वातावरण में नमी संतुलित रखने में सहायक होती हैं और जल्दी नहीं मुरझातीं है।इसलिए कलश यदि ब्रह्माण्ड और जीवन का आधार है, तो श्रीफल उसका फल और समृद्धि है। दोनों मिलकर अक्षय मंगल, सुख-समृद्धि और पूर्णता के कारक माने जाते हैं।
सोमवार, 11 अगस्त 2025
वरहिया जैन -एक दृष्टि
ऐतिहासिक और भाषावैज्ञानिक दृष्टि से "वरहिया" एक स्थानवाची नाम है जो मूल रूप से वराह नामक क्षेत्र या नगर के निवासी लोगों का परिचायक है।
बाद में यह समुदाय के जातिगत नाम के रूप में स्थिर हो गया।
यहां आगे संक्षेप में "वरहिया" शब्द के भाषाई विकास को दृष्टिगत रखते हुए
उसके ऐतिहासिक-स्थानवाची मूल, संस्कृत-प्राकृत के ध्वनि-विकास सिद्धांत तथा लोक-व्युत्पत्ति मूलक (श्रेष्ठ हृदय वाले) अर्थ पर विचार किया गया है।स्थानवाची (ऐतिहासिक) दृष्टि से यह वरहिया शब्द वराह क्षेत्र नामक प्राचीन स्थान के नाम→ वराह → वरह → वरह + इया ( प्रत्यय) जुड़कर उसक सिद्ध हुआ और जो वराह क्षेत्र से आए लोगों के बोधक के रूप में ग्रहण किया गया है। इसके अलावा संस्कृत-प्राकृत ध्वनि-विकास की दृष्टि से विचार करते हुए यह संस्कृत "वर्ह" = मोरपंख,पत्र ,चंवर के अर्थ में गृहीत होकर वर्ह → वरह (प्राकृत) → वरह + इया (प्रत्यय) जुड़कर चंवर/मोरपंख से जुड़ा (राजचिह्न, सेवा, प्रतीक) के बोधक के रूप में वरहिया शब्द- रूप निष्पन्न हुआ माना जाता है। हालांकि यह एक अनुमान मात्र है क्योंकि इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। तीसरे लोक-व्युत्पत्ति मूलक (भावात्मक अर्थ) की दृष्टि से विचार करने पर "वर" = श्रेष्ठ + "हिया" = हृदय → वर + हिया = वरहिया →श्रेष्ठ हृदय वाले व्यक्ति के बोधक के रूप में नैतिक पहचान और आत्म-गौरव से संपूरित व्यक्ति के अर्थ में हमारे सामने आता है। तीनों व्युत्पत्तियों में ध्वनि-रूप समान है, जिससे यह भ्रम और बहुअर्थीयता की स्थिति बनी है।लेकिन उपर्युक्त तीनों व्युत्पत्तियों में ऐतिहासिक-स्थानवाची व्युत्पत्ति मूलक अवधारणा सबसे तर्कसंगत, साक्ष्य-युक्त और ग्राह्य है। यद्यपि वरहिया शब्द का संस्कृत "वर्ह" से जुड़ाव संभाव्य है, पर सीमित प्रमाण होने से यह अधिकतर ध्वन्यात्मक संयोग लगता है।लोक-व्युत्पत्ति मूलक "श्रेष्ठ हृदय" के रूप में निरूपण करने वाली अर्थ व्यंजना इस समुदाय की आंतरिक सांस्कृतिक व्याख्या है, जो 19वीं–20वीं सदी में नैतिक और गौरवपूर्ण पहचान के रूप में उभरी। 'वरहिया' शब्द कहीं कहीं 'वरैया' के रूप में व्यवहृत हुआ है लेकिन
पुराने शिलालेखों और पांडुलिपियों में “वरहिया” पाठ को ही मौलिक और शुद्ध माना गया है; “वरैया” केवल एक अपभ्रंश यानी बोलचाल में आसानी की दृष्टि से प्रचलित रूप माना जाता है।‘वरहिया’ मूल पाठ है, जिसका अनेक पुराने शिलालेखों (प्रतिमाओं के पादलेख), दस्तावेजों और पांडुलिपियों में संदर्भ आया है। 19वीं-20वीं शताब्दी में ‘वरैया’ रूप का बढ़ा प्रचलन बोलीगत सरलता का परिणाम माना जाता है ।
वरहिया" नाम जो ऐतिहासिक रूप से वराह क्षेत्र नामक भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ा है। वराह क्षेत्र प्राचीन काल में उत्तरी-मध्य भारत में एक धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र रहा है ,जिसकी अवस्थिति बुंदेलखंड और उसके आसपास के इलाकों में मानी जाती है।ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, वरहिया जैन समुदाय का मूल केंद्र बुंदेलखंड, ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में था और आज भी यह इसका प्रवास क्षेत्र है।यह समुदाय जैन धर्म के दिगंबर आम्नाय से जुड़ा है, और यह समुदाय छोटे-छोटे कस्बों और नगरों में संगठित समाज के रूप में बसा रहा। विवाह और अन्य सामाजिक रिवाज पारंपरिक जैन पद्धति से होते हैं।भाषा प्रायः बुंदेली और हिंदी, लेकिन धार्मिक अनुष्ठान और प्रार्थनाओं में जैन शास्त्रीय संस्कृत-प्राकृत परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है।वरहिया जैन अन्य जैन जातियों जैसे पल्लीवाल,परवार, गोलालारे, खंडेलवाल, ओसवाल आदि से अलग पहचाने जाते हैं, और इनके बीच वैवाहिक संबंध कम ही होते हैं। प्राचीन और मध्यकाल में ये मुख्यतः कृषि, अनाज व्यापार, कपड़ा, और बैंकों (साहूकारी) के कार्य में संलग्न रहे।वरहिया जैन, धार्मिक दृष्टि से जैन समाज में सम्मानित व्यापारी-वर्ग में माने जाते हैं। इनके मंदिर और धर्मायतन बुंदेलखंड और उत्तर-मध्य भारत के कई शहरों में पाए गए हैं। ऐतिहासिक रूप से इस जाति की आर्थिक स्थिति मजबूत रही, क्योंकि यह व्यापार और वित्तीय कार्यों में अग्रणी थे।बुंदेलखंड में मिले अभिलेख (शिलालेख) और जैन मंदिरों की शिल्पकृतियों में वरहिया जाति के दानदाताओं के नाम मिलते हैं। अपने मूल क्षेत्र से इनका प्रव्रजन मध्यकाल के आसपास (14वीं–17वीं सदी) में अन्य जैन व्यापारिक समुदायों के साथ हुआ।18वीं–19वीं शताब्दी में इस जाति के कई परिवार व्यापार और रोजगार के लिए उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, और मध्यप्रदेश के अन्य हिस्सों में बस गए।आज ग्वालियर और आसपास के क्षेत्र इनके पारंपरिक केंद्र माने जाते हैं।वराह क्षेत्र का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों जैसे जैन प्रबंध साहित्य जैसे प्रबंधकोष, प्रबंधचिन्तामणि, और कई "चरित्र कथाओं"और खासकर जैन और पौराणिक दोनों परंपराओं में मिलता है। ऐतिहासिक रूप से वरहिया (Varahiya) जैन समुदाय और वराह क्षेत्र के बीच संबंध के संकेत मिलते हैं, लेकिन यह जुड़ाव प्रत्यक्ष राजनीतिक राज्य जैसा सम्बन्ध न होकर,इसे भौगोलिक-ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के रूप में देखना समझना चाहिए।
यह संभवतः वर्तमान उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र में फैला एक इलाका था।जैन साहित्य (विशेषकर विसंती कम्मट्ट और कुछ प्रबंध ग्रंथों) में वराह क्षेत्र का जिक्र क्षत्रिय वंशों और व्यापारी समुदायों के प्रवास से जुड़ा है।माना जाता है वरहिया जैन समुदाय के पूर्वज वराह क्षेत्र में रहते थे, फिर व्यापार और धर्म-प्रचार के कारण अन्य जगहों (विशेषकर राजस्थान, बुंदेलखंड, और उत्तर भारत) में फैल गए।
शनिवार, 28 जून 2025
बदलते परिवेश में विवाह संस्था
बुधवार, 21 मई 2025
आओ विचारें बैठकर
'हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें बैठकर हम ये समस्याएं सभी।'
दद्दा के शब्दों में कहूं मैं भी, तो क्या फिर हर्ज है।
लोगों को चेताना ही तो,कवियों का होता फर्ज है।
यों भी तो मुट्ठी भर हैं हम, संख्या हमारी न्यून है।
खांचों में उनको बांटना एक खतरनाक जुनून है।
पहले तो पूर्वाग्रह हैं जो भी, सभी अपने छोड़ दें।
छोड़ें सभी कड़वाहटें दिल से दिलों को जोड़ दें।
हल खोजने की शर्त यह है दिल हमारे साफ हों।
गलती हुई हों अगर कुछ,वे गलतियां भी माफ हों।
क्यों न शुरू से प्रगति की, मिलकर इबारत हम लिखें।
बातों से और कामों से भी; सच्चे बनें,अच्छे दिखें।।
✍🏻 श्रीश राकेश जैन,लहार
सोमवार, 19 मई 2025
सास-बहू का मंदिर व तेली का मंदिर
(चित्र : गूगल से साभार)
ग्वालियर दुर्ग परिसर में स्थित दर्शनीय स्मारकों में सास -बहू का मंदिर और तेली का मंदिर उल्लेखनीय हैं। सास-बहू का मंदिर जो सहस्रबाहु मंदिर का ही अपर नाम है 11 वीं सदी का जुड़वां मंदिर है।यह भगवान विष्णु और शिव को समर्पित है जिसका निर्माण 1093 ईस्वी में कच्छप घात वंशी नरेश महिपाल ने कराया था। सहस्रबाहु मंदिर के अद्वितीय शिल्प के अलावा उसका नाम भी लोगों में कुतूहल और उत्सुकता पैदा करता है।इस मंदिर में भगवान विष्णु को हजार हाथों के साथ दर्शाया गया था।जिस कारण इसका यह नाम पड़ा।कछवाहा नरेश महिपाल ने अपनी विष्णु भक्त पत्नी और शिवभक्त पुत्रवधू के निमित्त इन मंदिरों का निर्माण कराया था। मंदिर से एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जिससे यह तो ज्ञात होता है कि इस मंदिर को कछवाहा राजपूत राजा महिपाल ने 1093 ईस्वी में पूर्ण कराया लेकिन यह किस देवता को समर्पित है इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। परम्परागत रूप से लोग इन जुड़वां मंदिरों को विष्णु और शिव के मंदिर मानते हैं।
लेकिन इस विषय में ग्वालियर के विद्वान और जैन इतिहासकार श्री रामजीत जैन, एडवोकेट का अभिमत सर्वथा भिन्न है और वे इसे एक जैन मंदिर मानते हैं। उनके मतानुसार एक भक्त राजपूत ने अष्टान्हिका व्रत के उपलक्ष्य में नन्दीश्वर द्वीप की अनुकृति पर इस जैन मन्दिर का निर्माण कराया था।नन्दीश्वर द्वीप जाने वाले देव-देवियों की मूर्तियाँ नृत्य एवं विभिन्न मुद्राओं में मन्दिर के सभी भागों में उत्कीर्ण करायी गईं। संभवतया मुस्लिम काल में इन मूर्तियों का भंजन कर दिया गया।बड़े मंदिर के साथ बने छोटे मंदिर की भी यही परिणति हुई लेकिन हैं ये मूलतः जैन मंदिर ही।इनका निर्माण सेतवाल जैन जाति के सहस्रबाहु गोत्र के श्रेष्ठी ने कराया था।सेतवाल जाति जैन समाज की 84 जातियों में से एक है और इसके 18 गोत्रों में एक गोत्र सहस्रबाहु है।इस कारण इस मंदिर का नामकरण सहस्रबाहु का मंदिर हुआ था।
दुर्ग परिसर की सबसे ऊंची संरचनाओं में से एक तेली का मंदिर है जो द्रविड़ शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है और भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण ईसा की 9वीं शती में प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासनकाल में हुआ। बताते हैं कि तेल व्यापारियों द्वारा दिए गए दान के धन से इस मंदिर का निर्माण किया गया था।इस कारण इसका तेली का मंदिर या तेलिका मंदिर नाम पड़ा।कई विद्वान इस मंदिर का काल 8वीं शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दी के आरंभिक काल के बीच मानते हैं। इतिहासकार इसे एक हिंदू मंदिर मानते हैं और यह शिव, विष्णु और मातृकाओं (मातृदेवियों) को समर्पित है। मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है।
जैन इतिहासकार श्री रामजीत जैन एडवोकेट के अभिमतानुसार यह मंदिर राजा आम (जो कन्नौज के राजा यशोवर्मन के पुत्र थे) की वैश्य पत्नी से उत्पन्न राज कोठारी के वंशज तोलाशाह ने बनवाया था। राज कोठारी को 'आम' के गुरु जैनाचार्य वप्पभट्टि सूरी ने जैन धर्म में दीक्षित किया था जो ओसवाल जाति में सम्मिलित हो गया था। उसकी आठवीं पीढ़ी में तोलाशाह हुआ। यह बहुत बड़ा न्यायी, ज्ञानी, मानी और धनी था। जैन धर्म का बड़ा अनुरागी था। उन्होंने द्रविड़ शैली के इस भव्य जिनालय का निर्माण कराया था। तोलाशाह के मन्दिर का अपभ्रंश रूप 'तेली का मन्दिर' नाम कालान्तर में लोक में प्रसिद्ध हुआ। यह भी मूलतः एक जैन मन्दिर है।जो भगवान आदिनाथ को समर्पित है।इसके चारों ओर वराटिका (मुख्य भवन से संलग्न छोटा उपवन)में जैन मन्दिर या मन्दिरों के पाषाण स्तम्भ तथा तीर्थंकर मूर्तियाँ रखी हुई हैं। ये मूर्तियां किस मन्दिर की है तथा खुले मैदान में क्यों रखी गई है। यह ज्ञात नहीं है। श्री रामजीत जी जैन की मान्यता है कि यह पुरासामग्री तेली के मन्दिर और उसके निकट बने हुए एक जीर्ण मन्दिर की हैं। इस मन्दिर के निकट एक जीर्ण-शीर्ण कमरा बना हुआ है। सन् 1844 में कनिंघम ने इस 35 फुट लम्बे और 15 फुट चौड़े कमरे को जैनों के 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मन्दिर माना है।
मंगलवार, 25 मार्च 2025
पंडित लेखराज जी वरैया
पंडित लेखराज जी वरैया गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के ही समकालीन थे।आपका जन्म वरहिया जैन समाज के मातृस्थल और पौराणिक राजा नल की क्रीड़ा भूमि ऐतिहासिक नरवर गढ़ के समीप स्थित करहिया ग्राम में विक्रम संवत् 1925 में हुआ था। इनका गोत्र 'पलैया' है। इनके पिताका नाम जगराम उपनाम जगोलेराम था । जो उस समय करहिया ग्राम जागीर के प्रमुख व्यवसायी थे। करहिया ग्राम में पठन-पाठन की समुचित सुविधा न होने के कारण इनके पिताजी ने घर पर ही इनको पढ़ाने के लिए एक शिक्षक का प्रबन्ध किया था। पंडितजी की बाल्यकाल से ही धर्म के प्रति गहरी रुचि थी।धर्म शास्त्र में दृढ़ श्रद्धा के कारण उन्होंने 18 वर्ष की आयु में ही कन्दमूल का आजीवन त्यागकर दिया था और चारित्रिक दृढ़ता के कारण आपकी अपने समय के आदर्श व्यक्तियों में गणना होती थी।आप अत्यंत सादगी के साथ रहते थे और सदैव साधारण श्वेत वस्त्र पहनते थे और सिर पर पगड़ी बांधते थे।वह सही मायने में सरलता की प्रतिमूर्ति थे। तड़क-भड़क और दिखावा आपको तनिक पसन्द न था।आप निर्मल स्वभाव, उदारचेता और धर्म चिंतन में संलग्न रहने वाले सज्जन व्यक्ति थे । आपकी विचक्षणता, सरलता और अध्ययनशीलता से उनके संसर्ग में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।इस कारण समाज में उनकी बहुत ख्याति थी।इतनी ख्याति और प्रतिष्ठा के बावजूद आपमें अहंकार का लेशमात्र भी न था।आप सदैव मां जिनवाणी की आराधना में तल्लीन रहते थे।आपने जीवन पर्यन्त जैनधर्म की सेवा करते हुए उसकी धर्म पताका फहराई। कहीं भी कोई भी धार्मिक उत्सव होने पर वह सदैव उसमें यथाशक्ति सहयोग करते थे। धर्म की साधना को उन्होंने अपना जीवन लक्ष्य बना लिया था। लेकिन क्रूर काल के जटिल मारक-पाश में बंधकर 53 वर्ष की अल्पायु में ही विक्रम संवत् 1978 में माघ शुक्ला 14 को यह नक्षत्र क्षत होकर सदैव के लिए अस्त हो गया।'वरैया विलास' पंडित जी एकमात्र उपलब्ध स्वतंत्र कृति है।जिसकी भूमिका पंडित कपूरचंद जी वरैया ने लिखी है और यह लश्कर निवासी प्रसिद्ध वस्त्र व्यवसायी लक्ष्मीचन्द वरैया ने सन् 1950 में प्रकाशित कराई थी।यह कृति दो भागों में हैं। इसके पूर्वार्द्ध में सम्पूर्ण पूजायें संग्रहीत है और उत्तरार्ध में स्तुति, विभिन्न गायन शैली में निबद्ध उपदेशात्मक भजन और जैन बारहखड़ी संकलित हैं।आपकी ये रचनाएं अत्यंत भावप्रवण कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों दृष्टियों से सुपुष्ट, अत्यंत प्रौढ़ और गेय हैं। पंडित जी को छंदशास्त्र का ज्ञान था और वह गायन में भी निपुण थे इसलिए उनकी सभी रचनाएं छंदोबद्ध हैं।पंडित जी की एकमात्र पुत्र संतान श्री जियालाल जी थे,जो एक व्यवसायी थे।करहिया के प्रसिद्ध व्यवसायी और साहूकार श्री सुआलाल जी व श्री गेंदालाल जी इन्हीं के यशस्वी वंशज रहे हैं।
श्री गोपाल दिगंबर जैन सिद्धांत संस्कृत विद्यालय, मुरैना
गुरुवार, 6 मार्च 2025
डोभ कुंड शिलालेख
डोभ कुंड (ग्वालियर ) से प्राप्त प्रसिद्ध शिलालेख में जैन धर्मप्रेमी कच्छपघात वंशी राजा विक्रमसिंह तथा जायसवाल श्रावकों का उल्लेख है।यह शिलालेख विक्रम संवत 1145 का है जिसे डोभ कुंड के मंदिर में सन् 1866 में केप्टन डब्ल्यू आर मेलविले ने खोजा था,जो एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम दो में पृष्ठ 232-40 पर संकलित है। यह जिनालय के निर्माण की प्रशस्ति है । इस प्रशस्ति की रचना श्री विजयकीर्ति महाराज ने की थी । जिसको उदयराज ने पाषाण पर लिखा था और तिल्हण ने उत्कीर्ण किया था।यह मंदिर आज भले ही भग्नावस्था में हो, लेकिन उसकी स्थापत्य कला चमत्कृत करती है।यहां का मूर्ति शिल्प बेजोड़ है। मंदिर में 81 फीट के चबूतरे पर चौबीसी का निर्माण किया गया है।चौबीसी के चारों ओर एक प्लेटफार्म पर गजरथ का निर्माण कर इसे सुंदरता प्रदान की गई है।कलात्मक चौबीसी के प्रत्येक भाग पर तीर्थंकर विराजमान थे, पर अब ये खाली हैं। बताते हैं किे मंदिर के प्रवेशद्वार पर दो कलात्मक स्तंभ थे, जो अब नहीं हैं। डोभ का प्राचीन नाम चडोभ है।राजा विक्रम सिंह कच्छपघात ने डोभ की राजगद्दी संभालने और डोभ को राजधानी का दर्जा देने के बाद जैनाचार्य शांति देव के प्रभाव में आकर यहां नगरवासियों के माध्यम से एक भव्य और विशाल जिनालय का निर्माण कराया था।इन जैन मुनि के शिष्य विजय कीर्ति ने नागरिकों को इस मंदिर के निर्माण में सहभागिता के लिए प्रेरित किया था। राजा द्वारा मंदिर के प्रबंधन में सभी का सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से मंदिर के संचालन के निमित्त 'विंशोपक कर' का प्रावधान किया था जिस कारण अनाज के रूप में कर वसूला जाता था,जो प्रत्येक गौणी पर एक विंशोपक अनाज कर के रूप में तथा तेल निकालने का कारोबार करने वालों को भी इसी परिमाण में मंदिर के लिए तेल दान देना होता था।विंशोपक से आशय इकाई के बीसवें भाग से है।राजा विक्रमसिंह ने मंदिर के प्रबंधन में सौकर्य की दृष्टि से महाचक्र ग्राम में चारगोणी गेहूं बोने योग्य खेत तथा रजकद्रह के पूर्व में एक बाग कूप सहित प्रदान किया था तथा दीपकादि के लिये कुछ घड़े तेल के प्रदान किये थे और इस आशय की राजाज्ञा जारी की थी कि भविष्य में भी उनके परवर्ती राजा इसका पालन करते रहेंगे।डोभ कुंड से प्राप्त अभिलेख का उसके विषय में इस परिचयात्मक विवरण के साथ मैं यहां इस प्रयोजन से उल्लेख कर रहा हूं ताकि 'वरैया' पाठ की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़े गए निराधार तर्क की निरर्थकता रेखांकित कर सकूं। आदरणीय पंडित सुगनचंद जी आमोल वालों (पंडित जी के अलावा कुछ अन्य लोगों का भी यह अभिमत हो सकता है) ने ग्वालियर के विद्वान पंडित हरिहर निवास द्विवेदी के दैनिक भास्कर में सन् 1986 के आसपास लिखे एक लेख (जिसकी प्रति अब उपलब्ध नहीं है) का हवाला देकर उन्होंने मुझे डोभ कुंड के शिलालेख में उल्लिखित विंशोपक और 'वरैया' शब्द के बीच सहसम्बंध और विंशोपक माप की वरैया शब्द (माप के लिए इस्तेमाल होने वाली एक टोकरी, उनके कथनानुसार)से तुल्यता स्थापित करते हुए बताया कि विंशोपक संग्रहण का दायित्व संभालने वाले समुदाय को ही कालान्तर में वरैया नाम से संबोधित किया जाने लगा। मेरे लिए यह एक नूतन अवधारणा थी इसलिए मैंने पंडित जी के इस दावे का परीक्षण करने के लिए 'एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम 2' और 'मध्यप्रान्त, मध्यभारत और राजपूताने में जैन स्मारक' पुस्तकें जिनमें डोभ कुंड का अभिलेख संकलित किया गया हैं,यत्नपूर्वक जुटाईं और उनका अध्ययन किया। जिससे पता चला कि उक्त दावा एक कपोल-कल्पना मात्र है और डोभ स्थित जिनालय के निर्माण में जो लोग संलग्न थे,वे जायसवाल/जैसवाल समुदाय से थे।यह तथ्य अभिलेख से स्पष्ट है और विंशोपक से आशय उपार्जन के बीसवें भाग से रहा है और वरैया शब्द से उसका दूर या निकट का कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि पान की खेती के लिए बने झुरमुटों में बांस की जिन पनालियों का इस्तेमाल किया जाता है,वे 'बरई' कहलाती हैं और पान की खेती करने वाले लोगों को 'बरैया' नाम से संबोधित किया जाता है।




















