वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
शनिवार, 28 जून 2025
बदलते परिवेश में विवाह संस्था
अधिकांश वरहिया समाज आज भी ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में निवासरत है। हालांकि बेहतर रोजगार की तलाश में बहुत सारे लोग नगरों में आकर निवास कर रहे हैं। जिनमें से अधिकांश के पास स्वयं के घर नहीं है और वे किराए के घरों में रहकर छोटे मोटे व्यवसाय या प्राईवेट नौकरी कर जीवनयापन कर रहे हैं। गांवों में शहरी चकाचौंध और आधारभूत सुविधाएं भले ही कम हों, लेकिन वहां लोगों की मूलभूत जरूरतें पूरी हो जाती है और वे बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। आमतौर पर इंटरमीडिएट के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को नजदीकी शहरों का रुख करना पड़ता है। इंटरनेट की सहज-सुलभता के कारण गांवों और शहरों का सांस्कृतिक अंतर लगभग खत्म हो चुका है। लेकिन ज्यों ही बच्चे नये शहरी परिवेश में आते हैं उनकी चाहतों को पंख लग जाते हैं।एकल परिवारों के कारण अधिकतर बच्चे अकेले ही या किसी रूम पार्टनर के साथ रहते हैं। अभिभावक के बिना बच्चे स्वछंद हो जाते हैं और सामाजिक वर्जनाएं टूटने लगती हैं।नये और अलग अलग सांस्कृतिक और धार्मिक सामाजिक मूल्यों वाले सहपाठियों के साथ भावनात्मक और व्यवहारात्मक स्तर पर अंतर्विनिमय के कारण उनका मूल्यबोध और विचारदृष्टि बदल जाती है। मूल्यों के इस टकराव के कारण वे दोहराव के शिकार हो जाते हैं जिस कारण परिवार में उनका व्यवहार अलग होता है और इससे इतर मित्रों के बीच उनका व्यवहार एकदम भिन्न होता है।इस छद्म को वे इस तरह ओढ़े रहते हैं कि उनके परिजनों को उनके व्यवहार में आए इस दुराव का कोई अंदाजा ही नहीं होता। चूंकि शिक्षा बेहतर जीवन की एक अपरिहार्य पूर्वशर्त बन चुकी है इसलिए शिक्षा से विमुख होने की बात तो कोई स्वप्न में भी नहीं सोच सकता है। नई संभावनाओं की आहट मिलते ही लड़कों की महत्वाकांक्षा उड़ान भरने लगती है लेकिन लड़कों की तुलना में लड़कियां ज्यादा स्वप्नदर्शी और संवेदनशील होती हैं।वे दूसरों से जल्द प्रभावित हो जाती है। व्यवहार में अधिक खुलापन उनके लिए अक्सर घातक सिद्ध होता है। जिसके कारण भौतिक और सामाजिक रूप से खामियाजा लड़की को ही भुगतना पड़ता है क्योंकि छुरी तरबूज पर गिरे या फिर तरबूज छुरी पर गिरे दोनों ही स्थितियों में कटता तरबूज ही है। इसलिए जीवन के इस नाजुक पड़ाव पर लड़कियों की परवरिश बेहद सतर्कता के साथ करना जरूरी है।उनके साथ आपकी बेहतर अंडरस्टैंडिंग और बाॅन्डिंग उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती है। इस मामले में कोई भी लापरवाही अभिभावकों को हमेशा महंगी पड़ती है। शिक्षा व्यक्तित्व के समग्र विकास की कुंजी होने के साथ ही बेहतर रोजगार मिलने में मददगार बनती है इसलिए सभी अभिभावक अपने बच्चों को यथाशक्ति पढ़ाने लिखाने का प्रयास करते हैं और इस मामले में वे लड़का लड़की में कोई भेद नहीं करते। दुनिया में रुपए पैसे की बढ़ती अहमियत लोगों को पैसे के पीछे बेतहाशा भागने को प्रेरित करती है और इस मायावी उत्प्रेरण की वजह से आज इंसान पैसा कमाने की मशीन में तब्दील होता जा रहा है। पैसा उसके लिए साधन न रहकर साध्य बन गया है। लोगों की यह फिलासफी ही इस सारी गड़बड़ की मूल वजह है। ऐसे लोगों के लिए पैसा कमाना पहला लक्ष्य हो गया है ।जीवन के सुख और आनंद दोयम दर्जे पर हैं। वे लोग (स्त्री या पुरुष) अपनी सारी ऊर्जा पैसा कमाने में झोंक देते हैं। विवाह जैसी संस्था को वे अपनी राह का रोड़ा समझने लगते हैं और रोबो की तरह व्यवहार करते हैं। जब उन्हें विवाह की सुध आती है, गंगा में बहुत पानी बह चुका होता है।विवाह की सही या आदर्श उम्र चोबीस से छब्बीस वर्ष के बीच मानी जाती है जो विरल स्थितियों में तीस इकतीस वर्ष तक हो सकती है। विवाह भले ही सजातीय समुदाय में हो या विजातीय समुदाय में हो, बड़ी उम्र में विवाह एक मजबूरी में किया समझौता बन जाता है। आजकल विवाह के लिए लोगों की पसंद काफी बदल गई है।एक ट्रेंड के तौर पर गांव के बजाय शहर और व्यवसायी के बजाय नौकरीपेशा वर-कन्या को प्राथमिकता मिल रही है भले ही जीवन की गतिशीलता को ठहराव ग्रस ले और उसे पंगु बना दे।कुंडली मिलान का ढर्रा भी इसमें एक बड़ी बाधा है जबकि यह बात सिद्ध हो चुकी है कि इस तरह के मिलान का कोई तार्किक आधार नहीं है। दरअसल वर-कन्या का गांव या शहर का अथवा व्यवसायी या नौकरीपेशा होना जरूरी नहीं बल्कि वह एक बेहतर जीवनसाथी साबित हो,यह सुनिश्चित होना जरूरी है। उनके बीच शैक्षणिक और व्यावसायिक अनुरूपता के बजाय भावनात्मक तालमेल ज्यादा जरूरी है,इसलिए इस बात की बेहद जरूरत है कि आप समय रहते अपने बच्चों को जीवन की प्राथमिकताएं समझाएं। उन्हें एक संवेदनशील मनुष्य बना रहने दें और उनकी महत्वाकांक्षा को पंख लगाकर ईगल की तरह आकाश में सबसे ऊंचा उड़ने और पैसे कमाने वाले रोबो में तब्दील न करें। जहां तक संभव हो,सजातीय समुदाय को प्राथमिकता दें ताकि बेहतर सामाजिक सुरक्षा मिल सके।।
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