सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

बतकही -शादी की रस्में


 शादी विवाह की रस्मों में एक महत्वपूर्ण रस्म चढ़ाव की रस्म भी होती है। जिसमें वर पक्ष सप्तपदी से पहले जो शादी की प्रमुख और महत्वपूर्ण रस्म है, कन्यापक्ष के लोगों के सामने अपने पारिवारिक गहनों की नुमाइश करता है। जिससे कन्यापक्ष के लोग वरपक्ष की आर्थिक हैसियत का आकलन करते हैं।इस परिपाटी का उद्देश्य और औचित्य उस समय था जब रिश्ते नाई या मध्यस्थों के जरिए तय होते थे और आवागमन के सीमित साधनों की वजह से कन्यापक्ष से जुड़े सभी लोगों के लिए वर पक्ष के बारे में विशेष रूप से उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं होता था। चढ़ाव की यह नुमाइश वरपक्ष की आर्थिक सुदृढ़ता का कन्यापक्ष को एक अलिखित आश्वासन होता है। लेकिन आज के समय में जब लड़का लड़की और उनके परिवार वाले शादी तय होने के पहले कई बार औपचारिक और अनौपचारिक मुलाकातें करते हैं।एक दूसरे की सोशल मीडिया प्रोफाइल खंगालते हैं और विभिन्न सूत्रों से एक दूसरे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी जुटाते हैं तब ऐसी सूरत में चढ़ाव के जरिए दिए जाने वाले इस पारंपरिक आश्वासन का कोई औचित्य नहीं है। बेतहाशा मंहगाई के इस दौर में चढ़ाव ले जाना और शादी की गहमागहमी के बीच उनकी रखवाली करना बेहद जोखिम भरा काम है।कई बार दुर्घटनाएं भी हुईं है। चढ़ाव के गहनों से वर पक्ष की हैसियत का व्यवहारतया आकलन संभव भी नहीं है क्योंकि उन पर उनका नाम थोड़े ही अंकित रहता है और इस तात्कालिक प्रयोजन के लिए वे दूसरों से मांगकर जुटाए भी जा सकते हैं। इसलिए इस तरह की परिपाटी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

विवाह की सभी रस्में सामूहिक रूप से और समारोह पूर्वक निभाई जाती हैं।मटियाने की रस्म में शादी का खाना बनाने के लिए मिट्टी का चूल्हा बनाने के निमित्त गांव के बाहर जाकर किसी साफ स्थान से गाजे-बाजे के साथ मंगलाचार करते हुए मिट्टी लाने का रिवाज रहा है। आजकल मिट्टी के बने चूल्हों के बजाय गैस भट्ठी या लकड़ी व कोयले की रेडीमेड भट्ठियों का इस्तेमाल होता है लेकिन मटियाने की रस्म आज भी निभाई जाती है जो कालबाह्य हो चुकी है। इसका प्रयोजन इतना भर रह गया है कि मटियाने के बाद शादी वाले घर में न्यौत्हारियों के लिए औपचारिक रूप से सामूहिक रसोई शुरू हो जाती है।
 शादी की विभिन्न रस्मों में हल्दी मेंहदी की रस्में भी बेहद महत्वपूर्ण रस्में हैं जिसमें समारोह और मंगलाचार पूर्वक यथास्थिति वर या कन्या को मेंहदी, हल्दी लगाई जाती है। पहले ये रस्में सादगी के साथ लेकिन आमोद पूर्ण ढंग से निभाई जाती थीं।लेकिन अब इसमें  फिल्मी तड़का लग गया है। हल्दी मेंहदी की रस्मों के लिए खर्चीले भव्य सेट तैयार किए जाने लगे हैं।इनका एक अलग ड्रेस कोड लागू हो गया है जो टीवी सीरियलों की मेहरबानी है।यह शादी में आए मेहमानों के साथ ज्यादती से कम नहीं है क्योंकि उन्हें इन मौकों के लिए ड्रेस खरीदने पर गुंजाइश न होने के बावजूद अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। मूलत: शादी विवाह जो एक अनुष्ठान है, उसे अक्ल के अंधे लोग इवेंट में तब्दील करने पर आमादा हैं।
शादी विवाह के मौके पर खासकर वे लोग जिन्होंने नया-नया पैसा कमाया या कबाड़ा है,अपनी अमीरी का फूहड़ प्रदर्शन करने लगे हैं। पहले घर के बाहर गली में शामियाना लगाकर लोग शादी करते थे और फिर बाद में स्कूल भवन या मुहल्ले की किसी धर्मशाला से इस तरह के आयोजन करने लगे।इसी क्रम में विवाह- वाटिकाएं लोगों की अगली पसंद बनीं और अब लोगों पर रिसाॅर्ट का भूत सवार है।होड़ाहोड़ी में लोग दूसरों की नजर में अपना कद ऊंचा करने की ललक में खुद को कर्ज में धकेल रहे हैं। आयोजन स्थलों पर होने वाले बेतहाशा खर्च को नियंत्रित कर उस राशि का कोई अन्य रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है।हाल ही में ग्वालियर के एक कारोबारी जो अपनी बेटी की शादी को यादगार बनाने के लिए उसमें बॉलीवुड सिंगर बुलाना चाहते थे, ने मित्रों की समझाइश पर अपना इरादा बदलकर उसी मंडप से जहां वह अपनी बेटी की शादी धूमधाम से कर रहे हैं,11 साधनहीन परिवारों की बेटियों के हाथ पीले करने का सुखद और प्रेरणादायी निर्णय लिया है।

खाने के फेहरिस्त में भी जितना जोर व्यंजनों की रूपगत विविधता और क्वान्टिटी पर रहने लगा है उतना क्वालिटी पर नहीं है। क्योंकि दूसरों ने जो लकीर पहले से खींच रखी है उससे बड़ी लकीर खींचने की होड़ लगी है। इसलिए सलामी तोप की ही होगी फिर चाहे धमक से पूरा फाउंडेशन हिल जाए!