वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
रविवार, 27 सितंबर 2026
वरहिया जैन : सिंहावलोकन
दिगंबर जैन आम्नाय की चौरासी उपजातियों में से एक वरहिया उपजाति है जिसका भौगोलिक प्रसार क्षेत्र प्रमुख रूप से प्राचीन गोपाचल जनपद (म.प्र. स्थित वर्तमान ग्वालियर )का ग्राम्यांचल रहा है।वरहिया जाति सबसे प्राचीन जैन संघ मूलसंघ और बलात्कार गण(यहां बलात्कार शब्द का तत्समय प्रचलित अर्थ बलपूर्वक ग्रहण करें) के अंतर्गत है और कुंदकुदाम्नाय, सरस्वती गच्छ में परिगणित है। हालांकि कई फूलमाल पचीसी (जो वास्तव में जैन धर्मावलंबी समाजों की सूची है) में वरहिया जाति का उल्लेख नहीं है। फिर भी प्रमुख सूचियों में इस जाति का उल्लेख है।जिन फूलमाल पचीसी में वरहिया जाति का उल्लेख नहीं है उसका कारण उन ग्रंथकर्ताओं का दूरस्थ और ग्राम्य क्षेत्र में निवासरत वरहिया जाति से उनका अपरिचय ही है।
विक्रम की 15वीं 16वीं शताब्दी से इस समाज के विकास के बारे में पता चलता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर के बड़े मन्दिर में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा के पादलेख के अनुसार विक्रम सम्वत् 1545 में मूलसंघ, सरस्वती गच्छ में वरहिया कुलोद्भव साहू लक्खा के वंशजों ने यह प्रतिष्ठा कराई थी।
गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया जिन्होंने समूचे हिंदी प्रदेश और उसके बाहर भी जैन न्याय और दर्शन की दुन्दुभी बजाई ,इसी उपजाति के गौरव-रत्न हैं ।वर्तमान में भारतवर्ष में जितने भी जैन विद्वान और मनीषी हैं या रहे हैं,उनमें से अधिकांश पंडित गोपालदास जी की शिष्य-प्रशिष्य परंपरा में आते हैं ।
ग्राम्यांचल में निवास करने के फलस्वरूप अन्य जैन जातियों के साथ इसका सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर्विनमय न होने के कारण यह उपजाति अल्पज्ञात रही है ।इसके मूल उद्गम स्थान को लेकर भी मतभेद हैं।ग्वालियर निवासी श्री रामजीत जी जैन ने 'वरहियान्वय' नाम से वरहिया जाति का इतिहास लिखा है जो इस जाति के समाजशास्त्रीय अध्ययन का पहला व्यवस्थित प्रयास है ।हालांकि इसमें कई सारे प्रश्न अनुत्तरित रह गये हैं और मूल उद्गम स्थान के बारे में उनकी स्थापना भी ठोस अन्तःसाक्ष्यों पर आधारित न होने के कारण एकांगी है किन्तु फिर भी यह इस दिशा में पहला प्रयास होने के नाते उल्लेखनीय और स्तुत्य है।
जनश्रुति के आधार पर 'वरहिया' पद की व्याख्या श्रेष्ठ हृदय वाले व्यक्ति के रूप में की जाती है ।यह एक गुणवाची पद है।वरहिया' जाति के वराहकच्छ या वराह क्षेत्र नामक भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े होने की प्रबल तार्किक संभावना है। वराह क्षेत्र प्राचीन काल में उत्तरी-मध्य भारत में एक धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र रहा है ,जिसकी अवस्थिति बुंदेलखंड और उसके आसपास के इलाकों में मानी जाती है।वरहिया जैन समुदाय की बसाहट मुख्य रूप से बुंदेलखंड, ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में रही है और आज भी यह इसका प्रवास क्षेत्र है। ऐतिहासिक रूप से वराह क्षेत्र अनेक क्षत्रिय जातियों और व्यापारियों का प्रवास क्षेत्र रहा है। 14वीं से 17वीं शती के बीच विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक कारणों से इन समूहों का निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रव्रजन हुआ और मूल स्थान से अपने जुड़ाव की स्मृति को संजोकर रखने के स्वाभाविक आग्रह के कारण वरहिया नाम से जैन जगत में पहचाने गए। यहां यह बात ध्यान रखने योग्य है कि अधिकांश जैन जातियां अपने मूल भौगोलिक निवास स्थान के नाम से ही जानी पहचानी जाती है।
वरहिया शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के वर्ह: से हुई जान पड़ती है जिसके सभी विवक्षित अर्थ अभीप्सित हैं। उत्कृष्ट और धर्मानुमोदित आचरण के कारण आर्हत-मत अनुगामियों के समूह विशेष को धर्माचार्यों द्वारा यह अभिधान दिया गया।
एक किम्वदंती के अनुसार नरवर के प्रतापी नरेश राजा नल की वंश परम्परा में वीरमचंद्र देव नामक सामंत को वरहिया लोगों का पूर्वपुरूष बताया गया है।कालांतर में यही वरहिया वंश आठ गोत्रों में विभाजित हुआ।ये आठ गोत्र हैं-
-1 चौधरी ,2 कुम्हरिया,3 पलैया,4 भंडारी ,5 ऐछिया या ऐरछिया ,6 सेंथरिया या सिंहपुरिया ,7 पहाड़िया ,8 नोने या नोनेरिया |इन मूल आठ गोत्रों के पश्चात् कालान्तर में 28 अन्य गोत्र इस जाति में और समाहित हुए ,जिनकी सूची इस प्रकार है --
1 चौरिया ,2 वगेरिया ,3 पुनिहा ,4 निकोरिया ,5 भागी ,6 तरपटले या तरपटिया ,7 सिनरुखिया,8 सोनिया या सोनी ,9 अकलनया या इकलोने ,10 साहू ,11 कमोखरिया या केमोरिखिया ,12 उदयपुरिया ,13 अलापुरिया ,14 मेहरोटिया या मोरसिन्धु,15 गुलिया ,16 वेदिया,17 रोंसरिया ,18 इन्दुरिखिया ,19 किरोड़ या कारोडिया,20 धनोरिया ,21 वदरेठिया ,22 भटसंतानी ,23 वरैया ,24 पदमपेंथिया,25 सिंघई ,26 सेठिया ,27 तिलोरिया ,28 दाऊ।
इस प्रकार वरहिया जाति में गोत्रों की संख्या बढ़कर 36 हो गई। लेकिन इनमें से कुछ गोत्र इसलिए अल्पज्ञात हैं कि वे या तो अब मौजूद नहीं हैं या उनकी संख्या अत्यंत न्यून है। वरहिया जैन जाति की जनगणना का डाटा उपलब्ध होने पर इसका सटीक आकलन हो सकेगा।
वरहिया समाज की विभूतियों ,विशेष रूप से विद्वानों की यदि माला बनाएं तो उसके सुमेरु निर्विवाद रूप से पंडित गोपालदास जी वरैया ही हैं।इस माला के कुछ मनकों का निदर्शन यहां कराया है।कविवर परिमल्ल, पंडित छोटेलाल वरैया(जिनका मालवांचल में बहुत बहुमान है।)पंडित खच्चूराम जी, पंडित लेखराज जी, पंडित प्यारेलाल 'लाल', पंडित प्यारेलाल 'सुमन', पंडित भगवती प्रसाद, पंडित कपूरचंद वरैया,श्री होतीलाल 'हेती' और विशेष रूप से उल्लेखनीय नाम एडवोकेट श्री रामजीत जी जैन का है जिन्होंने वरहिया समाज के इतिहास के बिखरे सूत्रों को संजोने का श्रमसाध्य कार्य किया।
वरहिया समाज के धर्म साधकों में मुनिश्री क्षीरसागर, क्षुल्लक श्री पद्म सागर, क्षुल्लक श्री आदि सागर, ब्रह्मचारी खेमचंद, क्षुल्लक श्री कीर्ति सागर, ब्रह्मचारी जतनलाल, मुनिश्री पुष्पदंत सागर, आर्यिका पद्मश्री, क्षुल्लिका आदिमति, साध्वी लीलावाई, ब्रह्मचारिणी द्रौपदी बाई,मुनिश्री प्रेक्षा सागर, मुनिश्री प्रभाव सागर, मुनिश्री विश्वनायक सागर, मुनिश्री प्रवीर सागर, मुनिश्री दया धर्म सागर, मुनिश्री विश्वानुत्तर सागर, मुनिश्री पूज्यतीर्थ सागर, मुनिश्री अध्यात्म मणि रत्न सागर, ब्रह्मचारिणी सरोज दीदी नाम स्मृति पटल पर हैं।
अतीत में और वर्तमान में जिन स्थानों पर वरहिया समाज के जिनालय रहे हैं,उनका विवरण इस प्रकार है-अलापुर,अमरोल,आमोल,आरोन,उरवा,उरवाहा,ऐसा,करहिया,कुर्राचित्तरपुर,कुलैथ,कैरुआ,कालावेही,गोपालपुरा,गनेशपुरा,देवरी,धिमसिरी,धौंआ,पठा,पार,भौरी,भौंती,मामोनी,रजियार,राई, रायपुर,,रौरा,चराई,चीनौर,छीमक, जौरा, डबरा, देवरी, धौलागढ़, नरवर,,बड़ा नगला,बरौआ,बनवार,बानमोर, मगरौनी,मोहना,,रिठौरा,स्याऊ, सुमावली, सिमरिया,सतनबाड़ा,सांतऊ,सौजना,जिंदपुरा या चंदपुरा,पवा,वर का गांव, शमसाबाद, लश्कर, शिवपुरी।
अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा द्वारा ई.1914 में भारत की समस्त दिगंबर जैन जातियों की गणना कराई गई थी।इस जातीय जनगणना से दिगंबर जैन जातियों की जनसंख्या का पहली बार आधिकारिक रूप से एक स्थूल आकलन हो सका। यह डायरेक्टरी वेंकटेश्वर मुद्रणालय मुंबई से प्रकाशित हुई थी। इसमें सभी दिगंबर जैन जातियों की जनगणना के अलावा विभिन्न समाजों के प्रमुख लोगों की भी एक सूची तैयार की गई थी।इस उलेख्य सूची में वरहिया(वरैया) जैन समुदाय के 59 प्रमुख परिवारों को शामिल किया गया है। यह हमारे अतीत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
वरहिया जैन समुदाय की तत्समय जनसंख्या का ग्रामवार विवरण अकारादि क्रम से यहां प्रस्तुत है। इसके अनुसार कुल जनसंख्या 1512 थी।
1-अमरोल-23
2-आमोल-5
3-अलवर-20
4-अलापुर-20
5-अमोला-103
6-आरोन-27
7-इटावली-15
8-उज्जैन-9
9-करई -23
10-करहिया-311
11-कानीबहेरी-9
12-कुलैथ-23
13-गुलगांव(सलारतपुरा)-4
14-गोपालपुरा-8
15-घरसोदी-5
16-घाटीगांव-6
17-चंदपुरा-16
18-चिंदौनी-1
19-चीनौर-43
20-चुरैलखेरा-9
21-चैतनगर(चैतग्राम)-13
22-छड़ेर-8
23-छड़ेरा-8
24-छीमक-10
25-जिगसोली-5
26-जौरा-57
27-जौरासी-10
28-टिकटौली-36
29-दीमानगंज-8
30-धमकन-7
31-धौंआ-47
32-धौलागढ़-19
33-नरवर-53
34-नरेला-7
35-नवगांव-3
36-पनिहार-5
37-पार-10
38-बड़नगर(मालवा)-1
39-बनवार-34
40-बैरसिया-8
41-भौंती-2
42-भोपाल-10
43-मगरोनी-115
44-मुरैना-5
45-मोहना-39
46-मोहलिया-4
47-रायपुर(गिर्द)-11
48-रिठौरा-23
49-रेंहट-44
50-लीटिया -10
51-वरकेगांव-23
52-बिलोखो-2
53-बिहारिया-3
54-सांतऊ-11
55-सतनवाड़ा-18
56-सभराई-8
57-सिमरिया-21
58-सुमावली-85
59-सिरसा-6
60-शिवपुरी-30
61-हथरया-13
इस जनगणना दस्तावेज में वरहिया जैन समुदाय के तत्समय के प्रमुख परिवारों का विवरण इस प्रकार है।
1-अमरोल(गिर्द)-श्री राधेलाल,फुंदीलाल जी-गल्ले का व्यापार
2-आमोल(नरवर)-श्री चुन्नीलाल, मोतीलाल जी-बजाजी
3-अलापुर(तवरघार)-श्री सेवालाल,ग्यासीराम जी -दुकान कठारखाना
4-आमोल(नरवर)-श्री मन्नूलाल, तुलाराम जी -साहूकारी
5-आमोल(नरवर)-श्री ताराचंद, खूबचंद जी-साहूकारी
6-आरोन(गिर्द)-श्री दुरगी,खूबी-साहूकारी
7-इटावली(ग्वा.रिया.)-हीरावन दे-बंजी
8-उज्जैन-श्री जुहारमल, पूनमचंद जी -परचून की दुकान
9-करई(गिर्द)-श्री रामलाल, गंगाराम जी -साहूकारी
10-करहिया(गिर्द)-श्री लेखराज,जगराम जी -साहूकारी
11-करहिया-श्री दीवानमल वृजलाल जी-साहूकारी
12-करहिया-श्री मिहरचंद, रामलाल जी -साहूकारी
13-कानीबहेरी(नरवर)-श्री दरयाब, रामलाल जी -बंजी
14-कुलैथ(ग्वा.रिया.)-कुल्लेमल पुत्र श्रीधर्मदास जी-बंजी
15-गुलगांव [सलामतपुर](भोपाल रिया.)-सेठ सुखलाल, रतनचंद जी -किराना
16-घरसोदी(गिर्द)-श्री काशीराम, परमसुख जी -बंजी
17-घाटीगांव(गिर्द)-श्री पन्नू,मानू-बंजी करना
18-चंदपुरा(ग्वा.रिया.)-श्री दौलती,ज्योति प्रसाद -बंजी
19-चिंदौनी(तवरघार)-श्री दुलीचंद खूबचंद जी -खेतीबाड़ी
20-चीनौर(गिर्द)-श्री धाराजीत, नंदलाल जी -साहूकारी
21-चुरैलखेरा(नरवर)-श्री दुल्ली, रामलाल जी -घी और गल्ले का व्यापार
22-चैतनगर(ग्वा.)-श्री भजनलाल, प्यारेलाल जी -साहूकारी
23-छड़ेर(तवरघार)-श्री शोभाराम,मनसाराम जी -दुकान कठारखाना
24-छड़ेरा(गिर्द)-श्री हरगोविंद, बालकिशन जी -बंजी
25-छीमक(गिर्द)-श्री सोनपाल, प्यारेलाल जी -साहूकारी
26-जिगसोली(ग्वा.रिया.)-श्री मूलचंद, राजाराम जी -बंजी
27-जौरा(तवरघार)-श्री मोहनलाल, महासुख जी-दुकानदारी
28-जौरासी(ग्वा.रिया.)-श्री रामलाल, पातीराम जी -बंजी
29-टिकटौली(ग्वा.रिया.)-श्री छीतरया, अमरजीत जी -बंजी, खेतीबाड़ी
30-धमकन(तवरघार)-श्री ललईं, मूलचंद जी -दुकानदारी
31-धौंआ(गिर्द)-श्री मोतीराम,रामजीमल जी -साहूकारी
32-धौलागढ़(नरवर)-श्री रतनलाल, बिहारीलाल जी -आढ़त,साहूकारी
33-नरवर(ग्वा.रिया.)-सेठ श्रीचंद पुत्र श्री इच्छाराम जी -साहूकारी
34-नरवर-सेठ चतुर्भुज पुत्र श्री किशुनचंद जी -साहूकारी
35-नरेला(तवरघार)-श्री गिरधारी लाल,गोलीराम जी -दुकान कठारखाना
36-नवगांव(गिर्द)-श्री कड़ोरेलाल,विनतीलाल जी -गल्ले का व्यापार
37-पार(गिर्द)-श्री उदैनंद,हरप्रसाद जी -साहूकारी
38-बनवार(गिर्द)-श्री बापूराम, रामलाल जी-बंजी
39-बनवार-श्री हरलाल, भोगीराम जी -साहूकारी
40-बैरसिया(भोपाल)-श्री धन्नालाल जी -हलवाईगीरी
41-मगरौनी(नरवर)-श्री मोतीलाल, पन्नालाल जी -साहूकारी
42-मुरैना(ग्वा.रिया.)-पं.गोपालदास जी -आढ़त
43-मोहना(गिर्द)-श्री पन्नूलाल,भूरासिंह जी-साहूकारी, गल्ले का व्यापार
44-रायपुर(गिर्द)-श्री चिरोंजी लाल, धनपाल जी-पटवारी
45-रिठौरा(तवरघार)-सेठ पन्नालाल, हीरालाल जी -साहूकारी
46-रेंहट(गिर्द)-श्री प्रतापचंद,कड़ोरेमल जी -साहूकारी
47-लीटिया(गिर्द)-श्री पातीराम,बहोरनलाल जी -साहूकारी, खेतीबाड़ी
48-वरकेगांव-(गिर्द)-श्री माणिकचंद, हंसराज जी -साहूकारी,बजाजी
49-बिलोखो(नरवर)-श्री गुलाबचंद, श्रीलाल जी -बंजी
50-विहारिया(उज्जैन)-श्री चुन्नीलाल जी -परचून की दुकान
51-सांतऊ[शांतक](गिर्द)-श्री दुर्गा प्रसाद, मोतीलाल जी -साहूकारी, खेतीबाड़ी
52-सतनवाड़ा(नरवर)-श्री गुलाबचंद, पन्नूलाल जी-साहूकारी,घी का व्यापार
53-सभराई(गिर्द)-श्री फोदलिया पुत्र श्री जानकीराम जी -साहूकारी,घी का व्यापार
54-सिमरिया(गिर्द)-श्री अमरचंद, नेकराम जी -गल्ले का व्यापार
55-सुमावली(ग्वा.रियासत)-श्री हरगोविंद, प्यारेलाल जी -साहूकारी
56-सुमावली-श्री फैलीराम,गुलजारी लाल जी -साहूकारी
57-सिरसा(गिर्द)-श्री झींगरीमल, कालूलाल जी -पंसारी
58-शिवपुरी(नरवर)-श्री गिरधारी भाई, पातीराम जी -हलवाईगीरी
59-हथरया(ग्वालियर रियासत)-श्री भागचंद, धनीराम जी -बंजी।
[यहां यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इस जनगणना में आगरा अंचल के शमसाबाद ,बड़ा नगला,वदेकेवास,डौकी,कुर्राचित्तरपुर,गढ़ी महासिंह आदि स्थानों में वरहिया जैन समाज के निवास का कोई उल्लेख नहीं है। जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि या तो ई.1914 में कोई वरहिया जैन इस क्षेत्र में निवास नहीं करता था या फिर जनगणना कार्य करने वाले लोगों से कोई भूल हुई है।जबकि जनगणना में कुर्राचित्तर पुर में एक जैसवाल परिवार के निवास का उल्लेख है यानी वे लोग इस क्षेत्र से परिचित थे। शमसाबाद में रहने वाले सिंघई परिवार तो बरौआ (गिर्द) से जाकर वहां बसे हैं। अन्य मामलों में भी शायद ऐसा ही रहा हो।
वरहिया समाज को संगठित करने और सामाजिक स्तर पर समाज जनों के बीच सामंजस्य और सौहार्द स्थापित करने के पवित्र उद्देश्य से वरहिया समाज की सर्वोच्च प्रशासी संस्था अखिल भारतवर्षीय दिग. जैन वरहिया महासभा की स्थापना संवत् 2000 में स्याऊ जिला ग्वालियर हुई थी जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री नाथूराम जी धनोरिया डबरा एवं महामंत्री श्री होतीलाल जी भंडारी आगरा बने।उसके पश्चात महासभा कुछ वर्षों तक निष्क्रिय रही।सन् 1980 में श्री मोहनलाल जी ठेकेदार की सक्रियता से ग्वालियर में एक अधिवेशन कर श्री मक्खनलाल जी धौंआ वाले व श्री शीतलप्रसाद जी ग्वालियर को महासभा के पुनर्गठन का दायित्व सौंपा गया। जिसके फलस्वरूप उनके अथक प्रयासों से 23-11-1980 को महासभा का पुनर्गठन किया गया। जिसमें श्री राम भरोसीलाल जी अध्यक्ष व श्री चंद्रसेन जैन महामंत्री निर्वाचित हुए। तत्पश्चात श्री राजमल जैन वी.डी.ओ.(अध्यक्ष )और श्री शीतल प्रसाद जैन, ग्वालियर (महामंत्री)ने इसका नेतृत्व किया। इसके उपरांत श्री बालकृष्ण जैन (अध्यक्ष) व श्री रामस्वरूप जैन (महामंत्री) ने महासभा की कमान संभाली। इनके उत्तरवर्ती के रूप में श्री धर्मचंद जैन (अध्यक्ष) व श्री वीरेन्द्र जैन, नरवर (महामंत्री) तथा श्री माता प्रसाद भंडारी (अध्यक्ष) व श्री भरत जैन(महामंत्री) ने महासभा का दायित्व संभाला। इसके उपरांत श्री आई पी जैन (अध्यक्ष)व श्री वीरेन्द्र चौधरी, डबरा(महामंत्री )तथा श्री जवाहरलाल जैन(अध्यक्ष) व श्री वीरेन्द्र चौधरी, डबरा (महामंत्री) ने वरैया महासभा का नेतृत्व किया। इसके पश्चात श्री माता प्रसाद भंडारी(अध्यक्ष)व श्री नरेन्द्र सोनू(महामंत्री) ने महासभा का नेतृत्व किया और वर्तमान में श्री धर्मचंद जैन, मामोनी (अध्यक्ष) व श्री नरेन्द्र जैन नीरू (महामंत्री) के रूप में कार्यरत हैं। महासभा के पदाधिकारियों के कार्यकाल का व्यवस्थित काल क्रमिक ब्यौरा उपलब्ध नहीं हो सका।
वरहिया समाज जिन संस्थाओं का प्रबंधन करता है उसमें सबसे प्रमुख सोनागिर स्थित भट्टारक कोठी सोनागिर है। भारतवर्ष में स्थापित भट्टारक पीठों में सोनागिर स्थित भट्टारक पीठ भी एक है |जिस पर प्रमुखतः बलात्कार गण शाखा का वर्चस्व रहा है |अनेक यशस्वी भट्टारकों से सुशोभित इस पीठ के अंतिम भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी, जो वरहिया समुदाय से थे -वि.सं.2001 में अभिषिक्त हुए ,जिनका वि.सं.2031 में देहांत हो गया |श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी पर भट्टारकों की गद्दी(गादी) प्राचीन समय से चली आ रही थी। पूर्व में इस क्षेत्र का प्रबंधन दतिया के राजा के अधीन था। दतिया नरेश ने क्षेत्र का प्रबंधन जब श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र कमेटी को सौंपा था तब उस समय इस कोठी के मंदिर के सम्बन्ध में कमेटी की रिपोर्ट में उल्लेख आया है।जिसके अनुसार यह मंदिर भट्टारक जी महाराज सोनागिर पट्टाधीश का बनवाया हुआ है। पर्वत के चढ़ने के दरवाजे के सामने ही बना हुआ है। इसके साथ एक धर्मशाला भी है । भट्टारक हरेन्द्रभूषण जी सोनागिर तत्समय इस गद्दी के पट्टाधीश थे और इसका प्रबंधन करते थे और यहीं निवास करते थे। इस धर्मशाला में एक कुआं भी है।पर्वत राज के मंदिरों का प्रबन्ध इन्हीं के द्वारा होता था।पहले पर्वत का भंडार आप ही के यहाँ जमा होता था। उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार आगे उल्लिखित संस्थान 1- भट्टारक जी की कोठी ,2-खैरा वालों का,3-आचार्य वालों का,4- भगवानदास जी का,5- करहिया वालों का मंदिर,इनके प्रबंधनाधीन थे। जब सिद्धक्षेत्र सोनागिर कमेटी का निर्माण हुआ तो इसके अध्यक्ष भी भट्टारक श्री हरेन्द्रभूषण ही थे। उनके उत्तराधिकारी के रूप में भट्टारक श्री चन्द्रभूषण जी महाराज इसके अन्तिम भट्टारक बने । योग्य शिष्य न मिलने के कारण भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी ने अपने जीवनकाल में ही वरहिया समाज के प्रमुख लोगों से विमर्श कर अपने नियंत्रणाधीन परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक प्रबंधकारिणी कमेटी का गठन किया था जो भट्टारक गादी संस्थान के नाम से जानी जाती है।जिसमें मंदिर नं. 8 व 9, शांतिनाथ मंदिर तथा उससे सम्बंधित अन्य सम्पत्ति, कोठी के सामने का चबूतरा, कुआं, आमौल वाली धर्मशाला, दक्खोबाई का मंदिर नं. 11, परमसुख,लखमीचंद धनोरिया करहिया वालों का मंदिर नं. 12, मंदिर नं. 17 एवं उसकी धर्मशाला और उसका चबूतरा आदि की व्यवस्था जो भट्टारक जी के अधीन थी उसकी समुचित और सुचारू व्यवस्था करने के लिए वरहिया समाज की एक कमेटी बनाने का जो सुझाव भट्टारक जी ने रखा था, उसके अनुरूप वरहिया जैन समाज ने एक कमेटी का गठन किया और उसका भट्टारक श्री चन्द्रभूषण महाराज संस्थान गादी सोनागिर, दतिया (रजि.) नामकरण किया गया। यह संस्था म.प्र सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 (सन् 1973 क्रं. 44) के अधीन दि. 30-10-1984 को पंजीबद्ध की गई।) और इसका प्रबंधन दिगंबर जैन वरैया प्रबन्ध कार्यकारिणी कमेटी को सौंपा गया। भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी शेष जीवन पर्यन्त इस कमेटी के अध्यक्ष रहे।भट्टारक जी के निधन के पश्चात् से श्री दिगंबर जैन वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी सोनागिर इस दायित्व का सुचारू रूप से निर्वहन कर रही है।
आमोल वाली धर्मशाला के प्रांगण में 105 भट्टारक सर्वश्री सुरेंद्र भूषण जी, जिनेन्द्र भूषण जी, हरेंद्र भूषण जी व अंतिम भट्टारक चंद्रभूषण जी की चरण छतरी बनी हैं।
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