सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

वरहिया जैन और वैवाहिक चुनौतियां

वरहिया जैन समाज में पढ़े-लिखे लड़के-लड़कियों की कमी नहीं है। हमारी नई पीढ़ी शिक्षा के हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन करती हुई दिखाई देती है। लेकिन विवाह के मामले में वरहियाजनों के बीच इतर जैन समाज में रिश्ते करने को प्रमुखता देने और उन्हें महिमा मंडित करने का ट्रेंड जोर पकड़ रहा है, खासकर लड़कियों के मामले में। ऐसे रिश्तों पर दबी जुबान से चर्चा करते और अंगुलियां उठाते लोग अक्सर मिल जाते हैं लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है इसकी पड़ताल करने की कोई जहमत नहीं उठाना चाहता। अव्वल तो उच्च शिक्षित कन्या के अनुरूप सजातीय वर नहीं मिलता और यदि संयोग से मिल जाता है तो कभी लड़के के नखरे नहीं मिलते तो कभी उसके मां-बाप और नजदीकी रिश्तेदारों जैसे मामा,नाना के नखरे नहीं मिलते। वर पक्ष की कथित रूप से रुपए पैसों की कोई मांग न होने के बावजूद शादी के खर्च की राशि का आकलन करने के लिए परोक्ष रीति से कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। जबकि अन्य समाज के लोग दुल्हन को ही सबसे बड़ा दहेज मानकर सुशिक्षित कन्या को बहू के रूप में अपनाने को सहज और सहर्ष तैयार हो जाते हैं क्योंकि लिंगानुपात की जटिल समस्या से सभी समाज जूझ रही हैं।इस समय वरहिया जैन समाज के बीसियों लड़के विवाह की देहली सीमा पार कर चुके हैं यानी ओवरएज हो चुके हैं और एक बड़ी संख्या में विवाह की देहलीज पर बैठे हैं। इनमें से कुछ तो कम पढ़े-लिखे होने की वजह से मात खा रहे हैं तो कुछ दूरदराज देहात में रहने की वजह से कन्या पक्ष की प्राथमिकता सूची में नहीं है। इसके अलावा लड़के वालों के पास शुरू में जब विवाह प्रस्ताव आते हैं तो वह ना-नुकुर करते हैं।कई बार इस ना-नुकुर की वजह जेन्युइन होती है तो कई बार इसके पीछे बेहतर रिश्ते की तलाश और शादी के बजट को लेकर मोल-तोल की मंशा होती है।लड़के पक्ष के रिश्ते से इंकार की सूरत में कई लड़की पक्ष वाले क्षुब्ध होकर लड़के के बारे में गलत भ्रांतियां फैला देते हैं। जिसकी वजह से समाज में उसकी एक नकारात्मक छवि बन जाती है।जो उनकी राह में कांटे भर देती है।"तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी गैर को चाहोगे तो मुश्किल होगी" की तर्ज पर कुछ परिवार विला वजह की दुश्मनी पाल लेते हैं।इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि हाथठेला लगाने और मामूली प्राइवेट नौकरी करने वाला भी अपनी बेटी का हाथ अपनी आर्थिक हैसियत से ज्यादा बड़ी हैसियत वाले घर में देना चाहता है। हालांकि एक बेटी के बाप के लिए ऐसा सोचना गलत तो कतई नहीं है लेकिन इस सूरत में भी उसके ढेर सारे किंतु परंतु वर पक्ष को परेशानी में डाल देते हैं। जिस तरह इन दिनों अपने नौनिहाल का स्कूल में दाखिला कराते वक्त स्कूल प्रबंधन अभिभावकों से बेढंगे सवाल पूछकर उसके दिमाग का दही करते हैं , कमोबेश वैसी ही स्थिति लड़की वाले के सामने लड़के के परिवार की हो जाती है। लड़की वाले के पास भले ही खुद का घर न हो वाहन के नाम पर टूटी साइकिल भी न हो लेकिन लड़के का पक्का घर होना चाहिए और उसके पास चारपहिया गाड़ी होना चाहिए। परिवार ज्यादा बड़ा न हो ताकि घर के कामकाज में लड़की को न खटना पड़े। बहरहाल ताली दोनों हाथों से बजती है।इस दुरवस्था के लिए समाज के दोनों पक्ष जिम्मेदार हैं। लेकिन इस प्रकरण का सबसे दु:खद पहलू यह है कि समाज से ब्रेन ड्रेन हो रहा है। हमारी सुशिक्षित और सुयोग्य लड़कियां समाज से बाहर जा रही हैं और हमें अपनी बहुएं एससी और ओबीसी वर्ग से मैनेज करके लानी पड़ रही हैं। समकक्ष समाजों में हमें समुचित रिस्पांस नहीं मिलता है।इतर जैन समाज के लोग हमारी लड़कियां तो स्वीकार करते हैं लेकिन अपनी लड़की सजातीय समुदाय में ही ब्याहना चाहते हैं। यदि दोनों ओर से रिस्पांस मिले तो ज्यादा कठिनाई नहीं हो।आने वाले समय में वरहिया जैन समाज की सामाजिक स्थिति का यदि काल्पनिक चित्र खींचें तो वह बहुत भयावह नजर आता है। जातीय गौरव और रक्त की शुद्धता का आग्रह जिसका हम दंभ भरते नहीं अघाते, वह दूर की कौड़ी होगी। समाज में संस्कारहीन लोगों की एक पूरी पीढ़ी दिखाई देगी। क्योंकि संतान पर सबसे ज्यादा प्रभाव मां का ही होता है और जो संस्कार बच्चों को मां की घुट्टी में यानी बचपन में मिलते हैं उनका प्रभाव जीवन में स्थायी होता है। लेकिन लगता है समाज के पुरोधाओं को इन सब बातों से कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। क्योंकि वे सभी इन आशंकाओं से बेखबर नजर आ रहे हैं। सभी अपनी छवि चमकाने की कवायद में जुटे हैं और चमचेनुमा लोग उनके इर्द-गिर्द इकट्ठे होकर उनके झूठे अहंकार के गुब्बारे में हवा भरकर उन्हें सच्चाई से रूबरू ही नहीं होने देते।
 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

विमर्श -4


 वे ही हैं सरपंच कुछ भी फैसला लें।
उनका ही है मंच कुछ भी फैसला लें।
जिसे चाहें उसे 'तनखैया' बता दें।
गगनचुंबी को झुका नीचे गिरा  दें।
वरहिया  या  वरैया अथवा  बरैया,
वही होगा मान्य,जो वे तय  करेंगे।
तथ्य से उनको नहीं कुछ वास्ता है,
समर्थन वे स्वयं का निश्चय करेंगे।
हर तरफ इनका ही है अब दबदबा।
बह रही है आज इनकी ‌~  ‌ही हवा।
कौन इनसे उलझकर पंगा ~करेगा?
व्यर्थ में खुद ही को क्यों नंगा करेगा?
रिश्तेदारी टूटने का डर  ~ दिखाकर ,
आगापीछा सभी को उनका जताकर।
अंततः उनका ~ही पूर्वाग्रह  मनेगा !
उनका हठ ही सर्वसम्मत मत बनेगा!
इसलिए कुछ भी न कहना उचित है।
इस विषय में मौन रहना ~उचित है।