प्रायः सभी मांगलिक अवसरों पर कलश स्थापना की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। विवाह, गृहप्रवेश, व्रत, पर्व, पूजा जैसे मंगल प्रसंगों पर कलश स्थापना की जाती है। सभी भारतीय धर्मों में कलश स्थापना का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।कलश को अक्षय पात्र माना गया है। इसका आशय है कि जैसे कलश में जल भरा है, वैसे ही घर-परिवार में सुख, शांति और सम्पन्नता बनी रहे।नारियल,आम के पत्तों और जल से भरे कलश को "सजीव ब्रह्माण्ड" का प्रतीक माना जाता है।
कलश में रखा गया जल जीवन, शांति और समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए यह हर मांगलिक कार्य का प्रारम्भिक चरण है।
इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।कलश का आधार पृथ्वी, जल उसका जीवन, नारियल और पत्ते उसकी उर्वरता और सृजनशीलता का प्रतीक हैं। इससे मानव जीवन और ब्रह्माण्ड के बीच एकात्म का बोध कराया जाता है।कलश से जुड़े प्रतीकों में श्रीफल या नारियल और महत्वपूर्ण प्रतीक है।जिस प्रकार कलश जीवन और सृष्टि का प्रतीक है, उसी प्रकार श्रीफल पूर्णता और फलप्राप्ति का द्योतक है।नारियल का गोल आकार ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।इसके भीतर का जल जीवन का बीज माना गया है।
जब इसे कलश पर स्थापित किया जाता है, तो यह सृष्टि की निरंतरता और प्रजनन शक्ति का जीवंत प्रतीक बन जाता है।
आम के पत्तों से सज्जित श्रीफल आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।आम के पत्ते केवल सज्जा सामग्री नहीं है बल्कि ये पत्ते समृद्धि, शांति और शुभता का प्रतीक माने जाते हैं। कलश पर लगने वाले आम की पाँच पत्ते प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान इन पंचप्राण के प्रतिनिधि माने जाते हैं और ये हरे पत्ते नई ऊर्जा, उन्नति और उर्वरता के प्रतीक होते हैं।आम की पत्तियाँ वायु को शुद्ध करने और वातावरण में नमी संतुलित रखने में सहायक होती हैं और जल्दी नहीं मुरझातीं है।इसलिए कलश यदि ब्रह्माण्ड और जीवन का आधार है, तो श्रीफल उसका फल और समृद्धि है। दोनों मिलकर अक्षय मंगल, सुख-समृद्धि और पूर्णता के कारक माने जाते हैं।

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