मंगलवार, 8 मार्च 2016

श्री पन्नालाल जी जैन

पिता हकीम ताराचंद जी के दिलों की धड़कन और माता गौराबाई की आँखों के तारे ,सबके लाड़ले पन्नालाल जी का जन्म 25 मार्च सन 1934 में म.प्र. के शिवपुरी जिले के ग्राम मगरोनी में हुआ था |बालक पन्नालाल बहुत सौम्य,गंभीर स्वभाव के थे |समय के साथ उनकी यह सौम्यता  और गाम्भीर्य और पुष्ट होता चला  गया और उनके जीवन का स्थायी भाव बन गया |
                                                माता-पिता के आज्ञाकारी पन्नालाल जी बहुत धार्मिक स्वभाव के ,संस्कारी और अल्पभाषी रहे हैं |उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मगरोनी में ही हुई |उन दिनों मगरोनी में पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था न होने से उनकी पढ़ाई-लिखाई माध्यमिक स्तर तक ही संभव हो सकी लेकिन अनौपचारिक रूप से उनका अध्ययन-मनन आजीवन चलता रहा |
                                                                            आपका विवाह संवत् 2008 में वैशाख शुक्ला 3 को करहिया के श्री फूलचंद्र चौधरी की सुपुत्री बादामीबाई के साथ संपन्न हुआ |आपका दाम्पत्य जीवन सुखमय बीता |आपके चार पुत्रियाँ और एक पुत्र है |मगरोनी में ही आपकी लोहे की दुकान थी जो आपकी आजीविका का आधार रही |सामाजिक कार्यों में आपकी युवावस्था से ही गहरी रूचि रही जो आयु बढ़ने के साथ उत्तरोत्तर बढ़ती गई |जिससे आपकी एक निष्ठावान समाजसेवी के रूप में लोगों के मानस-पटल पर छवि अंकित हो गई |
                            गुलिया गौत्रोत्पन्न श्री पन्नालालजी पंडित गुरुवर्य गोपालदास जी कल्याण-कोष के संस्थापक अध्यक्ष रहे |कल्याण-कोष पन्नालाल जी की कल्पनाशीलता और समाज के प्रति उनके समर्पण का जीवंत दस्तावेज है |वह सन 2004 से 2010 तक इसके अध्यक्ष रहे और उसके उपरांत संरक्षक के रूप उसका मार्गदर्शन किया |आप 20 वर्षों तक नवयुवक मंडल ,मगरोनी के मंत्री रहे | आपने युवाओं को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई और नवयुवक मंडल की पहचान और सक्रियता को एक नया आयाम दिया |श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर ,कटरा मोहल्ला मगरोनी का आपने लम्बी अवधि तक कार्यभार सम्हाला |मगरोनी ग्राम पंचायत के भी आप सदस्य रहे हैं |श्री भट्टारक कोठी ,सोनागिर के उपाध्यक्ष के दायित्व का भी आपने दो कार्यकाल तक निर्वहन किया |आप उरवाहा सिद्धक्षेत्र ,नरवर ट्रस्ट के भी उपाध्यक्ष रहे हैं |अखिल भारतीय दिगंबर जैन महासभा के आप सदस्य रहे हैं |आपकी आतिथ्य-प्रियता और सौजन्य से हर व्यक्ति सहज ही अभिभूत हो जाता था |वह बहुत स्नेहशील व्यक्ति थे |27 फरवरी 2016 को क्रूर काल ने अचानक  उन्हें हम से छीन लिया ||

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

सराक जैन

प्राचीन काल में भारत के प्रायः सभी भागों में ,विशेष रूप से उत्तर भारत में जैन धर्म के अनुयायियों की काफी बड़ी संख्या रही है |विहार ,झारखण्ड ,उड़ीसा ,बंगाल आदि प्रदेश जो पार्श्वनाथ और वर्धमान महावीर की कर्मस्थली रहे हैं ,में उनके अनुयायियों की बहुत बड़ी संख्या थी |
                         कालांतर में जब राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और जैन संघ की शक्ति और प्रभा क्षीण हुई तो अनेक प्रकार के प्रलोभनों और दवाबों के चलते बड़ी संख्या में यहाँ के लोगों ने धर्म-परिवर्तन कर लिया |प्रकट रूप से तो ये लोग जैन मत से विमुख हो गये लेकिन अवचेतन रूप से जैन मूल्यों को अपने जीवन-व्यवहार में आत्मसात किये रहे |सैकड़ों वर्ष बाद भी ये अध्यात्मिक मूल्य उनके आचार-विचार में आज भी शामिल हैं |तमिलनाडु के नैनार,उत्तराखंड के डिभरी,मेदनीपुर के सदगोप व बिहार ,झारखण्ड ,उड़ीसा ,बंगाल में ये लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं और सराक नाम से जाने जाते हैं |पार्श्वनाथ को अपने कुलदेवता के रूप में पूजने वाले इन लोगों की 6-7 लाख की आबादी इन क्षेत्रों के लगभग 500 ग्रामों में निवासरत हैं ,जो आपने नाम के साथ सराक शब्द जोड़ते हैं ,जो वास्तव में श्रावक शब्द का ही अपभ्रंश है |
                   ये वास्तव में प्रच्छन्न जैन ही हैं क्योंकि इनके आचार-विचार ,मान्यताओं और धार्मिक विश्वासों में जैन मतावलंबियों के आचार-विचार,मान्यताओं और धार्मिक विश्वासों की ही प्रतिच्छवि ही दिखती है |सराक जाति के गौत्र जैन तीर्थंकरों के नाम पर,जैसे आदिदेव ,शांतिदेव,अनंतदेव ,धर्मदेव आदि मिलते हैं ,जो जैन परंपरा से इनकी निकटता की द्योतक है |ये पूर्ण शाकाहारी और अहिंसक हैं |सूर्योदय के पूर्व और सूर्योदय के पश्चात् भोजन नहीं करते और छानकर पानी पीते हैं |उदुम्बर यानी गूलर,पीपल आदि का सेवन नहीं करते |शौच के कपड़े बदले बिना किसी को नहीं छूते और छानकर पानी पीते हैं और बिना स्नान किये भोजन ग्रहण नहीं करते |स्वजाति में ही विवाह सम्बन्ध करने वाले इस समुदाय में विधवा विवाह परंपरा से वर्जित है |सराक समाज के उन्नयन के लिए अनेक जैन संस्थाएं आगे आई हैं और इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं |मुनि -श्री ज्ञानसागर जी ने तो इसे अपने जीवन का  एक मिशन ही बना लिया है ||

सोमवार, 24 नवंबर 2014

श्री लालमणि प्रसाद जैन


लम्बी कद काठी व गाम्भीर्य ,सहजता,और मिलनसारिता के सजीव विग्रह पलैया गौत्रोत्पन्न लालमणि प्रसाद जैन ,जिन्हें लालमन जी के नाम से प्रायः लोग जानते हैं -का जन्म ईस्वी सन 1937 में भाद्रपद शुक्ला षष्ठी को ग्वालियर जनपद के करहिया ग्राम में हुआ ।आपके पिता का नाम श्री लखमी चन्द्र वरहिया व माताश्री का नाम दक्खो बाई है ।दुर्भाग्यवश आप पितृ-स्नेह से वंचित रहे क्योंकि आपके जन्म के 2 मास पूर्व ही आपके पिता का देहांत हो गया था।आपका लालन-पालन आपके ताऊ श्री भगवान लाल जी वरहिया ने किया और अपना पुत्रवत स्नेह दिया।मणि जी के पूर्वज उम्मेदगढ़ के रहने वाले हैं जो आजीविका की तलाश में पहले आरोन और बाद में करहिया आकर बस गये लेकिन आपकी किशोरावस्था में ही आपके ताऊ भगवान लाल जी का भी स्वर्गवास हो गया और उनका स्नेह भरा हाथ भी आपके ऊपर से उठ गया।जिसके चलते गृहस्थी का कठिन बोझ आपके नाजुक कन्धों पर आ गया।इन विषम परिस्थितियों में आप माध्यमिक स्तर तक ही अपनी पढ़ाई पूरी कर सके।लेकिन बाद में कुछ लोगों की तानाकशी से विचलित होकर आपने आगे पढ़ने का निश्चय किया और सन 1978 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की और विशारद किया।आप काफी प्रत्युत्पन्न मति है।गायन के अलावा साहित्य में भी आपकी गहरी अभिरुचि है।अध्ययनशील होने के साथ ही आप रचनाधर्मी भी है।'मणि' उपनाम से आपने कई रचनाएँ की हैं जो यत्र-तत्र पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहीं हैं।आपने 'वरहिया जैन जाग्रति 'पत्रिका का संपादन भी किया ।इसके अतिरिक्त आपने उपन्यास भी लिखे हैं ,जो अप्रकाशित हैं।आपकी वक्तृता के तो सभी कायल हैं।आप अपनी वाग्मिता  से अपने विरोधियों को भी सहज ही में अभिभूत और निरुत्तर कर देते हैं। सामाजिक फलक पर आपकी सक्रियता निरंतर रही है।करहिया जैन मंदिर के मंत्री के रूप में आपने लगभग 15 वर्षों तक अपने दायित्व का निर्वहन किया।श्री सोनागिर सिद्धक्षेत्र संरक्षिणी सभा के सदस्य रहे व भट्टारक चंद्रभूषण संस्थान ,सोनागिर के मंत्री और अध्यक्ष के रूप में लम्बे समय तक अपने कार्यभार का निर्वहन किया।आप अखिल भारतीय दिगंबर जैन महासभा के आजीवन सदस्य हैं।श्री गोपालदास जैन सिद्धांत महाविद्यालय ,मुरैना की कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे हैं व अखिल भारतीय वरहिया महासभा के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष पद पर भी आसीन रहे हैं।विभिन्न पंचकल्याणकों के सफल आयोजनों में आपकी प्रभावी और सहयोगी भूमिका रही है।
                       राजनीतिक फलक पर भी आपकी सक्रियता रही है।तत्कालीन मध्यभारत के मुख्यमंत्री बाबू तख्तमल जैन का आपको राजनीतिक सानिध्य प्राप्त रहा ।आप कांग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं।
            आजीविका के लिए आपने सन 1953 में सभराई ग्राम में किराने की दुकान शुरू की और इसके साथ ही व्यापारिक क्षेत्र में पदार्पण किया और इसके दो वर्ष पश्चात् ही किराने का थोक कारोबार व बजाजी का काम किया।सन 1967 में आपने ग्वालियर में सर्राफा बाजार में पहले साझीदारी में और फिर बाद में स्वतन्त्र रूप से सोने-चांदी का कारोबार शुरू किया ,जो अब तक जारी है। 
          आप की सहधर्मिणी का नाम श्रीमती सुशीला बाई है।जिनका स्वर्गवास हो चुका है।आपके दो पुत्र और चार पुत्रियाँ हैं | आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए गृहस्थ-साधु का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।पनिहार में प्रवर्तित नवीन तीर्थ को विकसित करने में आपका उल्लेखनीय योगदान रहा है। विवादों से आपका गहरा नाता रहा लेकिन इस सबके बावजूद आप वरहिया जैन समाज के सबसे चर्चित और लोकप्रिय व्यक्ति रहे हैं।जीवन की अवसान बेला में आपने संसार की नश्वरता को जानकर जीवन चक्र से मुक्ति के निमित्त आचार्य चैत्यसागर जी से दि.24 जुलाई 26 को ग्वालियर में क्षुल्लक दीक्षा ली और अध्यात्म मणि रत्न सागर नाम ग्रहण किया। क्षुल्लक दीक्षा के एक दिन उपरांत ही साधु जीवन का एक और सोपान चढ़ते हुए आपने आचार्य चैत्यसागर जी से दि.25 जुलाई 26 को मुनि दीक्षा ली और मुनि श्री अध्यात्म मणि रत्न सागर नाम ग्रहण किया। मुनि दीक्षा के उपरांत आपने कठिन संल्लेखना व्रत धारण किया और आध्यात्मिक चिंतन मनन करते हुए दिनांक 29 जुलाई 26 को गुरु पूर्णिमा के दिन सायंकाल देह त्याग कर इस नश्वर संसार से प्रयाण किया।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

सिंघई फूलचंद्र जैन


शमशाबाद ,आगरा जनपद का एक प्रमुख क़स्बा है |यहाँ वरहिया जैन समुदाय के लगभग पैंतीस-चालीस परिवार निवास करते हैं |ये सभी प्रायःव्यवसायी हैं और आनुपातिक रूप से  यहाँ के व्यापार के एक बड़े भाग पर इनका नियंत्रण है |सिंघई फूलचंद्र जी भी इन्हीं में से एक हैं ,जो यहाँ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं |सिंघई फूलचंद्र जैन का जन्म 16 जनवरी सन 1934 में शमशाबाद में हुआ |आपके पिता का नाम सिंघई प्यारेलाल जैन व माता का नाम श्रीमती कटोरी बाई जैन है |
                                   सिंघई प्यारेलाल जी वरहिया का परिवार तीन-चार पीढ़ी पहले ग्वालियर जनपद के बरौआ गाँव से आकर शमशाबाद में बस गया और इसी को अपनी कर्मस्थली बना लिया |
                                   आपकी प्रारंभिक शिक्षा शमशाबाद में हुई |मेट्रिक तक पढ़ाई करने के बाद ही आपने पढ़ाई छोड़ दी और अनाज के कारोबार में अपने पिता का हाथ बंटाने लगे |यह वह समय था जब आपका सामना जीवन की कड़वी सच्चाइयों से हुआ |बेहतर आजीविका की तलाश में आपने कई प्रयोग किये और बहुत कड़ा परिश्रम व संघर्ष किया |लगन,दूरंदेशी और परिश्रम यही आपकी जीवन-यात्रा का पाथेय रहा है ,जिसने आपको एक सफल उद्यमी के रूप में स्थापित किया |
                                 21वर्ष की अवस्था में सन 1955 में जौरा निवासी श्री हरप्रसाद जैन की पुत्री श्रीमती कमला बाई जैन के साथ आपका विवाह संपन्न हुआ |आपका वैवाहिक जीवन काफी सुखमय रहा |आपके पांच पुत्र और तीन पुत्रियाँ हुईं |
                                 फूलचंद्र जी की छात्र जीवन से ही राजनीति में गहरी रूचि रही |स्वाधीनता संग्राम में भी आपने अपनी भागीदारी निभाई |स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आप भारतीय जनसंघ से जुड़े और आजीवन उससे जुड़े रहे |आप नवीकृत जनसंघ याने भाजपा की नगर इकाई के अध्यक्ष भी रहे हैं |सामाजिक फलक पर भी आपकी सक्रियता रही है |वरहिया जैन महासभा के कोषाध्यक्ष के रूप में आपने अपने दायित्व को कुशलता से निभाया है |कृषि उपकरण और ट्रेक्टर्स पार्ट्स कारोबारी के रूप में आपने काफी ख्याति अर्जित की है |वर्ष 1991 में आपने शमशाबाद में एक आधुनिक मेरिज-हाउस की नींव रखी ,जिसका नामकरण अपनी धर्म-पत्नी श्रीमती कमला बाई जैन के नाम पर 'कमला-पैलेस 'किया |धर्म के प्रति आजीवन आपकी गहरी रूचि रही है |तीर्थाटन के लिए आप अभी भी तत्पर रहते हैं |आपकी मृदुता और सौम्यता से कोई भी सहज ही में अभिभूत हो जाता है |78 वर्ष की उम्र में भी आप काफी सक्रिय रहते हैं |यह सक्रियता आपके व्यक्तित्व का सबसे प्रेरक पक्ष है |

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

वरहिया जैन


शिवपुरी जिले का नरवर गढ़ |
जिसका  प्राचीन  दुर्ग   सुदृढ़ ||
संस्थापक जिसके राजा नल |
जिनकी फैली है कीर्ति विमल ||
नृप श्रेष्ठ  निषध के  एकमेव |
वनराज सिंह है ज्यों स्वयमेव ||
जिनकी  पौराणिक   गाथाएं |
जनमानस  में  गायीं  जाएँ ||
उनके  वंशज  श्री  सूर्यसेन ,
गंभीर व्याधि से ग्रस्त हुए |
शुद्धनपुर नगरी में रहकर ,
स्नान मात्र से स्वस्थ हुए ||
उनके सुत वीरमचन्द्र देव का ,
हिंसा से मन क्लान्त हुआ |
अपनाकर जैन धर्म का पथ,
उनका भटका मन शांत हुआ ||
उनके  ही  सतत  प्रयासों  से,
सोनागिर  में  चंदाप्रभु   के ;
मंदिर  का शुभ निर्माण हुआ |
सारा जीवन ऋषि तुल्य जिया,
अंततः   वरारगढ़  में   आकर ;
 उनका  फिर महाप्रयाण हुआ ||
श्री   वीरमचन्द्र  देव  से   ही   ,
यह जाति 'वरहिया ' ख्यात हुई |
'हैं  श्रेष्ठ  ह्रदय वाले  जो जन' ,
इस भांति जगत विख्यात हुई ||
हम  सभी  'वरहिया   जैन'  ,
उन्हीं की धर्मनिष्ठ संतानें हैं |
संकल्प  पूर्वजों  के  पावन ,
  मन में  अपने  जो  ठाने हैं ||

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

करहिया ग्राम :एक परिचय


करहिया ग्राम ग्वालियर देहात (गिर्द)जिले में ग्वालियर से 60 किलोमीटर की दूरी  पर स्थित है |विक्रम संवत 1632 में परमार वंशी क्षत्रिय खड़गराय ने नरवर के तत्कालीन नरेश गजसिंह कछवाह की अनुज्ञा प्राप्त कर यह ग्राम बसाया था जो विन्ध्यघाटी में नरवर से 16 मील की दूरी  पर स्थित है |गाँव की सुरक्षा के निमित्त इसके चारों ओर पक्का परकोटा (सुरक्षा प्राचीर) था ,जो अब नहीं है लेकिन उसके भग्नावशेष आज भी जहाँ-तहाँ मौजूद हैं |गाँव की बसाहट के समय से ही वरहिया जैन समुदाय के लोग यहाँ बड़ी संख्या में निवास करते हैं ,जिन्हें सभी समुदायों में आदर और बहुमान प्राप्त है |ये ही लोग यहाँ की अर्थ-व्यवस्था के वास्तविक सूत्रधार हैं |
              व्यापार और वाणिज्य में कुशल होने के साथ-साथ वरहिया लोग उदभट योद्धा भी रहे हैं |करहिया के परमार शासकों के दीवान वरहिया समुदाय के कुम्हरिया परिवार से थे जिन्होंने विक्रम संवत 1824 में भरतपुर के जाट योद्धा जवाहर सिंह और करहिया के परमारों के बीच  हुए संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई और शत्रुओं से जमकर लोहा लिया |जिसमें उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर परमारों की जीत की नींव रखी |इस युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले कुम्हरिया परिवार के बलिदानियों के स्मारक छतरी के रूप में आज भी यहाँ मौजूद हैं |जो 'जे कम्मे शूरा,ते धम्मे शूरा 'की उक्ति को चरितार्थ करते हैं |
             यहाँ के वरहिया जन बहुत धार्मिक ,सहृदय और परम्परानिष्ठ रहे हैं |यहाँ कुम्हरिया (चौधरी व दीवान ),धनोरिया ,पलैया ,रोंसरया प्रभृति अनेक गौत्रों के लोग परस्पर सौहार्द के साथ रहते और धर्म पालन करते हैं |ग्वालियर के निकटवर्ती पार गाँव के रहने वाले कुम्हरिया परिवार व रायपुर गाँव के निवासी धनोरिया परिवार करहिया की बसाहट के समय से ही यहाँ आकर रहने लगे थे और यहाँ की उन्नति में सहभागी बने |
              पार गाँव से आये कुम्हरिया लोगों ने यहाँ खुशालीराम दीवान की अटारी में अपने साथ लाई जिन प्रतिमा की प्रतिष्ठा कर एक चैत्य की स्थापना की | बाद में वृजलाल जी दीवान ने अपने पूर्वज कमल सिंह दीवान का मकान मंदिर निर्माण हेतु विक्रम संवत 1922 में वरहिया समाज को दान में दिया |जहाँ सं.1949 में जैन समाज ने  एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया ,जिसमें सात वेदियाँ हैं |परमसुख ,लखमीचंद धनोरिया ने भी इस मंदिर में एक वेदिका की स्थापना कराई व धर्मशाला का निर्माण कराया ।


              वरहिया-विलास के विद्वान् लेखक पं.लेखराज वरहिया ,श्रीपाल चरित के रचयिता कविवर परिमल ,रविव्रत कथा ,सोनागिर पच्चीसी ,चन्द्र प्रभु पूजा इत्यादि कृतियों के प्रणेता निहाल चन्द्र वरहिया इसी गाँव के रत्न हैं जिनकी कीर्ति सभी ओर फैली है | करहिया के धनोरिया परिवार ने सोनागिर जी में पर्वतराज की परिक्रमा के प्रवेश द्वार के बाजू में एक मंदिर का निर्माण कराया था।अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन डायेरेक्टरी जो वर्ष 1914 में प्रकाशित हुई थी,में सोनागिर जी में करहिया वालों के मंदिर का संदर्भ आया है।अब उस मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका है लेकिन प्रबंधकों ने मूल मंदिर के निर्माता का उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं समझा।समाजसेवी लालमणि प्रसाद जैन व क्षुल्लक पूज्यसागर (लौकिक नाम-सुनहरी लाल धनोरिया )भी इसी गाँव के निवासी हैं |यहाँ के रहने वाले दर्जनों परिवार आजीविका के सिलसिले में डबरा और ग्वालियर आकर बस गए हैं लेकिन अपनी पितृभूमि के साथ उनका जुड़ाव और लगाव आज भी गहरा है और गाँव में होने वाले धार्मिक व सामाजिक आयोजनों में उनकी पूरी भागीदारी रहती है |

रविवार, 23 मार्च 2014

भट्टारक श्री चंद्रभूषण संस्थान,सोनागिर


जैन मठों और संस्थानों के प्रबंधन का दायित्व जिन यति तुल्य गरिमाओं के कन्धों पर रहा है, वे जैन परंपरा में भट्टारक के नाम से विश्रुत हैं | सुदूर अतीत में भट्टारक भी जैन मुनियों की भांति नग्न रहते थे लेकिन कालांतर में वस्त्र धारण करने की प्रथा आरंभ हुई | 'णग्गो विमोक्ख मग्गो " के आदर्श पर बल देने व दिगम्बरत्व को पूज्य मानने के कारण भट्टारकों  के लिए भी मृत्यु का समय निकट आने पर दिगम्बरत्व धारण कर संलेखना व्रत ग्रहण करने का विधान है |
      मंदिरों और मठों के प्रबंधन जैसे लौकिक कार्यों से जुड़े होने के कारण भट्टारकों का यति स्वरूप धीरे-धीरे लुप्त होकर शासकों की भांति राजसी स्वरूप ग्रहण करने लगा और उनका पट्टाभिषेक भी राजोचित ढंग से बड़ी भव्यता के साथ आयोजित होने लगा |
       भट्टारकों के कार्य क्षेत्र में -मूर्ति प्रतिष्ठा ;मंदिरों ,मठों का सुचारू प्रबंधन ;प्राचीन आर्ष ग्रंथों का संग्रहण,संरक्षण ;जैन साहित्य ,कला ,संगीत आदि का संवर्धन जैसे विषय शामिल रहे हैं |
        समूचे भारतवर्ष में भट्टारकों के कई पीठ स्थापित रहे हैं जिनमें श्रमणगिरि सोनागिर स्थित भट्टारक पीठ भी एक है |जिस पर प्रमुखतः बलात्कार गण शाखा का वर्चस्व रहा है |अनेक यशस्वी  भट्टारकों से सुशोभित इस पीठ के अंतिम भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी, जो वरहिया समुदाय से  थे -वि.सं.2001 में अभिषिक्त हुए ,जिनका वि.सं.2031 में देहांत हो गया |श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी पर भट्टारकों की गद्दी(गादी)  प्राचीन समय से चली आ रही थी। पूर्व में इस क्षेत्र का प्रबंधन दतिया के राजा के अधीन था। दतिया नरेश ने क्षेत्र का प्रबंधन जब श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र कमेटी को सौंपा था तब उस समय इस कोठी के मंदिर के सम्बन्ध में कमेटी की रिपोर्ट में उल्लेख आया है।जिसके अनुसार यह  मंदिर भट्टारक जी महाराज सोनागिर पट्टाधीश का बनवाया हुआ है। पर्वत के  चढ़ने के दरवाजे के सामने ही बना हुआ है। इसके साथ एक धर्मशाला भी है । भट्टारक हरेन्द्रभूषण जी सोनागिर तत्समय इस गद्दी के पट्टाधीश थे और इसका प्रबंधन करते थे और यहीं निवास करते थे। इस धर्मशाला में एक कुआं भी है।पर्वत राज के मंदिरों का प्रबन्ध इन्हीं के द्वारा होता था।पहले पर्वत का भंडार आप ही के यहाँ जमा होता था। उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार आगे उल्लिखित संस्थान 1- भट्टारक जी की कोठी ,2-खैरा वालों का,3-आचार्य वालों का,4- भगवानदास जी का,5- करहिया वालों का मंदिर,इनके प्रबंधनाधीन थे। जब सिद्धक्षेत्र सोनागिर कमेटी  का निर्माण हुआ तो इसके अध्यक्ष भी भट्टारक श्री हरेन्द्रभूषण ही थे। उनके उत्तराधिकारी के रूप में भट्टारक श्री चन्द्रभूषण जी महाराज इसके अन्तिम भट्टारक थे । योग्य शिष्य न मिलने के कारण भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी ने अपने जीवनकाल में ही वरहिया समाज के प्रमुख लोगों से विमर्श कर अपने नियंत्रणाधीन परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक प्रबंधकारिणी कमेटी का गठन किया था  जो भट्टारक गादी संस्थान के नाम से जानी जाती है।जिसमें मंदिर नं. 8 व 9, शांतिनाथ मंदिर तथा उससे  सम्बंधित अन्य सम्पत्ति, कोठी के सामने का चबूतरा, कुआं, आमौल वाली धर्मशाला, दक्खोबाई का मंदिर नं. 11, परमसुख,लखमीचंद धनोरिया करहिया वालों का मंदिर नं. 12, मंदिर  नं. 17 एवं उसकी धर्मशाला और उसका चबूतरा आदि की व्यवस्था जो भट्टारक जी के अधीन थी उसकी समुचित और सुचारू व्यवस्था करने के लिए वरहिया समाज की एक कमेटी बनाने का जो सुझाव भट्टारक जी ने रखा था, उसके अनुरूप वरहिया जैन समाज ने एक कमेटी  का गठन किया और उसका भट्टारक श्री चन्द्रभूषण महाराज संस्थान गादी  सोनागिर, दतिया (रजि.) नामकरण किया गया। यह संस्था म.प्र सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 (सन्‌ 1973 क्रं. 44) के अधीन दि. 30-10-1984 को पंजीबद्ध की गई।) और इसका प्रबंधन  दिगंबर जैन वरैया प्रबन्ध कार्यकारिणी कमेटी को सौंपा गया। भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी शेष जीवन पर्यन्त इस कमेटी के अध्यक्ष रहे।भट्टारक जी के निधन के पश्चात् से  श्री दिगंबर जैन वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी सोनागिर इस दायित्व का सुचारू रूप से निर्वहन कर रही है | वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी के प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियों में चन्द्र चौक स्थित विशाल भट्टारक कोठी जिसमें मंदिर नं.8 व 9 तथा भगवान शांतिनाथ का मंदिर स्थित है ,आमौल वालों की धर्मशाला ,दक्खोबाई का मंदिर नं.11 , परमसुख, लखमीचंद धनोरिया करहिया वालों का मंदिर नं .12 (जिसके संधारण का दायित्व उनके वंशज मुन्नालाल धनोरिया जीवन पर्यन्त निभाते रहे थे),मंदिर नं.17 व उससे संलग्न धर्मशाला प्रमुख रूप से शामिल है |
               अपने गठन के समय से ही वरहिया जैन समाज की अनेक सेवाभावी गरिमाओं का सहयोग और समर्थन श्री दिगंबर जैन वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी सोनागिर जी को प्राप्त रहा है |जिनके कुशल निर्देशन में अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज हुई हैं |
        जिसमें मंदिर नं.12 का पुनर्निर्माण  कर उसे भव्य स्वरूप प्रदान किया गया है |भट्टारक कोठी स्थित नवीन धर्मशाला में 46 कमरों का निर्माण कराया गया है |मंदिर नं.17 का जीर्णोद्धार कर उसके प्रथम तल पर भी 6 कमरों का जीर्णोद्धार किया गया है |इसी मंदिर के दूसरे तल पर स्थित भगवान चंद्रप्रभु के मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है |आमोल वाली धर्मशाला में एक विशाल कक्ष में यात्री भोजनालय संचालित है ,जहाँ नाममात्र के शुल्क पर सुरुचिपूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जाता है |इसी धर्मशाला के दूसरे तल पर 6 कमरों का नवीन निर्माण कराया गया।इस धर्मशाला के प्रांगण में 105 भट्टारक सर्वश्री सुरेंद्र भूषण जी, जिनेन्द्र भूषण जी, हरेंद्र भूषण जी व अंतिम भट्टारक चंद्रभूषण जी की चरण छतरी बनी हैं।इसके अतिरिक्त मुनियों व त्यागी, व्रतियों के निमित्त नियमित चौके की व्यवस्था भी इस कमेटी द्वारा की जा रही है |शांतिनाथ जिनालय के सामने ऊपरी मंजिल स्थित बारादरी प्रांगण में 6 कमरों का निर्माण कराया गया है व मंदिर नं.9 के तीसरे तल पर एक हाल का निर्माण हुआ है|भट्टारक कोठी स्थित सभी जिनालयों के शिखरों का जीर्णोद्धार भी कमेटी द्वारा कराया गया है। शांतिनाथ जिनालय के पर्वतराज की दिशा वाले भाग में तीन मंजिला भट्टारक श्री चंद्रभूषण धर्मशाला की पुनः साज-सज्जा की गई है और इसमें पहले और दूसरे तल पर कुछ कमरों को वातानुकूलित किया गया है।
 ‌‌            भट्टारक कोठी स्थित मंदिर नं.8 में बहुमूल्य रत्नों की चौबीसी स्थापित है ,जो एक अप्रतिम संग्रह है |यहाँ स्थित शास्त्र भंडार में अति प्राचीन 925 ग्रंथों का बहुमूल्य ,दुर्लभ संग्रह है जिसमें हमारी सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित है |चैत्य मनहर देव के नाम से सुविख्यात भगवान शांतिनाथ की 16 फीट उत्तुंग प्रतिमा जो श्रेष्ठी पाड़ा शाह द्वारा प्रतिष्ठापित 16 अतिशयकारी प्रतिमाओं में से एक है और मूलतः चैत्य ग्राम (करहिया) में स्थापित थी -यहाँ विराजित है।कुछ वर्ष पूर्व पंचकल्याणक महामहोत्सव का गरिमापूर्ण आयोजन वरहिया जनों द्वारा किया गया था,जिससे अभूतपूर्व धर्म प्रभावना हुई |वर्तमान में सोनागिर रेलवे स्टेशन के नजदीक श्री विहसंत सागर हाॅस्पीटल का निर्माण कार्य प्रगति पर है।इस क्रम में बाउंड्री वॉल का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है।भट्टारक कोठी की साज-सज्जा और रिनोवेशन का कार्य भी प्रगति पर है।
        इन अनेक उल्लेख्य उपलब्धियों के बावजूद यहाँ अभी बहुत से कार्य किये जाने शेष हैं |जिसके लिए लोगों से  उदार सहयोग की अपेक्षा है।