शनिवार, 13 सितंबर 2025

विवाह -एक अनुचिंतन


 यद्यपि सजातीय और सवर्ण विवाह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामाजिक स्तरण में तेजी से आ रहे बदलाव के परिप्रेक्ष्य में आज के समय में विवाह केवल 'कुलीनता' यानी वंश, जाति, आर्थिक स्तर आदि पर आधारित नहीं रह गया है।
जीवनसाथी का चयन अब अधिकतर विचारों के तालमेल समान शिक्षा और व्यवसाय जिससे उनके बीच सामंजस्य बन सके व एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने से उनके बीच के आपसी अच्छे बर्ताव जैसी व्यावाहरिक कसौटी पर होना उचित माना जाता है।केवल 'वंश और कुल' देखकर शादी करना, लेकिन स्वभाव/सोच में मेल न होना, जीवनभर की कठिनाइयाँ खड़ी कर सकता है।ऐसी स्थिति में विवाह पारिवारिक और सामाजिक उन्नति में सहायक होने के बजाय एक समझौता बन जाता है।इसलिए कुलीनता के नाम पर आत्मबलिदान के लिए विवश करने के स्थान पर वैवाहिक बंधन में बंधने वाले जोड़े की खुशी और संतुष्टि ज्यादा मायने रखती है।
धर्मशास्त्रीय नजरिए से देखें तो उच्च सामाजिक स्थिति वाले वर और निम्न सामाजिक स्थिति वाली कन्या के बीच विवाह को अनुलोम विवाह की श्रेणी में रखा जाता है और इसके विपरीत उच्च सामाजिक स्थिति वाली कन्या और निम्न सामाजिक स्थिति वाले वर के बीच विवाह को प्रतिलोम विवाह माना जाता है।धर्मशास्त्रों में अनुलोम विवाह को अपवाद स्वरूप स्वीकार किया गया है  हालांकि श्रेयस्कर तो नहीं, उसे पर सहनीय माना गया।किंतु प्रतिलोम विवाह को सामान्यतः अशुभ और समाज विरोधी बताया गया है, क्योंकि इससे पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था बिगड़ने का भय है। प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न संतान को अवर्ण या वर्णसंकर कहा गया है।
हालांकि सामाजिक उच्चता और निम्नता की यह अवधारणा परंपरागत रूप से वर्णाधारित है। लेकिन आज के अर्थ युग में इसका पैमाना अब धन बनता जा रहा है। फिर भी आज की परिस्थिति में और उच्च शिक्षित लोगों के बीच  अनुलोम/प्रतिलोम का यह पारंपरिक  विभाजन व्यावहारिक रूप से अब बहुत मायने नहीं रखता।
विवाह का मूल उद्देश्य गृहस्थ जीवन की सुख-शान्ति, सहयोग और अगली पीढ़ी का सुचारु पालन-पोषण है। इसलिए यदि दोनों परिवार और दम्पति मानसिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं तो  'अनुलोम' या 'प्रतिलोम' का भेद गौण हो जाता है।
केवल 'कुलीनता' की जिद के कारण अविवाहित रहना व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिए आज के युग में श्रेष्ठ वही विवाह है जिसमें वर-वधू के विचार, शिक्षा, संस्कार और व्यवहार का मेल हो।
पराशर ऋषि ने पाराशर स्मृति के अध्याय 2 में कहा है कि कलियुग में वर्णसंकर विवाहों से यथासम्भव बचना चाहिए, परंतु यदि विवाह कठिन हो तो गुण, संस्कार और आचरण को प्राथमिकता देना चाहिए।इसमें यह भी कहा गया कि विवाह का उद्देश्य धर्मपालन और संतति की शुद्धता है, न कि केवल कुलगौरव।
महाभारत के अनुशासन  पर्व में अध्याय 43 में भीष्म पितामह ने कहा है कि  "गुणहीन कुलवती कन्या से विवाह करने से गुणवती अकुलीन कन्या से विवाह करना श्रेष्ठ है।"अर्थात् यदि कन्या का कुल उच्च है परन्तु गुणहीन है, तो  गुणवान लेकिन अकुलीन कन्या का वरण करना श्रेष्ठ और उचित है।
इस प्रकार महाभारत और पाराशर स्मृति के प्रकाश में यह स्पष्ट  है कि कुल से बढ़कर गुण और संस्कार देखे जाने चाहिए।
इसलिए, यदि आज कुलीनता के कारण विवाह कठिन हो रहा है, तो धर्मशास्त्र और परम्परा दोनों यह मार्ग सुझाते हैं कि गुण, शिक्षा, आचरण और आपसी सामंजस्य को प्रमुख मानें।


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