शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

दर्शन(शास्त्र)


 दर्शन(शास्त्र) या फिलासफी एक वैश्विक और समग्र विषय है। जैसे केमिस्ट्री और फिजिक्स वैश्विक और समग्र विषय हैं उसी तरह फिलासफी है। जीवन और जगत के बारे में मनुष्यों के मूलभूत प्रश्न, जिज्ञासाएं और चिंताएं साझी हैं।ग्रीक फिलॉसफर्स (प्लेटो, अरस्तू) और भारतीय ऋषि (याज्ञवल्क्य, कपिल) मूलतः एक ही तरह के प्रश्न पूछ रहे थे। दर्शन (Philosophy) का आधार मानव-चिंतन है जो सार्वभौम प्रश्नों पर  मंथन कर समाधान खोजता है। सांसारिक दु:खों से मुक्ति की छटपटाहट और उनसे निपटने के उपाय खोजने की चाहत तमाम भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद सभी मनुष्यों में समान है लेकिन इनके उत्तर संस्कृति, भाषा, परंपरा और ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित होने और विशिष्ट सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के कारण अलग-अलग मिलते हैं। स्थूल रूप से सत्ता मीमांसा, ज्ञान मीमांसा और मानवीय मूल्यों का विवेचन दर्शनशास्त्र का केंद्रीय विषय या प्रयोजन रहा हैं। जैसे -
जगत का मूल क्या है?
 ईश्वर, आत्मा, प्रकृति, चेतना आदि की वास्तविकता क्या है?
क्या वास्तव में अस्तित्व में है?
मनुष्य सत्य को कैसे जानता है?
इन्द्रिय, तर्क, अनुभूति और अंतःप्रज्ञा की भूमिका क्या है?
सत्य और भ्रान्ति में भेद कैसे किया जाए?
क्या अच्छा है और क्या बुरा?
नैतिक जीवन का आधार क्या होना चाहिए?
सौंदर्य, कला और आनंद का मान्य रूप क्या है?
ये सभी बिंदु दर्शनशास्त्र का केंद्रीय प्रयोजन रहे हैं दूसरे शब्दों में दर्शनशास्त्र मनुष्य और विश्व के बीच के गहनतम संबंधों को समझने का प्रयास है।

फिलासफी का स्वरूप वास्तव में वैश्विक है लेकिन क्षेत्रीय और भौगोलिक विविधता के फलस्वरूप विकसित हुए जीवन-बोध पर आधारित भिन्न सांस्कृतिक दृष्टियों के कारण दर्शनशास्त्र में अनेक विचार-सरणियों का विकास हुआ जो सामान्यतः school of philosophy कहलाते हैं। हिंदू स्कूल, बौद्ध और जैन स्कूल, इस्लामिक स्कूल इत्यादि दर्शनशास्त्र की विभिन्न विचार- सरणियां हैं जिन्हें बोलचाल में हिंदू दर्शन, बौद्ध या जैन दर्शन, इस्लामिक दर्शन कहा जाता है। जबकि वास्तव में ये school of thaught  या दर्शन(शास्त्र) की शालाएं या प्रवृत्तियां हैं।अकादमिक जगत में ज़्यादातर विद्वान इसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं।
भारतीय परम्परा में दर्शन का लक्ष्य केवल सत्य की खोज न होकर  मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति है। दर्शन शास्त्र को जीवन के दुःखों की निवृत्ति का एक वरेण्य साधन माना गया है।
आत्मा, परमात्मा, जगत, प्रकृति और पुरुष के बीच संबंध तथा 'सत्य या यथार्थ' क्या है और उसे पाने का साधन क्या है? व प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति आदि प्रमाणों के अध्ययन एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे आदर्शों को जीवन का सर्वोच्च  लक्ष्य माना गया है।
इसलिए भारतीय दर्शन में  विवेच्य केंद्रीय विषय-आत्मा का यथार्थ स्वरूप और मोक्ष की प्राप्ति है।

जबकि पाश्चात्य परम्परा में दर्शन अधिकतर तार्किक विश्लेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित हुआ है। जहाँ दर्शन का विवेच्य विषय-सत्य और ज्ञान की वस्तुनिष्ठ खोज व मानव-जीवन के नैतिक-सौंदर्य संबंधी प्रश्नों का समाधान खोजना है।

1 टिप्पणी:

  1. मेरी दृष्टि में दर्शनशास्त्र वास्तव में एक वैश्विक और समग्र विषय है। दर्शन मानव जीवन और जगत से जुड़े मूल प्रश्नों की पड़ताल करता है। जीवन के दुख, आनंद, नैतिकता, आत्मा और सत्य की खोज ऐसी जिज्ञासाएँ हैं जो किसी जाति, काल या भाषा-विशेष की नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता की साझी धरोहर हैं।
    भारतीय परंपरा ने जहाँ मोक्ष को दर्शन का परम प्रयोजन माना, वहीं विदेशी परंपरा में सत्य और ज्ञान की खोज पर बल दिया है
    दार्शनिक सुकरात ने भी इसी सार्वभौमिक दृष्टि को पुष्ट किया। वे कहते थे कि *स्वयं को जानो* ही वास्तविक ज्ञान का प्रारंभ है। ओशो भी यही कहते है पहले *स्वयं को खोजो* उनका विश्वास था कि सवाल पूछना और जीवन की जांच करना ही मनुष्य के लिए सार्थक है। यह दृष्टिकोण चाहे भारतीय ऋषियों की आत्मा-परक साधना हो, या आधुनिक तर्कशील चिंतन—सबको जोड़ने वाली साझा चेतना है।
    इसलिए मेरी मान्यता है कि दर्शन केवल किसी संस्कृति या राष्ट्र की बौद्धिक विरासत नहीं है बल्कि संपूर्ण मानवता के अनुभव और जिज्ञासाओं की साझी खोज है। यह हमें एक-दूसरे से जोड़ता है और जीवन को सही अर्थों में समझने का मार्ग दिखाता है। यही दर्शन है
    हालांकि मैने विगत चार पांच वर्षो से ही इस विषय पर रूचि ली है और आपके बराबर परपग्य नही हू फिर भी जितना पढा समझा है वह लिखा

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