शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

उत्तरदायी कौन?

ब्याह हो गया, बहू आ गई, हुई पुरा में चर्चा।
घरवालों ने किया खुशी में, हाथ खोल के खर्चा।


पड़ा घूमना कहां-कहां,कितनों के पीछे-आगे।
जोड़े हाथ दलालों के,दिए दाम उन्हें मुंह मांगे।


पापड़ बेले ढेरों तब यह खुशी और बहू आई।
गूंजी बोहरे के घर में जाकर के तब  शहनाई।


ब्याह चुके विजाति में अपनी बेटी जो संभ्रांत।
उनके कारण ही समाज के लोग आज हैं क्लांत।


लड़के ज्यादा और लड़की कम,सो बिगड़ा अनुपात।
इस कारण ही बहुओं का करना पड़ता आयात।


गलती किसी और की लेकिन भरता कोई और।
विषम स्थिति है सचमुच,करिए इस पर कुछ गौर।


इस सामाजिक स्थिति का उत्तरदायी है कौन।
इसका उत्तर कठिन नहीं, फिर भी हैं सारे मौन।












 

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

जैन दृष्टि में कर्मकांड


 जैन धर्म मूलतः कर्मकांड प्रधान धर्म नहीं है। क्योंकि जैन साधना आत्मोत्थान केंद्रित रही है।भगवान महावीर और उनसे पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के समय में जैन धर्मावलंबियों का आग्रह आत्मशुद्धि, संयम,तप,ध्यान,अहिंसा और कर्मों की निर्जरा पर रहता था।आगम की दृष्टि में भाव, संयम और ज्ञान ही प्रमुख हैं।
इसलिए उनका सारा बल आंतरिक साधना पर था,बाह्य प्रदर्शन पर नहीं। प्राचीन काल में हवन,अनुष्ठान, पूजा विधि का स्वरूप भी आज से काफी भिन्न रहा है।फल की कामना के साथ आरती,पूजा-अर्चना, मंत्रपाठ करना यह सब उत्तरवर्ती विकास है।जो बौद्ध, वैदिक और लोक परंपराओं के प्रभाव के कारण और साधना को सामूहिक रूप देने के प्रयास में आगम सम्मत न होने के बावजूद यह शनै: शनै: अपने वर्तमान स्वरूप में विकसित हुआ है।
आगम में तो 'किरिया बहिया न मुक्खा' (बाह्य क्रिया मुख्य नहीं है) 'भावेण णिज्जरिज्जइ' (निर्जरा भाव से होती है) का स्पष्ट विधान है।बिना संयम के कोई भी क्रिया फलदायक नहीं होती। जैनागम में सदैव सामयिक,प्रतिक्रमण, ध्यान, स्वाध्याय और व्रत उपवास पर बल रहा है। 'अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य। अप्पा मित्तममित्तं च, तदुप्पट्ठिय सुप्पट्ठिओ।'आत्मा ही कर्मों का कर्ता और भोक्ता है।आत्मा को कर्मों से मुक्त करना ही साधना का मुख्य लक्ष्य है। जबकि कर्मकांड एक बाह्याचार है। वस्तुत:यह एक विचलन या स्खलन है और उसकी सीमित उपादेयता तभी है जब वह अहिंसा और संयम की ओर ले जाए, उसमें श्रद्धा दृढ़ करे।इस दशा में भी ये कर्मकांड साधन मात्र हैं ,साध्य नहीं। लौकिक फल प्राप्ति के लिए हवन, अनुष्ठान करना व  आराधना और स्तुति में मनोरथ पूर्ति की कामना या याचना करना अर्थात लौकिक अभीप्सा रखना जैनागम सम्मत नहीं है। लेकिन अज्ञानतावश हम यथार्थ से विमुख होकर कर्मकांड के इंद्रजाल में फंसे हुए हैं। आज यह एक स्थापित व्यवसाय बन गया है, जिससे कई लोगों के आर्थिक हित जुड़े हैं। कर्मकांड के इस इंद्रजाल का हमारे ऊपर इतना गहरा सम्मोहन है कि कुछ लोगों को ये खंडन-मंडन बेहद नागवार गुजर सकता है।




 



सोमवार, 19 जनवरी 2026

मृत्यु भोज निषेध


 किसी व्यक्ति के निधन पर मृतक और शोक-संतप्त परिजनों के प्रति शोक व्यक्त करना,संवेदना प्रकट करना उचित और अपेक्षित लोकाचार है। लेकिन मृतक की आत्मशांति के नाम पर  “मृत्यु भोज” की परंपरा का निर्वहन सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दृष्टि से कदापि उचित नहीं है।
मृत्यु भोज प्रायः समाजिक दबाव और दिखावे के कारण और परंपरा के नाम पर किया जाता है। लेकिन इससे शोकग्रस्त परिवार, जो पहले ही मानसिक पीड़ा में होता है, उस पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।कई गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार सक्षम न होने पर भी कर्ज लेकर भोज करने को मजबूर होते हैं, जो अनुचित है। मृत्यु भोज के दौरान मृतक के परिवार के सामाजिक स्टेटस के अनुसार सुस्वादु व्यंजनों का भोज आयोजित करना और अनेक तामझाम जोड़ना शोक की गरिमा को कम करता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर जीवन की असारता का चिंतन करना,मृतक का गुणानुवाद करना चाहिए न कि उत्सव जैसा वातावरण बनाना चाहिए।
 धर्मशास्त्रों में भी मृत्यु के बाद,शौच ,संयम, साधना और आत्मशुद्धि पर बल दिया गया है, न कि भोज पर। इनके स्थान पर दान, ध्यान और तप को श्रेष्ठ माना गया है।
इसका एक नकारात्मक सामाजिक पहलू भी है। चूंकि आर्थिक दबाव के कारण मृत्यु भोज में सीमित संख्या में ही लोगों को बुलाया जाना संभव होता है इस कारण न बुलाए गए लोग खिन्न हो जाते हैं।जो आलोचना और मनमुटाव का कारण बनता है।
मृत्यु भोज में धन के साथ ही भोजन की भी बर्बादी होती है।जबकि उसी धन से गरीबों की सहायता, शिक्षा, चिकित्सा जैसे सेवा कार्य किए जा सकते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम लोग मृतात्मा की शांति के लिए वृक्षारोपण, रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर जैसे सामाजिक कार्य कर सकते हैं। क्योंकि मृत्यु भोज न तो अनिवार्य है और न नैतिक दृष्टि से ही उचित है।
इन दिनों मृत्यु भोज के स्थानापन्न के रूप में शांति विधान का प्रचलन बढ़ रहा है।विधान के समापन पर होने वाला अतिथि भोज भी प्रकारांतर से मृत्यभोज का ही अपर रूप है। क्योंकि भले ही वह शांति विधान की रसोई हो लेकिन उसकी टाइमिंग वही होती है। उठावनी के समय बहिरागत अतिथियों के लिए मेजबान परिवार द्वारा की जाने वाली भोजन- व्यवस्था में स्थानीय लोगों को भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए और यह एक स्थापित परंपरा होना चाहिए ताकि मेजबान को यह बात स्पष्ट रूप से विदित हो और उसके सामने कोई धर्मसंकट न हो। महासभा को इस बारे में क्रियात्मक और सार्थक पहल करनी चाहिए।साथ ही लोग स्वविवेक से भी यह संकल्प ले सकते हैं।