वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
जैन दृष्टि में कर्मकांड
जैन धर्म मूलतः कर्मकांड प्रधान धर्म नहीं है। क्योंकि जैन साधना आत्मोत्थान केंद्रित रही है।भगवान महावीर और उनसे पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के समय में जैन धर्मावलंबियों का आग्रह आत्मशुद्धि, संयम,तप,ध्यान,अहिंसा और कर्मों की निर्जरा पर रहता था।आगम की दृष्टि में भाव, संयम और ज्ञान ही प्रमुख हैं।
इसलिए उनका सारा बल आंतरिक साधना पर था,बाह्य प्रदर्शन पर नहीं। प्राचीन काल में हवन,अनुष्ठान, पूजा विधि का स्वरूप भी आज से काफी भिन्न रहा है।फल की कामना के साथ आरती,पूजा-अर्चना, मंत्रपाठ करना यह सब उत्तरवर्ती विकास है।जो बौद्ध, वैदिक और लोक परंपराओं के प्रभाव के कारण और साधना को सामूहिक रूप देने के प्रयास में आगम सम्मत न होने के बावजूद यह शनै: शनै: अपने वर्तमान स्वरूप में विकसित हुआ है।
आगम में तो 'किरिया बहिया न मुक्खा' (बाह्य क्रिया मुख्य नहीं है) 'भावेण णिज्जरिज्जइ' (निर्जरा भाव से होती है) का स्पष्ट विधान है।बिना संयम के कोई भी क्रिया फलदायक नहीं होती। जैनागम में सदैव सामयिक,प्रतिक्रमण, ध्यान, स्वाध्याय और व्रत उपवास पर बल रहा है। 'अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य। अप्पा मित्तममित्तं च, तदुप्पट्ठिय सुप्पट्ठिओ।'आत्मा ही कर्मों का कर्ता और भोक्ता है।आत्मा को कर्मों से मुक्त करना ही साधना का मुख्य लक्ष्य है। जबकि कर्मकांड एक बाह्याचार है। वस्तुत:यह एक विचलन या स्खलन है और उसकी सीमित उपादेयता तभी है जब वह अहिंसा और संयम की ओर ले जाए, उसमें श्रद्धा दृढ़ करे।इस दशा में भी ये कर्मकांड साधन मात्र हैं ,साध्य नहीं। लौकिक फल प्राप्ति के लिए हवन, अनुष्ठान करना व आराधना और स्तुति में मनोरथ पूर्ति की कामना या याचना करना अर्थात लौकिक अभीप्सा रखना जैनागम सम्मत नहीं है। लेकिन अज्ञानतावश हम यथार्थ से विमुख होकर कर्मकांड के इंद्रजाल में फंसे हुए हैं। आज यह एक स्थापित व्यवसाय बन गया है, जिससे कई लोगों के आर्थिक हित जुड़े हैं। कर्मकांड के इस इंद्रजाल का हमारे ऊपर इतना गहरा सम्मोहन है कि कुछ लोगों को ये खंडन-मंडन बेहद नागवार गुजर सकता है।
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