शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

उत्तरदायी कौन?

ब्याह हो गया, बहू आ गई, हुई पुरा में चर्चा।
घरवालों ने किया खुशी में, हाथ खोल के खर्चा।


पड़ा घूमना कहां-कहां,कितनों के पीछे-आगे।
जोड़े हाथ दलालों के,दिए दाम उन्हें मुंह मांगे।


पापड़ बेले ढेरों तब यह खुशी और बहू आई।
गूंजी बोहरे के घर में जाकर के तब  शहनाई।


ब्याह चुके विजाति में अपनी बेटी जो संभ्रांत।
उनके कारण ही समाज के लोग आज हैं क्लांत।


लड़के ज्यादा और लड़की कम,सो बिगड़ा अनुपात।
इस कारण ही बहुओं का करना पड़ता आयात।


गलती किसी और की लेकिन भरता कोई और।
विषम स्थिति है सचमुच,करिए इस पर कुछ गौर।


इस सामाजिक स्थिति का उत्तरदायी है कौन।
इसका उत्तर कठिन नहीं, फिर भी हैं सारे मौन।












 

1 टिप्पणी:

  1. मेरी समझ से---
    विवाह केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं,
    यह समाज की सामूहिक सोच का प्रतिबिंब है।
    जब यह संस्कार खोज और सौदे का विषय बन जाए तो स्पष्ट है कि कहीं गहरी चूक हुई है।
    जिस समाज ने बेटी के जन्म को चिंता माना,
    उसने भविष्य का संतुलन स्वयं बिगाड़ लिया।
    आज उसी असंतुलन का भार
    विवाह संस्था वहन कर रही है।
    दोष किसी एक का नहीं,
    यह उस मानसिकता का परिणाम है
    जो समय रहते नहीं बदली।
    समाधान बाहरी नियंत्रण में नहीं,
    बल्कि उस विचार में है
    जो बेटी को बोझ नहीं,
    आधार मानता है।

    जब यह सोच बदलेगी,
    तभी संबंध फिर से
    संस्कार कहलाएँगे।

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