वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
गुरुवार, 12 मार्च 2026
पंडित कपूरचंद वरैया
जैन शास्त्रों के परिशीलनकर्ता और वरहिया समाज के सहृदय समाजसेवी पंडित कपूरचंद जी वरैया का जन्म 10 अगस्त 1925 को लश्कर निवासी कुम्हरिया गोत्रीय श्री फूलचंद जी वरैया के घर हुआ था। सरलता और विनम्रता जैसे संस्कार उन्हें बचपन से ही अपने माता-पिता से घुट्टी में मिले थे।प्रारम्भ से ही जैन बोर्डिंग हाऊस लश्कर में अध्ययनरत रहने के कारण उनकी जैन धर्म में सहज रुचि और प्रवृत्ति रही। 1950 में आगरा विश्वविद्यालय से आपने अंग्रेजी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और 1955 में साहित्यरत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की।लेकिन 1950 में ही आप महालेखाकार कार्यालय ग्वालियर में लिपिक के रूप में आपको नियुक्ति मिल गई थी।बाद में वे यहीं पर ऑडीटर के रूप में पदोन्नत हुए।पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वे अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति से कोसों दूर रहें। विशुद्ध भारतीय संस्कृति के पोषक और जिनवाणी माता की सेवा में सर्वदा दत्तचित्त होकर संलग्न रहने वाले पंडित कपूरचन्द जी वरैया अत्यंत सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। छात्र जीवन में ही ग्वालियर में जैन संत पूज्य वर्णी जी का मंगल सानिध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उनके चातुर्मास के प्रबंधनों से जुड़े रहने के कारण आपके हृदय में धर्म के प्रति जो उत्कट जिज्ञासा पैदा हुई, वह आजीवन उनकी उत्प्रेरक शक्ति बनी रही।वरैया जी वर्णी जी के प्रवचनों को नित्यप्रति पूरे मनोयोग से सुनते और गुनते थे और उन्हें अपनी डायरी में लिपिबद्ध करते थे जिसे उन्होंने 'सुख की झलक' नाम से संकलित किया। जो बाद में 15 भागों में स्वतन्त्र कृतियों के रूप में प्रकाशित हुई। साहित्य सेवा के क्षेत्र में यह आपका उल्लेखनीय योगदान है।आप गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के कृतित्व से बहुत प्रभावित थे।जिस कारण आपका गुरु जी के प्रति अगाध श्रद्धा भाव था। गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया स्मृति ग्रन्थ की रचना में आपका बहुमूल्य योगदान रहा है।आप छात्रावस्था में ही भजनों के रूप में पद्यात्मक रचनायें करने लगे थे।आपके लगभग 30 लेख विभिन्न जैन पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। 'भजन पीयूष' आपकी एक स्वतन्त्र पद्य-रचना है। आपने 'जैनधर्म और विज्ञान' पुस्तक जिसमें प्रोफेसर घासीराम जैन के लेख संकलित हैं,का स्वतंत्र रूप से सम्पादन किया और 'ग्वालियर जैन निर्देशिका' के सह-सम्पादक रहे।आपने पंडित लेखराज जी वरैया की कृति वरैया विलास की समीक्षात्मक भूमिका भी लिखी है।आपकी कथन शैली बहुत प्रांजल और सुबोध थी।आपने अपने सुकृत से उपार्जित द्रव्य का सदुपयोग कर लगभग 8 हजार रुपए दान स्वरूप दिए। जिससे भूखंड खरीदकर 1967 में दानाओली लश्कर में जैन भवन की नींव पड़ी।जो आज वरहिया समाज की एक बहुमूल्य सामाजिक धरोहर है।आपकी सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक सेवाओं के प्रतिफल में जैन समाज लश्कर ने 1967 में आपका सार्वजनिक अभिनन्दन कर 'धर्म भूषण' की उपाधि से सम्मानित किया था ।आप वीर जैन छात्रावास, चम्पाबाग लश्कर के पाँच वर्ष अधीक्षक भी रहे । आप एक गुणी श्रावक और ओजपूर्ण शैली के प्रभावी वक्ता रहे हैं। पंडित कपूरचंद जी वरैया दानाओली लश्कर स्थित जैन भवन की नींव का पत्थर रहे हैं।आज जब जैन भवन का पुनर्निर्माण हो रहा है तो उसमें जैन भवन के इस मूल स्वप्नद्रष्टा का नामोल्लेख किसी सहजदृश्य स्थान पर अवश्य होना चाहिए।
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