यों तो सभी माता-पिता अपने बच्चों को प्यार दुलार करते हैं लेकिन नये नये माता-पिता बने दंपति अपने बच्चे को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित रहते हैं।अपने नौनिहाल के साथ खेलते -खेलाते हुए वे आनंद के अतिरेक से भर जाते हैं।जो उनके लिए एक ऐसा अद्भूत और अनिर्वचनीय अनुभव होता है जिसे बार-बार दोहराना चाहते हैं। लेकिन कामकाज की व्यस्तता के चलते व्यावहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं होता है। जाहिर तौर पर अभिभावकों का बच्चे के साथ बिताया वक्त बहुत सुखद होता है जो उनकी बीच भावनात्मक बांडिंग को मजबूत करता है।यह एक ऐसी मनःस्थिति है जो कामकाज और अन्य कारणों से होने वाले मेंटल स्ट्रेस को कम करने में किसी मेडीसन से कम कारगर नहीं है।यह एक ऐसा फील गुड फैक्टर है जो कार्यक्षमता को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।इसी कारण से माता-पिता बच्चों के साथ यथासंभव ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना पसंद करते हैं। चूंकि हर बात में एक मर्यादा और संतुलन जरूरी होता है लेकिन कुछ अभिभावक से अतिउत्साह में इस मामले में चूक हो जाती है और वे बच्चों पर कुछ ज्यादा ही लाड़ प्यार लुटा देते हैं। उनकी मनमानी और गलतियों को बच्चा समझकर अनदेखा करते हैं।यही अतिरिक्त लेकिन अनावश्यक लाड़ प्यार यानी ओवर पैंपरिंग बच्चों को चिड़चिड़ा, जिद्दी और अटेंशन-सीकर बना देता है।जो कई मामलों में बच्चों में पर्सनेलिटी डिसआर्डर के डेवलप होने की वजह बनता है। जिससे बच्चे हिस्ट्रयोनिक, नाटकीय और मूडी हो जाते हैं।इस अवांछित स्थिति के लिए ओवर-पैंपरिंग काफी हद तक जिम्मेदार है।कभी-कभी बच्चा अपने बड़ों के सानिध्य का इतना अभ्यस्त हो जाता कि वो चाहता हैं कि कोई उसे हर वक्त एंटरटेन करे जो मुमकिन नहीं होता। बच्चे की हर चाहत पूरी होने पर वह इस मामले में न केवल आग्रही हो जाता है बल्कि इससे उलट चाहत पूरी न होने पर उग्र बर्ताव करने लगता है।जो अभिभावक के लिहाज से एक अप्रिय स्थिति होती है। अक्सर इसकी वजह चाहत और जरूरत में फर्क न कर पाना होता है।कई बार तो छः-सात वर्ष या इससे बड़ी उम्र के बच्चों का भी इस तरह का रवैया देखने में आता है और उन्हें जो चीज पसंद आ जाती है वो उसे दिलाने की जिद करने लगते हैं।भले ही आप उस समय ऐसा कर पाने की स्थिति में न हों।यह कोई आकस्मिक स्थिति नहीं है बल्कि जाने अनजाने में धीरे-धीरे उनके अंदर पनपी होती है और उनके इस अनचाहे व्यवहार के लिए अभिभावकों की ओवर-पैंपरिंग यानी अति लाड़-प्यार ही जिम्मेदार हैं।
वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
सोमवार, 8 जून 2026
ओवर-पैंपरिंग/अति लाड़-प्यार
यों तो सभी माता-पिता अपने बच्चों को प्यार दुलार करते हैं लेकिन नये नये माता-पिता बने दंपति अपने बच्चे को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित रहते हैं।अपने नौनिहाल के साथ खेलते -खेलाते हुए वे आनंद के अतिरेक से भर जाते हैं।जो उनके लिए एक ऐसा अद्भूत और अनिर्वचनीय अनुभव होता है जिसे बार-बार दोहराना चाहते हैं। लेकिन कामकाज की व्यस्तता के चलते व्यावहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं होता है। जाहिर तौर पर अभिभावकों का बच्चे के साथ बिताया वक्त बहुत सुखद होता है जो उनकी बीच भावनात्मक बांडिंग को मजबूत करता है।यह एक ऐसी मनःस्थिति है जो कामकाज और अन्य कारणों से होने वाले मेंटल स्ट्रेस को कम करने में किसी मेडीसन से कम कारगर नहीं है।यह एक ऐसा फील गुड फैक्टर है जो कार्यक्षमता को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।इसी कारण से माता-पिता बच्चों के साथ यथासंभव ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना पसंद करते हैं। चूंकि हर बात में एक मर्यादा और संतुलन जरूरी होता है लेकिन कुछ अभिभावक से अतिउत्साह में इस मामले में चूक हो जाती है और वे बच्चों पर कुछ ज्यादा ही लाड़ प्यार लुटा देते हैं। उनकी मनमानी और गलतियों को बच्चा समझकर अनदेखा करते हैं।यही अतिरिक्त लेकिन अनावश्यक लाड़ प्यार यानी ओवर पैंपरिंग बच्चों को चिड़चिड़ा, जिद्दी और अटेंशन-सीकर बना देता है।जो कई मामलों में बच्चों में पर्सनेलिटी डिसआर्डर के डेवलप होने की वजह बनता है। जिससे बच्चे हिस्ट्रयोनिक, नाटकीय और मूडी हो जाते हैं।इस अवांछित स्थिति के लिए ओवर-पैंपरिंग काफी हद तक जिम्मेदार है।कभी-कभी बच्चा अपने बड़ों के सानिध्य का इतना अभ्यस्त हो जाता कि वो चाहता हैं कि कोई उसे हर वक्त एंटरटेन करे जो मुमकिन नहीं होता। बच्चे की हर चाहत पूरी होने पर वह इस मामले में न केवल आग्रही हो जाता है बल्कि इससे उलट चाहत पूरी न होने पर उग्र बर्ताव करने लगता है।जो अभिभावक के लिहाज से एक अप्रिय स्थिति होती है। अक्सर इसकी वजह चाहत और जरूरत में फर्क न कर पाना होता है।कई बार तो छः-सात वर्ष या इससे बड़ी उम्र के बच्चों का भी इस तरह का रवैया देखने में आता है और उन्हें जो चीज पसंद आ जाती है वो उसे दिलाने की जिद करने लगते हैं।भले ही आप उस समय ऐसा कर पाने की स्थिति में न हों।यह कोई आकस्मिक स्थिति नहीं है बल्कि जाने अनजाने में धीरे-धीरे उनके अंदर पनपी होती है और उनके इस अनचाहे व्यवहार के लिए अभिभावकों की ओवर-पैंपरिंग यानी अति लाड़-प्यार ही जिम्मेदार हैं।
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अमेरिका मे अब अरबपति लोग परेशान हैं ! उन्हें चिंता हैं कि उनकी संतान इतने बड़े कारोबार और सम्पति को कैसे संभाल पायेंगे क्योंकि उनकी आराम परस्त जिंदगी और शाही मिजाज उन्हें इसके अयोग्य बनाता है। इसके लिये हाल ही में एक कोचिंग इंस्टीट्यूट खुळी है जो ऐसे बच्चों को इस योग्य बनाने के लिए प्रयास करती है जिसकी फीस डेढ़ करोड़ रुपये है। इससे आपकी बात की पुष्टी भी होती है और उसका हल भी निकालती है किन्तु भविष्य को और चिंतायुक्त बनाती है।
जवाब देंहटाएंसन्दर्भ:- आज का दैनिक भास्कर ।