गुरुवार, 24 जुलाई 2014

वरहिया जैन


शिवपुरी जिले का नरवर गढ़ |
जिसका  प्राचीन  दुर्ग   सुदृढ़ ||
संस्थापक जिसके राजा नल |
जिनकी फैली है कीर्ति विमल ||
नृप श्रेष्ठ  निषध के  एकमेव |
वनराज सिंह है ज्यों स्वयमेव ||
जिनकी  पौराणिक   गाथाएं |
जनमानस  में  गायीं  जाएँ ||
उनके  वंशज  श्री  सूर्यसेन ,
गंभीर व्याधि से ग्रस्त हुए |
शुद्धनपुर नगरी में रहकर ,
स्नान मात्र से स्वस्थ हुए ||
उनके सुत वीरमचन्द्र देव का ,
हिंसा से मन क्लान्त हुआ |
अपनाकर जैन धर्म का पथ,
उनका भटका मन शांत हुआ ||
उनके  ही  सतत  प्रयासों  से,
सोनागिर  में  चंदाप्रभु   के ;
मंदिर  का शुभ निर्माण हुआ |
सारा जीवन ऋषि तुल्य जिया,
अंततः   वरारगढ़  में   आकर ;
 उनका  फिर महाप्रयाण हुआ ||
श्री   वीरमचन्द्र  देव  से   ही   ,
यह जाति 'वरहिया ' ख्यात हुई |
'हैं  श्रेष्ठ  ह्रदय वाले  जो जन' ,
इस भांति जगत विख्यात हुई ||
हम  सभी  'वरहिया   जैन'  ,
उन्हीं की धर्मनिष्ठ संतानें हैं |
संकल्प  पूर्वजों  के  पावन ,
  मन में  अपने  जो  ठाने हैं ||

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

करहिया ग्राम :एक परिचय


करहिया ग्राम ग्वालियर देहात (गिर्द)जिले में ग्वालियर से 60 किलोमीटर की दूरी  पर स्थित है |विक्रम संवत 1632 में परमार वंशी क्षत्रिय खड़गराय ने नरवर के तत्कालीन नरेश गजसिंह कछवाह की अनुज्ञा प्राप्त कर यह ग्राम बसाया था जो विन्ध्यघाटी में नरवर से 16 मील की दूरी  पर स्थित है |गाँव की सुरक्षा के निमित्त इसके चारों ओर पक्का परकोटा (सुरक्षा प्राचीर) था ,जो अब नहीं है लेकिन उसके भग्नावशेष आज भी जहाँ-तहाँ मौजूद हैं |गाँव की बसाहट के समय से ही वरहिया जैन समुदाय के लोग यहाँ बड़ी संख्या में निवास करते हैं ,जिन्हें सभी समुदायों में आदर और बहुमान प्राप्त है |ये ही लोग यहाँ की अर्थ-व्यवस्था के वास्तविक सूत्रधार हैं |
              व्यापार और वाणिज्य में कुशल होने के साथ-साथ वरहिया लोग उदभट योद्धा भी रहे हैं |करहिया के परमार शासकों के दीवान वरहिया समुदाय के कुम्हरिया परिवार से थे जिन्होंने विक्रम संवत 1824 में भरतपुर के जाट योद्धा जवाहर सिंह और करहिया के परमारों के बीच  हुए संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई और शत्रुओं से जमकर लोहा लिया |जिसमें उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर परमारों की जीत की नींव रखी |इस युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले कुम्हरिया परिवार के बलिदानियों के स्मारक छतरी के रूप में आज भी यहाँ मौजूद हैं |जो 'जे कम्मे शूरा,ते धम्मे शूरा 'की उक्ति को चरितार्थ करते हैं |
             यहाँ के वरहिया जन बहुत धार्मिक ,सहृदय और परम्परानिष्ठ रहे हैं |यहाँ कुम्हरिया (चौधरी व दीवान ),धनोरिया ,पलैया ,रोंसरया प्रभृति अनेक गौत्रों के लोग परस्पर सौहार्द के साथ रहते और धर्म पालन करते हैं |ग्वालियर के निकटवर्ती पार गाँव के रहने वाले कुम्हरिया परिवार व रायपुर गाँव के निवासी धनोरिया परिवार करहिया की बसाहट के समय से ही यहाँ आकर रहने लगे थे और यहाँ की उन्नति में सहभागी बने |
              पार गाँव से आये कुम्हरिया लोगों ने यहाँ खुशालीराम दीवान की अटारी में अपने साथ लाई जिन प्रतिमा की प्रतिष्ठा कर एक चैत्य की स्थापना की | बाद में वृजलाल जी दीवान ने अपने पूर्वज कमल सिंह दीवान का मकान मंदिर निर्माण हेतु विक्रम संवत 1922 में वरहिया समाज को दान में दिया |जहाँ सं.1949 में जैन समाज ने  एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया ,जिसमें सात वेदियाँ हैं |परमसुख ,लखमीचंद धनोरिया ने भी इस मंदिर में एक वेदिका की स्थापना कराई व धर्मशाला का निर्माण कराया ।


              वरहिया-विलास के विद्वान् लेखक पं.लेखराज वरहिया ,श्रीपाल चरित के रचयिता कविवर परिमल ,रविव्रत कथा ,सोनागिर पच्चीसी ,चन्द्र प्रभु पूजा इत्यादि कृतियों के प्रणेता निहाल चन्द्र वरहिया इसी गाँव के रत्न हैं जिनकी कीर्ति सभी ओर फैली है | करहिया के धनोरिया परिवार ने सोनागिर जी में पर्वतराज की परिक्रमा के प्रवेश द्वार के बाजू में एक मंदिर का निर्माण कराया था।अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन डायेरेक्टरी जो वर्ष 1914 में प्रकाशित हुई थी,में सोनागिर जी में करहिया वालों के मंदिर का संदर्भ आया है।अब उस मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका है लेकिन प्रबंधकों ने मूल मंदिर के निर्माता का उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं समझा।समाजसेवी लालमणि प्रसाद जैन व क्षुल्लक पूज्यसागर (लौकिक नाम-सुनहरी लाल धनोरिया )भी इसी गाँव के निवासी हैं |यहाँ के रहने वाले दर्जनों परिवार आजीविका के सिलसिले में डबरा और ग्वालियर आकर बस गए हैं लेकिन अपनी पितृभूमि के साथ उनका जुड़ाव और लगाव आज भी गहरा है और गाँव में होने वाले धार्मिक व सामाजिक आयोजनों में उनकी पूरी भागीदारी रहती है |

रविवार, 23 मार्च 2014

भट्टारक श्री चंद्रभूषण संस्थान,सोनागिर


जैन मठों और संस्थानों के प्रबंधन का दायित्व जिन यति तुल्य गरिमाओं के कन्धों पर रहा है, वे जैन परंपरा में भट्टारक के नाम से विश्रुत हैं | सुदूर अतीत में भट्टारक भी जैन मुनियों की भांति नग्न रहते थे लेकिन कालांतर में वस्त्र धारण करने की प्रथा आरंभ हुई | 'णग्गो विमोक्ख मग्गो " के आदर्श पर बल देने व दिगम्बरत्व को पूज्य मानने के कारण भट्टारकों  के लिए भी मृत्यु का समय निकट आने पर दिगम्बरत्व धारण कर संलेखना व्रत ग्रहण करने का विधान है |
      मंदिरों और मठों के प्रबंधन जैसे लौकिक कार्यों से जुड़े होने के कारण भट्टारकों का यति स्वरूप धीरे-धीरे लुप्त होकर शासकों की भांति राजसी स्वरूप ग्रहण करने लगा और उनका पट्टाभिषेक भी राजोचित ढंग से बड़ी भव्यता के साथ आयोजित होने लगा |
       भट्टारकों के कार्य क्षेत्र में -मूर्ति प्रतिष्ठा ;मंदिरों ,मठों का सुचारू प्रबंधन ;प्राचीन आर्ष ग्रंथों का संग्रहण,संरक्षण ;जैन साहित्य ,कला ,संगीत आदि का संवर्धन जैसे विषय शामिल रहे हैं |
        समूचे भारतवर्ष में भट्टारकों के कई पीठ स्थापित रहे हैं जिनमें श्रमणगिरि सोनागिर स्थित भट्टारक पीठ भी एक है |जिस पर प्रमुखतः बलात्कार गण शाखा का वर्चस्व रहा है |अनेक यशस्वी  भट्टारकों से सुशोभित इस पीठ के अंतिम भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी, जो वरहिया समुदाय से  थे -वि.सं.2001 में अभिषिक्त हुए ,जिनका वि.सं.2031 में देहांत हो गया |श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी पर भट्टारकों की गद्दी(गादी)  प्राचीन समय से चली आ रही थी। पूर्व में इस क्षेत्र का प्रबंधन दतिया के राजा के अधीन था। दतिया नरेश ने क्षेत्र का प्रबंधन जब श्री सोनागिर सिद्ध क्षेत्र कमेटी को सौंपा था तब उस समय इस कोठी के मंदिर के सम्बन्ध में कमेटी की रिपोर्ट में उल्लेख आया है।जिसके अनुसार यह  मंदिर भट्टारक जी महाराज सोनागिर पट्टाधीश का बनवाया हुआ है। पर्वत के  चढ़ने के दरवाजे के सामने ही बना हुआ है। इसके साथ एक धर्मशाला भी है । भट्टारक हरेन्द्रभूषण जी सोनागिर तत्समय इस गद्दी के पट्टाधीश थे और इसका प्रबंधन करते थे और यहीं निवास करते थे। इस धर्मशाला में एक कुआं भी है।पर्वत राज के मंदिरों का प्रबन्ध इन्हीं के द्वारा होता था।पहले पर्वत का भंडार आप ही के यहाँ जमा होता था। उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार आगे उल्लिखित संस्थान 1- भट्टारक जी की कोठी ,2-खैरा वालों का,3-आचार्य वालों का,4- भगवानदास जी का,5- करहिया वालों का मंदिर,इनके प्रबंधनाधीन थे। जब सिद्धक्षेत्र सोनागिर कमेटी  का निर्माण हुआ तो इसके अध्यक्ष भी भट्टारक श्री हरेन्द्रभूषण ही थे। उनके उत्तराधिकारी के रूप में भट्टारक श्री चन्द्रभूषण जी महाराज इसके अन्तिम भट्टारक थे । योग्य शिष्य न मिलने के कारण भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी ने अपने जीवनकाल में ही वरहिया समाज के प्रमुख लोगों से विमर्श कर अपने नियंत्रणाधीन परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक प्रबंधकारिणी कमेटी का गठन किया था  जो भट्टारक गादी संस्थान के नाम से जानी जाती है।जिसमें मंदिर नं. 8 व 9, शांतिनाथ मंदिर तथा उससे  सम्बंधित अन्य सम्पत्ति, कोठी के सामने का चबूतरा, कुआं, आमौल वाली धर्मशाला, दक्खोबाई का मंदिर नं. 11, परमसुख,लखमीचंद धनोरिया करहिया वालों का मंदिर नं. 12, मंदिर  नं. 17 एवं उसकी धर्मशाला और उसका चबूतरा आदि की व्यवस्था जो भट्टारक जी के अधीन थी उसकी समुचित और सुचारू व्यवस्था करने के लिए वरहिया समाज की एक कमेटी बनाने का जो सुझाव भट्टारक जी ने रखा था, उसके अनुरूप वरहिया जैन समाज ने एक कमेटी  का गठन किया और उसका भट्टारक श्री चन्द्रभूषण महाराज संस्थान गादी  सोनागिर, दतिया (रजि.) नामकरण किया गया। यह संस्था म.प्र सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 (सन्‌ 1973 क्रं. 44) के अधीन दि. 30-10-1984 को पंजीबद्ध की गई।) और इसका प्रबंधन  दिगंबर जैन वरैया प्रबन्ध कार्यकारिणी कमेटी को सौंपा गया। भट्टारक श्री चंद्रभूषण जी शेष जीवन पर्यन्त इस कमेटी के अध्यक्ष रहे।भट्टारक जी के निधन के पश्चात् से  श्री दिगंबर जैन वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी सोनागिर इस दायित्व का सुचारू रूप से निर्वहन कर रही है | वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी के प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियों में चन्द्र चौक स्थित विशाल भट्टारक कोठी जिसमें मंदिर नं.8 व 9 तथा भगवान शांतिनाथ का मंदिर स्थित है ,आमौल वालों की धर्मशाला ,दक्खोबाई का मंदिर नं.11 , परमसुख, लखमीचंद धनोरिया करहिया वालों का मंदिर नं .12 (जिसके संधारण का दायित्व उनके वंशज मुन्नालाल धनोरिया जीवन पर्यन्त निभाते रहे थे),मंदिर नं.17 व उससे संलग्न धर्मशाला प्रमुख रूप से शामिल है |
               अपने गठन के समय से ही वरहिया जैन समाज की अनेक सेवाभावी गरिमाओं का सहयोग और समर्थन श्री दिगंबर जैन वरहिया प्रबंधकारिणी कमेटी सोनागिर जी को प्राप्त रहा है |जिनके कुशल निर्देशन में अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज हुई हैं |
        जिसमें मंदिर नं.12 का पुनर्निर्माण  कर उसे भव्य स्वरूप प्रदान किया गया है |भट्टारक कोठी स्थित नवीन धर्मशाला में 46 कमरों का निर्माण कराया गया है |मंदिर नं.17 का जीर्णोद्धार कर उसके प्रथम तल पर भी 6 कमरों का जीर्णोद्धार किया गया है |इसी मंदिर के दूसरे तल पर स्थित भगवान चंद्रप्रभु के मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है |आमोल वाली धर्मशाला में एक विशाल कक्ष में यात्री भोजनालय संचालित है ,जहाँ नाममात्र के शुल्क पर सुरुचिपूर्ण भोजन उपलब्ध कराया जाता है |इसी धर्मशाला के दूसरे तल पर 6 कमरों का नवीन निर्माण कराया गया।इस धर्मशाला के प्रांगण में 105 भट्टारक सर्वश्री सुरेंद्र भूषण जी, जिनेन्द्र भूषण जी, हरेंद्र भूषण जी व अंतिम भट्टारक चंद्रभूषण जी की चरण छतरी बनी हैं।इसके अतिरिक्त मुनियों व त्यागी, व्रतियों के निमित्त नियमित चौके की व्यवस्था भी इस कमेटी द्वारा की जा रही है |शांतिनाथ जिनालय के सामने ऊपरी मंजिल स्थित बारादरी प्रांगण में 6 कमरों का निर्माण कराया गया है व मंदिर नं.9 के तीसरे तल पर एक हाल का निर्माण हुआ है|भट्टारक कोठी स्थित सभी जिनालयों के शिखरों का जीर्णोद्धार भी कमेटी द्वारा कराया गया है। शांतिनाथ जिनालय के पर्वतराज की दिशा वाले भाग में तीन मंजिला भट्टारक श्री चंद्रभूषण धर्मशाला की पुनः साज-सज्जा की गई है और इसमें पहले और दूसरे तल पर कुछ कमरों को वातानुकूलित किया गया है।
 ‌‌            भट्टारक कोठी स्थित मंदिर नं.8 में बहुमूल्य रत्नों की चौबीसी स्थापित है ,जो एक अप्रतिम संग्रह है |यहाँ स्थित शास्त्र भंडार में अति प्राचीन 925 ग्रंथों का बहुमूल्य ,दुर्लभ संग्रह है जिसमें हमारी सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित है |चैत्य मनहर देव के नाम से सुविख्यात भगवान शांतिनाथ की 16 फीट उत्तुंग प्रतिमा जो श्रेष्ठी पाड़ा शाह द्वारा प्रतिष्ठापित 16 अतिशयकारी प्रतिमाओं में से एक है और मूलतः चैत्य ग्राम (करहिया) में स्थापित थी -यहाँ विराजित है।कुछ वर्ष पूर्व पंचकल्याणक महामहोत्सव का गरिमापूर्ण आयोजन वरहिया जनों द्वारा किया गया था,जिससे अभूतपूर्व धर्म प्रभावना हुई |वर्तमान में सोनागिर रेलवे स्टेशन के नजदीक श्री विहसंत सागर हाॅस्पीटल का निर्माण कार्य प्रगति पर है।इस क्रम में बाउंड्री वॉल का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है।भट्टारक कोठी की साज-सज्जा और रिनोवेशन का कार्य भी प्रगति पर है।
        इन अनेक उल्लेख्य उपलब्धियों के बावजूद यहाँ अभी बहुत से कार्य किये जाने शेष हैं |जिसके लिए लोगों से  उदार सहयोग की अपेक्षा है।







शुक्रवार, 21 मार्च 2014

अस्मिता का आसन्न संकट

घटते लिंगानुपात याने लड़कों की तुलना में लड़कियों की कम संख्या के चलते एक विकट सामाजिक संकट पैदा हुआ है |जिसके फलस्वरूप विवाह की देहली सीमा पर और उसके पार खड़े वरहिया जैन समुदाय के जिन युवाओं का गृहस्थी बसाने का सपना टूटकर बिखर चुका है ,वे अपने भविष्य को लेकर बेहद तनावग्रस्त और उद्विग्न हैं |इन छिके हुए (समाज में विवाह से बहिष्कृत )युवाओं ,जिनकी एक बड़ी संख्या है -के परिजनों का अपने बच्चों के गृहस्थ  जीवन को लेकर चिंतित होना उचित और स्वाभाविक है |उन्हें इसका एक ही सहज समाधान नज़र आता है -विजातीय समुदायों की कन्याओं को अपनी बहू बनाकर लाना |चूँकि सभी सवर्ण समुदाय घटते लिंगानुपात की समस्या से जूझ रहे हैं इसलिए लड़कियों की कमी इतर समुदायों में भी है | दूसरे ,स्वजाति में विवाह सम्बंध के आग्रह के चलते लोग सामान्यतः  विजातीय समुदायों में विवाह सम्बंध जोड़ने में हिचकिचाते हैं और विवशता में ही यह विकल्प चुनते हैं |किन्तु पिछड़े समुदायों में जहाँ लिंगानुपात की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है ,लड़कियों की बहुलता है |इसलिए सब ओर से नाउम्मीद लोग आज कुलीनता का किसी भी सीमा तक अतिक्रमण करने को तैयार हैं और उड़ीसा ,बिहार,बंगाल के पिछड़े समुदायों की विजातीय अजैन कन्याओं को ,जिन्हें उनके माता-पिता निर्धनता के कारण उनका परिणय करने में समर्थ नहीं है -दलालों के माध्यम से खरीद कर अपनी बहू बनाकर घर ला रहे हैं |ऐसे कई मामले प्रकाश में आये हैं |लेकिन यहाँ यह बात विचारणीय है कि नितांत भिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में पली-बढ़ी और विपरीत आहार-चर्या वाली कन्याओं के साथ तालमेल बैठा पाना दुष्करता की सीमा तक कठिन होगा ,साथ ही उन पर विश्वास कर पाना भी सहज नहीं होगा |कहीं वे मौका पाते ही कीमती माल-असबाव के साथ चम्पत न हो जायें,यह चिंता भी बेचैनी का सबब  बनेगी |इसलिए चाबी-ताले में कैद करके याने  सतत निगरानी में रखी जाने वाली इन क्रीत बहुओं की आमद का सिलसिला थमना चाहिए अन्यथा आने वाले समय में वरहिया समाज का स्वरूप भ्रष्ट होकर अपने नग्न विकृत रूप में सामने होगा और हम किंकर्तव्यविमूढ़ होंगे |
                                                        मेरी दृष्टि में इस विकट समस्या का एक ही उपयुक्त समाधान है कि इन बहिष्कृत (छिके हुए )विवाहार्थी युवाओं के निमित्त जैन संस्कारों से संस्कारित कन्याओं को अपनी बहू बनाकर घर लायें ताकि उनके साथ हमारा किसी प्रकार का कोई सांस्कृतिक टकराव न हो और धर्मनिष्ठता का भी सम्यक निर्वहन हो ||विजातीय जैन समुदायों के अलावा जैन संस्थाओं द्वारा संचालित अनाथालयों और आश्रमों में रहने वाली लड़कियाँ भी इस निमित्त सुपात्र हो सकती है |क्योंकि जैन संस्कारों से संस्कारित होने के कारण वे धर्मनिष्ठ होंगी और उनके साथ तालमेल बैठाने में सहजता होगी |भले ही यह सामाजिक विचलन है लेकिन इन परिस्थितियों के मद्देनज़र यह आज की एक बड़ी आवश्यकता और आपद-धर्म बन गया है |ऐसा करने से हमारे सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन-मूल्य व समाज की निरंतरता दोनों कायम रहेंगी और साथ ही हमारी सामाजिक अस्मिता अक्षुण्ण रहेगी अन्यथा एक समाज के रूप में हमारी पहचान ही लुप्त हो जाएगी ||

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

श्री राजमल वरैया


म.प्र. के रतलाम जिले में स्थित जावरा, मालवांचल का एक प्रमुख क़स्बा है |सम्प्रति यही क़स्बा श्री राजमल जी वरैया का गृहनगर है |जावरा में राजमल जी वरैया किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं | आपके पिता भंडारी गौत्रोत्पन्न श्री मुन्नालाल जी वरहिया मुरैना जिले के सुमावली ग्राम के निवासी थे जो कालांतर में आजीविका की तलाश में इंदौर आये और वहां कुछ दिन निवास करने के पश्चात् रतलाम जिले के जावरा कस्बे में स्थायी रूप से बस गए |यहीं पर राजमल जी का जन्म और लालन-पालन हुआ |भले ही आपने औपचारिक रूप से माध्यमिक स्तर तक ही शिक्षा प्राप्त की लेकिन स्वाध्याय मनन में वे आजीवन संलग्न रहे हैं |
                                                                                                                                         प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी ,सरल-चित्त श्री राजमल जी वरैया की एक अग्रणी समाजसेवी के रूप में पहचान रही है |आपका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ गहरा जुड़ाव रहा है | जावरा शहर में भारतीय जनसंघ के पुरस्कर्ताओं में आपका नाम शीर्ष पर आता है | आप मालवांचल की अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से सम्बद्ध रहे हैं | आपके व्यक्तित्व में एक चुम्बकीय आकर्षण है जिसके कारण आपके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति आपसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता |आपकी आतिथ्यप्रियता का लोग उदहारण देते हैं | मुझे भी उनका सानिध्य और सौजन्य प्राप्त हुआ है |उनकी सरलता और गाम्भीर्य से कोई भी अभिभूत हो जाता है |ऊँचे लम्बे कद काठी और सौम्य व्यक्तित्व के धनी श्री राजमल जी वरैया एक जुझारू राजनीतिक कार्यकर्ता और सहृदय समाजसेवी हैं |उनकी यह सक्रियता रुग्णावस्था में भी कायम रही|उनका मालवांचल में बहुत बहुमान है | उनका संघर्षों से भरा कर्मठ जीवन युवाओं के लिए एक प्रेरणा है |14 मई 2026 को उन्होंने इस असार संसार को अलविदा कहा।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

घटते लिंगानुपात के बरक्स बढ़ता सामाजिक विचलन


घटते लिंगानुपात के चलते वरहिया जैन समुदाय इस समय गंभीर सामाजिक संकट से गुजर रहा है जिसका कारण विवाहार्थी लड़कों की तुलना में विवाहार्थी लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी होना है |योग्य वर की तलाश में वरहिया जैन समुदाय की कई लड़कियों का विजातीय जैन समुदायों  के लड़कों के साथ विवाह होने से यह स्थिति और बदतर हुई |हाँलाकि कन्या के अनुरूप योग्य वर की तलाश करना हर अभिभावक की चाहत रहती है | इसलिए विजातीय जैन समुदायों में विवाह सम्बन्ध जोड़ना गलत नहीं कहा जा सकता बल्कि यह समय की मांग है |लेकिन विवाहार्थी लड़कियों की घटती उपलब्धता से जो गंभीर सामाजिक संकट पैदा हुआ है ,उससे विवाह की देहली-सीमा पर खड़े विवाह योग्य लड़को के जीवन में घोर हताशा घिर रही है और वह जीवन संगिनी की तलाश में विजातीय,अजैन और सामाजिक रूप से हीन (?) समुदायों की ओर रुख कर रहे हैं |हाल ही में ऐसे कई विवाह हुए हैं और कई प्रत्याशित हैं |जिन घरों में ऐसे विवाहार्थी लडके हैं उनके अभिभावकों का उनके प्रति चिंतातुर होना स्वाभाविक है और उनका अपनी संतानों के भविष्य को सुखमय और सुरक्षित करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने की यह कोशिश उनके प्रति सहानुभूति तो पैदा करती है लेकिन यह कितना उचित है ,एक विचारणीय प्रश्न है |
                                    यहाँ संदर्भित प्रतिलोम विवाहों ,जिनमें कथित रूप से वधू-मूल्य चुकाया जाता है या जो किसी अंधे प्रेम प्रसंग की परिणति होते हैं -में लड़की के भिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि का होने के कारण परिवार में उसके साथ तालमेल में कठिनाई होती है, जो इस समस्या से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बिंदु है | इसके अतिरिक्त लड़की के बहिरागत होने तथा  उसके अतीत और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में अनिभिज्ञता के कारण उसके प्रति विश्वास का संकट बना रहता है और सम्बंधित परिवार एक अचीन्हे असुरक्षा-बोध से ग्रस्त रहता है |यह बिंदु भी यहाँ महत्वपूर्ण है |
                                                        वरहिया जैन समाज के मठाधीश जिन्हें इस विषय में ठोस पहल करनी चाहिए वे इस गंभीर और महत्वपूर्ण प्रश्न पर भीष्म की तरह किंकर्तव्यविमूढ़ और मौन हैं |शायद उनकी निष्ठा समाज के प्रभावशाली वर्ग के हितसाधन से जुड़ी है |गरीब लोगों के सही और अच्छे कामों में अक्सर खोट ढूढ़ने वाले लोग जब अमीरजादों के गलत कामों को सही ठहराने के लिए उनके पक्ष में एकजुट होकर बेढब तर्क गढ़ते नज़र आते हैं तो दुःख तो होता है लेकिन हैरानी बिल्कुल नहीं होती |
                                                         इस समस्या को हल्के ढंग से लेने से इसके विकराल रूप धारण करने की आशंका है |यह एक बड़े आसन्न सांस्कृतिक और सामाजिक संकट की दस्तक है |यदि इस समस्या के समाधान की दिशा में समय रहते गंभीर और ठोस पहल नहीं की गई तो इससे समूचे समुदाय का सामाजिक तानाबाना प्रभावित होगा |हम सभी को इस दिशा में सचेत होकर प्रयास करने की जरुरत है |

पं. छोटेलाल वरैया

वरहिया जैन समाज की विद्वत परंपरा में पंडितवर्य गोपालदास जी वरैया के पश्चात् पं.छोटेलाल जी वरैया का नामोल्लेख आता है |समूचे मालवांचल में समादृत और उज्जैन के शीर्ष जैन विद्वानों में सुमेरु तुल्य पंडित छोटेलाल जी वरैया का जन्म भाद्रपद कृष्णा 5 संवत 1965 में ग्राम आमोल जिला शिवपुरी में हुआ था |आपके पिता का नाम श्री मोतीलाल जी वरहिया व माता का नाम श्रीमती सुन्दरबाई था |आपके पिता श्री मोतीलाल जी वरहिया अत्यंत सरलचित्त व्यक्ति थे |आप चौधरी गौत्र के रत्न हैं |किशोरावस्था से ही आप आजीविका के लिए परिश्रम करने में जुट गए |संवत 1982 में श्रीमती पुनियाबाई के साथ  आपका विवाह हुआ |अपनी जीवनसंगिनी से आपको 2 संतानें  प्राप्त हुईं  किन्तु क्रूर काल ने आपकी दोनों संतानों जिनमें एक पुत्री व एक पुत्र था ,आप से छीन लिया | इसके पश्चात् संवत 1998 में आपकी धर्मपत्नी का भी  स्वर्गवास हो गया ||इस दारुण वियोग से आपका ह्रदय विदीर्ण हो गया |
                       बाल्यावस्था से ही प्रतिकूलताओं से संघर्ष कर बड़े हुए युवा छोटेलाल ने इस विषम परिस्थिति में भी अपने संतुलन को डिगने न दिया और अपने मन के इस  सूनेपन को समाजसेवा ,सत्संग और साहित्य सृजन से भरना शुरू कर दिया और यही उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़-बिंदु (टर्निंग प्वाइंट )सिद्ध हुआ |
                      काव्य के पठन-पाठन में बचपन से ही आपकी गहरी रूचि रही |पांडित्य विधि की    शिक्षा प्राप्त कर आपने अनेक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराये जिसमें पंचकल्याणक जैसे विराट अनुष्ठान भी शामिल हैं किन्तु आपने पांडित्य कर्म को कभी अपनी आजीविका नहीं बनाया और अपनी इन सेवाओं के लिए मार्ग व्यय के अतिरिक्त कोई धन स्वीकार नहीं किया |
                     आप अनेक सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं से सम्बद्ध रहे हैं जिनमें भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा अजमेर,सोनागिर सिद्धक्षेत्र कमेटी ,भारतवर्षीय दिगंबर जैन शास्त्री परिषद् इत्यादि उल्लेखनीय हैं | आप संस्कृत के प्रकांड विद्वान् थे |आपने लगभग 45 ग्रन्थ और सौ से अधिक आलेख लिखे हैं जो आपकी विचक्षणता का जीवन्त प्रमाण हैं |आपकी रचनाएँ भारतवर्ष की सभी प्रमुख जैन पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होती रहीं हैं |आपके कई ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं |गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं पर आपका समान अधिकार रहा है |आपकी पुस्तकों का समाज में धर्म प्रचारार्थ निशुल्क वितरण हुआ जिससे अखिल जैन समाज में आपको अत्यधिक ख्याति और बहुमान प्राप्त हुआ |आपने अपने संचित द्रव्य का सदुपयोग करते हुए अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीर जी में शांतिनगर स्थित जिनालय श्रृंखला में एक जिन- मंदिर का निर्माण कराया और वेदी प्रतिष्ठा कराई जो अत्यंत मनोज्ञ और भव्य है |
                         आपकी अप्रतिम सेवाओं के लिए जैन समाज द्वारा आपको 'विनोद-रत्न','व्याख्यान भूषण','वाणी भूषण','धर्मालंकार','समाज रत्न' आदि अनेक उपाधियों से सम्मानित कर बहुमान प्रदान किया गया |हमारी स्मृतियों में जीवित जैन दर्शन के गहन अध्येता पंडित प्रवर छोटेलाल जी वरैया सही अर्थों में वरहिया जैन  समाज के गौरव हैं |