बुधवार, 17 सितंबर 2025

वरहिया समाज और चुनौतियां


 जिस  समाज का सामाजिक अनुशासन शिथिल हो जाता है। उसका सामाजिक ताना-बाना कमजोर होकर बिखरने टूटने लगता है। वरहिया समाज में दिन-ब-दिन बढ़ती स्वेच्छाचारिता एक चुनौती बनकर उभर रही है। पंचों के परंपरागत अनुशासन तंत्र के निष्क्रिय और प्रभावहीन होने के कारण समाज के स्तर पर उच्छृंखलता बढ़ी है। प्रभावशाली लोग मनमानी कर सामाजिक मूल्यों को धता बता रहे हैं। इन सबकी कीमत गरीब और सामान्य व्यक्ति अपनी परेशानियों से अकेले जूझकर चुका रहा है। समाज के स्तर पर उसे किसी तरह का सहयोग न मिल पाने से वह और टूट जाता है।यह स्थिति चिंताजनक है।आज सामान्य समाजजनों की पारिवारिक सुख-शांति को भी जमाने की नजर लग गई है। अपने बच्चों की गृहस्थी बसाने की चिंता में दुबले हो रहे लोग जब किसी तरह इस चिंता से पार पा लेते हैं तो कुछ ही दिनों में उनकी खुशियों को ग्रहण लग जाता है और हंसता खेलता पारिवारिक जीवन वैवाहिक विवादों की भेंट चढ़ जाता है। व्यक्तिगत समस्या कहकर इन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। व्यक्ति परिवार की इकाई है और परिवार समाज की इकाई है। इसलिए इस श्रृंखला की कुछ कड़ियां भी यदि कमजोर होंगी तो उसका नकारात्मक प्रभाव पूरी श्रृंखला और उसकी मजबूती पर पड़ेगा।इन विवादों को सुलझाने में सामाजिक स्तर पर प्रमुख और प्रभावशाली लोगों को अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।समाज की इस आत्मघाती उदासीनता के कारण ही लोगों को जो उचित समझ में आ रहा है वो कदम वह उठा रहे हैं। भले ही उसका दीर्घकालिक प्रभाव समाज और उनके स्वयं के लिए नकारात्मक और प्रतिकूल हो। समाज के लोगों के प्रतिकूल रवैए और समाज में उन्हें उचित रिस्पांस न मिलने के कारण ही समाज से बाहर जाकर विवाह की प्रवृत्ति पनप और बढ़ रही है।जिस पर अंकुश लगना चाहिए लेकिन यह तभी संभव होगा जब इसके लिए समाज में उचित वातावरण तैयार होगा। लेकिन समाज के नियामक और प्रशासी पदों पर बैठे लोग अपना क्रेडिट स्कोर बढ़ाने की जुगत में दिखावे के आयोजनों में व्यस्त हैं और जमीनी हकीकत से अपनी नजरें चुरा रहे हैं।यह न केवल गलत है बल्कि घातक भी है। जिसकी कीमत हमारी पीढ़ियां चुकाएंगी।

1 टिप्पणी:

  1. श्रीश जी, आपकी चिंता वाजिब है किन्तु इसका कारण प्रभावशाली लोग नहीं है वरन ऐसे महत्वाकांक्षी लोग हैं जो राजनीति में असफल तथा सामाज सेवा में शून्य रहे हैं किन्तु इनमें प्रतिष्ठा पाने की आकंठ लालसा विद्यमान है। इस स्वार्थी प्रतिष्ठा को पाने के लिये इन्होने समाज को खिलोना बना लिया है। जब चाहते है तब मनमाना खेल खेलने से बाज नहीं आते हैं। इसके लिये समाज में भ्रम फैलाना, मनचाहा गुट बनाना, उन गुटों की ताकत पर समाज की संस्थाओं पर कब्ज़ा करना तथा इन संस्थाओं की मान्यताओं व धन शक्ति के आधार पर अपनी मनमानी को समाज पर थोपना, एक सोची समझी रणनीति बन गया है। जब तक इस पर प्रहार नहीं होगा तब तक इनकी कुचेष्टा से, समाज के पतन को बचा पाना संभव नहीं है। अच्छे लोगों की कमी नहीं है पर उनमें कुचेष्टाओं की पूर्ति की स्वीकारोक्ति भी नहीं है। यही कारण है कि समाज सच्चे नेतृत्व से विमुख होती जा रही है। अब समाज में बदलाव तभी संभव है जब या तो महामानव पैदा हो या फिर समाज सच्चे नेतृत्व को उभारने में सक्षम हो वरना पतन को कौन रोक पाया है।

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