'खम्मामि सव्वे जीवाणां, सव्वे जीवा खमंतु मे,
मित्ति मे सव्व भूदेसु वैरं मज्झं ण केणवि'
(मूलाचार- 2/7)
'क्षमे सर्वजीवान् ,सर्वे जीवान् क्षमन्ताम् मम।
मैत्री मे सर्वभूतेषु ,वैरं मम न केनापि।'
मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ ,सभी जीव मुझे क्षमा करें।मेरा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव है। मेरा किसी से भी बैर नहीं है।
प्रकारांतर से यही बात इन पदों में कही है -
मिच्छामि दुक्कडं /
मिथ्यामि दुष्कृताम् /
मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हों
जाने-अनजाने जो कुछ भी भूल हुई हो।
या कोई प्रतिक्रिया किंचित प्रतिकूल हुई हो।
या राग-द्वेषवश कुछ भी अनुचित लिखा कहा हो।
मन में जिसके कारण चुभता शल्य रहा हो।
क्षमा-पर्व पर मांग रहा हूं क्षमा आपसे।
मुझे मिले उन्मुक्ति हुए इस महापाप से।
🙏🏻 श्रीश राकेश जैन
