सोमवार, 10 मार्च 2025

पवाया/पद्मावती


पद्मावती जिसे आज पवाया के नाम से जाना जाता है।
 इसका उल्लेख विष्णु पुराण, बाणभट्ट कृत हर्षचरित, महाराजा भोज कृत सरस्वतीकंठाभरण आदि में आया है। महाकवि भवभूति के मालतीमाधवम् की अमर कथा इसी नगरी के इर्द-गिर्द घूमती है।भवभूति ने पद्मावती नगरी को गगनचुम्बी महलों, मन्दिरों, अट्टालिकाओं से सुसज्जित बताया है। कथा का नायक उस नगर में तत्वमीमांसा सीखने आता है। भवभूति ने स्वयं इसी नगर में शिक्षा ग्रहण की थी।
मालतीमाधवम् में उल्लिखित विवरण के अनुसार पद्मावती  सिन्धु, पारा/परा(पार्वती),लवणा/नून एवं मधुमती/महुअर नदियों की क्रोड में बसा एक समृद्ध नगर था जो सिन्धु और परा के संगम पर स्थित था। सिन्धु तथा मधुमती के संगम पर महादेव को समर्पित एक भव्य शिव मंदिर स्थित था। सर्वप्रथम एच एच विल्सन ने उज्जैन को पद्मावती के रूप में चिन्हित किया। परन्तु उज्जैन में क्षिप्रा अकेली नदी होने के कारण इस विचार को मान्यता प्राप्त नहीं हुई । स्वयं विल्सन ने ही दक्कन में औरंगाबाद के आसपास पद्मावती के अवस्थित होने की बात कही थी। फिर बाद में उन्होंने विष्णुपुराण का अध्ययन करते समय  बिहार में स्थित भागलपुर को प्राचीन पद्मावती नगरी के रूप में चिन्हित किया।
विष्णुपुराण में  नागवंशी राजाओं के मथुरा, कान्तिपुरी (मुरैना जिले में कुतवार/ महाभारतकालीन कुन्तिभोज।) और पद्मावती से शासन करने का उल्लेख आया है। अलेक्जेंडर कनिंघम ने मथुरा से निकटता के कारण शिवपुरी जिले के नरवर की पद्मावती के रूप में पहचान की। नरवर से कनिंघम को नागवंशी शासकों के सिक्के भी मिले थे जिससे उनका यह विश्वास और दृढ़ हुआ।
लेकिन बाद में एम वी लेले और एम बी गार्डे ने मालतीमाधवम् में वर्णित  नदियों के आधार पर ग्वालियर जिले में डबरा के निकट स्थित पवाया ग्राम को ही पद्मावती के रूप में पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर स्पष्टता के साथ चिन्हित किया। जिसे इतिहासविदों के बीच व्यापक मान्यता प्राप्त हुई।सन् 1920 में सर जॉन मार्शल के पवाया में आगमन से उत्खनन का सिलसिला शुरू हुआ जो 1942 तक चला। इसमें एक बड़ा ईंटों का बना मन्दिर, ताड़पत्र स्तम्भ, यक्ष मणिभद्र, सूर्य/नारायण की एक मूर्ति तथा वामनावतार की कथा से अलंकृत एक तोरण शीर्ष प्राप्त हुआ। ये सभी पुरावशेष ग्वालियर किले में स्थित गूजरी महल संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं।
 शिव मंदिर की इमारत कई शताब्दियों पुरानी है। ये वही स्थान प्रतीत होता है जो आठवीं शताब्दी में रचित मालतीमाधवम् में एक प्राचीन सुवर्णबिन्दु नामक शिवालय के रूप में वर्णित है। जिसमें उल्लेख आया है कि “यहाँ स्वर्णबिन्दु नामक पवित्र भगवान शिव हैं, जिन्हें किसी मानव ने स्थापित नहीं किया है, जो मधुमती और सिंधु नदी के संगम को पवित्र करते हैं।”  यह प्राचीन शिवलिंग अपनी अलौकिक दिव्यता बिखेरता हुआ आज भी मौजूद है।
मालतीमाधवम् में जिस शिवालय का वर्णन है वह मधुमती और सिन्धु के संगम पर स्थित था। लेकिन मधुमति/महुअर नदी यहाँ से कुछ मील दूर जाकर सिन्ध में मिलती है। डेढ़ हजार साल के लंबे कालखंड में कदाचित महुअर ने अपने मार्ग को किंचित परिवर्तित किया हो जो अब सिन्ध के समान्तर ही बहती है।   
 पवाया गाँव जो कभी वैभवशाली और समृद्ध महानगर रहा है  आज एक निहायत छोटा और पिछड़ा गाँव है। यहां के नाग शासक काफी शक्तिशाली और प्रभावशाली रहे हैं और इस बात का अनुमान तो हम पृथ्वी के शेषनाग के फन पर टिके होने के मिथक से सहज ही लगा सकते हैं।
         वायु पुराण में उल्लेख आया है कि नौ नागों ने चंपावती या पद्मावती पर और सात नागों ने मथुरा पर शासन किया था, लेकिन किसी के नाम का उल्लेख इसमें नहीं है। विष्णु पुराण में कथन आया है कि नागों ने पद्मावती, कांतिपुरी और मथुरा में शासन किया था।पवाया में पाए गए सिक्कों पर नौ से अधिक शासकों, भव, भीम, बृहस्पति, देव, गणपति, प्रभाकर, पुम, स्कंद, वसु, विभु, वीरसेन, वृष और व्याघ्र का उल्लेख है । नाग वंश का अंत चौथी शताब्दी  के उत्तरार्ध में हुआ जब उनका राज्य प्रभावशाली गुप्त साम्राज्य में विलीन हो गया। इनमें से कांतिपुरी की पहचान आधुनिक कुतवार/कोटवाल(यह गाँव मुरैना के पूर्व, ग्वालियर के उत्तर और गोहद के पश्चिम में आसन नदी के किनारे स्थित है। यह बानमोर से लगभग 18 किलोमीटर और ग्वालियर से 30 किलोमीटर दूर है । यह मुरैना से 22 किलोमीटर दूर है) गांव के रूप में की गई है जो पद्मावती के उत्तर-पूर्व में लगभग 75 मील और मथुरा के दक्षिण में लगभग उतनी ही दूरी पर स्थित है। ये तीनों स्थान एक दूसरे के बहुत निकट हैं, इसलिए ये तीन अलग-अलग नाग राजवंशों की राजधानियां नहीं हो सकतीं। मथुरा और कांतिपुरी में पाए गए सिक्के ज्यादातर गणपति नाग के हैं।ये तथ्य हमें यह संकेत देते हैं कि देश के इस भाग में एक ही नाग शासक का साम्राज्य था जिसकी राजधानी पद्मावती थी और मथुरा, कांतिपुरी और विदिशा, जहां नागवंशी शासकों के सिक्के पाए गए हैं, नाग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान थे।
साहित्यिक साक्ष्य के अलावा, पद्मावती नगरी के कुछ अभिलेखीय संदर्भ भी हैं। खजुराहो के वैद्यनाथ मंदिर का एक शिलालेख, जिसकी तिथि 1000-1001 ई. है, पद्मावती की अप्रतिम सुंदरता का वर्णन करता है। शिलालेख में उल्लेख है, "पृथ्वी की सतह पर एक अद्वितीय (नगर) था, जो ऊंचे महलों से सुसज्जित था, जिसके बारे में दर्ज है कि इसे स्वर्ण और रजत युग के बीच पृथ्वी के किसी शासक, लोगों के स्वामी, जो ब्राह्मण जाति का था, ने स्थापित किया था, (एक ऐसा शहर जिसे) इतिहास में पढ़ा जाता है (और) पुराणों में पारंगत लोग इसे पद्मावती कहते हैं। पद्मावती नामक यह सबसे उत्कृष्ट (नगर), अभूतपूर्व तरीके से बनाया गया था, महलों की गलियों की ऊंची पंक्तियों से भरा हुआ था, (और) यह चमकदार महलनुमा आवासों से भरा था जो बर्फीले पहाड़ की चोटियों जैसे लगते थे।”
        गार्डे ने सन् 1916 में साहित्यिक साक्ष्य के अलावा गांव में पाए गए पुरातात्विक अवशेषों और भवभूति के मालती माधव नाटक में वर्णित पद्मावती के परिवेश के आधार पर पवाया ग्राम को पद्मावती नगरी के रूप में चिन्हित करने की एम वी लेले की स्थापना का समर्थन किया।पवाया गांव सिंध और पार्वती नदियों के संगम पर स्थित है। गांव से लगभग 3 किमी दक्षिण पश्चिम में सिंध नदी पर एक झरना है। इस झरने के बगल में धूमेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। महुआर नदी लगभग 3 किमी दक्षिण में सिंध में मिलती है। इस संगम पर शिवलिंग को सहारा देने वाला एक मंच है, संभवतः वह स्थान जहाँ नाटक में वर्णित प्राचीन सुवर्णबिंदु था। नून/लवणा नदी पवाया से लगभग 7-8 किमी दूर सिंध में मिलती है।

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