वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
गुरुवार, 6 मार्च 2025
डोभ कुंड शिलालेख
डोभ कुंड (ग्वालियर ) से प्राप्त प्रसिद्ध शिलालेख में जैन धर्मप्रेमी कच्छपघात वंशी राजा विक्रमसिंह तथा जायसवाल श्रावकों का उल्लेख है।यह शिलालेख विक्रम संवत 1145 का है जिसे डोभ कुंड के मंदिर में सन् 1866 में केप्टन डब्ल्यू आर मेलविले ने खोजा था,जो एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम दो में पृष्ठ 232-40 पर संकलित है। यह जिनालय के निर्माण की प्रशस्ति है । इस प्रशस्ति की रचना श्री विजयकीर्ति महाराज ने की थी । जिसको उदयराज ने पाषाण पर लिखा था और तिल्हण ने उत्कीर्ण किया था।यह मंदिर आज भले ही भग्नावस्था में हो, लेकिन उसकी स्थापत्य कला चमत्कृत करती है।यहां का मूर्ति शिल्प बेजोड़ है। मंदिर में 81 फीट के चबूतरे पर चौबीसी का निर्माण किया गया है।चौबीसी के चारों ओर एक प्लेटफार्म पर गजरथ का निर्माण कर इसे सुंदरता प्रदान की गई है।कलात्मक चौबीसी के प्रत्येक भाग पर तीर्थंकर विराजमान थे, पर अब ये खाली हैं। बताते हैं किे मंदिर के प्रवेशद्वार पर दो कलात्मक स्तंभ थे, जो अब नहीं हैं। डोभ का प्राचीन नाम चडोभ है।राजा विक्रम सिंह कच्छपघात ने डोभ की राजगद्दी संभालने और डोभ को राजधानी का दर्जा देने के बाद जैनाचार्य शांति देव के प्रभाव में आकर यहां नगरवासियों के माध्यम से एक भव्य और विशाल जिनालय का निर्माण कराया था।इन जैन मुनि के शिष्य विजय कीर्ति ने नागरिकों को इस मंदिर के निर्माण में सहभागिता के लिए प्रेरित किया था। राजा द्वारा मंदिर के प्रबंधन में सभी का सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से मंदिर के संचालन के निमित्त 'विंशोपक कर' का प्रावधान किया था जिस कारण अनाज के रूप में कर वसूला जाता था,जो प्रत्येक गौणी पर एक विंशोपक अनाज कर के रूप में तथा तेल निकालने का कारोबार करने वालों को भी इसी परिमाण में मंदिर के लिए तेल दान देना होता था।विंशोपक से आशय इकाई के बीसवें भाग से है।राजा विक्रमसिंह ने मंदिर के प्रबंधन में सौकर्य की दृष्टि से महाचक्र ग्राम में चारगोणी गेहूं बोने योग्य खेत तथा रजकद्रह के पूर्व में एक बाग कूप सहित प्रदान किया था तथा दीपकादि के लिये कुछ घड़े तेल के प्रदान किये थे और इस आशय की राजाज्ञा जारी की थी कि भविष्य में भी उनके परवर्ती राजा इसका पालन करते रहेंगे।डोभ कुंड से प्राप्त अभिलेख का उसके विषय में इस परिचयात्मक विवरण के साथ मैं यहां इस प्रयोजन से उल्लेख कर रहा हूं ताकि 'वरैया' पाठ की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़े गए निराधार तर्क की निरर्थकता रेखांकित कर सकूं। आदरणीय पंडित सुगनचंद जी आमोल वालों (पंडित जी के अलावा कुछ अन्य लोगों का भी यह अभिमत हो सकता है) ने ग्वालियर के विद्वान पंडित हरिहर निवास द्विवेदी के दैनिक भास्कर में सन् 1986 के आसपास लिखे एक लेख (जिसकी प्रति अब उपलब्ध नहीं है) का हवाला देकर उन्होंने मुझे डोभ कुंड के शिलालेख में उल्लिखित विंशोपक और 'वरैया' शब्द के बीच सहसम्बंध और विंशोपक माप की वरैया शब्द (माप के लिए इस्तेमाल होने वाली एक टोकरी, उनके कथनानुसार)से तुल्यता स्थापित करते हुए बताया कि विंशोपक संग्रहण का दायित्व संभालने वाले समुदाय को ही कालान्तर में वरैया नाम से संबोधित किया जाने लगा। मेरे लिए यह एक नूतन अवधारणा थी इसलिए मैंने पंडित जी के इस दावे का परीक्षण करने के लिए 'एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम 2' और 'मध्यप्रान्त, मध्यभारत और राजपूताने में जैन स्मारक' पुस्तकें जिनमें डोभ कुंड का अभिलेख संकलित किया गया हैं,यत्नपूर्वक जुटाईं और उनका अध्ययन किया। जिससे पता चला कि उक्त दावा एक कपोल-कल्पना मात्र है और डोभ स्थित जिनालय के निर्माण में जो लोग संलग्न थे,वे जायसवाल/जैसवाल समुदाय से थे।यह तथ्य अभिलेख से स्पष्ट है और विंशोपक से आशय उपार्जन के बीसवें भाग से रहा है और वरैया शब्द से उसका दूर या निकट का कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि पान की खेती के लिए बने झुरमुटों में बांस की जिन पनालियों का इस्तेमाल किया जाता है,वे 'बरई' कहलाती हैं और पान की खेती करने वाले लोगों को 'बरैया' नाम से संबोधित किया जाता है।
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