वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
मंगलवार, 25 मार्च 2025
पंडित लेखराज जी वरैया
पंडित लेखराज जी वरैया गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के ही समकालीन थे।आपका जन्म वरहिया जैन समाज के मातृस्थल और पौराणिक राजा नल की क्रीड़ा भूमि ऐतिहासिक नरवर गढ़ के समीप स्थित करहिया ग्राम में विक्रम संवत् 1925 में हुआ था। इनका गोत्र 'पलैया' है। इनके पिताका नाम जगराम उपनाम जगोलेराम था । जो उस समय करहिया ग्राम जागीर के प्रमुख व्यवसायी थे। करहिया ग्राम में पठन-पाठन की समुचित सुविधा न होने के कारण इनके पिताजी ने घर पर ही इनको पढ़ाने के लिए एक शिक्षक का प्रबन्ध किया था। पंडितजी की बाल्यकाल से ही धर्म के प्रति गहरी रुचि थी।धर्म शास्त्र में दृढ़ श्रद्धा के कारण उन्होंने 18 वर्ष की आयु में ही कन्दमूल का आजीवन त्यागकर दिया था और चारित्रिक दृढ़ता के कारण आपकी अपने समय के आदर्श व्यक्तियों में गणना होती थी।आप अत्यंत सादगी के साथ रहते थे और सदैव साधारण श्वेत वस्त्र पहनते थे और सिर पर पगड़ी बांधते थे।वह सही मायने में सरलता की प्रतिमूर्ति थे। तड़क-भड़क और दिखावा आपको तनिक पसन्द न था।आप निर्मल स्वभाव, उदारचेता और धर्म चिंतन में संलग्न रहने वाले सज्जन व्यक्ति थे । आपकी विचक्षणता, सरलता और अध्ययनशीलता से उनके संसर्ग में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।इस कारण समाज में उनकी बहुत ख्याति थी।इतनी ख्याति और प्रतिष्ठा के बावजूद आपमें अहंकार का लेशमात्र भी न था।आप सदैव मां जिनवाणी की आराधना में तल्लीन रहते थे।आपने जीवन पर्यन्त जैनधर्म की सेवा करते हुए उसकी धर्म पताका फहराई। कहीं भी कोई भी धार्मिक उत्सव होने पर वह सदैव उसमें यथाशक्ति सहयोग करते थे। धर्म की साधना को उन्होंने अपना जीवन लक्ष्य बना लिया था। लेकिन क्रूर काल के जटिल मारक-पाश में बंधकर 53 वर्ष की अल्पायु में ही विक्रम संवत् 1978 में माघ शुक्ला 14 को यह नक्षत्र क्षत होकर सदैव के लिए अस्त हो गया।'वरैया विलास' पंडित जी एकमात्र उपलब्ध स्वतंत्र कृति है।जिसकी भूमिका पंडित कपूरचंद जी वरैया ने लिखी है और यह लश्कर निवासी प्रसिद्ध वस्त्र व्यवसायी लक्ष्मीचन्द वरैया ने सन् 1950 में प्रकाशित कराई थी।यह कृति दो भागों में हैं। इसके पूर्वार्द्ध में सम्पूर्ण पूजायें संग्रहीत है और उत्तरार्ध में स्तुति, विभिन्न गायन शैली में निबद्ध उपदेशात्मक भजन और जैन बारहखड़ी संकलित हैं।आपकी ये रचनाएं अत्यंत भावप्रवण कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों दृष्टियों से सुपुष्ट, अत्यंत प्रौढ़ और गेय हैं। पंडित जी को छंदशास्त्र का ज्ञान था और वह गायन में भी निपुण थे इसलिए उनकी सभी रचनाएं छंदोबद्ध हैं।पंडित जी की एकमात्र पुत्र संतान श्री जियालाल जी थे,जो एक व्यवसायी थे।करहिया के प्रसिद्ध व्यवसायी और साहूकार श्री सुआलाल जी व श्री गेंदालाल जी इन्हीं के यशस्वी वंशज रहे हैं।
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