कुण्डलपुर के मेले में महासभा के अधिवेशन में यह सहमति हुई थी कि सहारनपुर में संचालित जैन महाविद्यालय पंडित गोपालदास जी वरैया की देखरेख में मुरैना में संचालित किया जाए। परन्तु वरैया जी की मुंशी चम्पतराय जी के साथ पटरी नहीं बैठती थी। इसलिए पंडित जी ने उनके साथ और उनके अधीन रहकर इस काम को करना स्वीकार नहीं किया लेकिन इसी समय उन्हें स्वतन्त्र रूप से मुरैना में एक जैन पाठशाला शुरू करने का विचार आया।आपके पास पंडित वंशीधर जी पूर्व से ही अध्ययनरत थे।अब दो-तीन विद्यार्थी और भी जैन सिद्धान्त का अध्ययन करने के लिए उनके पास आकर रहने लगे।कुछ सदाशयी लोग इन विद्यार्थियों का आर्थिक सहयोग करते थे और पंडित जी इन्हें पढ़ा देते थे । धीरे-धीरे इस विद्यालय की ख्याति बढ़ती गई और इसके बाद कुछ अन्य विद्यार्थी भी अध्ययन के निमित्त यहां आ गये और कार्य की अधिकता के कारण एक व्याकरण का अध्यापक नियुक्त करने की आवश्यकता अनुभव हुई।जिसके लिये सेठ सूरजचन्द्र जी शिवराम जी ने 30₹ मासिक की आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया। धीरे-धीरे छात्रों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि पण्डित जी को उसके लिये नियमित पाठशाला की स्थापना का निर्णय लेना पड़ा। सन् 1902 में बनी “जैन सिद्धान्त विद्यालय' नाम की यही पाठशाला आज पंडित गोपालदास संस्कृत महाविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है और इसके द्वारा जैन धर्म और जैन सिद्धांत के जानकार अनेकानेक विद्वान तैयार हुए हैं।इस पाठशाला की ख्याति समूचे जैन जगत में है। प्रारंभ में पाठशाला के साथ में एक छात्रावास भी था। छात्रावास और उस समय पाठशाला के लिये बने भवन पर लगभग दस हजार रुपए खर्च हुए थे। पाठशाला और छात्रावास दोनों पर मोटा-मोटी 10000₹ वार्षिक का खर्च आता था।यह धनराशि पंडित जी को दान के रूप में प्राप्त होती थी। पंडित जी द्वारा रोंपा गया यह नन्हा पौधा आज विशाल वटवृक्ष बन गया है।जिसका परिसर काफी बड़ा और सर्वसुविधायुक्त है।पंडित गोपाल दास वरैया 19वीं सदी के धर्म और दर्शन के प्रकांड विद्वान और उच्च कोटि के शिक्षाविद् हैं, जिन्होंने शिक्षण में संस्कृत की उपेक्षा से व्यथित होकर अपने बूते मुरैना में इस संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। जो धीरे-धीरे प्रदेश और देश का प्रसिद्ध शैक्षणिक केंद्र बन गया। पंडित जी सदैव निर्धन और असहाय छात्रों की आर्थिक सहायता करते थे। जैन जगत के चोटी के विद्वानों में अधिकांश इसी संस्थान की देन हैं।पंडित जी के देहावसान के बाद से विद्यालय प्रबंधन में स्थानीय जैसवाल समाज का डोमिनेंस रहा है। बाद में श्री जवाहरलाल जी जैन (कुलैथ वाले) और श्री दिनेश कुमार जैन, एडवोकेट ने वरहिया जैन समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रबंधन समिति में उपस्थिति दर्ज कराई और उसमें प्रभावी रूप से अपना दखल बढ़ाया। वर्तमान में भी मुरैना में वरहिया जैन समाज के पांच -छह परिवार ही हैं। मुरैना का पंडित गोपालदास संस्कृत महाविद्यालय एक सार्वजनिक संस्था है जिसमें वर्तमान में वरहिया जैन समाज सहित सभी स्थानीय सर्वजातीय जैन समाज का प्रतिनिधित्व और प्रबंधकीय नियंत्रण है। इसलिए कुछ लोगों का यह उपालंभ या आरोप कि वरहिया जैन समाज और उसकी नियामक संस्थाओं ने मुरैना विद्यालय को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लिया और उस पर दूसरों को हावी क्यों होने दिया, गलत है। बिना तथ्यों की जानकारी किए आरोप प्रत्यारोप उचित नहीं है।

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