वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
सोमवार, 19 जनवरी 2026
मृत्यु भोज निषेध
किसी व्यक्ति के निधन पर मृतक और शोक-संतप्त परिजनों के प्रति शोक व्यक्त करना,संवेदना प्रकट करना उचित और अपेक्षित लोकाचार है। लेकिन मृतक की आत्मशांति के नाम पर “मृत्यु भोज” की परंपरा का निर्वहन सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दृष्टि से कदापि उचित नहीं है।
मृत्यु भोज प्रायः समाजिक दबाव और दिखावे के कारण और परंपरा के नाम पर किया जाता है। लेकिन इससे शोकग्रस्त परिवार, जो पहले ही मानसिक पीड़ा में होता है, उस पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।कई गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार सक्षम न होने पर भी कर्ज लेकर भोज करने को मजबूर होते हैं, जो अनुचित है। मृत्यु भोज के दौरान मृतक के परिवार के सामाजिक स्टेटस के अनुसार सुस्वादु व्यंजनों का भोज आयोजित करना और अनेक तामझाम जोड़ना शोक की गरिमा को कम करता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर जीवन की असारता का चिंतन करना,मृतक का गुणानुवाद करना चाहिए न कि उत्सव जैसा वातावरण बनाना चाहिए।
धर्मशास्त्रों में भी मृत्यु के बाद,शौच ,संयम, साधना और आत्मशुद्धि पर बल दिया गया है, न कि भोज पर। इनके स्थान पर दान, ध्यान और तप को श्रेष्ठ माना गया है।
इसका एक नकारात्मक सामाजिक पहलू भी है। चूंकि आर्थिक दबाव के कारण मृत्यु भोज में सीमित संख्या में ही लोगों को बुलाया जाना संभव होता है इस कारण न बुलाए गए लोग खिन्न हो जाते हैं।जो आलोचना और मनमुटाव का कारण बनता है।
मृत्यु भोज में धन के साथ ही भोजन की भी बर्बादी होती है।जबकि उसी धन से गरीबों की सहायता, शिक्षा, चिकित्सा जैसे सेवा कार्य किए जा सकते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम लोग मृतात्मा की शांति के लिए वृक्षारोपण, रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर जैसे सामाजिक कार्य कर सकते हैं। क्योंकि मृत्यु भोज न तो अनिवार्य है और न नैतिक दृष्टि से ही उचित है।
इन दिनों मृत्यु भोज के स्थानापन्न के रूप में शांति विधान का प्रचलन बढ़ रहा है।विधान के समापन पर होने वाला अतिथि भोज भी प्रकारांतर से मृत्यभोज का ही अपर रूप है। क्योंकि भले ही वह शांति विधान की रसोई हो लेकिन उसकी टाइमिंग वही होती है। उठावनी के समय बहिरागत अतिथियों के लिए मेजबान परिवार द्वारा की जाने वाली भोजन- व्यवस्था में स्थानीय लोगों को भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए और यह एक स्थापित परंपरा होना चाहिए ताकि मेजबान को यह बात स्पष्ट रूप से विदित हो और उसके सामने कोई धर्मसंकट न हो। महासभा को इस बारे में क्रियात्मक और सार्थक पहल करनी चाहिए।साथ ही लोग स्वविवेक से भी यह संकल्प ले सकते हैं।
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उठावनी पर किसी भी तरह के भोज का सामाजिक प्रतिकार होना आवश्यक है क्योंकि यह कुप्रथा ही नहीं अपितु करुण प्रथा है।
जवाब देंहटाएंकाबू से परे अनार्थिक व खर्चीले मृत्यु भोज निश्चित ही कुप्रथा है पर हैसियत की सीमा मे
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