रविवार, 7 जून 2026

वरहिया समाज की वैवाहिक चुनौतियां


 समाज में (यहां समाज से वरहिया समाज अभिप्रेत है।) ऐसे बहुत सारे अभिभावक हैं जो बेटियां तो विजातीय(जैन)समाज में ब्याहने को आतुर हैं लेकिन बेटों की गृहस्थी बसाने के लिए बहुओं के लिए समाज का मुंह जोहते हैं। क्योंकि दूसरे समुदाय के लोग (प्रेम-प्रसंग के अपवादों को छोड़कर)आपको अपनी बेटियां देना पसंद नहीं करते।बेटियां आनुपातिक रूप से पहले ही कम हैं। विजातीय समुदायों में भी कमोबेश यही स्थिति है। और यह भी एक सच है कि सामान्यतः सभी लोग विधिक रिश्तों के लिए सजातीय समाज को ही वरीयता देते हैं लेकिन किसी कारणवश सजातीय समुदाय में वधू न मिलने पर ही अन्य समुदाय का रुख करते हैं। हमारी दरियादिली ये है कि हमें अपने समाज के युवा वर के रूप में जंचते ही नहीं हैं। दूसरे समुदाय के वर में हमें दर्जनों खूबियां नजर आती हैं। चूंकि उनके बारे में हम अनभिज्ञ रहते हैं और उनके बारे में हमें वे ही बातें पता चलती हैं, जो हमें इस मकसद से बताईं जाती हैं। वैसे भी अब कुलीनता और सामाजिक गौरव जैसी अवधारणाएं कोई मायने नहीं रखतीं। सबसे बड़ा फैक्टर अब पैसा है। तो बहरहाल समाज की लड़कियों के अन्य समाजों में ब्याहने के कारण पहले से ही लड़कियों की कमी से जूझ रही वरहिया समाज के सामने बड़ी दुविधा पूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार उन गांव या कस्बों में जहां वरहिया समाज निवासरत है, बड़ी संख्या में विवाहार्थी युवा विवाह की देहली सीमा पार कर चुके हैं। और उनके मां-बाप उनके गृहस्थी बसाने की उम्मीद संजोए बुढ़ाए जा रहे हैं। यदि यही सिलसिला बना रहा तो आने वाला वक्त इस लिहाज से बहुत मुश्किल वक्त होगा।मेरा इरादा किसी पर अंगुली उठाना या कठघरे में खड़ा करना नहीं है। सिर्फ स्थिति की गंभीरता और भयावहता की ओर इंगित करना भर मेरा मंतव्य है।जिसको लोग आज अनदेखा कर रहे हैं।हम आने वाली पीढ़ी के मामा का गोत्र एरियल में धुले कपड़े में नजर न आने वाले दाग़ की तरह ढूंढते ही रह जाएंगे।

1 टिप्पणी:

  1. राकेश जी,
    इस समस्या का कारण है हमारी समाज की बर्बर सोच। जब खुद से अपेक्षा हो तो वे ढेंका दिखाते हैं और जब समाज से अपेक्षा हो तो कोसना चालू कर देते हैं। जब लड़कियों का अनुपात ज्यादा था तब लड़के वालों के भाव इतने बढ़े थे कि लड़की वालों की दुर्दशा सबने देखी थी। अनेक वेमेल विवाह भी हमने देखे। आज जब लड़कों का अनुपात ज्यादा हुआ तो अब वही व्यवहार लड़की वाले करने लगे हैं। यह बर्बरता नही तो क्या है कि हमें अपनी मनमानी करना है समाज जाये भाड़ में। अब आप ही बतायें कि समाज इसमें क्या करे। उसकी अहमियत ही लोगों ने जब खत्म कर दी हो तब उसके पास उपाय क्या बचता है। समाज मर्यादाओं से चलती है और यह मर्यादा लोग बनाते हैं। जब लोग ही बर्बर हो जायें तब समाज का असहाय होना स्वाभाविक है और असहाय पर दोष डालना भी उचित नहीं लगता। एक संगठित, शक्तिसंपन्न व मर्यादित समाज ही अपने सदस्यों का हित संरक्षण करने में समर्थ होती है। यदि समाज से हम कुछ अपेक्षा करना चाहते हैं तो सबसे पहले उसे समर्थवान बनाना होगा? तभी हम उससे अपेक्षा करने के अधिकारी होंगे?

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