सोमवार, 20 जनवरी 2025

वरहिया हैं, वरहिया ही रहेंगे


 जो वर्ह से नि:सृत है,अभिप्राय जिसका श्रेष्ठ है।
कोई जहां न कनिष्ठ है एवं न कोई ज्येष्ठ है ।
जिनका रहा धर्माचरण के प्रति सदा अनुराग है।
दुर्व्यसन, पापाचार, हिंसा वृत्ति सबका त्याग है।
नलपुर की पावन क्रोड में,जिसका विमल शैशव खिला।
नि:सर्ग का आशीष जिसको बाल्यावस्था से मिला।
इक्ष्वाकुवंशी रक्त जिनकी धमनियों में बह रहा।
अभिमान रखना है सदा अक्षुण्ण,उनसे कह रहा।
जो मूल्य और आदर्श अपने पूर्वजों ने जिये हैं।
उपकार जो हम पर हमारे अग्रजों ने  किए हैं।
उनका रखेंगे मान,चाहे कष्ट जितने सहेंगे।
जिनका हृदय है श्रेष्ठ ऐसे वरहिया बन रहेंगे।
दोनों भुजाओं को उठा,उद्घोषकर यह कहेंगे।
हम वरहिया थे,वरहिया हैं,वरहिया ही रहेंगे।।




शनिवार, 18 जनवरी 2025

नरवरगढ़


 
किसी दुर्ग का इतिहास उससे सम्बन्धित देशवासियों की संस्कृति का इतिहास होता है।दुर्ग सामान्यतः किसी ऐसे ऊंचे स्थान,पहाड़ी आदि पर स्थित होते हैं जो भौगोलिक दृष्टि से समृद्ध और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुकूल हो। किसी दुर्ग की प्राकृतिक स्थिति उसे अजेय और सामरिक व राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।दुर्ग केवल प्रशानिक केंद्र या आश्रय स्थल नहीं हैं,इनकी क्रोड में विभिन्न राज्य सत्ताओं और सभ्यताओं के उत्थान पतन का इतिहास छिपा होता है। जिनमें मानव जाति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा,क्रंदन, रक्तपात और उल्लास अभिव्यंजित होता है।दुर्ग के स्थापत्य और वास्तु से समय विशेष की भवन निर्माण कला का निदर्शन होता है। 

मध्यप्रदेश के महत्वपूर्ण दुर्गों में नरवरगढ़ का दुर्ग सामरिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से विशिष्ट और उल्लेखनीय है।यह शिवपुरी जिले के नरवर नगर में स्थित है। यह विंध्य पर्वतमाला की एक पहाड़ी पर 500 फुट की ऊँचाई पर खड़ा है और 8 वर्ग किमी के क्षेत्रफल पर फैला है। नरवर के दुर्ग का इतिहास राजा नल और दमयंती के अमर प्रेम का साक्षी और केंद्र बिंदु रहा है।इस दुर्ग के दूल्हा द्वार के पास  कंगूरों की एक पंक्ति झुकी हुई है।राजा नल को उनके सौतेले भाई पुष्कर ने धोखे से जुएं में हरा दिया था(जिसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में आया है) और वह इतने सत्यनिष्ठ और बात के धनी थे कि वचनबद्ध होने के कारण अपना सब कुछ छोड़ कर जंगल की ओर पत्नी को लेकर चल पड़े थे। वो जब महल से निकले तो उनके सम्मान में महल के सारे कंगूरे श्रद्धा से झुक गए थे और तभी से उसी दिशा में झुके हुए हैं। कुलदेवी पसर देवी उनका रास्ता रोककर लेट गईं थीं।इस जनविश्वास में यह ध्वनित होता है कि राजा नल का इस निर्जीव दुर्ग के साथ भी कितना जीवंत रिश्ता और लगाव था।इस बात से प्रजा जनों के प्रति उनके दयालुतापूर्ण बर्ताव का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

इस दुर्ग के विषय में कई आख्यान और किंवदंतियां प्रचलित हैं।
तेजकरन (जिन्हें दूल्हा भी कहते हैं और जो राजा नल के वंशज हैं)के सम्बन्ध में दो किंवदन्तियां है - पहली यह कि प्रेमाहत दूल्हा जिस उत्तर-पश्चिमी दरवाजे से भागे थे उस दरवाजे का नाम दूल्हा दरवाजा पड़ गया। दूसरी किंवदंती यह है कि एक बार राजा दूल्हा(राजस्थान के लोकाख्यान ढोला-मारू के प्रसिद्ध नायक ढोला)और उसकी रानी मारु, मकरध्वज कुण्ड के बीच में चबूतरे पर बैठे थे। आनन्द-विभोर राजा रानी किसी तरह जल में डूब गए। इस घटना के पश्चात प्रत्येक श्रावण की पूर्णिमा को चबूतरा पर से हाथ उठता दिखाई देता था।एक बार एक सैनिक ने हाथ पर बाण चलाया, तब से हाथ दिखाई नहीं देता।एक और किंवदन्ती हैं जिसका वर्णन कनिंघम साहब इस प्रकार करते हैं कई शताब्दियों पूर्व दुर्ग शत्रुओं द्वारा घेर लिया गया। इस दुर्ग के निकट एक दूसरी पहाड़ी थी। इन दोनों पहाड़ों के बीच में एक रस्सी बंधी थी। राजा दुर्ग के सामनेवाली पहाड़ी पर अपने मित्रों के पास एक पत्र भेजना चाहते थे। यद्यपि राजा ने इस रस्सी पर से पत्र ले जाने वाले को अपना आधा राज्य देने की घोषणा की किन्तु किसी ने साहस न किया । अन्त में एक नटनी पत्र ले जाने को तैयार हुई और सबके समक्ष राजा को आधा राज्य देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध कर लिया।नटनी बड़ी कुशलता से रस्सी पर चलकर पत्र ले गई। जब वह पत्र देकर लौट रही थी एक सरदार ने राजा को मंत्रणा दी कि आधा राज्य बचाने का अवसर है। राजा ने रस्सी कटवा दी। फलस्वरूप नटनी गिरकर मर गई। उस समय से नटों ने कभी नरवर में प्रवेश नहीं किया।वे नरवर का रास्ता छोड़कर दूसरे रास्ते से निकल जाते हैं। कनिंघम द्वारा वर्णित नटनी की इस कहानी का एक दूसरा संस्करण भी प्रचलित है जिसके अनुसार लोहड़ी देवी जो एक तांत्रिक नटिनी थी। वह ग्वालियर की रहने वाली थी। नरवरगढ़ जब अपने वैभव के शिखर पर था,उस वक्त लोहड़ी नटिनी नरवर दुर्ग में पहुंची। उन्होंने कछवाह राजा से कच्चे धागे पर चलने का कलात्मक प्रदर्शन  देखने का आग्रह किया। राजा से लोहड़ी नटिनी ने कच्चे सूत पर चलकर दिखाने की बात कही। उसके एवज में महाराजा से पुरस्कार मांगा। महाराजा ने कहा कि यदि ऐसा हुआ, तो नरवर का राज्य दे दूंगा। कच्चे धागे पर चलने से पहले नटिनी ने राजा के सभी हथियारों को अभिमंत्रित कर दिया। उसके बाद उसने कच्चे धागे पर चलना शुरू किया। राज्य चला जाने की दुश्चिंता से आशंकित मंत्री ने एक चर्मकार से रांपी मंगवाकर रख ली थी। जैसे ही नटिनी बुर्ज के पास आने को थी। मंत्री ने रांपी से धागा काट दिया।जिस कारण नीचे गिरने से नटनी की मौत हो गई। उसी स्थल पर लोहड़ी देवी का मंदिर है। नरवर दुर्ग के‌ दक्षिणी दरवाजे के पास पहाड़ की तलहटी में एक छोटे-से चबूतरे पर यह मढ़िया बनी हुई है।इस मंदिर में मूर्ति नहीं है, केवल होम धूप की पूजा की जाती है। तभी से यह उक्ति लोक में प्रचलित है कि ‘नरवर चढ़े ने बेड़नी, ऐरच पकै न ईंट-गुदनौटा भोजन नहीं, बूंदी छपै न छींट’।
 

नरवर का इतिहास ग्वालियर दुर्ग से सदैव सम्बन्धित रहा। विक्रमी दसवीं शताब्दी के अन्त में ये दोनों दुर्ग कछवाहा राजपूतों के अधिकार में चले गए थे। 1186 वि. में इस पर प्रतिहारों का अधिकार हो गया। एक शताब्दी शासन करने के पश्चात जब सुलतान अल्तमश ने ग्वालियर को जीत लिया तो प्रतिहारों ने नरवर के दुर्ग में आकर शरण ली। विक्रम की 13वीं शताब्दी के अन्त में चाहुड़देव ने यह दुर्ग प्रतिहारों से छीन लिया। नरवर और उसके आसपास चाहुड़ वंश के सिक्के और शिलालेख मिले हैं। बाद में नरवर का यह दुर्ग ग्वालियर के तोमरों के अधीन आ गया।
जयस्तंभ नाम के एक पत्थर के खंबे पर तोमरों की वंशावली खुदी है ।यह खंबा नरवर दुर्ग से एक मील पूर्व की ओर है।
1563 वि. संवत् में सिकन्दर लोदी ने दुर्ग पर विजय प्राप्त की।सिकन्दर लोदी ने दुर्ग में कई मन्दिरों को तोड़ा और मस्जिदें बनवाईं। बाद में सिकन्दर लोदी ने यह दुर्ग राजसिंह कछवाहा को दे दिया जो प्राचीन स्वत्वाधिकारी थे।
विक्रम की 16वीं शताब्दी के मध्य में दुर्ग पर जयसिंह का शासन था। दुर्ग पर लोहे की 'शत्रु संहार' और 'फतेहजंग' नाम की दो तोपें पड़ी हैं, उनपर लेख खुदे हैं जिनमें राजा जयसिंह के नाम का उल्लेख है और 1753 वि.संवत अंकित है।
कछवाहा वंश के अन्तिम राजा मनोहरसिंह से महाराजा शिन्दे ने विक्रम की 19वीं शताब्दी के मध्य में नरवर को जीत लिया।
महाराजा दौलतराव शिन्दे के समय में अम्बाजी इंगले इस दुर्ग के प्रशासक थे। जिन्होंने विक्रमी संवत् 1857 में इस दुर्ग का जीर्णोद्धार किया।एक विशाल भवन अब भी इंगले की हवेली कहलाती हैं ।यह दुर्ग विंध्याचल की एक ढालू पर्वत श्रेणी पर समुद्रतल से 1000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। सिंधु नदी के मोड़ पर स्थित होने के कारण दुर्ग के पश्चिम और उत्तर की ओर नदी हैं। दुर्ग का घेरा लगभग 5 मील का है। विस्तार की दृष्टि से ग्वालियर राज्य में यह सबसे बड़ा दुर्ग है।दुर्ग की पत्थर की प्राचीर और अन्य दीवालों पर अनेक गढ़गजे हैं । विभाजक दीवालें दुर्ग को चार सुदृढ़ घेरों में विभाजित करती हैं। मध्य के घेरे को 'मझ लोक' कहते हैं । यह भाग खंडहर हो चुका है। पहाड़ी के पश्चिम भाग का घेरा दूल्हा अहाता' कहलाता है ।इसी भाग में दूल्हा दरवाजा स्थित है। जिसमें से अन्तिम कछवाहा राजा निकलकर भागा था।दुर्ग का दक्षिणी अहाता "मदार' अहाता कहलाता है, क्योंकि इस भाग में मदारशाह की मजार हैं। दुर्ग का धुर-दक्षिणी भाग 'गूजर' अहाता कहलाता है क्योंकि यहाँ पर गूजर रहते थे।नगर भी पत्थर की प्राचीर से घिरा है।  
 दूल्हा दरवाजा केवल बड़े बड़े पत्थर के ढोकों का बना है। इसमें चूना का प्रयोग नहीं किया गया । द्वार के पत्थरों पर सुन्दर शिल्पकारी है।पिसनहारी दरवाजा, जिसे आलमगीरी दरवाजा भी कहते हैं, सिरे पर बहुत ढालू है इसलिए उसमें सीढ़ियाँ लगा दी गई हैं। एक दरवाजा वीरनपौर अथवा सैयदों का दरवाजा कहलाता है क्योंकि इसके पास सैयद की दरगाह है। तीसरा द्वार गणेशपौर कहलाता है।सबसे ऊपर का द्वार हवापौर कहलाता है।मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व नरवर का दुर्ग भव्य मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध था किन्तु सिकन्दर लोदी ने विक्रम की 15वीं शताब्दी के अन्त में सब हिन्दू और जैन मन्दिरों को तुड़वा दिया। आजकल दुर्ग पर प्राचीन मंदिरों  के कोई भी चिन्ह नहीं पाए जाते, यत्रतत्र खंडित मूर्तियों के टुकड़े मिलते हैं और हवापौर के निकट एक मन्दिर के कुछ अवशेष मिलते हैं। अन्य तीन मन्दिर बहुत पीछे के बने हैं, संभवत: कछवाहा राजपूत राजाओं ने बनवाए हैं।दीर्घ काल तक दुर्ग मुसलमानों के प्रभाव में रहा इसलिए दुर्ग पर अनेक मस्जिदें और दरगाहें हैं। सबसे प्राचीन मस्जिद सिकन्दर लोदी की बनबाई हुई है जो बड़ी मस्जिद कहलाती है । मस्जिद का आंगन बड़ा है। पश्चिम की ओर प्रार्थना भवन है, तीन ओर दालानें हैं। छत पर कोई गुम्बद नहीं है।मस्जिद पर दो लेख खुदे हैं, एक अरबी में है और दूसरा फारसी में। फारसी में लिखा हैं कि मस्जिद सिकन्दर लोदी ने हिजरी संवत 912 (1506) में बनाई। दूसरी मस्जिद हवापौर के पास है। इसमें भी तीन लेख खुदे हैं ।पहाड़ी के पूर्वी किनारे पर प्रसिद मुसलमान फकीर मदारशाह की दरगाह हैं।दुर्ग कछवाहे राजाओं के बनवाए हुए महलों के खंडहरों से भरा पड़ा है । यह महल मझलोक के पूर्वी भाग में हैं। यहां से सिंध नदी की घाटी का दृश्य दिखाई देता है । राजा के महल में अनेक आंगन हैं। प्रत्येक आंगन में एक सभा भवन, सिंहासन-गृह, दालान, स्नानागार, अन्तःपुर, आनन्दवाटिका और झूला है। महल काँच और चूने की सजावट से सजे थे और दीवालों पर सुन्दर चित्रकारी थी। यद्यपि महल टूटी फूटी अवस्था में है तथापि राजप्रासादों के अवशेषों से पता चलता है कि राजपूत राजाओं का जीवन आनन्दमय और वैभव पूर्ण था। इन सब महलों में बड़े महल को महाराजा माधौराव शिन्दे ने ठीक कराया था । यह कचहरी-महल कहलाता है। इसके एक भवन में लकड़ी के मंच पर चटाई बिछी रहती थी । लोगों का विश्वास था कि यह राजा नल की गद्दी है। इस भवन के ताकों और द्वारों पर काँच के टुकड़ों के बेल-बूटे हैं। शीशमहल में भी इस प्रकार के बेल-बूटे हैं।
लदाऊ बंगला के चारों ओर ढलवां छते हैं। इसी के पास एक घर में बैलों से चलने वाली एक बड़ी चक्की है ।लदाऊ बंगला के पास ही द्वीपमहल है, इसमें एक पत्थर के ढोके में कटा हुआ सुन्दर बड़ा नहाने का हौज है। हौज की बनाबट अंडाकार पुष्प की भांति है जिसमें छह कलियां हैं।राज-महलों के अहाते के बाहर, बहुत से सुदृढ़ और कई खण्डों वाले भवन हैं।जिनमें राज्य के पदाधिकारी तथा अन्य आश्रित जन रहते थे।
दुर्ग में अनेक छोटे बड़े ताल हैं। उनमें प्रमुख मकरध्वजताल, कटोराताल, छत्रताल, चन्दनताल, सागरताल,गौमुख-कुंड और बिशन-तलैया हैं।मकरध्वज-ताल सबसे बड़ा है । जनश्रुति के अनुसार इसे राजा मकरध्वज ने बनवाया था । यह 30 फीट गहरा है और इसका क्षेत्रफल 300 वर्गफीट है। यह मध्यकालीन हिन्दू शैली के अनुसार बनाया गया है। इसके पश्चिमी किनारे पर एक भवन है।उसमें एक पत्थर लगा है जिसमें एक बहती हुई नदी दिखाई गई है जिसके दोनों ओर देवी-देवताओं के चित्र हैं। साधारणत: लोग इन्हें पनिहारे कहते हैं। तालाबों के अतिरिक्त दुर्ग पर अनेक कुआं और बावड़ी भी हैं। 

नरवर किले की तलहटी में अतिशयकारी उरवाहा जैन मंदिर स्थित है। पुरातन समय में नरवर में काफी संख्या में जैन मतावलंबी रहते थे जो अत्यंत धार्मिक और परंपरानिष्ठ थे। बताते हैं कि नरवर में अधिकांश जैन परिवारों के घरों में चैत्यालय स्थापित थे। नरवर के वरहिया जैन मंदिर में 140 के आसपास जो मूर्तियां हैं, वे उन्हीं चैत्यालयों से लाकर विराजमान की गई हैं।यह वरहिया जैन मंदिर स्थानीय चौधरी गोत्रीय वरहिया जैन जाति के श्रेष्ठी मानसिंह के वंशजों ने बनवाया था।इन प्रमाणों से यहां के लोगों की अध्यात्मिक जागृति ,धर्म के प्रति रुचि और अटूट श्रद्धा  का पता चलता है।

   

 






बुधवार, 15 जनवरी 2025

विमर्श 3(पंडित/विद्वान)


 

लोक व्यवहार में पंडित विशेषण सामान्यतः ब्राह्मणों के लिए प्रयोग होता है।पंडित का शाब्दिक अर्थ है -ज्ञानी या पांडित्यशाली। जैन समाज में पंडित से आशय कर्मकांड की विधा में प्रवीण व्यक्ति से होता है।पूजा और अनुष्ठान कराने में कुशल व्यक्ति को पंडित कहा जाता है। शास्त्रों का पारायण कर उनकी व्याख्या करने वाले भी पंडित जी कहलाते हैं। जबकि इसके समांतर विद्वान शब्द से आशय  विद्यावान से होता है। विद्वान व्यक्ति जिज्ञासु,उद्भावनाशील,तर्कप्रवण और ज्ञान की शाखा-विशेष का ज्ञाता होता है।इस दृष्टि से यद्यपि पंडित और विद्वान दोनों का क्षेत्र अलग है फिर भी एक ही व्यक्ति पंडित और विद्वान दोनों हो सकता है। लेकिन विडंबनापूर्ण स्थिति तब हो जाती है जब वे एक-दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण की अनधिकार चेष्टा करते हैं और जब कर्मकांडी पंडित हर क्षेत्र में टांग अड़ाना और लालबुझ्झकड़ी देना शुरू कर देते हैं तो बात बनने के बजाय बिगड़ जाती है।इन दिनों समाज में विद्वान कम और पंडित ज्यादा हैं क्योंकि कर्मकांड के क्षेत्र में जहां एक ओर ज्यादा अर्थ लाभ है वहीं समाज में मिलने वाला बहुमान एक अतिरिक्त आकर्षण है।जिस पंडित के पास फचफची सरस्वती होती है उसे लोक में ज्यादा प्रमुखता प्राप्त होती है लेकिन विद्वान के लिए यह कोई पूर्वशर्त नहीं है।

चौरासी जैन जातियां


 चौरासी जाति

अथ मनरंग कीर्ति चौरासी जाति की जयमाल लिख्यते।।

दोहा।।

श्री नेमीस्वर चरनजुग।। तारन तरन जहाज।।

नमो मदन मारन मेले।। मदन मत्त मृगराज।।1।।

श्री सिवदेवी नंद को। जूना गढ़ गिरनारि।।

भयो महोत्सव शुभ तहा।। सुनिये सब नरनारि।।2।।

जाति चौरासी जैन मत, देस – देस के आन।।

चारि छोहनी भीर सब।। इकठी भई महान।।3।।

माल भई जिन चंद जी।। नित कर इंद्र बनाय।।

लेवे को भविजन सकल।। उमगे चित हरषाय।।4।।

जौन जौन सुभ देस के।। आये भवि उमगाय।।

तौन तौन के नाम सुभ।। कछु कहिये चित लाय।।5।।

।।छंद पद्धड़ी।।

कौसल कासी सुभ देस जान। कास्मीर और कौंरूबषान।।

तैलंग्ग अंग अरू वंग देस। करनाट लाट अरू घोटवेस।।6।।

वागड वन्वर पुनि और किंलग। मालवा मध्य चित्तौड चंग।।

गुजरात सकल सुभ सिंधु चोल। निज निज भेषन को धरि अमोल।।7।।

सोरठ द्रावड मह चीन चीन। बंगाला मागध जो प्रवीन।।

अंभोज पोद्र केरल मनाय। सुभ देस मलै गिरि सकल आय।।8।।

सौ वीर अवंतिक पुनि उनाट। वीजापुर अरू सुंदर विराट।।

मरहट मेवातरू माड़वार। पंचाल देस अरू सिग ठुँठार।।9।।

कालिंजर गगहर कक्ष देस। वीसाल मनोहर गौड वेस।।

कुरूजंगल तिरऊत है विनोद। सौरम्य तिलोरक कहयौ मोद।।10।।

सुभ कालकीट सोहै किरात। अरू पुंड मल्ल त्रिकिंलग जात।।

वैदुर्भ सुकुरू अरू सुभ्य देस। पुनि चेदी उद सोमधृ देस।।11।।

सुभ कामरूप अरू अघ्न होय। प्रातर दुसार्न पुन्नाट सोय।।

पाडता उसीर सुभ है कसे। उद्दू विद्रुम अरू अघ चेर।।12।।

सोहै अरद्र पुनि विड वषान। पुह कलावती कारूक सुजान।।

हीरन्य और सुभ कूल संग। सौरम्य जोध आये सुचंग।।13।।

अम्मेर मंगलावति सुजोय। पुनि पांडु और पांडल मनोय।।

जोडाहल कहिये सूरमंद। कुल कम्म अंदु जानौ अमंद।।14।।

काँर्च सौभद्र रूवल्स जान। गंभीर भोट कुंकुन बषान।।

इत्यादि देस औरऊ अनेक। सब इकटे में धरि हिय विवेक।।15।।

—दोहा—

तहा इंद्र सचि आइके। माला रची सुभाय।

कछु ताको वरनन करौ। जा सुनि चित हरषाय।।16।।

—भुजंगम प्रयात छंद—

महा गंधकारी महा रूपधारी। लगे पुष्प नाना संभारी संभारी।।

चमेली सुचंपा घेनेरे घेनेरे। सुवंधूक जाही जुही के भले रे।।17।।

गुलाला गुलाबी सदा सो गुलाबा। भले दावदी गुंजते भौरसावा।।

गुथी कल्प साषी तने पुष्पलाई। लगाये महा कंज बेला चुनाई।।18।।

महा नाग मुक्ता लगे जासु माही। चुनी सो चुनी चारू सोभा लषाही।।

कही पीत आभा कही स्याँमताई। कही रक मानिक्य सोभा धिकाई।।19।।

कहीं स्वेत माला विराजै विसाला। लगे वङ्का के षंड की सोभ आला।।

कही लागि पन्ना महा काँति कारी। चऊवोर जाने निजाभा विभारी।।20।।

वनी माल अैसी कहाँ सोभ जाकी। बनाई भई वैस वज्जी तियाकी।।

धरी नाभ आगे महा सोभ पाई। चढ़ाई रची नाथ को आप लाई।।21।।

तहा राजरने अनेकान आये। भले सेठि साहू विना गंतु धाये।।

षडे देवदेवी चहूँ वोर घेरे। करै सव्द जै जै महा भक्ति पेरे।।22।।

षगी और षगेसा महाँ तेजधारे। चरै चारि हूँ धा जिनाज्ञा विथारे।।

वहा जाति चौरासि यौ जैन केरी। भँई आइ भेला सुमेला घनेरी।।23।।

वजामै वहा दुंदुभी देव तारी। नगारें वजै सर्व आनंदकारी।।

वजै ताल मिरदंग नाना नवीन। वजै वंस कणसाल कानू नवीना।।24।।

नटै नाटकी नाटिनी नाटनी के। कटै पाप संताप सारे तिन्ही के।।

महा भामिनी को किलारा व गामै। चलै भाँति सो भाव अछे बतामै।।25।।

सजै नृत्य संगीत संगीत गामै। वड भावसों देव ताली वजामै।।

भेल पाद विन्यास की रति ल्यामै। मिलै ताल सौं छुद्र घंटी वजामै।।26।।

—दोहा—

अैसो उत्सव जह भयौ। कहत न पावत पार।।

अब चौरासी जाति के। नाम कहौ निरधार।।27।।

—नाराच छंद—

षडायना सुगोड गंगरानिया वषानिया। अचीतवाल कोरवाल दूसरे सुवानिया।।

षडेलवाल वोसवाल श्री श्रिमाल जानिया। वघेलवाल अग्रवाल जैसवाल मानिया।।28।।

लंवेचूवाल श्रीयमाल धाकडा जुरे घने। सहेलवाल ऊँवडे संडेरिया गने गने।।

माढवा लवायडी कपोल जाति के भने। दसौरवाल पल्लिवाल गोल लार के घने।।29।।

नरायना सुनागरीय काँथडा चितोडिया। भटेर गोल पूर्व और भट्ट नागरे भिया।।

घनोरवाल रैकवाल झारिड़ी सवालिया। चतुर्थ और पंचमा सुजाय ला कराहिया।।30।।

सुलाडवाल सूरिवाल जंवुसार धाइया। श्रीयगौड जाति के अनेक लोग आइया।।

कहे सुनार सिंघ पोर सेरिहीय है घने। गुरू सुवाल जेहरान डेडुवाल सोहने।।31।।

—अडिल छंद—

षडवड गोल संगारे मेठ तवालही। टठतवाल पुरवाल वरहिया है सही।।

मगलवाल अरू पुकरवाल हर सौरिया। वध नो राज लहराक है अन दौरिया।।32।।

हर दौरा श्रीमाली नाना वाल जू। माडाहाडा सेरहिया अकनाल जू।।

करनसिया मझ करा कहे कोलापुरी। साचौरा गृह पत्तीना गद्रह कीकुरी।।33।।

सकल जाँगरा पोरवार कर वारजे। सोरठिया पुरवार कठन है लारजे।।

भले अयोध्या पूरब आनंद सो चले। पद्मावति पुरवार पवयडा हे भले।।34।।

वासक माको मठी अटस परवार है। कहे दसेरा पोरवार हितकार है।।

औ माली पुरवार सकल ये जानिया। निज निज भाषा बोलत आनंद मानिया।।35।।

चार्चा संग्रह ग्रंथ महा अभिराम है। ता मधि जिनमत जाति चौरासी नाम है।।

ताहि देषि हम इहा लिषी सुनियौ सही। भूल जहा कछु होय तहा सोधौ कही।।36।।

—सोरठा—

अैसे सब ही जात—भेला है मेला भयौ।

निज निज मन हरषात।। उमगे माला लेन को।।37।।

—दोहा—

और अनेकन भूपसों।। मागै माल वढाय।

ताको वरनन करते हौ।।सुनऊ भब्य मनलाय।।38।।

—नाराच छंद—

नवाय माथ जोरि हाथ नाभ माल दीजियै। मगाय देव हेमराशि सो भंडार कीजिए।।

सहस वीर जांगरा दिनार भावसाँ। हजार दै चलीस गौड माँग ही छचावसों।।39।।

षडेलवाल यौं कहै असी हजार लीजियै। दिनार सेक जाति की दया दयाल कीजियै।।

षडायना सुलछदेत है वडी उमंग सौ। द्विलछ देय श्रीयमाल माल को अभंग सौ।।40।।

सुचारि लछ श्री श्रिमाल आठ लछ दूसरे। वघेलवाल आठ दून देत दावसौ भरे।।

बत्तीस लाष जैसवार तास दून धाकडा। नारया सु अस्सि लाष ऐक कोटि काथडा।।41।।

दिनार देय देय हाथ जोडि जोडि माग ही। गुनानुवाद गाय गाय सीस को नवाय ही।।

अचीतव दोय कोटि लछ देत वानिया। करोरि चार कोरवाल आठ गंगरानिया।।42।।

सुवोसवाल मोतिया अमोल देत है घने। अनेक रत्न अग्रवाल देत है बिना गने।।

अमोल लाल मालकाज श्रीयमाल देत है। लुटाय के जिनेन्द्र पै सुफूल माल लेत है।।43।।

सडैसि सुपल्लिवाल दूमडे षेड जहाँ। कहै अनेक कोठरी षजाने लीजियै महाँ।।

कपूर जाफरान की सुगाडिया भराय के। सहेलवाल औलवेचू देत आय आय के।।44।।

वनाय रत्न सो जडी लगाम जीन पाषरे। अमोल येक जाति के अनेक सोभ को धरे।।

नरायना चितोडिया सनागरी मगाय के। बिना गने तुरंग देत सीस को नवाय के।।।।45।।

भट्टेरगौल पूर्व और गौल लार के घने। गयद साजि साजि वेस भेस सो सुहावने।।

महा उतंग स्याम जेम नील भू धरा लसै। मगाय देत माल हेत इंद्र नाग को हसौ।।46।।

चतुर्थ और पंचमा अनेक दसे देवही। लुटाय माल मालकाज श्री जिनेन्द्र से वही।।

घनोरवाल यौ कहै हमै न माल देऊगे। भराय घौ जहाज मै कितेक दाम लेऊगे।।47।।

इत्यादि वानिया समस्त आप आपु को सवै। सो येक येकू सो अधिक देत दाम है जवै।।

पवित्र पाप नाशनी जिनेन्द्र माल लेन को। उछाह सो षडे जहां महान द्रव्य मो।।48।।

अनेक सूम यौ कहै भले सुलछ देत है। टाय दाँम आपने सुफूल माल लेत है।।

कठोर व्रूर चेत्त के महात्म देषित जैन को। चले सुवाग मोडि मोडि होस नाहि वैन को।।49।।

अनेक देषि भूपती बड़ा अचंभ मान ही।। महाप्रताप जैन धर्म को हियै पछाँन ही।

कहै पुकारि यौ छित्तीस नाथ चाल दीजियै। जितेक राज लक्ष्मी सवै हमारि लीजियै।।50।।

—सोरठा— गुरू बोले सुनि बात। वैसे माला ना मिलें।।

महाश पुन्य अवदात।होय जास को पाव ही।।51।।

—त्रोटक छंद—

जिन भौम वनावहि भावधरे। प्रतिबीब शिरावहि जो सुथरे।।

इकठी चवरासिऊँ जाति करै। िषयाजन की सब पीर हरै।।52।।

जिन जज्ञ रचै छल छिद्र बिना। कछु मान वडाइन करै अपिना।।

सब संघ चलाय वनै संघ ही। परभावन अंग करै व ही।।53।।

प्रिय वैन कहै सवसाँ हित के। नहि पालहि झूठ भले चित के।।

इत के वित के नहि वैन सुनै। मन मै जिनराज सरूप गुनै।।54।।

लक्ष्मी वऊ धर्म विषै षरचै। न करै कवहूँ मिथ्या परचै।।

अरचै पद पंकज नेमतने। चरचै गुरजो निग्रंथ भने।।।55।।

वह सास्त्र सुनै जिएमो सुदया। उपजै विनसै ससरी अदया।।

यहि भाँति अनेकन पुन्य मिया। करि पावहि माल अमोल जिया।।56।।

सबको यहि भांति संबोध कियौ। तब ही सिंघराय बुलाय लियौ।।

अति आनंद पूरित माल दई। नृप सिंघ तवे हरषाय भई लियौ।।57।।

नर जो जिन माल अमोल लहै गनियो। नर जन्म सुफल वहै।।

प्रगटै जस लोक विषै जिहि को। अति पुन्य भंडार भरै तिहि को।।58।।

जिहि की लक्ष्मी न घटै कबहूँ। दिन दून बढै परचै जवऊँ।।

यह लोक प्रसिद्ध कहै सगरे। जित धर्म तितै लक्ष्मी वमरै।।59।।

बिन धर्म रमा वुध यौ उचरै। विधवा त्तिय ज्यौं नहि सोभ धरै।।

मनरंग सदा चितमें धरियै। जिनधर्म दयामय विस्तरियै।।60।।

तरियै करि सो निज आतम को। हरियै सु अज्ञान महातम को।।

परिये न भवोदधि मै फिरिकै। करियै यह काज महा थिर कै।।61।।

—दोहा—

यह चौरासी जाति की। माल कही हम वेस।।

पढत सुनत संकट मिटै। जै जै नेमि जिनेस।।62।।

जेठ महीना सुकुल पष। तिथि पंचमि गुरुवार।।

ता दिन संपूरन भई। जैमाला हितकार।।63।।

येक सहस नै सतक मै। षटवरषै करि दूरि।।

संवत सो जानौ सुधी सदा रहौ सुष पूरि।।64।।

—छप्पै—

धन कन वढै अनेक वढै कीरति दिन दूनी

दिन दिन सुष सरसाय कुमति छिन छिन मै ऊनी

अनगन गुनगन गहै लहै पगपग पटुताई।

कलमल दर कल्यान होय ता घर मै आई। पुत्र पौत्र परताप सौ।

संपूरन निव से जिया। मँनरंग लाल जा ऊदै मौ। वसत नेमि राजुलि पिया।।65।।

—सवैया—

श्रावक धरमपाल मुसाहेव गंज साल विंदा लाल के सुपुत्र रतन वषान ही अन्नजल के त्रसाय रहौ सु नगर आय अग्रवाल दंस गग्र्ग गोत सुवषान ही। भादौ जी की पूजा पाठक कथा रासा है विसाल हरष सहित लिष्यौ अति सुषदान ही। विक्रम सुदित्य सार संवत सुनौरसरल मास तिथि दिन ताको करौ सु वषान ही।

—छप्पै छंद—

येक ऊनसन बीस तास पर षोडस जानो।

पोह सुकुल तिथि और जान पूनम सुवषानो येतवार दिन सार राति के पूरन कीनो।

पढै गुनै जो कोई ताहि आतम सुष भइनं गुलजारी के पठन को लिषी सु मन वच काइ के। भूल चूक सब सोंधियौ।


सोमवार, 13 जनवरी 2025

शातियाल की शैलकृतियां


 पाक अधिकृत कश्मीर में हिमालय और हिंदुकुश पर्वतमाला के मध्य शातियाल और रायकोट क्षेत्र सिंधु नदी के दक्षिणी तट पर, पूर्व में दारेल घाटी और पश्चिम में तांगिर घाटी के बीच स्थित है। यह स्थल यात्रियों, व्यापार कारवां और रेशम मार्ग पर तीर्थयात्रियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण स्थल था। इस यात्रा मार्ग का उपयोग करने वाले विभिन्न संस्कृतियों के लोगों ने यहां अपनी उपस्थिति के जो निशान छोड़े हैं, उन्हें आज भी इस क्षेत्र के शैल उत्कीर्णन, संस्कृति, ज्ञान और सामाजिक प्रथाओं में देखा जा सकता है। यह स्थान हजारों वर्षों से मानवता के लिए एक सांस्कृतिक संगम रहा है जो अपने प्राचीन इतिहास और धार्मिक मान्यताओं के लिए अद्वितीय है। इस क्षेत्र में मिलने वाली चट्टानों पर उकेरी गईं मूर्तियां और  शिलालेख न केवल प्रागैतिहासिक मानव सभ्यता के प्रमाण हैं, बल्कि इनमें श्रमण धर्म के विकास और प्रभाव के भी संकेत मिलते हैं। यहां मिली मूर्तियों और चित्रों में श्रमण धर्म के विभिन्न पहलुओं, जीवन गाथाओं, ध्यान, और तपस्या का चित्रण किया गया है।जो इस क्षेत्र में श्रमण धर्म के उपदेशों जैसे अहिंसा, सत्य, और अपरिग्रह के पालन का प्रमाण प्रस्तुत करता है।1980 में, एक जर्मन मानवविज्ञानी प्रोफेसर कार्ल जेटमार और पाकिस्तान के प्रसिद्ध पुरातत्वविद्, प्रोफेसर अहमद हसन दानी ने इस क्षेत्र में प्राचीन शैलकृतियों की महान संपदा की व्यवस्थित रूप से जांच करने और इसे दुनिया के सामने पेश करने के लिए उत्तरी क्षेत्रों में पाक-जर्मन पुरातत्व मिशन की शुरुआत की थी।कराकोरम मार्ग पर शातियाल और रायकोट क्षेत्र में लगभग 100 किलोमीटर तक फैले विस्तार में प्राचीन शैल चित्रों की एक विशाल खुली और विस्तृत गैलरी है। जिसमें 50,000 से अधिक शैल उत्कीर्णन और 5,000 शिलालेख हैं, जो 9 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 16 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक के हैं, जिस में से कुछ लगभग 2,900 साल पुराने हैं। नक्काशी में जानवर, त्रिकोणीय मानव आकृतियाँ , मन्नत स्तूप और तपस्या में लीन यतियों के चित्र दिखाई देते हैं। जिन्हें कुछ लोग बोधिसत्व तो कुछ अन्य जैन तीर्थंकर के उत्कीर्णन मानते हैं।सबसे पुरानी नक्काशी में पत्थर के औजारों से नक्काशी किए जाने के संकेत मिलते हैं। जबकि बाद की बौद्ध छवियों को तेज धातु के औजारों का उपयोग करके जोड़ा गया था,जो इस क्षेत्र में औजारों और प्रौद्योगिकी के विकास का एक स्पष्ट संकेतक है। यहां मिलने वाली प्राचीन लिपियों में खरोष्ठी, ब्राह्मी, सोग्डियन, चीनी, तिब्बती, प्रोटो-शारदा और यहां तक कि प्राचीन हिब्रू भी शामिल हैं। अधिकांश लेखन ब्राह्मी लिपि में हैं। ये शिलालेख अतीत की संस्कृति, यहां रहने वाले समुदायों और क्षेत्र के आगंतुकों की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को समझने में एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ शिलालेखों में शासकों की तिथियों और नामों का उल्लेख है, जिससे विद्वानों को इस क्षेत्र के इतिहास के कालक्रम को समझने की गहरी अंतर्दृष्टि मिलती है।चट्टानों पर की गई नक्काशी में मानव विकास का एक संपूर्ण शानदार अध्याय छिपा है।


वरहिया पाठ विमर्श


 मूल पाठ वरहिया अथवा वरैया है,यह मुद्दा इन दिनों सुर्खियों में छाया है। वरैया पाठ को बनाए रखने के आग्रह का आधार पंडितवर्य गोपालदास जी वरैया द्वारा अपने नाम के साथ किया वरैया उपनाम का व्यवहार है। पंडित गोपालदास जी वरैया निर्विवाद रूप से अपने समय के एक प्रकांड विद्वान रहे हैं। जैन जगत में उनका बहुत समादर है। किंतु जो जिस उपनाम का व्यवहार करता है, सर्वत्र वही नाम उल्लेखित होता है। आदरणीय पंडित जी ने जैन आगम का गहन अध्ययन किया था और उन्होंने जैन ग्रंथों को सर्वसुलभ कराने और जैन विद्वान तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया था।जिस पर सभी को गर्व है और होना चाहिए लेकिन आदरणीय पंडित जी ने स्वजाति का इतिहास खंगालने की कभी कोई चेष्टा नहीं की,क्योंकि यह सर्वथा अलग क्षेत्र है। उन्होंने तो जैन धर्म के मर्म को आत्मसात किया और आजीवन उसी का प्रचार प्रसार किया क्योंकि वही उनका एकमेव जीवन लक्ष्य रहा।आदरणीय पंडित जी का जन्म वर्ष 1867 ईस्वी में यानी आज से 158 वर्ष पूर्व हुआ था।19वीं शती तक इस विषय में कोई पुरातात्विक गवेषणा अथवा अनुसंधान का कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं हुआ था। इसलिए उस समय इस बात को लेकर कोई अभिमत या आग्रह होने का कोई प्रश्न ही नहीं था।जब वर्ष 1944 ईस्वी (वि.संवत्2000) में स्याऊ ग्राम में अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरैया महासभा की स्थापना हुई और 1980 ईस्वी में अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरैया महासभा का पुनर्गठन हुआ तब ऐसा कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं था। इसलिए इस विषय में यह  कहना कि उस समय के विद्वतजनों ने इस विषय में कोई प्रतिवाद नहीं किया, बेहद बचकाना तर्क है।1987 ईस्वी में आदरणीय श्री रामजीत जी जैन, एडवोकेट की इस विषय में लिखी पुस्तक"वरहियान्वय"के प्रकाशित होने के बाद जब लोग इन नये तथ्यों से रूबरू हुए तब इस विषय पर समाज में विमर्श शुरू हुआ और खोजे गए पुरातात्विक साक्ष्यों के प्रकाश में वरहिया उपनाम को अपनाने का आग्रह भी बढ़ा। यद्यपि उस समय भी कुछ लोग जो आदरणीय पंडित गोपालदास जी वरैया की ख्याति को भुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे, पंडित जी के नाम से पहचाने जाने की लालसावश  "वरैया" उपनाम को बनाए रखने के पक्ष में लामबंद थे और वही स्थिति कमोबेश आज भी है। चूंकि पंडित गोपालदास जी वरैया उपनाम का व्यवहार करते थे इसलिए जहां भी उनका प्रसंग या संदर्भ आया है स्वाभाविक रूप से वरैया उपनाम ही प्रयोग हुआ है। पंडित जी के कारण "वरैया" उपनाम जैन जगत में समादृत होने से 19वीं शती के बहुत सारे लोगों ने इस नाम का व्यवहार किया। उदाहरण स्वरूप- श्री प्यारेलाल वरैया,श्री लेखराज वरैया,श्री कपूरचंद वरैया,श्री भगवती प्रसाद वरैया इत्यादि।लोगों ने अपने प्रतिष्ठान पर भी वरैया नाम लिखवाया। लेकिन "वरैया" उपनाम का व्यवहार ग्वालियर जनपद तक ही सीमित रहा है।आमोल निवासी पंडित छोटेलाल जी बरैया जिनकी कर्मस्थली उज्जैन रही है,का समूचे मालवांचल में काफी समादर रहा है।वह स्थानीय जैन जगत के सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं। उनके प्रभाव के कारण उज्जैन, रतलाम, जावरा के सजातीय परिवारों ने "बरैया" उपनाम अपनाया। और ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है क्योंकि 'महाजनो येन गत: स पंथ:'। अतएव इस प्रकार प्रचलन रूप में अपनाया गया "वरैया" नाम व्यवहार इसे प्राचीन और मूल पाठ ठहराने के पक्ष में प्रमाण के रूप में ग्राह्य नहीं हैं? "वरहिया" पाठ की प्राचीनता के पक्ष में उपलब्ध प्रथम साक्ष्य पंडित जी के जन्म से 400 वर्ष पूर्व का,वर्ष 1489 ईस्वी (वि.संवत्1545) का मैनपुरी के बड़े मंदिर में विराजित भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा का पादलेख है।जिसमें स्पष्टतया "वरहिया कुलोद्भव"  उल्लेख आया है। दूसरा उपलब्ध साक्ष्य श्रीपाल चरित के रचयिता कविवर परिमल्ल (जो सोलहवीं शती के हैं जिन्होंने श्रीपाल चरित की रचना वर्ष 1595 ईस्वी (वि.संवत 1651) में प्रारंभ की थी),को डाक्टर कस्तूरचंद कासलीवाल ने अपनी पुस्तक "बाई अजीतमति एवं समकालीन कवि" में 'वरहिया' जात्युत्पन्न बताया है और यह पुस्तक वर्ष 1984 ईस्वी में यानी "वरहियान्वय" के प्रकाशन से 3 वर्ष पहले की है। इन दोनों साक्ष्यों के स्नेपशाॅट मैंने यहां प्रमाण के लिए लगाए हैं।तीसरा उपलब्ध साक्ष्य करहिया ग्राम के जिन मंदिर में प्रतिष्ठित कलिकुंड यंत्र जो वर्ष 1785 ईस्वी ( वि.संवत 1841) का है। उसमें "वरहिया जाति,कुम्हरिया गोत्रे" उल्लेख सुस्पष्ट है(संदर्भ - वरहियान्वय)। कलिकुंड यंत्र का स्नेपशाॅट भी इस ब्लॉग पोस्ट में अंत में दिया है।आश्चर्य तो तब होता है कि कुछ लोग श्री रामजीत जी जैन के इतिहास को ही खारिज करने पर आमादा हैं।"वरैया" शब्द में दन्त्योष्ठ्य 'व' है लेकिन उसका उच्चारण सामान्यतः ओष्ठ्य 'ब' जैसा होता है। इसलिए वरैया शब्द का उच्चारण बरैया की तरह होता है।बरैया जाति मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित है। इसलिए उससे सुभेदित यानी डिफ्रेंशियेट करने की दृष्टि से भी वरहिया उपनाम का व्यवहार उचित है। वरहिया जाति की गोत्र सूची में 36 गोत्र शामिल हैं जिनमें वरैया गोत्र भी एक गोत्र है और यह बात निर्विवाद है। किसी गोत्र के नाम पर जाति का नाम होने का एक भी उदाहरण ढूंढ़ने पर भी देखने को नहीं मिलता! यहां यह भी विचारणीय है कि क्या एक ही गोत्र नाम अपनाने पर हम सभी परस्पर बंधु-बांधव यानी सगोत्र नहीं होंगे?

खंडेलवाल जैन जाति के बृहद् इतिहास के पृष्ठ 41 पर दिगंबर जैन जातियों की तुलनात्मक सूची में संवत् 1852 की पांडुलिपि में वरहिया पाठ है तथा सन् 1914 ई.की दिगंबर जैन डायरेक्टरी में वरैय्या/वरैया पाठ आया है।इस प्रमाण के आधार पर भी वरहिया पाठ अधिक प्राचीन है। हां, बीसवीं शती में वरैया उपनाम प्रचलन में था।श्री मनरंगकीर्ति की जयमाल के 32वें छंद की पहली अर्धाली में 'वरहिया' पाठ आया है।श्री नवल शाह जो 18वीं शती के प्रसिद्ध विद्वान कवि हैं, उनके द्वारा ई.1770 में रचित 'श्री वर्धमान पुराण' जो पंडित पन्नालाल जी साहित्याचार्य के संपादकत्व में ई.1942 में सूरत से मुद्रित और प्रकाशित हुआ, में कवि परिचय खंड में  विभिन्न जैन जातियों के परिचय के प्रसंग में पृष्ठ 417 पर 'वरहिया' नाम आया है।उसका स्नेपशाॅट भी यहां प्रमाण के रूप में दिया है।
 महासभा का पंजीयन जो त्रुटिवश या अज्ञानतावश अथवा जानबूझकर वरैया नाम के साथ किया गया है जो महासभा के तत्कालीन पदाधिकारियों की एक गंभीर तथ्यात्मक गलती है,को सुधारकर ठीक करने के बजाय उसी गलत लीक को पीटना भयंकर किस्म का यथास्थितिवाद या सुविधावाद है।जब हथेली पर रखे आंवले की तरह सारा निष्कर्ष हस्तामलकवत् है फिर यह हठधर्मिता क्यों? मेरा किसी के प्रति कोई राग-द्वेष नहीं है और न मैं समाज के किसी राजनीतिक गुट या लाॅबी का हिस्सा हूं। मैं सिर्फ प्रमाणों और तथ्यों के साथ खड़ा हूं। आशा है इस विस्तृत विमर्श के बाद इस विषय में सभी शंकाएं निर्मूल हो चुकी होंगी और इस विषय पर किसी मीमांसा की अतिरिक्त आवश्यकता नहीं होगी।



 





शनिवार, 11 जनवरी 2025

विमर्श -2


 पंडित श्री गोपालदास जी की ख्याति को,
दोनों हाथों से बटोरने के चक्कर में, उप-
-नाम "वरैया" रखने पर आमादा हैं कुछ लोग।
अनजाने में या जानबूझकर आखिर क्यों?
श्री रामजीत जी द्वारा संधानित तथ्यों पर
फेर रहे हैं पानी, यह साजिशन है या संयोग।

मैनपुरी के मूर्तिलेख में नाम 'वरहिया' ही लेखित है।
ग्राम करहिया के जिनमंदिर के यंत्रों पर यह रेखित है।

क्या जिद है फिर,यह बात जेहन में सबके आती है।
क्यों,महासभा पिछली  गलती दोहराती  जाती है।।

 

बुधवार, 8 जनवरी 2025

वरैया या वरहिया


 मूल पाठ वरैया नहीं वरहिया है, मेरे और कुछ अन्य साथियों द्वारा यह नेरेटिव चलाने पर मुझे 'वरैया' पाठ की स्वीकार्यता के पक्ष में किसी पत्रिका के कुछ पृष्ठ भेजे गए हैं। पंडित गोपालदास जी वरैया निर्विवाद रूप से अपने समय के एक प्रकांड विद्वान रहे हैं। जैन जगत में उनका बहुत समादर है। किंतु जो जिस उपनाम का व्यवहार करता है, सर्वत्र वही नाम उल्लिखित होता है। आदरणीय पंडित जी ने जैन आगम का गहन अध्ययन किया था और उन्होंने जैन ग्रंथों को सर्वसुलभ कराने और जैन विद्वान तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया था।जिस पर सभी को गर्व है और होना चाहिए लेकिन आदरणीय पंडित जी ने स्वजाति का इतिहास खंगालने की कभी कोई चेष्टा नहीं की क्योंकि यह सर्वथा अलग क्षेत्र है। उन्होंने तो जैन धर्म के मर्म को आत्मसात किया और आजीवन उसी का प्रचार प्रसार किया क्योंकि वही उनका जीवन लक्ष्य था।आमोल के पंडित छोटेलाल जी जिनकी कर्मस्थली उज्जैन रही है 'बरैया' उपनाम का व्यवहार करते थे और मालवांचल में उनकी ख्याति के कारण मालवांचल के परिवारों ने 'बरैया' उपनाम अपना लिया। पंडित गोपालदास जी वरैया की ख्याति के कारण अनेक लोगों ने इस नाम को अपनाया। अब पंडित गोपालदास जी वरैया की इसी ख्याति को भुनाने के लिए कुछ लोग 'वरैया' उपनाम को मूल पाठ ठहराने के पक्ष में न केवल तर्क गढ़ रहे हैं बल्कि हठधर्मिता दिखा रहे हैं। इसलिए मैं इस विषय में भ्रम का निवारण करने के लिए तथ्य रख रहा हूं। वरहिया जैन समाज के एकमात्र इतिहास "वरहियान्वय" से यह सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूं जिसके लिए हम सभी आदरणीय रामजीत जी जैन, एडवोकेट, ग्वालियर के  ऋणी और आभारी हैं।

"जनसाधारण में वर्तमान में 'वरैया' शब्द प्रचलित है जो वरहिया शब्द का अपभ्रंश है। स्मरण रहे कि इस समाज के छत्तीस गोत्र है, उनमें एक गोत्र वरैया भी है। वह छत्तीस गोत्र वरहिया समाज में निहित हैं।   वरैया गोत्र एवं वरहिया समाज फिर एक कैसे हो सकते हैं, यह सोचने की बात है। अभी तक ऐसा प्रचलन देखने में नहीं आया कि समाज और गोत्र दोनों एक ही नाम के हों। वास्तविकता यह है कि उसका मूल रूप वरहिया है।
वर्तमान तर्क युग में सीधी सादी बात भी गले नहीं उतरती। प्रमाण बिना कोई बात सत्य नहीं मानी जाती ऐसा कुछ चलन सा हो गया है। लेखन कला प्रारम्भ होने से पूर्व श्रुतज्ञान था । परम्परा से यही चला आ रहा था। इसी ज्ञान के आधार पर जब लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ तो अनेकों ग्रन्थों एवं शास्त्रों की रचना हुई। प्रामाणिकता के लिये तथ्य दिये जा रहे हैं।

      विक्रम की 15वीं 16वीं शताब्दी से इस समाज के विकास के बारे में पता चलता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर के बड़े मन्दिर में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा है-चिन्ह बैल-धातु- 14 अ- आसन में शासन देवता गोमुखाकार गोमुख और चक्रेश्वरी तथा दो सिंह-लेख "सम्बत् 1545 वर्षे वैसाख सुदी 10 चन्द्र दिने श्री मूलसंघे, सरस्वती गच्छे ,बलात्कार गणे ,श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री जिन चन्द्रदेवाः वरहिया-कुलोद्भव साहु लखे भार्या कुसुमा तयो पुत्र साहु मल्लू तस्य भार्या उदयश्री तस्य पुत्र चन्द्र ज्येष्ठ, सा. लहण तत्कनिष्ठ सा. छोटे तत्कनिष्ठ सा. वीरसिंह तत्कनिष्ठ सा. अर्जुन तत्कनिष्ठ सा. प्रभु तत्कनिष्ठ सा. पलटू तत्कनिष्ठ सा. बल्दु तेषां मध्ये सा. अर्जुन तस्य भार्या मता तेन अजुनेनेदं आदीश्वरबिंवं स्व पूजनार्थ करोपितां ।" यह कामताप्रसाद जैन की पुस्तक 'प्रतिमा-लेख संग्रह के प्रथम पृष्ठ एवं भट्टारक सम्प्रदाय पुस्तक सम्पादक जोहारपुर पृष्ठ 104 के लेखांक 262 पर दिया है।

श्रीपाल चरित - अषाढ़ बदी 8 वि. सं. 1651 में कविवर परिमल ने श्रीपाल चरित की रचना प्रारंभ की। इसमें उन्होंने अपने पूर्वजों का परिचय इस प्रकार दिया है-

गोवरि गिरिबहु उत्तम जान । सूरवीर वहां राजा मान। ता आगे चन्दन चौधरी । कीरति सब जग में विस्तरी
जाति वरहिया गुन गम्भीर । अति प्रताप कुल राज धीर। ता सुत रामदास परवीन | नंदन आसकरन शुभ दीन । ता सुत कुल मंडल परिमल्ल | वसे आगरे में तजि सल्ल।

वि. सं. की अर्ध सत्रहवीं शताब्दी में भी वरहिया नाम प्रचलित था। कलिकुण्ड यंत्र - ग्राम करहिया के जिन मन्दिर में वि. सं. 1841 का एक यंत्र है उसमें लेख निम्न प्रकार है-
" संवत् 1841 वर्षे मूल संघे, बलात्कारगणे ,सरस्वतीगच्छे, कुन्दकुन्दाचार्यान्वये श्री ज्ञानभूषण तद भट्टारक श्री विश्वभूषण तदाम्नाये तद् शिष्य आचार्य श्री ललितकीर्तिया उपदेशामदिय यंत्र करोपितम् वरहिया जाति कुम्हरिया गोत्रे साह रामदास .... आसकरण यंत्र करोपितम् ।
उपरोक्त वर्णित लेख पाँच सौ, चार सौ तथा दो सौ वर्ष  प्राचीन हैं। इनमें वरहिया शब्द का ही उल्लेख है । इससे यह तो स्पष्ट है कि मूल नाम वरहिया है। परन्तु विक्रम की 19वीं शताब्दी में वरैया शब्द का भी उल्लेख मिलता है। इसका कारण उच्चारण की सरलता ही हो सकता है ।
अतः उचित व वास्तविक शब्द
 वरहिया है ।इसमें सन्देह की गुंजाइश प्रतीत नहीं होती ।"
 ‌✍🏻 श्रीश राकेश जैन, लहार

सोमवार, 6 जनवरी 2025

विमर्श -1


  विगत वर्ष के उत्तरार्द्ध में वरहिया महासभा के लिए संपन्न हुए चुनावों में लोगों ने उत्साह से भाग लिया और एक नई नवेली कार्यकारिणी चुनकर आई। इनमें ज्यादातर लोग युवा हैं और उत्साह और उमंग से भरे हुए हैं।वरहिया समाज में प्रतिभावान लोगों की कमी नहीं है। लेकिन चूंकि हर व्यक्ति हर कार्य को करने में दक्ष और प्रवीण नहीं होता क्योंकि सभी की अपनी सीमाएं होती हैं इसलिए जिस व्यक्ति की जिस कार्य में विशेषज्ञता हो, उसे यदि वह कार्य या दायित्व सौंपा जाए तो वह उसे ज्यादा कुशलता से सम्पादित कर सकता है और इस तरह से नियोजित लोगों की टीम के समन्वयन का कार्य सम्बंधित निर्वाचित प्रतिनिधि को करना चाहिए।इस प्रकार समाज के विकास और उत्थान के कार्यों में समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता रहेगी और उनके बीच सामंजस्य बढ़ेगा।इस प्रकार लक्षित काम का श्रेय उसे सम्पादित करने वाले लोगों को मिले और समन्वयन करने वाले पदाधिकारी को टीम वर्क को बेहतर ढंग से लीड करने और निर्देशित करने का समुचित क्रेडिट मिले तो कोई समस्या ही नहीं होगी।रेलगाड़ी को भले ही इंजन अपनी ताकत से खींचता है लेकिन बिना डिब्बों की रेलगाड़ी नहीं होती। आजकल तो रेलगाड़ी में मल्टीपल यूनिट होते हैं जो खुद गतिशील रहकर रेलगाड़ी को खींच रहे इंजन की रफ्तार को बूस्ट करते हैं। इसलिए नई रेलगाड़ियों में डिब्बों की अपनी अहमियत है। यदि इस माॅडल पर समाजोन्नति के मिशन को लीड किया जाए तो फिर हमारा अभीष्ट लक्ष्य दूर नहीं होगा। ध्यान रहे कि किसी क्वाड्रिगा या चार घोड़े वाले रथ में जुते घोड़ों को एक  ही दिशा में दौड़ना पड़ता है अन्यथा परिणाम सभी को मालूम है।