बुधवार, 15 जनवरी 2025

चौरासी जैन जातियां


 चौरासी जाति

अथ मनरंग कीर्ति चौरासी जाति की जयमाल लिख्यते।।

दोहा।।

श्री नेमीस्वर चरनजुग।। तारन तरन जहाज।।

नमो मदन मारन मेले।। मदन मत्त मृगराज।।1।।

श्री सिवदेवी नंद को। जूना गढ़ गिरनारि।।

भयो महोत्सव शुभ तहा।। सुनिये सब नरनारि।।2।।

जाति चौरासी जैन मत, देस – देस के आन।।

चारि छोहनी भीर सब।। इकठी भई महान।।3।।

माल भई जिन चंद जी।। नित कर इंद्र बनाय।।

लेवे को भविजन सकल।। उमगे चित हरषाय।।4।।

जौन जौन सुभ देस के।। आये भवि उमगाय।।

तौन तौन के नाम सुभ।। कछु कहिये चित लाय।।5।।

।।छंद पद्धड़ी।।

कौसल कासी सुभ देस जान। कास्मीर और कौंरूबषान।।

तैलंग्ग अंग अरू वंग देस। करनाट लाट अरू घोटवेस।।6।।

वागड वन्वर पुनि और किंलग। मालवा मध्य चित्तौड चंग।।

गुजरात सकल सुभ सिंधु चोल। निज निज भेषन को धरि अमोल।।7।।

सोरठ द्रावड मह चीन चीन। बंगाला मागध जो प्रवीन।।

अंभोज पोद्र केरल मनाय। सुभ देस मलै गिरि सकल आय।।8।।

सौ वीर अवंतिक पुनि उनाट। वीजापुर अरू सुंदर विराट।।

मरहट मेवातरू माड़वार। पंचाल देस अरू सिग ठुँठार।।9।।

कालिंजर गगहर कक्ष देस। वीसाल मनोहर गौड वेस।।

कुरूजंगल तिरऊत है विनोद। सौरम्य तिलोरक कहयौ मोद।।10।।

सुभ कालकीट सोहै किरात। अरू पुंड मल्ल त्रिकिंलग जात।।

वैदुर्भ सुकुरू अरू सुभ्य देस। पुनि चेदी उद सोमधृ देस।।11।।

सुभ कामरूप अरू अघ्न होय। प्रातर दुसार्न पुन्नाट सोय।।

पाडता उसीर सुभ है कसे। उद्दू विद्रुम अरू अघ चेर।।12।।

सोहै अरद्र पुनि विड वषान। पुह कलावती कारूक सुजान।।

हीरन्य और सुभ कूल संग। सौरम्य जोध आये सुचंग।।13।।

अम्मेर मंगलावति सुजोय। पुनि पांडु और पांडल मनोय।।

जोडाहल कहिये सूरमंद। कुल कम्म अंदु जानौ अमंद।।14।।

काँर्च सौभद्र रूवल्स जान। गंभीर भोट कुंकुन बषान।।

इत्यादि देस औरऊ अनेक। सब इकटे में धरि हिय विवेक।।15।।

—दोहा—

तहा इंद्र सचि आइके। माला रची सुभाय।

कछु ताको वरनन करौ। जा सुनि चित हरषाय।।16।।

—भुजंगम प्रयात छंद—

महा गंधकारी महा रूपधारी। लगे पुष्प नाना संभारी संभारी।।

चमेली सुचंपा घेनेरे घेनेरे। सुवंधूक जाही जुही के भले रे।।17।।

गुलाला गुलाबी सदा सो गुलाबा। भले दावदी गुंजते भौरसावा।।

गुथी कल्प साषी तने पुष्पलाई। लगाये महा कंज बेला चुनाई।।18।।

महा नाग मुक्ता लगे जासु माही। चुनी सो चुनी चारू सोभा लषाही।।

कही पीत आभा कही स्याँमताई। कही रक मानिक्य सोभा धिकाई।।19।।

कहीं स्वेत माला विराजै विसाला। लगे वङ्का के षंड की सोभ आला।।

कही लागि पन्ना महा काँति कारी। चऊवोर जाने निजाभा विभारी।।20।।

वनी माल अैसी कहाँ सोभ जाकी। बनाई भई वैस वज्जी तियाकी।।

धरी नाभ आगे महा सोभ पाई। चढ़ाई रची नाथ को आप लाई।।21।।

तहा राजरने अनेकान आये। भले सेठि साहू विना गंतु धाये।।

षडे देवदेवी चहूँ वोर घेरे। करै सव्द जै जै महा भक्ति पेरे।।22।।

षगी और षगेसा महाँ तेजधारे। चरै चारि हूँ धा जिनाज्ञा विथारे।।

वहा जाति चौरासि यौ जैन केरी। भँई आइ भेला सुमेला घनेरी।।23।।

वजामै वहा दुंदुभी देव तारी। नगारें वजै सर्व आनंदकारी।।

वजै ताल मिरदंग नाना नवीन। वजै वंस कणसाल कानू नवीना।।24।।

नटै नाटकी नाटिनी नाटनी के। कटै पाप संताप सारे तिन्ही के।।

महा भामिनी को किलारा व गामै। चलै भाँति सो भाव अछे बतामै।।25।।

सजै नृत्य संगीत संगीत गामै। वड भावसों देव ताली वजामै।।

भेल पाद विन्यास की रति ल्यामै। मिलै ताल सौं छुद्र घंटी वजामै।।26।।

—दोहा—

अैसो उत्सव जह भयौ। कहत न पावत पार।।

अब चौरासी जाति के। नाम कहौ निरधार।।27।।

—नाराच छंद—

षडायना सुगोड गंगरानिया वषानिया। अचीतवाल कोरवाल दूसरे सुवानिया।।

षडेलवाल वोसवाल श्री श्रिमाल जानिया। वघेलवाल अग्रवाल जैसवाल मानिया।।28।।

लंवेचूवाल श्रीयमाल धाकडा जुरे घने। सहेलवाल ऊँवडे संडेरिया गने गने।।

माढवा लवायडी कपोल जाति के भने। दसौरवाल पल्लिवाल गोल लार के घने।।29।।

नरायना सुनागरीय काँथडा चितोडिया। भटेर गोल पूर्व और भट्ट नागरे भिया।।

घनोरवाल रैकवाल झारिड़ी सवालिया। चतुर्थ और पंचमा सुजाय ला कराहिया।।30।।

सुलाडवाल सूरिवाल जंवुसार धाइया। श्रीयगौड जाति के अनेक लोग आइया।।

कहे सुनार सिंघ पोर सेरिहीय है घने। गुरू सुवाल जेहरान डेडुवाल सोहने।।31।।

—अडिल छंद—

षडवड गोल संगारे मेठ तवालही। टठतवाल पुरवाल वरहिया है सही।।

मगलवाल अरू पुकरवाल हर सौरिया। वध नो राज लहराक है अन दौरिया।।32।।

हर दौरा श्रीमाली नाना वाल जू। माडाहाडा सेरहिया अकनाल जू।।

करनसिया मझ करा कहे कोलापुरी। साचौरा गृह पत्तीना गद्रह कीकुरी।।33।।

सकल जाँगरा पोरवार कर वारजे। सोरठिया पुरवार कठन है लारजे।।

भले अयोध्या पूरब आनंद सो चले। पद्मावति पुरवार पवयडा हे भले।।34।।

वासक माको मठी अटस परवार है। कहे दसेरा पोरवार हितकार है।।

औ माली पुरवार सकल ये जानिया। निज निज भाषा बोलत आनंद मानिया।।35।।

चार्चा संग्रह ग्रंथ महा अभिराम है। ता मधि जिनमत जाति चौरासी नाम है।।

ताहि देषि हम इहा लिषी सुनियौ सही। भूल जहा कछु होय तहा सोधौ कही।।36।।

—सोरठा—

अैसे सब ही जात—भेला है मेला भयौ।

निज निज मन हरषात।। उमगे माला लेन को।।37।।

—दोहा—

और अनेकन भूपसों।। मागै माल वढाय।

ताको वरनन करते हौ।।सुनऊ भब्य मनलाय।।38।।

—नाराच छंद—

नवाय माथ जोरि हाथ नाभ माल दीजियै। मगाय देव हेमराशि सो भंडार कीजिए।।

सहस वीर जांगरा दिनार भावसाँ। हजार दै चलीस गौड माँग ही छचावसों।।39।।

षडेलवाल यौं कहै असी हजार लीजियै। दिनार सेक जाति की दया दयाल कीजियै।।

षडायना सुलछदेत है वडी उमंग सौ। द्विलछ देय श्रीयमाल माल को अभंग सौ।।40।।

सुचारि लछ श्री श्रिमाल आठ लछ दूसरे। वघेलवाल आठ दून देत दावसौ भरे।।

बत्तीस लाष जैसवार तास दून धाकडा। नारया सु अस्सि लाष ऐक कोटि काथडा।।41।।

दिनार देय देय हाथ जोडि जोडि माग ही। गुनानुवाद गाय गाय सीस को नवाय ही।।

अचीतव दोय कोटि लछ देत वानिया। करोरि चार कोरवाल आठ गंगरानिया।।42।।

सुवोसवाल मोतिया अमोल देत है घने। अनेक रत्न अग्रवाल देत है बिना गने।।

अमोल लाल मालकाज श्रीयमाल देत है। लुटाय के जिनेन्द्र पै सुफूल माल लेत है।।43।।

सडैसि सुपल्लिवाल दूमडे षेड जहाँ। कहै अनेक कोठरी षजाने लीजियै महाँ।।

कपूर जाफरान की सुगाडिया भराय के। सहेलवाल औलवेचू देत आय आय के।।44।।

वनाय रत्न सो जडी लगाम जीन पाषरे। अमोल येक जाति के अनेक सोभ को धरे।।

नरायना चितोडिया सनागरी मगाय के। बिना गने तुरंग देत सीस को नवाय के।।।।45।।

भट्टेरगौल पूर्व और गौल लार के घने। गयद साजि साजि वेस भेस सो सुहावने।।

महा उतंग स्याम जेम नील भू धरा लसै। मगाय देत माल हेत इंद्र नाग को हसौ।।46।।

चतुर्थ और पंचमा अनेक दसे देवही। लुटाय माल मालकाज श्री जिनेन्द्र से वही।।

घनोरवाल यौ कहै हमै न माल देऊगे। भराय घौ जहाज मै कितेक दाम लेऊगे।।47।।

इत्यादि वानिया समस्त आप आपु को सवै। सो येक येकू सो अधिक देत दाम है जवै।।

पवित्र पाप नाशनी जिनेन्द्र माल लेन को। उछाह सो षडे जहां महान द्रव्य मो।।48।।

अनेक सूम यौ कहै भले सुलछ देत है। टाय दाँम आपने सुफूल माल लेत है।।

कठोर व्रूर चेत्त के महात्म देषित जैन को। चले सुवाग मोडि मोडि होस नाहि वैन को।।49।।

अनेक देषि भूपती बड़ा अचंभ मान ही।। महाप्रताप जैन धर्म को हियै पछाँन ही।

कहै पुकारि यौ छित्तीस नाथ चाल दीजियै। जितेक राज लक्ष्मी सवै हमारि लीजियै।।50।।

—सोरठा— गुरू बोले सुनि बात। वैसे माला ना मिलें।।

महाश पुन्य अवदात।होय जास को पाव ही।।51।।

—त्रोटक छंद—

जिन भौम वनावहि भावधरे। प्रतिबीब शिरावहि जो सुथरे।।

इकठी चवरासिऊँ जाति करै। िषयाजन की सब पीर हरै।।52।।

जिन जज्ञ रचै छल छिद्र बिना। कछु मान वडाइन करै अपिना।।

सब संघ चलाय वनै संघ ही। परभावन अंग करै व ही।।53।।

प्रिय वैन कहै सवसाँ हित के। नहि पालहि झूठ भले चित के।।

इत के वित के नहि वैन सुनै। मन मै जिनराज सरूप गुनै।।54।।

लक्ष्मी वऊ धर्म विषै षरचै। न करै कवहूँ मिथ्या परचै।।

अरचै पद पंकज नेमतने। चरचै गुरजो निग्रंथ भने।।।55।।

वह सास्त्र सुनै जिएमो सुदया। उपजै विनसै ससरी अदया।।

यहि भाँति अनेकन पुन्य मिया। करि पावहि माल अमोल जिया।।56।।

सबको यहि भांति संबोध कियौ। तब ही सिंघराय बुलाय लियौ।।

अति आनंद पूरित माल दई। नृप सिंघ तवे हरषाय भई लियौ।।57।।

नर जो जिन माल अमोल लहै गनियो। नर जन्म सुफल वहै।।

प्रगटै जस लोक विषै जिहि को। अति पुन्य भंडार भरै तिहि को।।58।।

जिहि की लक्ष्मी न घटै कबहूँ। दिन दून बढै परचै जवऊँ।।

यह लोक प्रसिद्ध कहै सगरे। जित धर्म तितै लक्ष्मी वमरै।।59।।

बिन धर्म रमा वुध यौ उचरै। विधवा त्तिय ज्यौं नहि सोभ धरै।।

मनरंग सदा चितमें धरियै। जिनधर्म दयामय विस्तरियै।।60।।

तरियै करि सो निज आतम को। हरियै सु अज्ञान महातम को।।

परिये न भवोदधि मै फिरिकै। करियै यह काज महा थिर कै।।61।।

—दोहा—

यह चौरासी जाति की। माल कही हम वेस।।

पढत सुनत संकट मिटै। जै जै नेमि जिनेस।।62।।

जेठ महीना सुकुल पष। तिथि पंचमि गुरुवार।।

ता दिन संपूरन भई। जैमाला हितकार।।63।।

येक सहस नै सतक मै। षटवरषै करि दूरि।।

संवत सो जानौ सुधी सदा रहौ सुष पूरि।।64।।

—छप्पै—

धन कन वढै अनेक वढै कीरति दिन दूनी

दिन दिन सुष सरसाय कुमति छिन छिन मै ऊनी

अनगन गुनगन गहै लहै पगपग पटुताई।

कलमल दर कल्यान होय ता घर मै आई। पुत्र पौत्र परताप सौ।

संपूरन निव से जिया। मँनरंग लाल जा ऊदै मौ। वसत नेमि राजुलि पिया।।65।।

—सवैया—

श्रावक धरमपाल मुसाहेव गंज साल विंदा लाल के सुपुत्र रतन वषान ही अन्नजल के त्रसाय रहौ सु नगर आय अग्रवाल दंस गग्र्ग गोत सुवषान ही। भादौ जी की पूजा पाठक कथा रासा है विसाल हरष सहित लिष्यौ अति सुषदान ही। विक्रम सुदित्य सार संवत सुनौरसरल मास तिथि दिन ताको करौ सु वषान ही।

—छप्पै छंद—

येक ऊनसन बीस तास पर षोडस जानो।

पोह सुकुल तिथि और जान पूनम सुवषानो येतवार दिन सार राति के पूरन कीनो।

पढै गुनै जो कोई ताहि आतम सुष भइनं गुलजारी के पठन को लिषी सु मन वच काइ के। भूल चूक सब सोंधियौ।


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