मूल पाठ वरहिया अथवा वरैया है,यह मुद्दा इन दिनों सुर्खियों में छाया है। वरैया पाठ को बनाए रखने के आग्रह का आधार पंडितवर्य गोपालदास जी वरैया द्वारा अपने नाम के साथ किया वरैया उपनाम का व्यवहार है। पंडित गोपालदास जी वरैया निर्विवाद रूप से अपने समय के एक प्रकांड विद्वान रहे हैं। जैन जगत में उनका बहुत समादर है। किंतु जो जिस उपनाम का व्यवहार करता है, सर्वत्र वही नाम उल्लेखित होता है। आदरणीय पंडित जी ने जैन आगम का गहन अध्ययन किया था और उन्होंने जैन ग्रंथों को सर्वसुलभ कराने और जैन विद्वान तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया था।जिस पर सभी को गर्व है और होना चाहिए लेकिन आदरणीय पंडित जी ने स्वजाति का इतिहास खंगालने की कभी कोई चेष्टा नहीं की,क्योंकि यह सर्वथा अलग क्षेत्र है। उन्होंने तो जैन धर्म के मर्म को आत्मसात किया और आजीवन उसी का प्रचार प्रसार किया क्योंकि वही उनका एकमेव जीवन लक्ष्य रहा।आदरणीय पंडित जी का जन्म वर्ष 1867 ईस्वी में यानी आज से 158 वर्ष पूर्व हुआ था।19वीं शती तक इस विषय में कोई पुरातात्विक गवेषणा अथवा अनुसंधान का कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं हुआ था। इसलिए उस समय इस बात को लेकर कोई अभिमत या आग्रह होने का कोई प्रश्न ही नहीं था।जब वर्ष 1944 ईस्वी (वि.संवत्2000) में स्याऊ ग्राम में अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरैया महासभा की स्थापना हुई और 1980 ईस्वी में अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरैया महासभा का पुनर्गठन हुआ तब ऐसा कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं था। इसलिए इस विषय में यह कहना कि उस समय के विद्वतजनों ने इस विषय में कोई प्रतिवाद नहीं किया, बेहद बचकाना तर्क है।1987 ईस्वी में आदरणीय श्री रामजीत जी जैन, एडवोकेट की इस विषय में लिखी पुस्तक"वरहियान्वय"के प्रकाशित होने के बाद जब लोग इन नये तथ्यों से रूबरू हुए तब इस विषय पर समाज में विमर्श शुरू हुआ और खोजे गए पुरातात्विक साक्ष्यों के प्रकाश में वरहिया उपनाम को अपनाने का आग्रह भी बढ़ा। यद्यपि उस समय भी कुछ लोग जो आदरणीय पंडित गोपालदास जी वरैया की ख्याति को भुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे, पंडित जी के नाम से पहचाने जाने की लालसावश "वरैया" उपनाम को बनाए रखने के पक्ष में लामबंद थे और वही स्थिति कमोबेश आज भी है। चूंकि पंडित गोपालदास जी वरैया उपनाम का व्यवहार करते थे इसलिए जहां भी उनका प्रसंग या संदर्भ आया है स्वाभाविक रूप से वरैया उपनाम ही प्रयोग हुआ है। पंडित जी के कारण "वरैया" उपनाम जैन जगत में समादृत होने से 19वीं शती के बहुत सारे लोगों ने इस नाम का व्यवहार किया। उदाहरण स्वरूप- श्री प्यारेलाल वरैया,श्री लेखराज वरैया,श्री कपूरचंद वरैया,श्री भगवती प्रसाद वरैया इत्यादि।लोगों ने अपने प्रतिष्ठान पर भी वरैया नाम लिखवाया। लेकिन "वरैया" उपनाम का व्यवहार ग्वालियर जनपद तक ही सीमित रहा है।आमोल निवासी पंडित छोटेलाल जी बरैया जिनकी कर्मस्थली उज्जैन रही है,का समूचे मालवांचल में काफी समादर रहा है।वह स्थानीय जैन जगत के सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं। उनके प्रभाव के कारण उज्जैन, रतलाम, जावरा के सजातीय परिवारों ने "बरैया" उपनाम अपनाया। और ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है क्योंकि 'महाजनो येन गत: स पंथ:'। अतएव इस प्रकार प्रचलन रूप में अपनाया गया "वरैया" नाम व्यवहार इसे प्राचीन और मूल पाठ ठहराने के पक्ष में प्रमाण के रूप में ग्राह्य नहीं हैं? "वरहिया" पाठ की प्राचीनता के पक्ष में उपलब्ध प्रथम साक्ष्य पंडित जी के जन्म से 400 वर्ष पूर्व का,वर्ष 1489 ईस्वी (वि.संवत्1545) का मैनपुरी के बड़े मंदिर में विराजित भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा का पादलेख है।जिसमें स्पष्टतया "वरहिया कुलोद्भव" उल्लेख आया है। दूसरा उपलब्ध साक्ष्य श्रीपाल चरित के रचयिता कविवर परिमल्ल (जो सोलहवीं शती के हैं जिन्होंने श्रीपाल चरित की रचना वर्ष 1595 ईस्वी (वि.संवत 1651) में प्रारंभ की थी),को डाक्टर कस्तूरचंद कासलीवाल ने अपनी पुस्तक "बाई अजीतमति एवं समकालीन कवि" में 'वरहिया' जात्युत्पन्न बताया है और यह पुस्तक वर्ष 1984 ईस्वी में यानी "वरहियान्वय" के प्रकाशन से 3 वर्ष पहले की है। इन दोनों साक्ष्यों के स्नेपशाॅट मैंने यहां प्रमाण के लिए लगाए हैं।तीसरा उपलब्ध साक्ष्य करहिया ग्राम के जिन मंदिर में प्रतिष्ठित कलिकुंड यंत्र जो वर्ष 1785 ईस्वी ( वि.संवत 1841) का है। उसमें "वरहिया जाति,कुम्हरिया गोत्रे" उल्लेख सुस्पष्ट है(संदर्भ - वरहियान्वय)। कलिकुंड यंत्र का स्नेपशाॅट भी इस ब्लॉग पोस्ट में अंत में दिया है।आश्चर्य तो तब होता है कि कुछ लोग श्री रामजीत जी जैन के इतिहास को ही खारिज करने पर आमादा हैं।"वरैया" शब्द में दन्त्योष्ठ्य 'व' है लेकिन उसका उच्चारण सामान्यतः ओष्ठ्य 'ब' जैसा होता है। इसलिए वरैया शब्द का उच्चारण बरैया की तरह होता है।बरैया जाति मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित है। इसलिए उससे सुभेदित यानी डिफ्रेंशियेट करने की दृष्टि से भी वरहिया उपनाम का व्यवहार उचित है। वरहिया जाति की गोत्र सूची में 36 गोत्र शामिल हैं जिनमें वरैया गोत्र भी एक गोत्र है और यह बात निर्विवाद है। किसी गोत्र के नाम पर जाति का नाम होने का एक भी उदाहरण ढूंढ़ने पर भी देखने को नहीं मिलता! यहां यह भी विचारणीय है कि क्या एक ही गोत्र नाम अपनाने पर हम सभी परस्पर बंधु-बांधव यानी सगोत्र नहीं होंगे?
खंडेलवाल जैन जाति के बृहद् इतिहास के पृष्ठ 41 पर दिगंबर जैन जातियों की तुलनात्मक सूची में संवत् 1852 की पांडुलिपि में वरहिया पाठ है तथा सन् 1914 ई.की दिगंबर जैन डायरेक्टरी में वरैय्या/वरैया पाठ आया है।इस प्रमाण के आधार पर भी वरहिया पाठ अधिक प्राचीन है। हां, बीसवीं शती में वरैया उपनाम प्रचलन में था।श्री मनरंगकीर्ति की जयमाल के 32वें छंद की पहली अर्धाली में 'वरहिया' पाठ आया है।श्री नवल शाह जो 18वीं शती के प्रसिद्ध विद्वान कवि हैं, उनके द्वारा ई.1770 में रचित 'श्री वर्धमान पुराण' जो पंडित पन्नालाल जी साहित्याचार्य के संपादकत्व में ई.1942 में सूरत से मुद्रित और प्रकाशित हुआ, में कवि परिचय खंड में विभिन्न जैन जातियों के परिचय के प्रसंग में पृष्ठ 417 पर 'वरहिया' नाम आया है।उसका स्नेपशाॅट भी यहां प्रमाण के रूप में दिया है।
महासभा का पंजीयन जो त्रुटिवश या अज्ञानतावश अथवा जानबूझकर वरैया नाम के साथ किया गया है जो महासभा के तत्कालीन पदाधिकारियों की एक गंभीर तथ्यात्मक गलती है,को सुधारकर ठीक करने के बजाय उसी गलत लीक को पीटना भयंकर किस्म का यथास्थितिवाद या सुविधावाद है।जब हथेली पर रखे आंवले की तरह सारा निष्कर्ष हस्तामलकवत् है फिर यह हठधर्मिता क्यों? मेरा किसी के प्रति कोई राग-द्वेष नहीं है और न मैं समाज के किसी राजनीतिक गुट या लाॅबी का हिस्सा हूं। मैं सिर्फ प्रमाणों और तथ्यों के साथ खड़ा हूं। आशा है इस विस्तृत विमर्श के बाद इस विषय में सभी शंकाएं निर्मूल हो चुकी होंगी और इस विषय पर किसी मीमांसा की अतिरिक्त आवश्यकता नहीं होगी।







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