पंडित श्री गोपालदास जी की ख्याति को,
दोनों हाथों से बटोरने के चक्कर में, उप-
-नाम "वरैया" रखने पर आमादा हैं कुछ लोग।
अनजाने में या जानबूझकर आखिर क्यों?
श्री रामजीत जी द्वारा संधानित तथ्यों पर
फेर रहे हैं पानी, यह साजिशन है या संयोग।
मैनपुरी के मूर्तिलेख में नाम 'वरहिया' ही लेखित है।
ग्राम करहिया के जिनमंदिर के यंत्रों पर यह रेखित है।
क्या जिद है फिर,यह बात जेहन में सबके आती है।
क्यों,महासभा पिछली गलती दोहराती जाती है।।

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