वरहिया -श्री , ब्लॉग दिगंबर जैन आम्नाय की वरहिया उपजाति की सामाजिक,सांस्कृतिक गतिविधियों के विविध आयामों को समेटकर बृहत्तर पटल पर उसकी उपस्थिति को दर्ज कराने का एक विनम्र प्रयास है |
बुधवार, 8 जनवरी 2025
वरैया या वरहिया
मूल पाठ वरैया नहीं वरहिया है, मेरे और कुछ अन्य साथियों द्वारा यह नेरेटिव चलाने पर मुझे 'वरैया' पाठ की स्वीकार्यता के पक्ष में किसी पत्रिका के कुछ पृष्ठ भेजे गए हैं। पंडित गोपालदास जी वरैया निर्विवाद रूप से अपने समय के एक प्रकांड विद्वान रहे हैं। जैन जगत में उनका बहुत समादर है। किंतु जो जिस उपनाम का व्यवहार करता है, सर्वत्र वही नाम उल्लिखित होता है। आदरणीय पंडित जी ने जैन आगम का गहन अध्ययन किया था और उन्होंने जैन ग्रंथों को सर्वसुलभ कराने और जैन विद्वान तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया था।जिस पर सभी को गर्व है और होना चाहिए लेकिन आदरणीय पंडित जी ने स्वजाति का इतिहास खंगालने की कभी कोई चेष्टा नहीं की क्योंकि यह सर्वथा अलग क्षेत्र है। उन्होंने तो जैन धर्म के मर्म को आत्मसात किया और आजीवन उसी का प्रचार प्रसार किया क्योंकि वही उनका जीवन लक्ष्य था।आमोल के पंडित छोटेलाल जी जिनकी कर्मस्थली उज्जैन रही है 'बरैया' उपनाम का व्यवहार करते थे और मालवांचल में उनकी ख्याति के कारण मालवांचल के परिवारों ने 'बरैया' उपनाम अपना लिया। पंडित गोपालदास जी वरैया की ख्याति के कारण अनेक लोगों ने इस नाम को अपनाया। अब पंडित गोपालदास जी वरैया की इसी ख्याति को भुनाने के लिए कुछ लोग 'वरैया' उपनाम को मूल पाठ ठहराने के पक्ष में न केवल तर्क गढ़ रहे हैं बल्कि हठधर्मिता दिखा रहे हैं। इसलिए मैं इस विषय में भ्रम का निवारण करने के लिए तथ्य रख रहा हूं। वरहिया जैन समाज के एकमात्र इतिहास "वरहियान्वय" से यह सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूं जिसके लिए हम सभी आदरणीय रामजीत जी जैन, एडवोकेट, ग्वालियर के ऋणी और आभारी हैं।
"जनसाधारण में वर्तमान में 'वरैया' शब्द प्रचलित है जो वरहिया शब्द का अपभ्रंश है। स्मरण रहे कि इस समाज के छत्तीस गोत्र है, उनमें एक गोत्र वरैया भी है। वह छत्तीस गोत्र वरहिया समाज में निहित हैं। वरैया गोत्र एवं वरहिया समाज फिर एक कैसे हो सकते हैं, यह सोचने की बात है। अभी तक ऐसा प्रचलन देखने में नहीं आया कि समाज और गोत्र दोनों एक ही नाम के हों। वास्तविकता यह है कि उसका मूल रूप वरहिया है।
वर्तमान तर्क युग में सीधी सादी बात भी गले नहीं उतरती। प्रमाण बिना कोई बात सत्य नहीं मानी जाती ऐसा कुछ चलन सा हो गया है। लेखन कला प्रारम्भ होने से पूर्व श्रुतज्ञान था । परम्परा से यही चला आ रहा था। इसी ज्ञान के आधार पर जब लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ तो अनेकों ग्रन्थों एवं शास्त्रों की रचना हुई। प्रामाणिकता के लिये तथ्य दिये जा रहे हैं।
विक्रम की 15वीं 16वीं शताब्दी से इस समाज के विकास के बारे में पता चलता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर के बड़े मन्दिर में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा है-चिन्ह बैल-धातु- 14 अ- आसन में शासन देवता गोमुखाकार गोमुख और चक्रेश्वरी तथा दो सिंह-लेख "सम्बत् 1545 वर्षे वैसाख सुदी 10 चन्द्र दिने श्री मूलसंघे, सरस्वती गच्छे ,बलात्कार गणे ,श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री जिन चन्द्रदेवाः वरहिया-कुलोद्भव साहु लखे भार्या कुसुमा तयो पुत्र साहु मल्लू तस्य भार्या उदयश्री तस्य पुत्र चन्द्र ज्येष्ठ, सा. लहण तत्कनिष्ठ सा. छोटे तत्कनिष्ठ सा. वीरसिंह तत्कनिष्ठ सा. अर्जुन तत्कनिष्ठ सा. प्रभु तत्कनिष्ठ सा. पलटू तत्कनिष्ठ सा. बल्दु तेषां मध्ये सा. अर्जुन तस्य भार्या मता तेन अजुनेनेदं आदीश्वरबिंवं स्व पूजनार्थ करोपितां ।" यह कामताप्रसाद जैन की पुस्तक 'प्रतिमा-लेख संग्रह के प्रथम पृष्ठ एवं भट्टारक सम्प्रदाय पुस्तक सम्पादक जोहारपुर पृष्ठ 104 के लेखांक 262 पर दिया है।
श्रीपाल चरित - अषाढ़ बदी 8 वि. सं. 1651 में कविवर परिमल ने श्रीपाल चरित की रचना प्रारंभ की। इसमें उन्होंने अपने पूर्वजों का परिचय इस प्रकार दिया है-
गोवरि गिरिबहु उत्तम जान । सूरवीर वहां राजा मान। ता आगे चन्दन चौधरी । कीरति सब जग में विस्तरी
जाति वरहिया गुन गम्भीर । अति प्रताप कुल राज धीर। ता सुत रामदास परवीन | नंदन आसकरन शुभ दीन । ता सुत कुल मंडल परिमल्ल | वसे आगरे में तजि सल्ल।
वि. सं. की अर्ध सत्रहवीं शताब्दी में भी वरहिया नाम प्रचलित था। कलिकुण्ड यंत्र - ग्राम करहिया के जिन मन्दिर में वि. सं. 1841 का एक यंत्र है उसमें लेख निम्न प्रकार है-
" संवत् 1841 वर्षे मूल संघे, बलात्कारगणे ,सरस्वतीगच्छे, कुन्दकुन्दाचार्यान्वये श्री ज्ञानभूषण तद भट्टारक श्री विश्वभूषण तदाम्नाये तद् शिष्य आचार्य श्री ललितकीर्तिया उपदेशामदिय यंत्र करोपितम् वरहिया जाति कुम्हरिया गोत्रे साह रामदास .... आसकरण यंत्र करोपितम् ।
उपरोक्त वर्णित लेख पाँच सौ, चार सौ तथा दो सौ वर्ष प्राचीन हैं। इनमें वरहिया शब्द का ही उल्लेख है । इससे यह तो स्पष्ट है कि मूल नाम वरहिया है। परन्तु विक्रम की 19वीं शताब्दी में वरैया शब्द का भी उल्लेख मिलता है। इसका कारण उच्चारण की सरलता ही हो सकता है ।
अतः उचित व वास्तविक शब्द
वरहिया है ।इसमें सन्देह की गुंजाइश प्रतीत नहीं होती ।"
✍🏻 श्रीश राकेश जैन, लहार
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