लोक व्यवहार में पंडित विशेषण सामान्यतः ब्राह्मणों के लिए प्रयोग होता है।पंडित का शाब्दिक अर्थ है -ज्ञानी या पांडित्यशाली। जैन समाज में पंडित से आशय कर्मकांड की विधा में प्रवीण व्यक्ति से होता है।पूजा और अनुष्ठान कराने में कुशल व्यक्ति को पंडित कहा जाता है। शास्त्रों का पारायण कर उनकी व्याख्या करने वाले भी पंडित जी कहलाते हैं। जबकि इसके समांतर विद्वान शब्द से आशय विद्यावान से होता है। विद्वान व्यक्ति जिज्ञासु,उद्भावनाशील,तर्कप्रवण और ज्ञान की शाखा-विशेष का ज्ञाता होता है।इस दृष्टि से यद्यपि पंडित और विद्वान दोनों का क्षेत्र अलग है फिर भी एक ही व्यक्ति पंडित और विद्वान दोनों हो सकता है। लेकिन विडंबनापूर्ण स्थिति तब हो जाती है जब वे एक-दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण की अनधिकार चेष्टा करते हैं और जब कर्मकांडी पंडित हर क्षेत्र में टांग अड़ाना और लालबुझ्झकड़ी देना शुरू कर देते हैं तो बात बनने के बजाय बिगड़ जाती है।इन दिनों समाज में विद्वान कम और पंडित ज्यादा हैं क्योंकि कर्मकांड के क्षेत्र में जहां एक ओर ज्यादा अर्थ लाभ है वहीं समाज में मिलने वाला बहुमान एक अतिरिक्त आकर्षण है।जिस पंडित के पास फचफची सरस्वती होती है उसे लोक में ज्यादा प्रमुखता प्राप्त होती है लेकिन विद्वान के लिए यह कोई पूर्वशर्त नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें