सोमवार, 20 जनवरी 2025

वरहिया हैं, वरहिया ही रहेंगे


 जो वर्ह से नि:सृत है,अभिप्राय जिसका श्रेष्ठ है।
कोई जहां न कनिष्ठ है एवं न कोई ज्येष्ठ है ।
जिनका रहा धर्माचरण के प्रति सदा अनुराग है।
दुर्व्यसन, पापाचार, हिंसा वृत्ति सबका त्याग है।
नलपुर की पावन क्रोड में,जिसका विमल शैशव खिला।
नि:सर्ग का आशीष जिसको बाल्यावस्था से मिला।
इक्ष्वाकुवंशी रक्त जिनकी धमनियों में बह रहा।
अभिमान रखना है सदा अक्षुण्ण,उनसे कह रहा।
जो मूल्य और आदर्श अपने पूर्वजों ने जिये हैं।
उपकार जो हम पर हमारे अग्रजों ने  किए हैं।
उनका रखेंगे मान,चाहे कष्ट जितने सहेंगे।
जिनका हृदय है श्रेष्ठ ऐसे वरहिया बन रहेंगे।
दोनों भुजाओं को उठा,उद्घोषकर यह कहेंगे।
हम वरहिया थे,वरहिया हैं,वरहिया ही रहेंगे।।




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