गुरुवार, 27 मार्च 2025

गुरुवर गोपालदास वरैया बेमिसाल हैं



 

कोई नहीं  है उनकी  समता का,
वैसी विलक्षण वक्तृत्व क्षमता का।
 

सम्मान उनको  मिला अपरंपार,
पर इससे ज्यादा के हैं वे हकदार।

संयत रहे, प्रतिकूलताओं में,
इस अर्थ में वे आत्मजेता थे।
पीढ़ियां उनको रखेंगी याद,
गुरुदेव ऐसे युग प्रणेता थे।

शास्त्रार्थ रण के निर्जयी गजकेसरी,
थीं मुग्ध जिन पर स्वयं मां वागीश्वरी।

 पंडित प्रवर,गुरुओं के गुरु,वाचस्पति,
व्यक्तित्व था ऐसा,ज्यों हों योगी यति।  

 वे सरलता और  सौम्यता की मूर्ति थे,

वे तर्कप्रिय थे ,न्याय की प्रतिमूर्ति थे। 

ज्ञान की अहर्निश प्रज्वलित मशाल हैं।

गुरुवर गोपालदास वरैया बेमिसाल हैं।।
  ✍🏻 श्रीश राकेश जैन, लहार

मंगलवार, 25 मार्च 2025

पंडित लेखराज जी वरैया


 पंडित लेखराज जी वरैया  गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के ही समकालीन थे।आपका जन्म  वरहिया जैन समाज के मातृस्थल और पौराणिक राजा नल की क्रीड़ा भूमि ऐतिहासिक  नरवर गढ़ के समीप स्थित करहिया ग्राम में विक्रम संवत्‌  1925 में हुआ था। इनका गोत्र 'पलैया' है। इनके पिताका नाम जगराम उपनाम जगोलेराम था । जो उस समय करहिया ग्राम जागीर के प्रमुख व्यवसायी थे। करहिया ग्राम में पठन-पाठन की समुचित सुविधा न होने के कारण इनके पिताजी ने  घर पर ही इनको पढ़ाने के लिए एक शिक्षक का प्रबन्ध किया था। पंडितजी की बाल्यकाल से ही  धर्म के प्रति गहरी रुचि थी।धर्म शास्त्र में दृढ़ श्रद्धा के कारण उन्होंने 18 वर्ष की आयु में ही कन्दमूल का आजीवन त्यागकर दिया था और चारित्रिक दृढ़ता के कारण आपकी अपने समय के आदर्श व्यक्तियों में गणना होती थी।आप अत्यंत सादगी के साथ रहते थे और सदैव साधारण श्वेत वस्त्र पहनते थे और सिर पर पगड़ी बांधते थे।वह सही मायने में सरलता की प्रतिमूर्ति थे। तड़क-भड़क और दिखावा आपको तनिक पसन्द न था।आप निर्मल स्वभाव, उदारचेता और धर्म चिंतन में संलग्न रहने वाले सज्जन व्यक्ति थे । आपकी विचक्षणता, सरलता और अध्ययनशीलता से उनके संसर्ग में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।इस कारण समाज में  उनकी बहुत ख्याति थी।इतनी ख्याति और  प्रतिष्ठा के बावजूद आपमें अहंकार का लेशमात्र भी न था।आप सदैव मां  जिनवाणी  की आराधना में तल्‍लीन रहते थे।आपने जीवन पर्यन्त जैनधर्म की सेवा करते हुए उसकी धर्म पताका फहराई। कहीं भी कोई भी धार्मिक उत्सव होने पर वह सदैव उसमें यथाशक्ति सहयोग करते थे। धर्म की साधना को उन्होंने अपना जीवन लक्ष्य बना लिया था। लेकिन क्रूर काल के जटिल मारक-पाश में बंधकर 53 वर्ष की अल्पायु में ही  विक्रम संवत्‌ 1978 में माघ शुक्ला 14 को यह नक्षत्र क्षत होकर सदैव के लिए अस्त हो गया।'वरैया विलास' पंडित जी एकमात्र उपलब्ध स्वतंत्र कृति है।जिसकी भूमिका पंडित कपूरचंद जी वरैया ने लिखी है और यह लश्कर निवासी प्रसिद्ध वस्त्र व्यवसायी  लक्ष्मीचन्द वरैया ने सन् 1950 में प्रकाशित कराई थी।यह कृति दो भागों में हैं। इसके  पूर्वार्द्ध में सम्पूर्ण पूजायें संग्रहीत है और उत्तरार्ध में स्तुति, विभिन्न गायन शैली में निबद्ध उपदेशात्मक भजन और जैन बारहखड़ी संकलित हैं।आपकी ये रचनाएं अत्यंत भावप्रवण कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों दृष्टियों से सुपुष्ट, अत्यंत प्रौढ़ और गेय हैं। पंडित जी को छंदशास्त्र का ज्ञान था और वह गायन में भी निपुण थे इसलिए उनकी सभी रचनाएं छंदोबद्ध हैं।पंडित जी की एकमात्र पुत्र संतान श्री जियालाल जी थे,जो एक व्यवसायी थे।करहिया के प्रसिद्ध व्यवसायी और साहूकार श्री सुआलाल जी व श्री गेंदालाल जी इन्हीं के यशस्वी वंशज रहे हैं।

श्री गोपाल दिगंबर जैन सिद्धांत संस्कृत विद्यालय, मुरैना

कुण्डलपुर के मेले में महासभा के अधिवेशन में यह सहमति हुई थी कि सहारनपुर में संचालित जैन महाविद्यालय पंडित गोपालदास जी वरैया की देखरेख में मुरैना में संचालित किया जाए। परन्तु वरैया जी की  मुंशी चम्पतराय जी के साथ पटरी नहीं बैठती थी। इसलिए पंडित जी ने उनके साथ और उनके अधीन रहकर इस काम को करना स्वीकार नहीं किया लेकिन  इसी समय उन्हें  स्वतन्त्र रूप से मुरैना में एक जैन पाठशाला शुरू करने का विचार आया।आपके पास पंडित वंशीधर जी पूर्व से ही अध्ययनरत थे।अब दो-तीन विद्यार्थी और भी जैन सिद्धान्त का अध्ययन  करने के लिए उनके पास आकर रहने लगे।कुछ सदाशयी लोग इन विद्यार्थियों का आर्थिक सहयोग करते थे और पंडित जी  इन्हें पढ़ा देते थे । धीरे-धीरे इस विद्यालय की ख्याति बढ़ती गई और इसके बाद कुछ अन्य विद्यार्थी भी अध्ययन के निमित्त यहां आ गये और कार्य की अधिकता के कारण एक व्याकरण का अध्यापक नियुक्त करने की आवश्यकता अनुभव हुई।जिसके लिये सेठ सूरजचन्द्र जी शिवराम जी ने 30₹ मासिक की आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया। धीरे-धीरे छात्रों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि पण्डित जी को उसके लिये नियमित पाठशाला की स्थापना का निर्णय लेना पड़ा। सन् 1902 में बनी “जैन सिद्धान्त विद्यालय' नाम की यही पाठशाला आज पंडित गोपालदास संस्कृत महाविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है और इसके द्वारा जैन धर्म और जैन सिद्धांत के जानकार अनेकानेक विद्वान तैयार हुए हैं।इस पाठशाला की ख्याति समूचे जैन जगत में है। प्रारंभ में पाठशाला के साथ में  एक छात्रावास भी था। छात्रावास और उस समय पाठशाला के लिये बने भवन पर लगभग दस हजार रुपए खर्च हुए थे। पाठशाला और छात्रावास दोनों पर मोटा-मोटी 10000₹ वार्षिक का खर्च आता था।यह धनराशि पंडित जी को दान के रूप में प्राप्त होती थी। पंडित जी द्वारा रोंपा गया यह नन्हा पौधा आज विशाल वटवृक्ष बन गया है।जिसका परिसर काफी बड़ा और सर्वसुविधायुक्त है।पंडित गोपाल दास वरैया 19वीं सदी के धर्म और दर्शन के प्रकांड विद्वान और उच्च कोटि के शिक्षाविद् हैं, जिन्होंने शिक्षण में संस्कृत की उपेक्षा से व्यथित होकर अपने बूते   मुरैना में इस संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। जो धीरे-धीरे प्रदेश और देश का प्रसिद्ध शैक्षणिक केंद्र बन गया। पंडित जी सदैव निर्धन और असहाय छात्रों की आर्थिक सहायता करते थे। जैन जगत के चोटी के विद्वानों में अधिकांश इसी संस्थान की देन हैं।पंडित जी के देहावसान के बाद से विद्यालय प्रबंधन में स्थानीय जैसवाल समाज का डोमिनेंस रहा है। बाद में  श्री जवाहरलाल जी जैन (कुलैथ वाले) और श्री दिनेश कुमार जैन, एडवोकेट ने वरहिया जैन समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रबंधन समिति में उपस्थिति दर्ज कराई और उसमें प्रभावी रूप से अपना दखल बढ़ाया। वर्तमान में भी मुरैना में वरहिया जैन समाज के पांच -छह परिवार ही हैं। मुरैना का पंडित गोपालदास संस्कृत महाविद्यालय एक सार्वजनिक संस्था है जिसमें वर्तमान में वरहिया जैन समाज सहित सभी स्थानीय सर्वजातीय जैन समाज का प्रतिनिधित्व और प्रबंधकीय नियंत्रण है। इसलिए कुछ लोगों का यह उपालंभ या आरोप कि वरहिया जैन समाज और उसकी नियामक संस्थाओं ने मुरैना विद्यालय को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लिया और उस पर दूसरों को हावी क्यों होने दिया, गलत है। बिना तथ्यों की जानकारी किए आरोप प्रत्यारोप उचित नहीं है।
 

सोमवार, 10 मार्च 2025

पवाया/पद्मावती


पद्मावती जिसे आज पवाया के नाम से जाना जाता है।
 इसका उल्लेख विष्णु पुराण, बाणभट्ट कृत हर्षचरित, महाराजा भोज कृत सरस्वतीकंठाभरण आदि में आया है। महाकवि भवभूति के मालतीमाधवम् की अमर कथा इसी नगरी के इर्द-गिर्द घूमती है।भवभूति ने पद्मावती नगरी को गगनचुम्बी महलों, मन्दिरों, अट्टालिकाओं से सुसज्जित बताया है। कथा का नायक उस नगर में तत्वमीमांसा सीखने आता है। भवभूति ने स्वयं इसी नगर में शिक्षा ग्रहण की थी।
मालतीमाधवम् में उल्लिखित विवरण के अनुसार पद्मावती  सिन्धु, पारा/परा(पार्वती),लवणा/नून एवं मधुमती/महुअर नदियों की क्रोड में बसा एक समृद्ध नगर था जो सिन्धु और परा के संगम पर स्थित था। सिन्धु तथा मधुमती के संगम पर महादेव को समर्पित एक भव्य शिव मंदिर स्थित था। सर्वप्रथम एच एच विल्सन ने उज्जैन को पद्मावती के रूप में चिन्हित किया। परन्तु उज्जैन में क्षिप्रा अकेली नदी होने के कारण इस विचार को मान्यता प्राप्त नहीं हुई । स्वयं विल्सन ने ही दक्कन में औरंगाबाद के आसपास पद्मावती के अवस्थित होने की बात कही थी। फिर बाद में उन्होंने विष्णुपुराण का अध्ययन करते समय  बिहार में स्थित भागलपुर को प्राचीन पद्मावती नगरी के रूप में चिन्हित किया।
विष्णुपुराण में  नागवंशी राजाओं के मथुरा, कान्तिपुरी (मुरैना जिले में कुतवार/ महाभारतकालीन कुन्तिभोज।) और पद्मावती से शासन करने का उल्लेख आया है। अलेक्जेंडर कनिंघम ने मथुरा से निकटता के कारण शिवपुरी जिले के नरवर की पद्मावती के रूप में पहचान की। नरवर से कनिंघम को नागवंशी शासकों के सिक्के भी मिले थे जिससे उनका यह विश्वास और दृढ़ हुआ।
लेकिन बाद में एम वी लेले और एम बी गार्डे ने मालतीमाधवम् में वर्णित  नदियों के आधार पर ग्वालियर जिले में डबरा के निकट स्थित पवाया ग्राम को ही पद्मावती के रूप में पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर स्पष्टता के साथ चिन्हित किया। जिसे इतिहासविदों के बीच व्यापक मान्यता प्राप्त हुई।सन् 1920 में सर जॉन मार्शल के पवाया में आगमन से उत्खनन का सिलसिला शुरू हुआ जो 1942 तक चला। इसमें एक बड़ा ईंटों का बना मन्दिर, ताड़पत्र स्तम्भ, यक्ष मणिभद्र, सूर्य/नारायण की एक मूर्ति तथा वामनावतार की कथा से अलंकृत एक तोरण शीर्ष प्राप्त हुआ। ये सभी पुरावशेष ग्वालियर किले में स्थित गूजरी महल संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं।
 शिव मंदिर की इमारत कई शताब्दियों पुरानी है। ये वही स्थान प्रतीत होता है जो आठवीं शताब्दी में रचित मालतीमाधवम् में एक प्राचीन सुवर्णबिन्दु नामक शिवालय के रूप में वर्णित है। जिसमें उल्लेख आया है कि “यहाँ स्वर्णबिन्दु नामक पवित्र भगवान शिव हैं, जिन्हें किसी मानव ने स्थापित नहीं किया है, जो मधुमती और सिंधु नदी के संगम को पवित्र करते हैं।”  यह प्राचीन शिवलिंग अपनी अलौकिक दिव्यता बिखेरता हुआ आज भी मौजूद है।
मालतीमाधवम् में जिस शिवालय का वर्णन है वह मधुमती और सिन्धु के संगम पर स्थित था। लेकिन मधुमति/महुअर नदी यहाँ से कुछ मील दूर जाकर सिन्ध में मिलती है। डेढ़ हजार साल के लंबे कालखंड में कदाचित महुअर ने अपने मार्ग को किंचित परिवर्तित किया हो जो अब सिन्ध के समान्तर ही बहती है।   
 पवाया गाँव जो कभी वैभवशाली और समृद्ध महानगर रहा है  आज एक निहायत छोटा और पिछड़ा गाँव है। यहां के नाग शासक काफी शक्तिशाली और प्रभावशाली रहे हैं और इस बात का अनुमान तो हम पृथ्वी के शेषनाग के फन पर टिके होने के मिथक से सहज ही लगा सकते हैं।
         वायु पुराण में उल्लेख आया है कि नौ नागों ने चंपावती या पद्मावती पर और सात नागों ने मथुरा पर शासन किया था, लेकिन किसी के नाम का उल्लेख इसमें नहीं है। विष्णु पुराण में कथन आया है कि नागों ने पद्मावती, कांतिपुरी और मथुरा में शासन किया था।पवाया में पाए गए सिक्कों पर नौ से अधिक शासकों, भव, भीम, बृहस्पति, देव, गणपति, प्रभाकर, पुम, स्कंद, वसु, विभु, वीरसेन, वृष और व्याघ्र का उल्लेख है । नाग वंश का अंत चौथी शताब्दी  के उत्तरार्ध में हुआ जब उनका राज्य प्रभावशाली गुप्त साम्राज्य में विलीन हो गया। इनमें से कांतिपुरी की पहचान आधुनिक कुतवार/कोटवाल(यह गाँव मुरैना के पूर्व, ग्वालियर के उत्तर और गोहद के पश्चिम में आसन नदी के किनारे स्थित है। यह बानमोर से लगभग 18 किलोमीटर और ग्वालियर से 30 किलोमीटर दूर है । यह मुरैना से 22 किलोमीटर दूर है) गांव के रूप में की गई है जो पद्मावती के उत्तर-पूर्व में लगभग 75 मील और मथुरा के दक्षिण में लगभग उतनी ही दूरी पर स्थित है। ये तीनों स्थान एक दूसरे के बहुत निकट हैं, इसलिए ये तीन अलग-अलग नाग राजवंशों की राजधानियां नहीं हो सकतीं। मथुरा और कांतिपुरी में पाए गए सिक्के ज्यादातर गणपति नाग के हैं।ये तथ्य हमें यह संकेत देते हैं कि देश के इस भाग में एक ही नाग शासक का साम्राज्य था जिसकी राजधानी पद्मावती थी और मथुरा, कांतिपुरी और विदिशा, जहां नागवंशी शासकों के सिक्के पाए गए हैं, नाग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान थे।
साहित्यिक साक्ष्य के अलावा, पद्मावती नगरी के कुछ अभिलेखीय संदर्भ भी हैं। खजुराहो के वैद्यनाथ मंदिर का एक शिलालेख, जिसकी तिथि 1000-1001 ई. है, पद्मावती की अप्रतिम सुंदरता का वर्णन करता है। शिलालेख में उल्लेख है, "पृथ्वी की सतह पर एक अद्वितीय (नगर) था, जो ऊंचे महलों से सुसज्जित था, जिसके बारे में दर्ज है कि इसे स्वर्ण और रजत युग के बीच पृथ्वी के किसी शासक, लोगों के स्वामी, जो ब्राह्मण जाति का था, ने स्थापित किया था, (एक ऐसा शहर जिसे) इतिहास में पढ़ा जाता है (और) पुराणों में पारंगत लोग इसे पद्मावती कहते हैं। पद्मावती नामक यह सबसे उत्कृष्ट (नगर), अभूतपूर्व तरीके से बनाया गया था, महलों की गलियों की ऊंची पंक्तियों से भरा हुआ था, (और) यह चमकदार महलनुमा आवासों से भरा था जो बर्फीले पहाड़ की चोटियों जैसे लगते थे।”
        गार्डे ने सन् 1916 में साहित्यिक साक्ष्य के अलावा गांव में पाए गए पुरातात्विक अवशेषों और भवभूति के मालती माधव नाटक में वर्णित पद्मावती के परिवेश के आधार पर पवाया ग्राम को पद्मावती नगरी के रूप में चिन्हित करने की एम वी लेले की स्थापना का समर्थन किया।पवाया गांव सिंध और पार्वती नदियों के संगम पर स्थित है। गांव से लगभग 3 किमी दक्षिण पश्चिम में सिंध नदी पर एक झरना है। इस झरने के बगल में धूमेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। महुआर नदी लगभग 3 किमी दक्षिण में सिंध में मिलती है। इस संगम पर शिवलिंग को सहारा देने वाला एक मंच है, संभवतः वह स्थान जहाँ नाटक में वर्णित प्राचीन सुवर्णबिंदु था। नून/लवणा नदी पवाया से लगभग 7-8 किमी दूर सिंध में मिलती है।

गुरुवार, 6 मार्च 2025

डोभ कुंड शिलालेख


 डोभ कुंड (ग्वालियर ) से प्राप्त प्रसिद्ध शिलालेख में जैन धर्मप्रेमी कच्छपघात वंशी राजा विक्रमसिंह तथा जायसवाल श्रावकों का उल्लेख है।यह शिलालेख विक्रम संवत 1145 का है जिसे  डोभ कुंड के मंदिर में सन्‌ 1866 में केप्टन डब्ल्यू आर मेलविले ने खोजा था,जो एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम दो में पृष्ठ 232-40 पर संकलित है। यह जिनालय के निर्माण की प्रशस्ति है । इस  प्रशस्ति की रचना श्री विजयकीर्ति महाराज ने की थी ।  जिसको उदयराज ने  पाषाण पर लिखा था और तिल्हण ने उत्कीर्ण किया था।यह मंदिर आज भले ही भग्नावस्था में हो, लेकिन उसकी स्थापत्य कला चमत्कृत करती है।यहां का मूर्ति शिल्प बेजोड़ है। मंदिर में 81 फीट के चबूतरे पर चौबीसी का निर्माण किया गया है।चौबीसी के चारों ओर एक प्लेटफार्म पर गजरथ का निर्माण कर इसे सुंदरता प्रदान की गई है।कलात्मक चौबीसी के प्रत्येक भाग पर तीर्थंकर विराजमान थे, पर अब ये खाली हैं। बताते हैं किे मंदिर के प्रवेशद्वार पर दो कलात्मक स्तंभ थे, जो अब नहीं  हैं। डोभ का प्राचीन नाम चडोभ है।राजा विक्रम सिंह कच्छपघात ने डोभ की राजगद्दी संभालने और डोभ को राजधानी का दर्जा देने के बाद जैनाचार्य शांति देव के प्रभाव में आकर यहां नगरवासियों के माध्यम से एक भव्य और विशाल जिनालय का निर्माण कराया था।इन जैन मुनि के शिष्य विजय कीर्ति ने नागरिकों को इस मंदिर के निर्माण में सहभागिता के लिए प्रेरित किया था। राजा द्वारा मंदिर के प्रबंधन में सभी का सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से  मंदिर के संचालन के निमित्त 'विंशोपक कर' का प्रावधान किया था जिस कारण अनाज के रूप में कर वसूला जाता था,जो प्रत्येक गौणी पर एक विंशोपक अनाज कर के रूप में तथा तेल निकालने का कारोबार करने वालों को भी इसी परिमाण में मंदिर के लिए तेल दान देना होता था।विंशोपक से आशय इकाई के बीसवें भाग से है।राजा विक्रमसिंह ने मंदिर के प्रबंधन में सौकर्य की दृष्टि से महाचक्र ग्राम में चारगोणी गेहूं बोने योग्य खेत तथा रजकद्रह के पूर्व में एक बाग कूप सहित प्रदान किया था तथा  दीपकादि के लिये कुछ घड़े तेल के प्रदान किये थे और इस आशय की राजाज्ञा जारी की थी कि भविष्य में भी उनके परवर्ती राजा इसका पालन करते रहेंगे।डोभ कुंड से प्राप्त अभिलेख का उसके विषय में इस परिचयात्मक विवरण के साथ मैं यहां इस प्रयोजन से उल्लेख कर रहा हूं ताकि 'वरैया' पाठ की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़े गए  निराधार तर्क की निरर्थकता रेखांकित कर सकूं। आदरणीय पंडित सुगनचंद जी आमोल वालों (पंडित जी के अलावा कुछ अन्य लोगों का भी यह अभिमत हो सकता है) ने ग्वालियर के विद्वान पंडित हरिहर निवास द्विवेदी के दैनिक भास्कर में सन् 1986 के आसपास लिखे एक लेख (जिसकी प्रति अब उपलब्ध नहीं है) का हवाला देकर उन्होंने मुझे डोभ कुंड के शिलालेख में उल्लिखित विंशोपक और 'वरैया' शब्द के बीच सहसम्बंध और विंशोपक माप की वरैया शब्द (माप के लिए इस्तेमाल होने वाली एक टोकरी, उनके कथनानुसार)से तुल्यता स्थापित करते हुए बताया कि विंशोपक संग्रहण का दायित्व संभालने वाले समुदाय को ही कालान्तर में वरैया नाम से संबोधित किया जाने लगा। मेरे लिए यह एक नूतन अवधारणा थी इसलिए मैंने पंडित जी के इस दावे का परीक्षण करने के लिए 'एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम 2' और 'मध्यप्रान्त, मध्यभारत और राजपूताने में जैन स्मारक' पुस्तकें  जिनमें डोभ कुंड का अभिलेख संकलित किया गया हैं,यत्नपूर्वक जुटाईं और उनका अध्ययन किया। जिससे पता चला कि उक्त दावा एक कपोल-कल्पना मात्र है और डोभ स्थित जिनालय के निर्माण में जो लोग संलग्न थे,वे जायसवाल/जैसवाल समुदाय से थे।यह तथ्य अभिलेख से स्पष्ट है और विंशोपक से आशय उपार्जन के बीसवें भाग से रहा है और वरैया शब्द से उसका दूर या निकट का कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि पान की खेती के लिए बने झुरमुटों में बांस की जिन पनालियों का इस्तेमाल किया जाता है,वे 'बरई' कहलाती हैं और पान की खेती करने वाले लोगों को 'बरैया' नाम से संबोधित किया जाता है।