सोमवार, 9 जनवरी 2023

परवार जैन


 
परवार जाति के पूर्वज परमार क्षत्रियों के वंशज हैं, यह तथ्य इतिहास सिद्ध है। इसके लिए परमार, पंवार, पुरवार, पोरवार, पोरवाड़, पोरवाल, पद्मावती पोरवाड़ या जांगड़ा पोरवाल आदि अनेक नामान्तर प्रचलित हैं। ये भिन्न भिन्न प्रदेशों में निवास करते हैं ।
         परवार जाति में बारह गोत्र मान्य है और प्रत्येक गोत्र में बारह-बारह मूर है, फलतः कुल १४४ मूर है ।(मूर शब्द संस्कृत 'मूल' का अपभ्रंश है।) इनके अलावा १४५वाँ मूर भी है, जिसका नाम 'सिंहबाघ' अथवा 'सदाबदा' कहा जाता है । यह अन्तिम गोत्र का मूर माना जाता है। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति का परिवार देशान्तर चला गया हो अथवा कालान्तर में अपना मूर-गोत्र भूल गया हो तो वह जातीय पंच उसे अन्तिम गोत्र और तेरहवाँ मूर प्रदान कर देते थे और इसी आधार पर विवाहादि कार्य पंच सम्पन्न करा देते थे ।
         'मूर' शब्द मूल स्थान का वाचक है और मूल से तात्पर्य मूल निवास स्थान से है । जो व्यक्ति देशान्तर में निवास करता है उसका परिचय लोग मूल निवास स्थान से आज भी लेते हैं। परवार जाति के प्रत्येक व्यक्ति के गोत्र के साथ 'मूर' भी पृथक् पृथक् पाया जाता है। परवार जाति का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसका कोई गोत्र और मूर न हो। इसका यह अर्थ हुआ कि ये वर्तमान में भले ही मध्यप्रदेश में निवास करते हैं तो भी इनका मूल निवास कहीं अन्यत्र रहा है और ये किसी राजनीतिक और धार्मिक कारण से अपने मूल निवास को छोड़कर मध्यप्रदेश और उसके आसपास आकर बसे हैं । जो जिस ग्राम के पूर्व निवासी हैं उसी ग्राम को वे अपना मूर (मूल) आज भी मानते हैं, भले ही वे इस बात को आज न जानते हों, परन्तु उन्हें इस वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिये।
          गुजरात प्रान्त में अनेक ग्राम इस प्रकार पाये जाते हैं जिनसे यह मान्यता स्पष्ट होती है कि परवार जाति के मूर इन्हीं ग्राम-नामों पर हैं- जैसे ईडर के निवासी 'ईडरीमूर', रखियाल ग्राम के निवासी ' रखयामूर', नारदपुरी से 'नारद', दुद्दो से 'देदामूर', लोटासन से 'लोटामूर', कठासा से 'कठामूर', पटवारा से 'पटवामूर', बहेरियारोड से 'बहेरियामूर' आदि । इस प्रकार ग्रामों और मूरों का परस्पर संबंध स्पष्ट है। तात्कालिक राजनीतिक, धार्मिक कारणों और प्राकृतिक विपदाओं के कारण परवार जाति के लोगों को अपने धर्म एवं मूलसंघ की रक्षा के लिए गुजरात प्रदेश छोड़कर मध्यप्रदेश मे आकर बसना पड़ा था।  यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जिन परमार क्षत्रियों ने तत्कालीन गुजरात प्रदेश के श्वेताम्बर धर्म के अनुयायी राजाओं के दबाव से दि० जैनधर्म छोड़कर श्वेताम्बर धर्म स्वीकार कर लिया. उन्हें उन राज्यों से निष्कासित नही किया गया। वे श्वेताम्बर हो गये, इसलिए श्वेताम्बरों में भी परमार पाये जाते हैं ।
            गुजरात प्रान्त छोड़कर जब मूलसंघ के अनुयायी परवार जाति के लोगों को अपने धर्म की रक्षा हेतु देशान्तर जाना पड़ा तो उस समय मालवा, उज्जैन, चंदेरी, सिरौंज, टीकमगढ़, पन्ना और छतरपुर आदि स्थानों में परमार / बुन्देला तथा अन्य क्षत्रिय वंशों का शासन था । इनमें अनेक राज्य / रियासतें जैनधर्म की अनुयायी थी या उससे प्रभावित थीं। अतः वहाँ परवारों को आश्रय मिला। चूंकि परवार जाति के लोग उन क्षेत्रों में पहिले से निवासरत थे इसलिए आगत लोगों को यहां बसना सुविधाजनक लगा।परवार समाज यहाँ आज भी बहुतायत में पाया जाता है। छतरपुर बुंदेलखंड में एक प्रतिष्ठित राज्य था। यहाँ के शासक बुन्देला परमार क्षत्रिय थे तथा जैनधर्म से पूर्ण प्रभावित थे | उनके राज्य में जैनियों की बड़ी प्रतिष्ठा थी ।उस समय बुन्देलखण्ड के क्षत्रिय जैनधर्म के अनुयायी भी थे या उसके अनुकूल थे और इसलिए भी गुजरात से आये उन दि. जैन भाइयों को उन्होंने अपने-अपने राज्य में आश्रय दिया था। इसी तरह उज्जैन, चंदेरी सिरौंज, ओरछा आदि राज्यों में भी उनको आश्रय मिला । अतएव इन अंचलों में परवार समाज की जनसंख्या आज भी बहुतायत में पाई जाती है। स्मरण रहे कि मूल आम्नायी दि. जैन परवार, गोला पूर्व, गोलालारे तथा गोलसिंघारे -इन जैन जातियों का यहाँ पहिले से निवास था, इसलिए  गुजरात छोड़कर यहाँ बसने का निर्णय उचित और स्वाभाविक था ।
    वैवाहिक सम्बन्ध :
           परवार जाति में परस्पर में वैवाहिक सम्बधों में गोत्र तो बचाया ही जाता है, साथ ही मूरों को भी बचाया जाता है। अपने मूर के साथ ही अपने  माता और पिता की आठ पीढ़ियों या चार पीढ़ियों का मूर बचाकर ही सम्बन्ध किया जाता रहा है और इसी आधार पर  'अठसखा' (अष्टशाखा) और चौसखा कहलाए। चौसखा  चार शाखाओं का बचाव करके विवाह करते थे,  और दोसखा दो शाखाओं का बचाव करके विवाह करते थे। वर्तमान में अब केवल चार या दो शाखाओं का ही विचार किया जाता है और ऐसा प्रायः सभी समुदायों में देखा जा रहा है।
     जिन पट्टावलियों, शिलालेखों अथवा प्रतिमालेखों में 'अष्टशाखा' या 'चौसखा' आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है, उसमें परवार शब्द का उल्लेख न भी हो अथवा अठसखा और चौसखा के साथ पोरवाल या पोरवाड़ जाति का उल्लेख हो तो वे सब भी परवार जाति के ही नामांतर माने जाने चाहिये ।
      परवार जाति में जो बारह गोत्र मान्य है, उनका कोई इतिहास नहीं मिलता । किन्तु इसी प्रकार के कई गोत्र अग्रवालों में तथा गहोई जाति में (जो वर्तमान में जैन नहीं हैं) में भी पाये जाते हैं अथवा इनसे मिलते-जुलते शब्दों वाले गोत्र पाये जाते हैं। 'कच्छी बीसा ओसवाल जैन संघ' पुस्तिका में इस समाज के छह गोत्र तथा 88 अटक (उपगोत्र)लिखे हैं | इनमे 'परमार' भी एक गोत्र है। वर्तमान मे 35 अटक है, जिनमें पुरवाज सोरठिया, लोटा सुरखिया आदि है, जो परवार जाति के मूरों से मिलते हैं | सम्भव है कि इन मूर वालों ने श्वेताम्बर धर्म स्वीकार कर लिया हो । उक्त उदाहरणों से यह बात सिद्ध होती है कि कालान्तर में एक गोत्र के भीतर भी अनेक जातियाँ बन गई हैं। साथ ही धर्म का पालन करना व्यक्तिगत आस्था के आधार पर ही रहा है। इसीलिए अग्रवाल, खंडेलवाल, पोरवाड़, पोरवाल, गहोई, जैसवाल तथा नेमा - इन जातियों में जैन धर्मानुयायी तथा वैष्णव धर्म के अनुयायी भी पाये जाते हैं। यद्यपि गहोई जाति में  आज जैन धर्मानुयायी नहीं हैं, परन्तु ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी मे उनके द्वारा प्रतिष्ठित दि. जैन प्रतिमायें दि.जैन तीर्थ क्षेत्र अहार ( टीकमगढ़, म.प्र. ) के संग्रहालय में हैं। अहार क्षेत्र की मूल नायक शांतिनाथ भगवान् की प्रतिमा भी 'गहोई वंश' के द्वारा प्रतिष्ठित है । उसमें इन्हें गृहपति अन्वय के नाम से उल्लेखित किया गया है | गृहपति शब्द का प्राकृत भाषा में 'गिहवई' और 'गहवई' रूप बनता है और बोल-चाल की भाषा में वह 'गहोई' शब्द  के रूप में प्रचलित हो गया है। परवारों और गहोइयों के नौ गोत्र आपस में मिलते हैं।गहोईयों में एक आंकना (मूर) सरावगी भी है जो परवार और गहोई जातियों के बीच निकटता दर्शाता है।नन्दिसंघ की पट्टावली से मालूम होता है कि आचार्य अमृतचन्द्र वि. सं. 962 में नन्दिसंघ के पट्ट पर बैठे थे ।पट्टावलियों से यह भी पता चलता है कि वि. सं. 4 में आचार्य भद्रबाहु द्वितीय से मूलसंघ प्रारम्भ हुआ। उनकी शिष्य परम्परा मे वि. सं. 142 में लोहाचार्य हुए । शिष्य परम्परा की दृष्टि से वह दो शाखाओं में विभक्त हो गया। पहला पूर्वपट्ट कहलाया, जो मूलसंघ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और दूसरा उत्तरपट्ट कहलाया।पं. नाथूराम 'प्रेमी' के शब्दों में 'पुरवाट्', 'प्राग्वाट्' ये नाम परवार जाति के लिए प्रयुक्त किये जाते थे। यह भारतीय इतिहास की जाति विषयक एक विचित्रता कही जा सकती है कि किसी समय में क्षत्रिय तथा श्रेष्ठिवर्ग (वैश्य कुल) में विवाह सम्बन्ध अनुज्ञेय थे। 'पुरातन प्रबन्ध' में नाडोल के लक्ष्मण चौहान का विवाह एक श्रेष्ठी की पुत्री से होना लिखा है। अग्रवाल, माहेश्वरी, जैसवाल, खण्डेलवाल और ओसवालों का उद्भव क्षत्रियों से बताया जाता है। इनको अहिंसक होने और वाणिज्य व्यापार संलग्न रहने के कारण भले ही वैश्य कहा जाने लगा हो लेकिन आज भी इनके रक्त में स्वाभिमान झलकता है।
      उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि "पोरपाट" का सर्व प्रथम उल्लेख अहार जी के मूर्तिलेखों में मिलता है। पौरपट्ट या परवार जाति का 16वीं-17वीं शताब्दी तक  गुजरात से लगातार सम्पर्क बना रहा है। परवार जाति के लोगों का रूप-रंग,रहन-सहन आदि से काफी हद तक उनका मेल खाता है। परवार जाति में 12 गोत्र जिस प्रकार के पाये जाते हैं, उसी से मिलते-जुलते जुझोतिया ब्राह्मण, अग्रवाल, गहोई व अन्य वैश्यों में भी पाए जाते है। प्रेमी जी की इस मान्यता में वजन मालूम होता है कि वैश्यों की लगभग सभी जातियाँ राजस्थान से निकली है । 'पद्मावती पोरवाल' परवारों की ही एक शाखा मानी गई है। जिसका उल्लेख पं. बखतराम ने 'बुद्धि विलास' ग्रन्थ में श्रावकोत्पत्ति प्रकरण मे किया है- “पौरपाट” शब्द का प्रथम प्रयोग वि. सं. 610 के साढोरा ( गुना) स्थित मूर्ति लेख में मिलता है। इसके पूर्व का अभी तक न तो "प्राग्वाट" का और न "पौरपट्ट" का कोई उल्लेख मिलता है। वास्तव में प्राग्वाट > पौरपट्ट से विकसित होकर पोरवाड, परवाड, परवाल, परवार शब्द निकला है । मूर्तिलेखो में जो वि. सं. 1089 से लेकर वि. सं. 1789 तक के उपलब्ध होते है, उनमें परवार जाति के लिए 'पोरपट्ट' शब्द का प्रयोग मिलता है। प्राग्वाट और पौरपट्ट एक ही कहा गया है। "
  श्री अगरचन्द जी नाहटा के मत से- 

"वर्तमान गोडवाड़, सिरोही राज्य के भाग का नाम कभी प्राग्वाट प्रदेश रहा था ।"
श्वे० मुनि जिनविजयजी के मतानुसार -
'अर्बुद पर्वत से लेकर गौड़वाड़ तक के लम्बे प्रान्त का नाम पहले प्राग्वाट प्रदेश था।'
स्व.श्री गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के विचारानुसार-
"पुर" शब्द से "पुरवाड़" और "पोरवाड़" शब्दों की उत्पत्ति हुई है । "पुर" शब्द मेवाड़ के "पुर" जिले का सूचक है और मेवाड़ के लिये प्राग्वाट भी लिखा मिलता है। "
श्री ओझा जी “राजपूताने का इतिहास" की पहली जिल्द में लिखते हैं -
“करनवेल (जबलपुर के निकट) के एक शिलालेख में प्रसङ्गवशात् मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा हंसपाल, बेरिसिंह और विजयसिंह का वर्णन आया है, जिसमें उनको "प्राग्वाट" का राजा कहा गया है। अतएव  "प्राग्वाट" मेवाड़ का ही दूसरा नाम होना चाहिए। संस्कृत शिलालेखों तथा पुस्तकों में पोरवाड़ महाजनों के लिये “प्राग्वाट" नाम का प्रयोग मिलता है और वे लोग अपना निवास मेवाड़ के "पुर" नामक कस्बे से बतलाते हैं, जिससे सम्भव है कि “प्राग्वाट" देश के नाम पर वे अपने को प्राग्वाट वंशी कहते रहे हों।"
श्री डॉ. विलास आदिनाथ संघवे, प्रोफेसर राजाराम कालेज, कोल्हापुर ने “जैन कम्युनिटी : ए सोसल सर्वे" मे 84जातियों के उल्लेख के प्रसंग में "परवार" जाति का निकास "पारानगर" से माना है । उस सूची से यह तो नहीं मालूम पड़ता है कि यह "पारानगर" कहाँ है ? फिर भी इस नगर के उल्लेख से ऐसा मालूम होता है कि या तो "पोरवा” नगर को "पारानगर" कहा  है या फिर "पुरमण्डल" को  पारानगर पद से सम्बोधित किया गया है। जो कुछ भी हो, इतना तो सुनिश्चित है कि इस अन्वय का निकास "प्राग्वाट" प्रदेश से और उससे लगे हुए पोरबन्दर तक के प्रदेश से ही हुआ है। इस स्थान को पोरबन्दर कहने का कारण भी शायद यही है ।वर्तमान में “मूल” के अर्थ में “मूर" या "शाख" शब्द प्रचलित है । अब देखना यह है कि पौरपाट (परवार) अन्वय में जो 144 या 145 मूल प्रसिद्ध हैं, वे क्या है ? पौरपाट (परवार) अन्वय का निकास मूल में मेवाड़ और गुजरात के उस भाग से हुआ है जो "प्राग्वाट" प्रदेश कहा जाता है। दूसरी इससे यह बात भी फलित होती है कि जिस ग्राम, कस्बा या नगर से आकर जो कुटुम्ब इस अन्वय में दीक्षित हुए हैं उनका मूल" वही स्वीकार कर लिया गया है। इसका यह अर्थ हुआ कि महाराष्ट्र में जिस अर्थ में "कर" शब्द का प्रयोग किया जता है, उसी अर्थ में पौरपाट अन्वय में “मूल" शब्द का प्रयोग किया जाता है तथा गोत्र के अन्तर्गत होने से उन्हें शाख भी कहा जाता है।ये बारह गोत्रों के 144 मूर (मूल) या शाखा हैं।
        जैसा कि पहले बताया है कि  इस अन्वय प्रत्येक गोत्र के अन्तर्गत जो 12-12 मूल हैं वे ग्रामों के नामों के आधार पर ही हैं। अर्थात् जिस ग्राम के रहवासी जिस कुटुम्ब ने इस अन्वय को स्वीकार किया उस कुटुम्ब का वही मूल हो गया। इसकी पुष्टि में हम यहाँ पर एक तुलनात्मक सूची दे रहे हैं। वह इस प्रकार है-
1. ईडरीमूल ईडरशहर में रहने वालों का मूल ईडर है 
2. रक (ख) या मूल रखयाल ग्राम (सौराष्ट्र) में रहने वालों का मूल रखयाल है ।
3. नारद मूल मारवाड़ के मेड़ता जिले के पार्श्वनाथ मन्दिर में नारदपुरी का उल्लेख है।
4. कठिया मूल-काठियाबाड़ के निवासियों के इस अन्वय में सम्मिलित होने पर उनका मूल 'कठिया' प्रसिद्ध हुआ।
5. दुगायत मूल-दो नदियों का संगम स्थान (गुजरात), उसके आस-पास रहने वालों का मूल दुगायत हुआ।
6. पद्मावत मूल -इस शहर के रहने वाले।
7. पद्मावती मूल-पद्मावती शहर (गुजरात) में रहने वाले । 8.बेला-बेला स्टेशन (सौराष्ट्र), डिम या डिम्मका अर्थ छोटा होता है। बेलाडिम अर्थात् बेला नाम का छोटा ग्राम |
9. बहुरिया मूल-बहेरिया रोड स्टेशन है। बहेरिया में रहने वाले । 10.मांडू-माडलगढ़का संक्षिप्त नाम मांडू है, के रहने वाले ।
11. कुआ-गुजरात में एक ग्राम का नाम कुआ या पाटना कुआ है। एक दूसरा गाँव रानकुआ भी है।
12. कठा-कठासा स्टेशन (यहाँ के रहने वाले )
13.पटवा मूल-पटवारा स्टेशन के रहने वाले
14. लोटा मूल-लोटासा स्टेशन के रहने वाले
15. छना मूल-छना खड़ा स्टेशन के रहने वाले
16.बाला मूल-बाला रोड स्टेशन, बाला ग्राम या  बल्लापुर ग्राम के रहने वाले
17. डेरिया मूल-डेरोन स्टेशन
18. डंडिया मूल-डंडिया एक खेड़े का नाम है, उस पर से इस नाम से प्रसिद्ध
19. देदा मूल-दुद्दा स्टेशन
20. किड मूल-किडिया नाम का नगर है
21. धना मूल-धनाखड़ा स्टेशन, इस ग्राम के रहने वाले
22. उजया मूल-उजेडिया ग्राम रहने वाले
23.. किड मूल-किडिमा नगर के रहने वाले
24.सर्व छोला मूल छोला स्टेशन |
25.गोदू मूल-गोदो ग्राम के रहने वाले
26.तका मूल -टाका टुक्का ग्राम के
27.बंसी मूल-बंसी पहाड़पुर स्टेशन में रहने वाले ।




गुरुवार, 29 दिसंबर 2022

पल्लीवाल जैन


 परंपरागत रूप से जैन धर्मावलंबियों की 84 जातियां मानी जाती है जबकि इनकी संख्या 84 से अधिक रही है। कालांतर में इनमें से कुछ जातियों का लोप हो गया और कुछ अन्य प्रमुख जातियों में अंतर्भूत हो गईं।इस प्रकार इनकी संख्या घट गई लेकिन 50 से अधिक जातियां, जो समाज की विभिन्न गतिविधियों में भाग लेती रहती हैं वर्तमान में हैं।

पल्लीवाल जैन जाति भी इन्हीं 84 जातियों में गिनी जाती है और 84 जातियों का नामोल्लेख करने वाले सभी लेखकों ने पल्लीवाल जाति का उल्लेख किया है। यह जाति वर्तमान में प्रमुख रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एव महाराष्ट्र प्रान्त में मिलती है । जयपुर के पं. बख्तराम साह ने अपने 'बुद्धि विलास' में पल्लीवाल जाति को प्रथम 32 जातियों में गिनाया है। कुछ विद्वान पल्लीवाल जाति का सम्बंध मारवाड़ के पाली नगर से जोड़ते हैं लेकिन पल्लीवाल जैन जाति के इतिहास के विद्वान लेखक डाक्टर अनिल कुमार जैन ने अपना भिन्न मत व्यक्त किया है और पल्लीवाल जाति की उत्पति उत्तर भारत के पाली नगर से न मानकर दक्षिण भारत के पल्ली नगर से मानी है और अपनी इस स्थापना के समर्थन में विद्वान लेखक ने जो तर्क प्रस्तुत किये हैं वे विश्वनीय और तर्कसंगत लगते हैं। यह सही भी है कि यदि पाली नगर से पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति हुई होती तो वह पालीवाल कहलाती, पल्लीवाल नहीं, क्योकि 'आ' के स्थान पर 'अ' के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं जान पड़ता और 'ली के स्थान पर 'ल्ली' का प्रयोग भी शब्दों के सरलीकरण के विरुद्ध है। लेकिन प्रश्न यह भी है कि पल्लीवाल जाति के अधिकांश परिवार उत्तर भारत में ही क्यों मिलते हैं। उसके सम्बन्ध में भी लेखक ने जो शोध किया है उसके आधार पर पल्लीवाल जाति का सामाजिक, भौगोलिक और राजनीतिक कारणों से दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर पलायन होना मालूम होता है। फिर भी इस सम्बन्ध में और अधिक शोध करने की आवश्यकता है।

पल्लीवाल जैन जाति मूलतः दिगम्बर जैन जाति ही रही है। अब तक जितनी भी सामग्री प्राप्त हुई है वह इसे दिगम्बर ही सिद्ध करती है । डाक्टर अनिल कुमार जैन ने आचार्य कुन्दकुन्द को पल्लीवाल जाति का सिद्ध करके हमारे इस कथन की पुष्टि ही की है कि पल्लीवाल जैन जाति मूलतः दिगम्बर जैन धर्मानुयायी ही रही है। वर्तमान में भी पल्लीवाल जैन जाति के जितने परिवार है उनमें अधिकांश दिगम्बर जैन धर्मानुयायी ही है। यही स्थिति मन्दिरों की भी रही है।
इस जाति में कितने ही कवि एवं श्रेष्ठी हुये हैं। 12 वीं शताब्दी में धनपाल कवि हुये, जिन्होंने तिलक मंजरी के आधार से तिलक मंजरी कथा-सार नामक ग्रंथ लिखा था। कवि पल्लीवाल दिगम्बर जैन धर्मानुयायी थे।
18 वीं शताब्दी में होने वाले कवि मनरगलाल के नाम से सभी परिचित होंगे। ये कन्नौज के रहने वाले थे तथा इन्होंने कितने ही ग्रंथों की रचना की थी। 19 वीं शताब्दी में होने वाले कविवर दौलतराम जी के भक्ति एवं अध्यात्म से सराबोर भजनों एवं छहढाला का तो सभी गुणी जनों ने स्वाध्याय  किया होगा। ये दोनों पल्लीवाल समाज के रत्न हैं।
श्री नाथूराम जी 'प्रेमी के अनुसार कुछ जातियां तो भौगोलिक कारणों से, (देश, प्रान्त व नगरों के कारण) बनी है। जैसे - ब्राह्मणों की औदीच्य, कान्यकुब्ज, सारस्वत, गौड़ आदि जातियां। उदीचि प्रर्थात् उत्तर दिशा के औदीच्य, कान्यकुब्ज देश के कान्यकुब्ज या कनोजिया, सरस्वती तट के सारस्वत और गौड देश ( बंगाल) के गौड़ । इसी प्रकार श्रीमाल जिनका मूल निवास था, वे श्रीमाली कहलाये, जो ब्राह्मण भी हैं, वैश्य भी है और सुनार भी है। इसी प्रकार खण्डेला के रहने वाले खण्डेलवाल ओसिया के ओसवाल, मेवाड़ के मेवाड़ा, लाट (गुजरात) के लाड आदि । जातियों के सम्बन्ध में एक यह बात ध्यान रखने की है कि जब किसी राजनैतिक, प्राकृतिक अथवा धार्मिक कारणों से कोई समूह अपने स्थान या प्रान्त को छोड़कर दूसरे स्थान पर जा बसता था तब ही ये नाम उन्हें प्राप्त होते थे और नये स्थान के स्थायी निवासी बन जाने पर धीरे-धीरे उनकी उसी नाम से एक जाति बन जाती थी। उदीचि अर्थात उत्तर के ब्राह्मणों का दल जब गुजरात में आकर बसा तब यह स्वाभाविक ही था कि उस दल के लोग अपने जैसे अपने ही दल के लोगों के साथ सामाजिक सम्बन्ध रखें और इसलिए अपनी विशिष्ट पहचान के लिए औदीच्य कहलाने लगे ।कुछ जातियां सामाजिक कारणों से बन गई है, जैसे- दस्सा बीसा, पाँचा आदि भेद और परवारों की चौसखा, दोसखा आदि शाखाएं | कुछ जातियां धार्मिक विचार-भेद से  और कुछ अपने परंपरागत व्यवसाय के आधार पर भी कई जातियां बनी, जैसे-सुनार, लुहार, धीवर, बढ़ई, कुम्हार, चमार आदि। बाद में इन जातियों में भी प्रान्त, स्थान, भाषा आदि के कारण सैकड़ों उपभेद हो गये ।
 कई जातियां प्राचीन काल के गणतन्त्रों या पंचायती राज्यों के अवशेष हैं, जैसे -पंजाब के अरोड़ा (अ) और खत्री (क्सप्रोई), गोरखपुर - आजमगढ़ के मल्ल, आग्रेय गण के अग्रवाल आदि। ये गणतन्त्र एक तरह के पंचायती और स्वशासी राज्य थे। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में बताया है कि वैश्य कृषि, पशुपालन और वाणिज्य के अलावा शस्त्र भी धारण करते थे। जब इनकी स्वाधीनता छिन गई और एकतंत्रीय राज्यों ने इनका उन्मूलन कर दिया तब ये शस्त्र छोड़कर केवल वैश्य कर्म ही करने लगे । उनमे से कितने ही पुराने नामों की जातियों में ही अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। सम्भव है कि अरोड़ा, मल्ल ,खत्री आदि जातियों की तरह अन्य वैश्य जातियो का सम्बन्ध भी किसी न किसी गणतन्त्र से रहा हो । यह भी सम्भव है कि बार-बार स्थान परिवर्तन के कारण और नये स्थानों पर बसने के कारण नये नाम प्रचलित हो गये हों और पुराने गणतन्त्र वाले नाम विस्मृत हो गये हों ।

जैन जातियों की उत्पत्ति के बारे में कुछ लोगों की धारणा है कि अमुक जैनाचार्य ने अमुक नगर के तमाम लोगों को जैन धर्म की दीक्षा दी और  उस नगर के नाम से उस जाति का नामकरण हो गया । उक्त सभी आचार्य पहली शताब्दी के बताये जाते हैं । नाथूराम प्रेमी जी इन बातों पर अविश्वास प्रकट करते हुये लिखते है कि यह ठीक है कि कभी बड़े समूह जैनी बने होंगे। लेकिन  उनमें सभी सामाजिक स्तर और जातियों के लोग होंगे, वे सब एक ग्राम के नाम के आधार पर  किसी एक जाति में कैसे परिणत हो गये होंगे, क्योंकि ऐसी सभी जातियों में जो स्थान विशेष के निवासी होने के कारण बनी है, जैन अजैन सभी लोग रहे होंगे। समय की धारा में जैन अजैन बनते रहे हैं और अजैन जैन ।
  जातियों की उत्पत्ति का समय 👉

कुछ विद्वानों का कहना है कि विभिन्न जातियों की उत्पत्ति राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में हुई। उनकी मान्यता है कि राजा चन्द्रगुप्त के राज्य काल मे बारह वर्ष का भीषण दुर्भिक्ष पड़ा था । जिस कारण आजीविका के लिए इधर-उधर भटकने लगे। कहीं वर्ण-संकरता न हो जाये इस भय से लोग अपने-अपने समूहों में ही शादी-विवाह करने लगे। धीरेधीरे ये समूह ही विभिन्न जातियों में परिणत हो गये ।

कुछ विद्वानों का कहना है कि जातियों का उल्लेख नौवीं-दसवीं शताब्दी से पूर्व का नहीं मिलता है। इसलिए विभिन्न जातियों की उत्पत्ति का समय नौवीं-दसवीं शताब्दी होना चाहिए । दसवीं शताब्दी के श्री भगवज्जिन सेनाचार्य ने भी अपने 'आदिपुराण में वर्ण व्यवस्था की विस्तार से चर्चा की है, लेकिन जातियों का कोई उल्लेख नहीं किया है । इसका कारण यह नहीं कि उनके समय में जातियां नही थी, बल्कि यह है कि उन्होंने चौथे काल की समाज व्यवस्था का ही वर्णन किया है, दसवीं शताब्दी की समाज व्यवस्था का नहीं । और चौथे काल में जातियां नहीं थीं । अन्य जैन कथा-साहित्य में भी सामान्यतः चौथे काल की घटनाओं का ही वर्णन है। लेकिन यहाँ दो बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि एक तो यह कि नौवीं-दसवीं शताब्दी से पूर्व ग्रन्थ-प्रशस्तियों आदि में जातियों के उल्लेख करने का प्रचलन  नहीं था। मूर्तियों पर भी पादलेख  लिखने का प्रचलन नहीं था। दूसरा यह कि नौवीं-दसवीं शताब्दी में ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता जिससे यह कहा जा सके कि विभिन्न वर्ण विभिन्न जातियों मे परिणत हो गये, क्योंकि जब वर्ण व्यवस्था अविछिन्न रूप से चल रही थी तब जातियों के आधार पर नई समाज व्यवस्था स्थापित होने का कुछ ठोस और तात्कालिक कारण तो होना ही चाहिये । अतः जातियों की उत्पत्ति का समय राजा चन्द्रगुप्त के समय से मानना ही उचित है ।
कुछ जातियां मात्र छह-सात सौ वर्ष पुरानी भी है। लेकिन ये जातियां किसी बड़ी जाति के अलग होकर उनका स्वतंत्र अस्तित्व कायम हो गया, जैसे -खरौआ
पल्लीवालों का मारवाड़ स्थित पाली नगर सम्बन्ध जोड़ने के मामले में यह तथ्य भी विचारणीय है कि पाली नाम के नगर मारवाड़ के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी हैं। इस नाम का एक प्राचीन नगर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के निकट यमुना नदी के किनारे स्थित है। जैनो के प्रसिद्ध तीर्थस्थान कौशाम्बी से पभोसा की ओर जाने पर यह पाली मिलता है। वहाँ पर एक प्राचीन जैन मन्दिर था जो यमुना नदी की बाढ़ में बह गया। अब उसके भग्नावशेष ही बचे हैं। वहाँ एक नया मन्दिर बन गया है, लेकिन प्रतिमाएं अत्यन्त प्राचीन हैं । वहाँ चारों ओर खण्डहर बिखरे पड़े हैं। जिनमें कई जैन मूर्तियाँ  प्राप्त हुई हैं । इन बातों से ऐसा लगता है कि यह पाली (उत्तर प्रदेश) एक प्राचीन स्थान रहा है तथा वहाँ जैन लोग बडी संख्या मे रहते थे ।

पाली नाम का एक अन्य गाँव आगरा जिले की किरावली तहसील के सहाई नामक गाँव के निकट है । इसी नाम का एक अन्य गाँव मध्यप्रदेश के बिलासपुर जिले में भी स्थित है। पालीगढ नाम का एक स्थान लखनऊ से 36 किमी दूर खोगघाट के निकट है । पालीताना नामक नगर गुजरात में स्थित है ही। एक पाली नगर उ. प्र. के ललितपुर जिले में भी है ।

इस प्रकार हम देखते है कि पाली नाम के कई नगर विभिन्न क्षेत्र में स्थित है। 'पल्ली' नाम के कुछ प्राचीन नगरों का उल्लेख भी मिलता है। 'दत्त पल्ली' नाम का एक नगर ग्यारहवीं शताब्दी में इटावा अंचल में था। इस नगर पर ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक जैन तथा चौहान वंशी राजाओं का शासन रहा।
'पल्लीवाल जैन इतिहास की भूमिका में भी पल्ली नाम की नगरी का उल्लेख है। इनकी प्राचीनता को निम्न प्रमाणों द्वारा दर्शाया गया है -  पल्ली में अग्नि का उपद्रव वि. सं. 918, चैत्र शुक्ला द्वितीया को हुआ था। ऐसा एक शिलालेख घटियाला ( जोधपुर, मारवाड़) से प्राप्त हुआ है। इसी लेख मे प्रतिहार''स्थानों की सूची में 'पल्लयाँ' का उल्लेख है । एक लेख वि. सं. 1215 का है जिसमें भी पल्ली शब्द का प्रयोग हुआ है। इन सभी लेखों में पल्ली नगर का उल्लेख किया गया है, लेकिन इस भूमिका के लेखक ने इसे मारवाड़ में स्थित पाली नगर ही मान लिया है ।

इसी भूमिका में लिखा है कि जैसलमेर स्थित किले के ग्रन्थ भण्डार मे रखी हुई 'पचाशक वृत्ति' नामक ताड़पत्रीय पुस्तक के अन्त मे दो पद्य है, जिनमें लिखा है कि "वि.सं. 1207 में 'पल्ली-भंग' के समय उस अधूरी पुस्तक को ग्रहण किया था, बाद में श्री जिनदत्त सूरि जी के शिष्य स्थिर चन्द्रगणी ने अपने कर्म क्षयार्थ अजयमेरु दुर्ग में उसके शेष भाग को लिखा था।" इस लेख में भी पल्ली शब्द ही प्रयक्त हुआ है जिसे पाली मान लिया गया है।
पल्लीवालों के चारण-भाट हिन्डौन निवासी श्री कजोड़ीलाल राय थे | उनसे प्राप्त एक हस्तलिखित 'प्रार्थना-पुस्तक' में भी पल्लीपुर नगर का वर्णन मिलता है । यह पुस्तक लगभग 180 वर्ष पूर्व लिखी गई थी। इसमें एक स्थान पर लिखा है कि पल्लीपुर गुजरात खण्ड के मध्य में स्थित है। सम्भवतः यह पल्लीपुर पूर्वोक्त पल्लीपुर ही है ।
इस प्रकार हम देखते है कि पाली नाम के कई ग्राम व नगर विभिन्न स्थानों पर स्थित हैं , साथ ही पल्ली नाम के कई प्राचीन नगरों का भी उल्लेख मिलता है। लेकिन ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो पल्लीवाल जाति का सम्बन्ध किसी पाली से होना सिद्ध करता हो। कुछ लेखों से पता चलता है कि मारवाड़ के पाली नगर में पल्लकीय गच्छ के आचार्यों ने मूर्ति प्रतिष्ठा कराई। लेकिन पल्लकीय गच्छ का पाली से सम्बन्ध होने पर भी पल्लीवालों का पाली से कोई संबंध जुड़ता नहीं दिखाई पड़ता।
दक्षिण की तेलुगू तथा तमिल भाषा मे 'पल्ली' शब्द का अर्थ 'छोटे-गाँव' से होता है। आज भी छोटे-छोटे गाँवों के नाम के पीछे पल्ली शब्द लगाने का प्रचलन है। प्राचीन काल में एक पल्ली ( छोटे गाँव) में एक ही वर्ण के लोग रहते थे। कई-कई पल्लियों के लोग एक ही वर्ग के तथा एक ही धर्म को मानने वाले हुआ करते थे। अतः उन सभी पल्लियों के सब लोग, जो जैन धर्मानुयायी थे तथा उनका वर्ण वैश्य था, कालान्तर में पल्लीवाले कहे जाने लगे और वे ही बाद मे पल्लीवाल जाति के नाम से प्रसिद्ध हो गये। अतः पल्लीवालों की उत्पत्ति दक्षिण भारत से माननी चाहिए |

आचार्य कुन्दकुन्द पल्लीवाल जात्युत्पन्न थे ।उनका जन्म वि.सं.49(वीर निर्वाण संवत् 519) में दक्षिण भारत के तमिल प्रदेश के कुरुमराई नामक ग्राम में हुआ था । आचार्य श्री ने बहुत वर्षों तक तमिल प्रदेश में ही भ्रमण किया तथा धर्म प्रभावना की। उनकी साधना स्थली भी तमिल प्रदेश के जंगल ही थे । इससे भी यही सिद्ध होता है कि पल्लीवालों का सम्बन्ध दक्षिण के तमिल प्रदेश से रहा है। अतः पल्लीवाल जाति का उद्गम स्थान तमिल प्रदेश ही रहा है।
पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति के समय के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का मत है कि इसकी उत्पत्ति ग्यारहवीं - बारहवीं शताब्दी में हुई। लेकिन यह मानना गलत है। पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति तो बहुत पहले ही हो चुकी थी। इस जाति में श्वेताम्बर तथा दिगम्बर दोनों सम्प्रदायों को मानने वाले लोग है। तेरहवीं चौदहवीं शताब्दी के कई लेख तथा मूर्ति लेख उपलब्ध है। इनसे पता चलता है कि उस समय इस जाति के कुछ लोग दिगम्बर आम्नाय को मानने वाले थे तथा कुछ लोग श्वेताम्बर आम्नाय को मानते थे यानि  तेरहवीं शताब्दी के अन्त में इस जाति में जैन धर्म की दोनों आम्नायों को मानने वाले लोग थे । किसी समुदाय का जाति में परिणत होना उस समुदाय के समस्त लोगों के खान-पान, रीति-रिवाज, रहन-सहन और धार्मिक  समानता पर निर्भर करता है । यदि दो वर्ग अलग-अलग धर्मों को मानने वाले हों तो उनका एक ही जाति के रूप में उभरकर आना असम्भव है। यदि पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति बारहवीं शताब्दी में माने तब अलग-अलग आम्नाय को मानने वाले लोग एक ही जाति में कैसे परिणत हो सकते हैं ? जबकि दो अलग-अलग आम्नायों को मानने के कारण दो अलग-अलग जातियों का निर्माण होना चाहिए था। अतः पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में नहीं बल्कि उससे बहुत पहले हो गई थी ।
आचार्य कुन्दकुन्द पल्लीवाल जाति से थे । नागोर के भट्टारकीय शास्त्र भंडार से प्राप्त आचार्य पट्टावली ,जो चामुंडराय कृत 'चारित्र-सार' नामक में ग्रंथ में संलग्नक के रूप में जुड़ी है -में आचार्य कुंदकुंद जिनके अपरनाम -पद्मनंदि,वक्रग्रीव,गृद्धपिच्छक, और एलाचार्य है,को पल्लीवाल जात्युत्पन्न बताया है।इनका जन्म वि.सं. 49 में हुआ था। अतः पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति का समय आचार्य कुन्दकुन्द से पूर्व का ही होना चाहिए । 'पल्ली' ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की तमिल भाषा का बहु-प्रचलित शब्द भी है। पल्लीवालों की उत्पत्ति का समय भी विक्रम की पहली सदी ( ईसा पूर्व पहली दूसरी शताब्दी) मानना चाहिए ।
पल्लीवाल जाति का विकास 👉
बहुत समय तक पल्लीवाल दक्षिण के तमिल प्रदेश में ही रहते रहे । कालान्तर में ये उत्तर भारत की ओर पलायन कर गये। विक्रम की दसवीं शताब्दी तक ये लोग कन्नौज तथा इटावा अंचल में फैल गये तथा अन्तिम रूप से यहीं पर रहने लगे। विक्रम की तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक ये पल्लीवाल बिना किसी कठिनाई के यहाँ आनन्दपूर्वक रहते रहे ।

'विक्रमी 1251 (सन् 1194) में मुहम्मद गौरी जब बनारस की ओर जा रहा था, तब उससे मुठभेड़ के समय इटावा में धनपत शाह के दो पुत्रों  सोहिल व गुंझा ने पल्लीपुर में वास किया जो गुजरात खण्ड के मध्य में है ।' 'प्रार्थना पुस्तक का यह वक्तव्य उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में लिखा गया । धनपतशाह का समय विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी का मध्य है। उसने जिस घटना का वर्णन किया है वह यथा सम्भव चन्द्रवाड़ (फिरोजाबाद के निकट)में मुहम्मद गौरी के युद्ध के समय की ही है। इसी समय इटावा अंचल में स्थित विभिन्न जैन जातियों के लोग इस क्षेत्र को छोड़ने के लिये बाध्य हो गये थे और उन्होंने हस्तिनापुर के निकट एकत्र होकर अन्यत्र जाने के लिये विचार-विमर्श किया। तत्पश्चात कुछ पल्लीवालों ने गुजरात की ओर प्रस्थान किया और वे वही बस गये । जैसा कि विभिन्न मूर्तिलेखों से पता चलता है, वि चौदहवीं शताब्दी के मध्य तक ये पल्लीवाल पूरे गुजरात मे फैल गये । पाटण, काठियावाड, मेहसाणा, भरुच तथा सूरत इन सभी स्थानों पर इस जाति के लोग रहते थे ।
कुछ मूर्ति लेखों मे गुर्जर पल्लीवाल ( शक सं. 1428), पद्मावती पल्लीवाल (शक सं. 1001 ) तथा उज्जैनी पल्लीवाल (शक सं. 1626) का उल्लेख आता है। ये सभी मूर्तियाँ नागपुर के मन्दिरों में मौजूद है। इन लेखों से सिद्ध होता है कि पल्लीवाल जाति के कुछ लोगों ने विक्रम की पन्द्रहवी शताब्दी के अन्त में गुजरात प्रदेश छोड़ दिया और उज्जयनी नगरी की ओर चले गये तथा वहीं पर रहने लगे।
ऐसा ज्ञात हुआ है कि आज भी रतलाम में, जो कि उज्जैन के निकट ही है, पल्लीवाल जाति के कुछ लोग रहते है, लेकिन ये सभी हिन्दू धर्म को मानते हैं। अब इनका पल्लीवाल जाति की मूलधारा से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है। उज्जैन के शेष पल्लीवाल
पद्मावती नगर होते हुये विदर्भ क्षेत्र की ओर चले गये। आज भी वहाँ पल्लीवाल जैन लोग रहते है। विदर्भ क्षेत्र के पल्लीवालों का मानना है कि इस क्षेत्र में बसने वाले पल्लीवाल दो रास्तों से आये हैं - एक वर्धा होते हुये तथा दूसरे छिन्दवाडा की ओर से । बाद में ये सभी पल्लीवाल विदर्भ क्षेत्र के नागपुर तथा वर्धा आदि स्थानों में बस गये। पिछले लगभग 200-250 वर्ष से ये लोग यहाँ पर ही बसे हुए हैं। ये भी पल्लीवाल जाति की मुख्य धारा से अलग हो गये हैं।
गुजरात प्रदेश के काठियावाड क्षेत्र में रहने वाले पल्लीवाल कई भागों में बँट गये - कन्नौज क्षेत्र के पल्लीवाल, मुरैना क्षेत्र के पल्लीवाल, जगरौठी तथा आगरा क्षेत्र के पल्लीवाल और नागपुर क्षेत्र के पल्लीवाल । बहुत समय तक तो यही माना जाता रहा कि ये चारों घटक अलग-अलग जातियाँ है, लेकिन ऐसा मानना सही नहीं है। पल्लीवाल जाति के लोग विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग समूहों में बँट गये, मूलतः ये चारों एक ही जाति के अंग हैं। इनके गोत्रों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि बहुत से गोत्र चारों घटकों मे मिलते हैं। निश्चित ही ये गोत्र जाति के विघटन के पूर्व के है । जो गोत्र आपस में नही मिलते, वे या तो इन घटकों के विघटन के बाद के है, या उन गोत्रो के वंशज अब अन्य घटकों में नहीं हैं ।जौरा(मुरैना) से  6 किमी.दूर परसौटा नामक ग्राम में पल्लीवालों का एक प्राचीन दि० जैन चैत्यालय है जिसमे प्राचीन मूर्तियाँ विराजमान है। परसौटा ग्राम में ही पल्लीवाल समाज के अधिष्ठाता की गद्दी है । इसके अन्तिम अधिष्ठाता श्री 108 भट्टारक करन सागर जी महाराज थे जिनका कुछ वर्ष पूर्व देहांत हो गया । घर मे कुछ भी शुभ कार्य होने पर पल्लीवाल लोग यहाँ दान देने और चढ़ावा चढ़ाने जाते है ।
आज हम पल्लीवाल जाति को जिस रूप में देखते है उसमें पल्लीवालों के विभिन्न घटकों के साथ-साथ सिकन्दरा (आगरा), पालम (दिल्ली के निकट ) तथा अलवर के जैसवाल तथा सैलवाल जाति के लाग भी सम्मिलित है। इन जातियों ने लगभग 150 वर्ष पूर्व से ही पल्लीवालों में विवाह सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे । अब ये पल्लीवाल जाति के ही अभिन्न अंग बन गये है। इन जातियों ने भी स्वयं को पल्लीवाल जाति में विलीन कर लिया है और अपना अलग अस्तित्व समाप्त कर लिया है। नागपुर क्षेत्र के पल्लीवालों से बाकी पल्लीवालों का कोई सम्बन्ध अब नही रहा है, इसका मुख्य कारण दूरी है। मातृभाषा तथा रहन-सहन में भी बहुत अन्तर है।

 पल्लीवाल जाति के गोत्र

अधिकतर जातियो मे विभिन्न गोत्र पाये जाते है । जिस प्रकार से जातियों का नामकरण वंशों, प्रान्तो, नगरों तथा व्यवसायों आदि के आधार पर माना जाता है उसी प्रकार से गोत्रों का।
(1)जगरोठी, अलवर और आगरा क्षेत्र के पल्लीवाल,
(2) कन्नौज- अलीगढ तथा फिरोजाबाद क्षेत्र के पल्लीवाल, (3) मुरैना तया ग्वालियर क्षेत्र के पल्लीवाल, (4) नागपुर (विदर्भ) क्षेत्र के पल्लीवाल, (5) सिकन्दरा तथा पालम के सैलवाल तथा (6) पालम तथा अलवर के जैसवाल | इनमे से सैलवाल तथा जैसवाल प्रारम्भ में अलग जातियाँ थीं। लेकिन कालान्तर मे इनके परिवारो की संख्या कम हो जाने से इनको शादी-विवाहादि में कठिनाई का अनुभव हुआ। अतः इस जाति के लोगों ने अन्य जाति के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का निश्चय किया। चूंकि पल्लीवाल जाति के धार्मिक तथा सामाजिक आचार-विचार जैसवाल तथा सैलवाल जातियों से मिलते थे तथा पल्लीवाल जाति भी छोटी जाति होने के कारण अपना क्षेत्र बढ़ाना चाहती थी, अतः ये जातियाँ आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व पल्लीवाल जाति मे पूर्णतः विलीन हो गई ।

प्रारम्भ के चार घटकों के गोत्रों के सम्बन्ध मे एक बात मुख्य है कि इन सब घटकों के कुछ गोत्र एक दूसरे से नहीं मिलते हैं। ऐसा लगता है कि इन गोत्रों की स्थापना पल्लीवाल जाति की उत्पत्ति के बहुत बाद मे हुई है। भिन्न-भिन्न घटकों के गोत्र निम्न प्रकार से है-

1. जगरौठी, अलवर तथा आगरा क्षेत्र के पल्लीवालों के गोत्र-

(1) सुगे सुरिया, (2) नग सुरिया, (3) नागे सुरिया, (4) सलावदिया, (5) डगिया मसद, ( 6 ) डगिया सारग, (7) डगिया रसक, (8) जनूथरिया - ईट की थाप (9) जथरियाकैम की थाप, ( 10 ) राजौरिया, (11) चौर बवार, (12) बहतरिया, (13) भडकौलिया, (14) बरवासिया, (15) बारीलिया, (16) बडेरिया, (17) अठवरसिया, (18) नौलाठिया,(19) पावटिया, ( 20 ) लेदोरिया, (21) विदोराबकस, ( 22 ) धाती, (23) कोटिया, (24) नौघी, (25) लोहकरेरिया, (26) मंगरवासिया, (27) तिलवासिया, (28) चांदपुरिया, (29) दिवरियां, (30) व्यानिया, (31) वेद. (32) काश्मीरिया, (33) निगोहिया, (34) खैर, (35) चकिया, ( 36 ) विलनमासिया, ( 37 ) डडूरिया, (38) नौहराज, (39) गुदईलिया, (40) भावरिया (41) कुरसौलिया, ( 42 ) खोहवाल (43) पचीरिया, (44) वारीवाल, ( 45 ) गुदिया, (46) निहानिया, (47) लवट किया, (48) दादुरिया, (49) गिदौरिया, (50) भोवार, (51) माईमूडा, ( 52 ) गुवालियरे |

2.कन्नौज, अलीगढ़ तथा फिरोजाबाद क्षेत्र के पल्लीवालों के गौत्र

(1) अकबरपुरिया, (2) अगरैय्या (3) औरंगाबादी, (4) कठमत्या. ( 5 ) कठोरिया (6) करोडिया, (7) करोनिया ( 8 ) काश्मीरिया, ( 9 ) कोनेवाल, (10) गिदौरिया, (11) चीनिया (12) चौधरिया, (13) जिवरिया, (14) टेनगुरिया, (15) ठाकुरिया, (16) डरिया, (17) दरवाजेवाल, ( 18 ) धनकाडिया ( 19 ) नगेसुरिया, (20) नारगावादी, (21) पटपस्या (22) पहाड्डया, (23 फिरोजाबादी, (24) भजौरिया, ( 25 ) मवाडिया, ( 26 ) बजौरिया, ( 27 ) वरवासिया, (28) बाकेवाल (29) वारीलखु, (30) बदिया, (31) मकटिया, (32) सैगरवासिया, ( 33 ) हतकतिया ।

मुरैना तथा ग्वालियर क्षेत्र के पल्लीवालों के गोत्र-

( 1 ) कायर ( 2 काश्मीरिया (3) खेरोनीबाल, (4) खोहवाल, ( 5 ) खैर, (6) गुदिया, ( 7 ) ग्वालियरे, (8) चौमुण्डा ( चौरबम्बार), (9) चौथा, ( 10 ) डडूरिया, ( 11 ) दमेजरे,
(12) दिवस्या, (13) धनवासी (धाती), (14) घुनेरिया (15) नगेसुरया, (16) निहानिया, (17) पचोरिया, (18) पाडे, (19) पावटिया (20) महेला, (22) रायसेनिया (23) लखट किया, (24) लोहकरेरिया, (25) बडेरिया, (26) बरवासिया, ( 27 ) वारीवाल, (28) वैद- भगोरिया, ( 29 ) ब्यानिया, ( 30 ) बजारे, (31) समल, (32) सलावदिया, ( 33 ) सारग डग्या, (34) साले, (35) सैगरवासिया।

4. नागपुर ( विदर्भ) क्षेत्र के पल्लीवालों के गोत्र

(1) वाईवाल, (2) नामक (3) बिजाबरत, ( 4 ) धराईवाल, (5) डरेपूर (6) पानीवाल, (7) थासु, (8) फरीवाल, (9) भिमानी, (10) छामरनीवाल (11) बीदर, नन्दनीवाल |

5. सैसवालों के गौत्र

( 1 ) मालेश्वरी (मालेसरी), (2) आमेश्वरी (3) अम्बिया, ( 4 ) राजेश्वरी आदि ।

जैसवालों के गोत्र-

(1) वेद-वैराष्टक, (2) अगरस, ( 3 ) राजनायक, (4) श्याम पाडिया प्रादि ।

इन गोत्रों का विश्लेषण करने पर निम्न निष्कर्ष निकालते है-

(1) बहुत से गोत्रों का नामकरण विभिन्न ग्रामों अथवा स्थानों के नाम पर हुआ । जैसे- सलाबदिया, सैगरवासिया, काश्मीरिया, गुवालियर (ग्वालियरे), अकवरपुरिया, अगरैय्या औरंगाबादी, फिरोजाबादी, बोहवान्न आदि ।

(2) ऐसा लगता है कि कुछ वर्गों के लोग पहले एक ही गोत्र के अन्तर्गत आते थे। कालान्तर मे जब उस गोत्र के लोगों की
संख्या में वृद्धि हुई तथा अलग-अलग स्थानों पर चले गये, तब नये गोत्र बन गये | जैसे नगे सुरिया, नागे सुरिया तथा सूगे सुरिया।








बुधवार, 9 नवंबर 2022

श्री प्यारेलाल जी वरैया 'लाल'


 श्री प्यारेलाल जी वरैया (दाऊ गोत्रीय)श्रीमान चिरोंजी लाल जी वरैया और श्रीमती खुशयाली देवी के आंगन की वह किलकारी हैं जिसने अपने माता पिता के आंगन को बालसुलभ कौतुक के आह्लाद से भर दिया । आपका जन्म विक्रम संवत् 1960 में श्रावण मास में करहिया के पास स्थित रायपुर ग्राम में हुआ था।आपके पिता श्री चिरोंजी लाल जी तत्समय रायपुर ग्राम में पटवारी के रूप में पदस्थ थे।आपकी माताजी  श्रीमती खुशयाली देवी , बदेकेवास जिला आगरा निवासी श्रीमान सूरजभान जी की बहिन हैं। प्यारेलाल जी के दो सहोदर भाई और एक बहिन भी थी। छोटे भाई वृजलाल जी की मृत्यु तो उनके बाल्यकाल में ही हो गई थी और बड़े भाई पन्नालाल जी भी लश्कर आने के कुछ समय उपरांत अपनी इकलौती पुत्री बाओबाई को छोड़कर स्वर्ग सिधार गए थे।आपकी बहिन श्रीमती आनंदी बाई का विवाह करहिया ग्राम में आरोन निवासी श्री भगवान लाल जी के साथ हुआ था।
                आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे।आपकी प्रारंभिक शिक्षा पंडित गोपाल दास जी वरैया के सानिध्य में मुरैना विद्यालय में हुई, जहां आपने छठवीं तक अध्ययन किया।इस कारण आपके विचारों पर पंडित गोपाल दास जी वरैया का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। आपने शिक्षार्जन के दौरान अंग्रेजी का भी कार्य साधक ज्ञान प्राप्त किया।
                  श्री प्यारेलाल जी वरैया दो बार परिणय सूत्र में बंधे।उनका पहला विवाह सिरसा (ग्वा.) निवासी श्रीमान झींगुरमल जी की पुत्री व श्रीमान भगवानलाल, जौहरीलाल जी की बहिन के साथ हुआ था और दूसरा विवाह करहिया निवासी श्रीमान भीखाराम जी की पुत्री व श्री मंगलचंद जी पलैया जो दानाओली लश्कर में निवास करते थे, की बहिन श्रीमती इमरती बाई के साथ हुआ था।
                 पिता श्री चिरोंजी लाल जी के रायपुर ग्राम से पनिहार स्थानांतरण होने पर आप भी तीन-चार साल पनिहार में रहे। इसके पश्चात विक्रम संवत् 1976 में आप ग्वालियर आ गए  और आढ़त का काम प्रारंभ किया।अध्यवसायी होने के कारण आपने अपने व्यवसाय में काफी ख्याति अर्जित की। विक्रम संवत् 2000 में आपके पिताजी के स्वर्गवास के बाद पूरी गृहस्थी का भार आपके कंधों पर आ गया।
                    धर्म के प्रति आपकी रुचि बाल्यकाल से ही रही।आप बिना देवदर्शन के भोजन ग्रहण नहीं करते थे। फिर भी जीवन के पूर्वार्द्ध में आपने व्रतादि का पालन नहीं किया था। लेकिन सुयोगवश विक्रम संवत् 2010 में सर्राफा लश्कर स्थित बड़े जैन मंदिर में ग्वालियर के पंडित धन्नालाल जी की प्रवचन श्रृंखला ने जिसे वे पूरे मनोयोग से श्रवण करते थे,मानो उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्हें आत्मजागृति की ऐसी स्वस्फूर्त  प्रेरणा मिली ;जिसके कारण व्रतादि के पालन की भावना प्रबल हुई और उन्होंने प्रथम प्रोषधोपवास किया।त्रैकालिक सामयिक का नियम भी ग्रहण किया। ऊर्ध्वमुखी चेतना ने उन्हें गृहस्थ वैरागी बना दिया। आजीविका का भार अपने पुत्रों पर छोड़कर आप शनै:शनै: आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर होते रहे।उनका अधिकांश समय शास्त्रों के अध्ययन और पारायण में व्यतीत होने लगा। आध्यात्मिक साहित्य के चिंतन मनन के साथ ही साहित्य के प्रणयन में भी उनकी प्रवृत्ति हुई।आप 'लाल' उपनाम से साहित्य रचना करते थे।आपकी रचनाएं पद्यात्मक और छंदोबद्ध हैं और जनमानस में काफी लोकप्रिय रहीं।आपकी रचनाओं की जो सूची प्राप्त हुई है उसमें 22 रचनाओं का उल्लेख है।आपके वंशज संप्रति रोशनीघर लश्कर में निवास करते हैं। उनकी रचनाएं निम्नलिखित अनुसार हैं- 
          1. अध्यात्म भावना, 2. अध्यात्म चालीसा, 3. अध्यात्म बहत्तरी, 4.भेदज्ञान पच्चीसा, 5 दर्शन पच्चीसा 6. द्वादसानुप्रेक्षा, 7. बारह भावना, 8. तीन की महिमा एवं प्रश्नोत्तर, 9. जैन धर्म शतक, 10. चौबीस ठाणा के उत्तर भेद, 11. दान कथा, 12, सुख पाने के सम्यक उपाय 13. सार समुच्चय पद्यानुवाद, 14. रयणसार पद्यानुवाद, 15. आत्म प्रबोध ग्रन्थ, 16. अध्यात्म भक्ति भजन भावना, 17. कार्तिकेयानुप्रेक्षा, 18. अध्यात्म प्रश्नोत्तरी , 19. शान्ति पथ दर्शक वरहिया विलास भाग-1 व 2, 20 कर्ता कौन 21. जीव की 47 शक्तियां, 22. आत्मार्थी जीवों की भावनाएं।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

गुरुवर्य पं.गोपालदास वरैया

जैन-जाग्रति के पुरस्कर्ताओं की पंक्ति में एक उल्लेखनीय नाम स्यादवाद-वारिधि,वादिगजकेशरी,न्यायवाचस्पति,गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया का है |
                    पंडित जी का जन्म विक्रम संवत 1923(17 मार्च,सन् 1866 ई.) में चैत्र प्रतिपदा को आगरा(उ.प्र.)में एछिया गोत्रीय श्री लक्ष्मण दास जी जैन के घर हुआ था |आपके पिता की आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी |जिसके कारण उन्होंने साधारण अंग्रेजी स्कूल में माध्यमिक स्तर तक ही शिक्षा प्राप्त की और आजीविका के लिए रेलवे में क्लर्क की नौकरी कर ली |
              पंडित जी की पत्नी बहुत कर्कश स्वभाव की थी फिर भी उन्होंने कभी भी अपने जीवन की इस कड़वाहट को सार्वजनिक व्यवहार में नहीं आने दिया |पंडित जी के जीवन का पूर्वार्ध भटकाव से भरा और प्रायः निरर्थक रहा |एक दिन किसी विद्वान के शास्त्र प्रवचन सुनकर उनके मन पर इसका बड़ा गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी |मानो उनके भीतर छिपी प्रतिभा को प्रस्फुटन के लिए अनुकूल आधार-भूमि मिल गयी |इसके पश्चात् श्रुताभ्यास में निरंतर संलग्न होकर उन्होंने दिगंबर जैन परंपरा के शास्त्रों का गंभीर अध्ययन ,मनन किया और उनमें निपुणता प्राप्त करते हुए संस्कृत और प्राकृत भाषाओं पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया। आर्ष ग्रंथों की सहायता से उन्होंने जैन सिद्धांत ,तत्वज्ञान ,दर्शन और न्याय को हस्तामलकवत कर लिया |
                    जैन दर्शन के ध्वजवाहक बनकर आपने यत्र-तत्र अनेक जैन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया | ई.1892 में आपने पं. धन्नालाल जी के साथ मुंबई में दिगंबर जैन सभा की स्थापना की और ई.1899 में आपने इस सभा के तत्वावधान में जैन-मित्र पत्र का प्रकाशन शुरू किया। पंडित जी के संपादकत्व में जैनमित्र ने अखिल जैन समाज का पहरुआ बनकर न केवल उसे एक सूत्र में पिरोने का काम किया बल्कि उसकी अस्मिता को एक नया आयाम दिया |
                   एक बार जब पं० गोपालदास जी वरैया  की कीर्ति महाराजा छतरपुर के कानों में पड़ी तो नरेश ने उन्हें  छतरपुर बुलवाया तथा कुछ दिनों तक  उनके  सानिध्य में रहकर  धर्मदेशना ली । यह घटना इस शताब्दी के प्रथम दशक की है।  वरैया जी को विदाई देते समय छतरपुर नरेश ने उन्हें दो गाँव भेंट स्वरूप  दिये, परन्तु पण्डित जी ने विनम्रतापूर्वक कहा कि मैं धर्मोपदेश के प्रतिफल में कोई भेंट स्वीकार नहीं करता। छतरपुर नरेश  वरैया जी की इस नि:स्पृहवृत्ति से बहुत अधिक प्रभावित हुए।
                   आपने कई सफल शास्त्रार्थ किये और अपनी वाग्मिता से अजैनों को भी मुग्ध कर दिया |उन्होंने अपनी विलक्षण मेधा से जैन न्याय और सिद्धांत की दुन्दुभी बजाते हुए जैन दर्शन की विमल कीर्ति पताका को फहराया और शैक्षिक क्रांति के अग्रदूत बने |ई.1901 में दिगंबर जैन महासभा की स्थापना में भी आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा है |आपने लगभग 10 वर्षों तक इस संस्था के सचिवीय दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन किया ।
                      मुरैना का जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय आपकी कीर्ति का प्रकाश स्तम्भ है |यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आज भारतवर्ष में जितने भी जैन विद्वान् हैं उनमें से अधिकांश पंडित जी की शिष्य -प्रशिष्य परंपरा में हैं।समाज सेवा और शिक्षण कार्य में अत्यधिक व्यस्त रहते हुए भी वे अवकाश के क्षणों में चिंतन-मनन करते रहते थे जिसका प्रतिफलन 'जैन सिद्धांत दर्पण' ,'सुशीला' उपन्यास और 'जैन सिद्धांत प्रवेशिका' के प्रणयन के रूप में हमारे सामने है |इनमें से बहुप्रसारित जैन सिद्धांत प्रवेशिका जैन धर्म और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए एक बहुउपयोगी ग्रंथ है ,जो एक पारिभाषिक कोष का काम देती है|
                         आपका सभी समुदायों के लोग बहुत समादर करते थे |ग्वालियर रियासत से आपको मानद मजिस्ट्रेट का पद प्राप्त हुआ था |आप पंचायत परिषद् और चेम्बर्स ऑफ़ कोमर्स के भी सदस्य रहे | ई.1917 में मुरैना(म.प्र.)में यह दैदीप्यमान नक्षत्र सदा के लिए लुप्त हो गया। अखिल वरहिया जैन जगत में आदरणीय पंडित जी का जन्मदिवस प्रतिवर्ष चैत्र प्रतिपदा को श्रद्धा और उल्लास के साथ समारोहपूर्वक मनाया जाता है।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

वैवाहिक विवाद

 वरहिया समाज में विवाह सम्बन्धी विवादों के दर्जनों मामले लंबे समय से अनसुलझे पड़े हैं।  दोनों पक्षों के लिए कष्टदायक होने के बावजूद दोनों पक्षों का अंहकार  उनके बीच रिश्तों में  कड़वाहट घोलता रहता है जो उनके किसी समझौते तक पहुंचने में सबसे बड़ी बाधा है। दोनों पक्ष यदि विवेक और संयम से काम लें तो किसी मान्य समाधान तक पहुंचने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी। इनमें से कुछ मामले तो न्यायालय में लंबित हैं और कुछ मामलों में द्विपक्षीय रिश्तों में ठंडेपन के कारण गतिरोध बना हुआ है। इनमे से किसी मामले लड़का पक्ष की गलती  है तो किसी मामले में लड़की पक्ष की ज्यादती है। लेकिन ज्यादातर मामलों में लड़के और लड़की के बीच आपसी गलतफहमी, छोटे मोटे आरोप -प्रत्यारोप   नासमझी के कारण इतने तनावपूर्ण हो जाते हैं कि उनके मधुर रिश्तों में दरार पड़ जाती है जो उनके बीच अलगाव पैदा करती है।इसी स्थिति-परिस्थिति में विच्छेद की पृष्ठभूमि तैयार होती है। लेकिन मामले के तथ्यों को चाहे कितना तोड़ा-मरोड़ा जाए,मोटी सच्चाई समाज के लोगों के सामने आ ही जाती है। ऐसे में समाज के वरिष्ठ जनों की नैतिक जिम्मेदारी है वे ऐसे मामलों में अपने सामाजिक प्रभाव का उपयोग कर उनके समाधान के लिए यथासंभव प्रयास करें। शादी-विवाह तिजारत नहीं है इसलिए किसी भी पक्ष को सौदेबाजी करके अनुचित लाभ लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।हम सभी वरहिया जन एक परिवार हैं। इसलिए हमें समाज को एकजुट रखने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। समारोहजीवी समाज के धुरंधर नेताओं से यही मेरी विनम्र प्रार्थना है।

अंतर्जातीय विवाह

 वरहिया समाज में अन्तर्जातीय विवाह के मामलों में हाल के दिनों में काफी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि हमारी पढ़ी-लिखी लड़कियां तो अपेक्षाकृत अच्छी सामाजिक स्थिति वाले परिवारों में ब्याह रही हैं लेकिन लड़कों के लिए बहुएं हीनतर सामाजिक स्थिति वाले समुदायों और परिवारों से मेनेज करके लानी पड़ रही हैं।यह बड़ी दु:खद और विकट स्थिति है।इस सबके बावजूद आज भी बहुतेरे ऐसे हैं जो अपने लड़कों के विवाह की फ़िक्र में बूढ़े हुए जा रहे हैं।'महोजनो येन गत:स पंथा' यह लोकप्रसिद्ध है। वरिष्ठ जनों को लोग अपना आदर्श मानते हैं और वे उन्हीं के अनुसरित मार्ग का अनुगमन करते हैं। इसलिए वरिष्ठजन समाज में आदर्श प्रस्तुत करें और वर्जनीय क्रियाकलापों से विमुख रहें, ऐसी अपेक्षा करना गलत नहीं होगा। क्योंकि लोग एक दूसरे का उदाहरण देकर अपनी गलतियों को जस्टिफाई करते हैं । प्रगतिशीलता और ब्राडमाइंडेडनेस का हवाला देकर कुछ लोग तो कुछ भी कर गुजरने से गुरेज नहीं करते। अपनी क्रांतिदूत वाली छवि पर मुग्ध होते हुए खुद ही अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं। यही सूरतेहाल रहा तो समाज के अस्तित्व पर संकट खड़ा होना निश्चित है। सजातीय वर-वधू को प्राथमिकता मिलना चाहिए। विवाह के लिए लड़के लड़कियों की प्राथमिकता सूची में नौकरीपेशा के साथ ही व्यापारी वर्ग को भी तरजीह मिलना चाहिए। दूसरों पर आर्थिक रूप से निर्भर सर्विस मेन से दूसरों को नौकरी या रोजगार देने में सक्षम व्यापारिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति कमतर नहीं होता।विरल स्थिति में ही विजातीय जैन समाज के वरवधू का विकल्प चुनना चाहिए। जड़ों से कटकर चीजें बेजान हो जाती हैं। प्रगतिशीलता की आधुनिकता की बयार में उड़ रहे और गर्द में हिचकोले खा रहे ,जड़ों से कटे लोगों से जमीन से दूर होने का दर्द पूछिए। वे भले ही कुछ न बताएं लेकिन उनका मौन उनकी पीड़ा को बयान कर देगा।यह चमन उजड़ने ने न पाए,यह नैतिक जिम्मेदारी उसके सुयोग्य मालियों की है। इसलिए आप सुधीजन विचार करें कि पंचकल्याणक महोत्सव, धार्मिक विधान- अनुष्ठान, मंदिर निर्माण आदि हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए या समाज का सुदृढ़ीकरण 🤔

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

श्री शीतल प्रसाद जैन


बृहत्तर ग्वालियर के जैन समाज द्वारा "जैन समाज रत्न "सम्मान  से विभूषित श्रीमान शीतल प्रसाद जैन आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं |उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका जीवट और सक्रियता हम युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है|आप गुलिया गोत्रोत्पन्न शमसाबाद निवासी श्रीमान गुलाबचंद जी वरहिया के आँगन की किलकारी हैं |आपकी जन्मस्थली तो शमसाबाद (उ.प्र .) है लेकिन कर्मस्थली ग्वालियर (म .प्र.) है |आपका जन्म १० अगस्त १९३० में हुआ है  |आप अपने पिता की चौथी पुत्र संतान हैं |लेकिन दुर्भाग्यवश श्री गुलाबचंद जी की असमय मृत्यु होने से उनके परिवार के सामने जब गंभीर संकट उत्पन्न हो गया तब ऐसी विषम परिस्थिति में उनके मामाजी सांतउ निवासी श्रीमान सुखलाल जी पहाड़िया ने जो तत्समय ग्वालियर में निवास करते थे ,उन्हें आश्रय और संरक्षण प्रदान किया |फलतः छः वर्ष की आयु  में ही आप ग्वालियर आ गए जहाँ मामाजी श्रीमान सुखलाल जी के सानिध्य में उनका लालन -पालन हुआ |आपकी शिक्षा -दीक्षा ग्वालियर में ही हुई |आपने वाणिज्य संकाय में स्नातक किया और हायर डिप्लोमा इन को-ऑपरेशन की उपाधि प्राप्त की |
                                  ई.१९५० में करहिया निवासी कुम्हरिया गौत्रीय चौधरी रकसलाल जी की सुपुत्री शांतिबाई जैन के साथ आपका विवाह संपन्न हुआ |आपका वैवाहिक जीवन काफी सुखमय व्यतीत हुआ |आपके दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं |
                               १९ फरवरी १९५४ में आप बैंकिंग सेवा में चयनित हुए |अपनी सेवावधि में आपने जनसामान्य की पूरी निष्ठाभाव के साथ सेवा की |अपनी कर्तव्यपरायणता ,लगनशीलता और ईमानदारी के कारण बैंकिंग क्षेत्र में आपको काफी सम्मान और सराहना मिली |९ मई १९९० को आप प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए |
                              सेवा में रहते हुए और सेवानिवृत्ति के बाद आप समाजसेवा के लिए प्राणपण से समर्पित हैं |८६ वर्ष की अवस्था में भी अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद आप देशाटन और तीर्थभ्रमण के लिए तत्पर रहते हैं |ग्वालियर अंचल में जैन समाज की प्रायः हर गतिविधि में आपकी संलग्नता रहती है |आप जुनून की हद तक समाजसेवा के लिए प्रस्तुत रहते हैं |आपका गहरा जीवनानुभव और उत्कृष्ट चिंतन सहज ही लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है |
                                   आपने वर्ष २००५ में ग्वालियर में आयोजित अखिल जैन समाज के वैवाहिक परिचय सम्मलेन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका के संपादक के रूप में महत्वपूर्ण बौद्धिक योगदान दिया और उसके अनुसचिवीय दायित्व का कुशलतापूर्वक निष्पादन किया |वर्ष १९७३ -७४ श्री दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र सोनागिर की प्रबंधकारिणी समिति के कतिपय पदाधिकारियों ने कार्यसमिति को विश्वास में लिए बिना जब गोपनीय ढंग से ट्रस्ट का गठन कर उसमें यह प्रावधान कर लिया था कि किसी न्यासी का स्थान रिक्त होने पर उसके उत्तराधिकारी को नामित किया जावेगा लेकिन ज्यों ही यह तथ्य श्री शीतल प्रसाद जी के संज्ञान में आया उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया और उस 'निजी 'न्यास को निरस्त कराने के लिए चले अभियान के आप सूत्रधार बने और अंततः उसमे सफलता प्राप्त की|
                               जैन समाज की दर्जनों संस्थाओं और संस्थानों से आप संबद्ध रहे हैं |ग्वालियर अंचल की प्रायः हर गतिविधि में आपकी सक्रिय संलग्नता रही है जिनकी सूची काफी विस्तृत और लंबी-चौड़ी है |आपको दर्जनों अभिनन्दन-पत्र,पारितोषक ,स्मृति-चिन्ह और सम्मान प्राप्त हुए हैं |आपने अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरहिया महासभा के महामंत्री पद को सुशोभित किया है और अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन परिषद की कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में लंबे समय तक जुड़े रहे हैं ||दिगंबर जैन मुमुक्षु मंडल को ग्वालियर अंचल में आपने नई ऊंचाईओं तक पंहुचाया है |वरहिया जैन समाज आप जैसे युवा-बुजुर्ग के मार्गदर्शन का अभिलषित हैं |