मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

अग्रवाल जाति


 अग्रोतक अथवा अग्रोदक अगरोहा का प्राचीन नाम है। अगरोहा पंजाब प्रान्त के हिसार जिले के फतेहाबाद तहसील में देहली-सिरसा रोड पर स्थित एक छोटा सा कस्बा है, इसको अग्रवाल जाति अपने पूर्वजों का निवास स्थान मानती है। विक्रम संवत् 1632 में लिखी 'जंबूस्वामी चरितम्' के लेखक ने अपने संरक्षक को 'अग्रोतक वंश के गर्ग गोत्र' का बताया है और वि.सं.1881 की पभोसा पहाड़ की धर्मशाला की प्रशस्ति में भी उसके निर्माता का 'अग्रोतकान्वय गोयल गोत्र' का बताकर परिचय दिया है जिससे यह मालूम होता है कि अकबर के समय तक अग्रवाल शब्द  प्रचलन में नहीं आया था और 19वीं शताब्दी में जब अग्रवाल शब्द का व्यवहार शुरू होगया,अग्रवाल लोगों को अपने 'अग्रोतकान्वय' या 'अग्रोतक' निवासियों के वंशज होने का पता था।
मोशियो प्रज़लुस्की ने बुलेटिन ऑफ द स्कूल ऑफ ओरियन्टल स्टडीज में अपने एक लेख में अगरोहा की पहचान अग्रोतक या अग्रोदक के रूप में की है। उनके इस कथन की पुष्टि अगरोहा की खुदाई में मिली मुद्राओं से भी होती है। 'अग्रोदक' एक यौगिक शब्द है जिसका विग्रह 'अग्र-उदक' होगा। उदक शब्द जल अथवा तालाब का द्योतक है। इसलिए अग्रोदक का तात्पर्य 'अग्र का तालाब' अथवा 'अग्र से सम्बद्ध तालाब' हुआ। सिरसा से अगरोहा और करनाल-थानेश्वर तक का सौ मील का इलाका अपने कुण्ड या तालाबों के लिए प्रसिद्ध रहा है। इसलिए इस नाम से यह मालूम होता है  कि वहाँ  कोई तालाब रहा है और हिसार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1918 के अनुसार इस इलाके में एक प्राचीन तालाब के चिह्न 310 बीघे के क्षेत्रफल में मिले थे इसलिए यह कोरी कल्पना नहीं है।
 1938 में भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से हुई अगरोहे के कुछ टीलों की खुदाई में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की जो ताम्र मुद्राएं प्राप्त हुई हैं,जिनसे मालूम होता है कि वहां 'आग्रेय' नामक एक जनपद था।अग्रवाल जाति के इतिहास के सम्बन्ध में अब तक कई छोटी-बड़ी पुस्तकें प्रकाशित हुईं हैं जिनमें दन्तकथाओं और भाटों द्वारा बताई गईं किंवदन्तियों तथा पौराणिक कथाओं के हवाले से यह बताया गया है कि 'अग्रवाल जाति के आदि-पुरुष अग्रसेन नाम के एक नृपति थे और उनके 18 पुत्रों के नाम से 18 गोत्र प्रचलित हुए हैं। लेकिन इन महाराज अग्रसेन के होने के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण या साक्ष्य नहीं मिलता इसलिए यह कोई मिथकीय चरित्र मालूम होते हैं। अग्रवाल जाति का इतिहास लिखने वाले विद्वान लेखक परमेश्वरी लाल गुप्त की भी यही मान्यता है। उनके अनुसार ‌‌ भी 'अग्रसेन' नाम के कोई ऐतिहासिक नृपति नहीं हुए हैं जिनसे अग्रवालों की उत्पत्ति का सम्बन्ध जोड़ा जा सके।यह बात भले ही अटपटी लगे लेकिन यह बात सच है कि अग्रसेन के सम्बन्ध में प्रचलित किंवदन्तियों और कथाओं को पुष्ट करने वाला कोई ऐतिहासिक प्रमाण अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। अन्य वैश्य जातियों के समान ही अग्रवाल जाति के मूल में भी 'गण' और 'श्रेणी' रही है।  इसी से 'अग्रश्रेणी' और उससे अग्रसेन की कल्पना को बल मिला प्रतीत होता है।'अग्रवाल' शब्द का व्यवहार मुस्लिम काल में शुरू हुआ है। इसके पहले इस शब्द का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। अग्रवाल' शब्द का तात्पर्य 'अग्र' के निवासी है। अकेली अग्रवाल जाति ऐसी नहीं है जिसमें 'वाल' प्रत्यय का प्रयोग हुआ हो। पालीवाल, ओसवाल, खण्डेलवाल, वर्णवाल आदि सभी 'वाल' प्रत्यय वाली जातियों के नाम उनके मूल निवासस्थान के बोधक हैं। कदाचित् आग्रेय गण में जिन 18 प्रधान कुलों का हाथ रहा या जिन मित्र संघों से मिलकर यह मित्र गण (काॅनफेडरेशन)बना और अग्रश्रेणी के रूप में उनमें , जिन 18 कुलों का निवास रहा हो, उन्हीं के द्योतक ये गोत्र हों।क्योंकि यदि एक ही पिता के 18 पुत्र होते और उन्हीं से यह 18 गोत्र बने होते तो एक ही पिता के वंशजों में परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध की अनुमति क्योंकर होती? इसलिए यह मान्यता उचित नहीं है।
       'ट्राइब्स एंड कास्ट ऑफ एन. डब्ल्यू. पी. एंड अवध' के लेखक डब्ल्यू.क्रुक और 'अग्रवाल उत्पत्ति ' के लेखक रामचंद्र अग्रवाल (सन् 1890) का मत है कि जो लोग अगर (अगरु) यानी चंदन के बुरादे ,जो हवन में और सुगंध के रूप में व्यापक रूप से उपयोग होता था-के व्यवसाय में संलग्न रहे,वे कालांतर में अगरवाल कहलाए। हालांकि यह कल्पना असंगत मालूम नहीं होती फिर भी अधिकांश लोग ऐसा नहीं मानते। लेकिन मुंबई के कुछ गुजराती अग्रवाल स्वयं को अग्रोहा का मूलनिवासी न मानकर 'आगर' (मालवा)का मूल निवासी मानते हैं और अग्रवाल शब्द को 'आगरवाल' से निष्पन्न मानते हैं।
              आग्रेय गण काफी प्राचीन और ऐतिहासिक गण रहा है। महाभारत के वनपर्व में आए एक उल्लेख में कर्ण ने अपने दिग्विजय अभियान में जिन राज्यों को पराजित किया था, उसमें आग्रेय नामक गण भी था,जो भद्र गण से आगे रोहितक और मालव गणों के बीच में स्थित था।भद्र,रोहितक (रोहतक) और मालव पंजाब के प्रसिद्ध गण रहे हैं ।यवन लेखकों (330 ईसापूर्व) के विवरणों में 'अग्गलसोई' नामक जिस समृद्धशाली गणतंत्र का उल्लेख आया है जो वास्तव में 'आग्रेय श्रेणी' शब्द का ही प्राकृत रूप है। प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि (5वीं ईसापूर्व) ने भी 'अष्टाध्यायी' में 'अग्र' नामक जनसमुदाय का उल्लेख किया है।इन प्राचीन गण या श्रेणी में कोई वंशानुगत या निर्वाचित शासक नहीं होता था और समस्त जनपद को उसका शासक समझा जाता था।आग्रेय गण भी एक ऐसी ही श्रेणी था।खुदाई में प्राप्त मुद्राओं से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। लेकिन गणतंत्रात्मक व्यवस्था का धीरे धीरे लोप होने और एकतंत्रीय शासन व्यवस्था के उदय होने पर 'अग्रश्रेणी' से अग्रसेन की कल्पना कर उसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व प्रदान करने के लिए भाटों द्वारा उनकी वंशावली की कल्पना असंभव नहीं लगती।'अग्र' गण के लोग शस्त्र संचालन में भी निपुण थे।
            नागों के प्रति अग्रवाल लोगों में विशेष आदर भाव रहा है।वे उनकी विशेष अवसरों पर पूजा करते हैं क्योंकि वे नाग जाति को अपने मातृ पक्ष से सम्बद्ध मानते हैं। नागों से आशय नाग या सर्प गणचिन्ह (टोटेम) वाली एक आर्येतर जाति से है जो अतीत में काफी शक्तिशाली रही है और जिसका साम्राज्य बहुत विशाल और समृद्ध रहा है। कश्मीर से लेकर श्रीलंका और अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक नाग सभ्यता के चिन्ह फैले हुए हैं।नाग जाति की आर्यों के साथ काफी घनिष्ठता रही है।राजा जनमेजय के अतिरिक्त किसी अन्य आर्य राजा से उनका भारी संघर्ष नहीं हुआ।नाग जाति और आर्य जातियों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होने के कई वृतांत पुराणों में मिलते हैं। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में नाग जाति का वर्चस्व रहा है।बाद में विदिशा, मथुरा, पद्मावती,कांतिपुरी नाग जातियों के शक्ति केंद्र रहे हैं। नागों की शासन प्रणाली संघात्मक थी। अग्रोहा से खुदाई में मिली सामग्री से वहां कुषाण शासकों  का आधिपत्य  होने के बारे में संकेत मिलते हैं।नाग जाति के भारशिव राजाओं ने अग्रोहा से कुषाणों को  खदेड़ बाहर किया था और वहां के लोगों को कुषाणों के अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाई थी, इसलिए वहां के लोगों में नाग जाति के प्रति कृतज्ञता का भाव  बहुत स्वाभाविक है।
श्री काशी प्रसाद जायसवाल ने अष्टाध्यायी के आधार पर तत्कालीन बहुत से गण राज्यों की सत्ता का उल्लेख किया है। इन गण राज्यों का शासन प्रायः श्रेणितन्त्र होता था। गण सभा में विविध कुलों के प्रतिनिधि एकत्र होते थे और राज्य कार्य का संचालन करते थे। ये प्रतिनिधि  निर्वाचित नहीं होते थे बल्कि प्रत्येक कुल का नेतृत्व उसका मुखिया यानी गोत्रापत्य या वृद्ध व्यक्ति करता था। (आज भी पंचायतों में यही रूप चला आ रहा है, कुल का मुखिया ही प्रतिनिधि समझा जाता है।) इसीलिए कुल में एक ही गोत्रापत्य होता था। उस कुलके अन्य सदस्य युवापत्य कहलाते थे। प्रत्येक कुल की विशेष संज्ञा होती थी, जैसे गर्ग द्वारा स्थापित कुल के गोत्रापत्य व वृद्ध की संज्ञा गार्ग्य थी और उस कुल के सब लोग गार्ग्यायण कहलाते थे। गोत्र से पाणिनि का यही अभिप्राय रहा है।अग्रवाल जाति का विकास 'आग्रेय' नामक गण से हुआ है। इसलिए इस जाति में गोत्र का तात्पर्य वही रहा होगा, जो पाणिनि ने व्यक्त किया है। इसलिए अग्रवाल जाति में जो धारणा गोत्रों के सम्बन्ध में प्रचलित है वह मिथ्या है। अग्रवाल जाति में जो साढ़े 17 या 18 गोत्र माने जाते हैं, वे आग्रेय गण में  18 प्रधान कुलों  या जिन मित्र संघों के सहयोग से वह मित्रपद (काॅनफेडरेशन)बना था-के द्योतक हैं। अग्रश्रेणि के रूप में उसमें जिन 18 कुलों का निवास रहा कदाचित् उन्हीं के प्रतीक ये गोत्र हैं। जिनकी बाद में मिताक्षरा विधि के उनकी अनुकूल कल्पना कर ली गई और उसीके आधार पर अग्रवालों के गोत्रों के पुरोहितों से होने की किंवदन्ती चल पड़ी।  यदि  मिताक्षरा हिंदू विधि के अनुसार अग्रवालों के सभी गोत्र हैं तो वे सभी गोत्र ब्राह्मणों से मिलने चाहिये क्योंकि उनका विकास विभिन्न पुरोहितों से हुआ होगा। लेकिन  बड़ी खींचतान के बाद भी अग्रवालों के केवल चार गोत्र ब्राह्मण गोत्रों से मिल पाते है। इससे स्पष्ट है अग्रवालों के गोत्र ब्राह्मण पुरोहितों के नहीं हैं। जहां तक अग्रसेन के पुत्रों से अग्रवालों के गोत्रों के स्थापित होने का प्रश्न है तो यहां भी विचारणीय है कि उनके कितने पुत्र थे। क्योंकि इस बात को लेकर भी गंभीर मतभेद हैं।कई पुस्तकों में अग्रसेन की पुत्रों की संख्या 54 बताई गई है लेकिन गोत्र तो 17 या 18 ही हैं इसलिए यह मान्यता भी गलत मालूम होती है।
अग्रवालों के गोत्रों के बारे में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विवरण दिए हैं जिनका यहां आगे उल्लेख किया गया है -
'हिंदू ट्राइब्स एंड कास्ट एज़ रिप्रिजेंटेड इन बनारस' में शेरिंग महोदय ने निम्न गोत्र बताए हैं- 1-गर्ग,2-गोभिल,3-गरवाल,4-वात्सिल,5-कासिल,6-सिंहल,7-मंगल,8-भदल,9-दिंगल,10-एरण,11-तायल,12-टेरण,13-ढिंगल,14-तित्तिल,15-मित्तल,16-तुंदल,17-गोयल,18-विंदल।

'द पीपल ऑफ इंडिया' में रिसले ने जो गोत्र सूची दी है वह निम्नानुसार हैं- -1-गर्ग,2-गोभिल,3-गावाल,4-वात्सिल,5-कासिल,6-सिंहल,7-मंगल,8-भदल,9-तिंगल,10-ऐरण,11-तायल,12-टेरण,13-ढिंगल,14-तित्तल,15-मित्तल,16-तुंदल,17-गोयल,18-गोयन

'ट्राइब्स एंड कास्ट ऑफ एन. डब्ल्यू.पी. एंड अवध' में डब्ल्यू.क्रुक के उल्लेखानुसार गोत्र इस प्रकार हैं -
1-गर्ग,2-गोभिल,3-गौतम,4-वासल,5-कौशिक,6-सैंगल,7-मुद्गल,8-जैमिनि,9-तैत्तरेय,10-औरण,11-धान्याश,12-ढेलन,13-कौशिक,14-ताण्डेय,15-मैत्रेय,16-कश्यप,17-माण्डव्य,18-नागेंद्र।
'अग्रवाल जाति का प्रामाणिक इतिहास' के लेखक श्री गुलाब चंद ऐरण के अनुसार -
1-गर्ग,2-गोयल,3-कछल,4-कांसिल,5-बिंदल,6-ढालन,7-सिंगल,8-जिंदल,9-मीतल,10-तिंगल,11-तायल,12-वांसल,13-कांसल/(टेरन),14-तांगल,15-मंगल,16-ऐरन,17-मधुकल,18-गोइन।

श्रीविष्णु अग्रसेन वंश पुराण के अनुसार -
1-गर्ग,2-गोयल,3-कच्छल,4-मंगल,5-विंदल,6-ढालन,7-सिंगल,8-जिंदल,9-मित्तल,10-तुंगल,11-कांसल,12-ताइल,13-वांसल,14-नागल,15-मुग्दल,16-ढरन,17-ऐरन,18-गवन।

काका हाथरसी (प्रभु दास गर्ग) ने अग्रवाल जाति के गोत्रों का पद्यात्मक विवरण इस प्रकार दिया है -
वैश्य जाति में प्रतिष्ठित अग्रवाल का वर्ग,
 गोत्र अठारह में प्रथम नोट कीजिए गर्ग,
नोट कीजिए गर्ग कि कुच्छल, तायल, तिंगल,
 मंगल, मधुकुल, ऐरण, गोयन, बिंदल, जिंदल,
कहीं-कहीं है नागल, धारण, भंदल, कंसल,
अधिक मिलेंगे मित्तल, गोयल, सिंहल, बंसल,
 यह सब थे अग्रसेन के पुत्र दुलारे,
 अनेक भारतवासी उनके वंशज हैं, वे हैं पूज्य हमारे 

अग्रवाल समाज प्राचीन समय में जैन धर्मावलंबी रहा है लेकिन राजनीतिक परिस्थितिवश धीरे धीरे वे वैष्णव मतावलंबी हो गए। लेकिन आज भी बड़ी संख्या में अग्रवाल जैन धर्मानुयायी हैं।


सोमवार, 13 फ़रवरी 2023

चौरासी जैन जाति


 

चौरासी जाति


✍️अथ 'मनरंग कीर्ति 'चौरासी जाति की जयमाल लिख्यते-



श्री नेमीश्वर चरनजुग
 तारन तरन जहाज।

 नमो मदन मारन मेले
 मदन मत्त मृगराज।

श्री सिवदेवी नंद को
 जूना गढ़ गिरनारि।

भयो महोत्सव शुभ तहां
सुनिये सब नरनारि।

जाति चौरासी जैन मत
देस – देस के आन।

चारि छोहनी भीर सब
इकठी भई महान।

माल भई जिन चंद जी
निज कर इंद्र बनाय।

लेवे को भविजन सकल
 उमगे चित हरषाय।

जौन जौन सुभ देस के
आये भाव उमगाय।

तौन तौन के नाम सुभ
कछु कहिये चित लाय।



कौसल कासी सुभ देस जान
 कश्मीर और कौंरू बखान।

तैलंग अंग अरू बंग देस
करनाट लाट अरू घोटवेस।

वागड वन्वर पुनि और किंलग
मालवा मध्य चित्तौड़ चंग।

गुजरात सकल सुभ सिंधु चोल
निज निज भेषन को धरि अमोल।

सोरठ द्रावड़ मह चीन चीन
 बंगाला मागध जो प्रवीन।

अंभोज पोंड्र केरल मनाय
सुभ देस मलय गिरि सकल आय।

सौ वीर अवंतिक पुनि उनाट
 बीजापुर अरू सुंदर विराट।

मरहट मेवात अरू माड़वार
 पंचाल देस अरू सिग ठुँठार।

कालिंजर गगहर कक्ष देस
वीशाल मनोहर गौड़ वेस।

कुरूजंगल तिरऊत है विनोद
सौरम्य तिलोरक कह्यौ मोद।

सुभ कालकीट सोहै किरात
अरू पुंड मल्ल त्रिकिंलग जात।

वैदुर्भ सुकुरू अरू सुभ्य देस
 पुनि चेदी उद सोमधृ देस।

सुभ कामरूप अरू अघ्न होय
 प्रांतर दसार्न पुन्नाट सोय।

पाडता उसीर सुभ है कसे
 उद्दू विद्रुम अरू अघ चेर।

सोहै अरद्र पुनि विड बखान
 पुह कलावती कारूक सुजान।

हीरन्य और सुभ कूल संग
सौरम्य जोध आये सुचंग।

अम्मेर मंगलावति सुजोय
 पुनि पांडु और पांडल मनोय।

जोडाहल कहिये सूरमंद
 कुल कम्म अंदु जानौ अमंद।

कांची सौभद्र रावल सुजान
गंभीर भोट कोंकन बखान।

इत्यादि देस औरऊ अनेक
सब इकटे में धरि हिय विवेक।

तहा इंद्र सचि आइके
 माला रची सुभाय।

कछु ताको वरनन करौ
जा सुनि चित हरषाय।

महा गंधकारी महा रूपधारी
लगे पुष्प नाना संभारी-संभारी।

चमेली सुचंपा घेनेरे घेनेरे।
सुवंधूक जाही जुही के भले रे।

गुलाला गुलाबी सदा सो गुलाबा
भले दाउदी गुंजते भौरसावा।

गुंथी कल्प साखी तने पुष्पलाई
 लगाये महा कंज बेला चुनाई।

महा नाग मुक्ता लगे जासु माही
 चुनी सो चुनी चारू सोभा लखाही।

कहीं पीत आभा कहीं स्यामताई
कहीं रक्त मानिक्य सोभा धिकाई।

कहीं स्वेत माला विराजै विसाला
लगे  वंग के खंड की सोभ आला।

कहीं लागि पन्ना महा कांतिकारी
चंहुओर जाने निजाभा विभारी।

बनी माल ऐसी कहाँ सोभ जाकी
 बनाई भई भेस वज्जी तियाकी।

धरी नाभ आगे महा सोभ पाई
 चढ़ाई रची नाथ को आप लाई।
तहा राज राने अनेकान आये
 भले सेठि साहू विना गंतु धाये।

खड़े देवदेवी चहूँ ओर घेरे
 करै सब्द जै जै महा भक्ति पेरे।

खगी और खगेसा महा तेजधारे
 चरै चारिहूं धा जिनाज्ञा विथारे।

वहां जाति चौरासि यों जैन केरी
भई आइ मेला सुमेला घनेरी।

बजावे वहां दुंदुभी देव तारी
नगारें बजैं सर्व आनंदकारी।

बजैं ताल मिरदंग नाना नवीना
बजैं वंस कणसाल कानू नवीना।

नटै नाटकी नाटिनी नाटनी के
 कटै पाप संताप सारे तिन्ही के।

महा भामिनी को किलारा  सुगावे
चलै भाँति सो भाव अच्छे बतावे।

सजै नृत्य संगीत संगीत गावें
 बड़े भावसों देव ताली बजावें।

भेल पाद विन्यास की रति ल्यावें
मिलै ताल सौं छुद्र घंटी बजावें।

ऐसो उत्सव जहं भयौ
 कहत न पावत पार।
अब चौरासी जाति के
नाम कहौ निरधार।

खडायना सुगोड गंगरानिया बखानिया
 असीतवाल कोरवाल दूसरे सुवानिया।

खंडेलवाल ओसवाल श्री श्रिमाल जानिया
 वघेरवाल अग्रवाल जैसवाल मानिया।

लंबेंचूवाल श्रीयमाल धाकड़ा जुरे घने
 सहेलवाल ऊँवडे संडेरिया गने गने।

माढवा लवायडी कपोल जाति के भने
 दसौरवाल पल्लिवाल गोललार के घने।

नरायना सुनागरीय कांथडा चितोड़िया
 भटेर गोलपूर्व और भट्ट नागरे भिया।

घनोरवाल रैकवाल झारिड़ी संवालिया
चतुर्थ और पंचमा सुजाय ला कराहिया।

सुलाडवाल सूरिवाल जंवुसार धाइया
 श्रीयगौड जाति के अनेक लोग आइया।

कहे सुनार सिंहपोर सेरिहीय है घने
 गुरू सुवाल जेहरान डेडुवाल सोहने।


खडवड गोलसिंगारे मेठ तवालही
 टठतवाल पुरवाल 'वरहिया' है सही।

मगलवाल अरू पुकरवाल हर सौरिया
वध नो राज लहराक है अन दौरिया।

हर दौरा श्रीमाली नाना वाल जू
 माडाहाडा सेरहिया अकनाल जू।

करनसिया मझकरा कहे कोलापुरी
 साचौरा गृहपत्तीना गद्रह कीकुरी।

सकल जाँगरा पोरवार कर वारजे
 सोरठिया पुरवार कठन है लारजे।

भले अयोध्या पूरब आनंद सो चले
पद्मावति पुरवार पवयडा हे भले।

वासक माको मठी अटस परवार है
 कहे दसेरा पोरवार हितकार है।

औ माली पुरवार सकल ये जानिया
निज निज भाषा बोलत आनंद मानिया।

चार्चा संग्रह ग्रंथ महा अभिराम है
 ता मधि जिनमत जाति चौरासी नाम है।

ताहि देखि हम इहा लिखि सुनियौ सही
भूल जहां कछु होय तहां सोधौ कही।


ऐसे सब ही जात
भेला है मेला भयौ।
निज निज मन हरषात
उमगे माला लेन को।

और अनेकन भूपसों
 मागै माल बढ़ाय।
ताको वरनन करते हौ
सुनऊ भव्य मनलाय।

नवाय माथ जोरि हाथ नाभ माल दीजियै
 मगाय देव हेमराशि सो भंडार कीजिए।

सहस वीर जांगरा दिनार भावसों
हजार दै चलीस गौड माँग ही छ चावसों।

खंडेलवाल यौं कहै असी हजार लीजियै
दिनार सेक जाति की दया दयाल कीजियै।

खडायना सुलछदेत है बड़ी उमंग सों
 द्विलछ देय श्रीयमाल माल को अभंग सों।।

सुचारि लछ श्री श्रिमाल आठ लछ दूसरे।
वघेरवाल आठ दून देत दावसों भरे।

बत्तीस लाख जैसवार तास दून धाकड़ा
नारया सु अस्सि लाख  ऐक कोटि काथड़ा।

दिनार देय देय हाथ जोड़ जोड़ माग ही
 गुनानुवाद गाय गाय सीस को नवाय ही।

असीतवाल दोय कोटि लछ देत वानिया
 करोरि चार कोरवाल आठ गंगरानिया।

सुओसवाल मोतिया अमोल देत है घने
 अनेक रत्न अग्रवाल देत है बिना गने।

अमोल लाल मालकाज श्रीयमाल देत है
 लुटाय के जिनेन्द्र पै सुफूल माल लेत है।

खड़े सुपल्लिवाल दूमड़े खड़े जहां
 कहै अनेक कोठरी खजाने लीजियै महां।

कपूर जाफरान की सुगाड़िया भराय के
 सहेलवाल औ लंबेचू देत आय आय के।

बनाय रत्न सो जड़ी लगाम जीन पाखरे
 अमोल एक जाति के अनेक सोभ को धरे।

नरायना चितोडिया सनागरी मगाय के
 बिना गने तुरंग देत सीस को नवाय के

भट्टेर गोल पूर्व और गोललार के घने
 गयद साजि साजि वेस भेस सो सुहावने।

महा उतंग स्याम जेम नील भू धरा लसे
मगाय देत माल हेत इंद्र नाग को हसे।

चतुर्थ और पंचमा अनेक दसे देवही
 लुटाय माल मालकाज श्री जिनेन्द्र से वही।

घनोरवाल यों कहे हमें न माल देओगे
 भराय घी जहाज में कितेक दाम लेओगे।

इत्यादि बानिया समस्त आप आपु को सवै
 सो एक एक सो अधिक देत दाम है जवै।

पवित्र पाप नाशनी जिनेन्द्र माल लेन को
 उछाह सो खड़े जहां महान द्रव्य देन को।

अनेक सूम यों कहे भले सुलछ देत है
 ताय दाम आपने सुफूल माल लेत है।

कठोर क्रूरचित्त के महात्म देखि जैन को
चले सुवाग मोडि मोडि होस नाहि वैन को।

अनेक देखि भूपती बड़ा अचंभ मान ही।
 महाप्रताप जैन धर्म को हियै पछान ही।

कहें पुकारि यों क्षितीशनाथ माल दीजिए
जितेक राज लक्ष्मी सवै हमारि लीजिए।

गुरू बोले सुनि बात
 वैसे माला ना मिलें।
महा पुन्य अवदात
होय जास सो पाव ही।

जिन भौम वनावहि भावधरे
प्रतिबींब शिरावहि जो सुथरे।
इकठी चवरासिऊँ जाति कर
दुखियाजन की सब पीर हरे।

जिन जज्ञ रचै छल छिद्र बिना
कछु मान वड़ाइन करै अपिना।

सब संघ चलाय वनै संग ही
 परभावन अंग करै तब ही।

प्रिय बैन कहै सबसों हित के
नहि पालहि झूठ भले चित के।

इत के वित के नहि वैन सुनै
मन मै जिनराज सरूप गुनै।

लक्ष्मी वऊ धर्म विषै खरचै।
न करै कवहूँ मिथ्या परचै।

अरचै पद पंकज नेमतने
चरचै गुरजो निग्रंथ भने।

वह सास्त्र सुनै जिनमें सुदया
उपजै विनसै सगरी अदया।

यहि भांति अनेकन पुन्य मिया
 करि पावहि माल अमोल जिया।

सबको यहि भांति संबोध कियो
 तब ही सिंघराय बुलाय लियो।

अति आनंद पूरित माल दई
 नृप सिंह तवे हरषाय लई ।

नर जो जिन माल अमोल लहै
गनियो नर जन्म सुफल वहै।

प्रगटै जस लोक विषै जिहि को
अति पुन्य भंडार भरै तिहि को।

जिहि की लक्ष्मी न घटै कबहूँ
दिन दून बढै परचै जबहूं।

यह लोक प्रसिद्ध कहै सगरे
जित धर्म तितै लक्ष्मी बगरे।

बिन धर्म रमा वुध यौ उचरै
विधवा तिय ज्यौं नहिं सोभ धरै।

मनरंग सदा चितमें धरिए
जिनधर्म दयामय विस्तरिए।
तरियै करि सो निज आतम को
हरियै सु अज्ञान महातम को।

परिये न भवोदधि में फिरिकै
 करियै यह काज महा थिर कै।


यह चौरासी जाति की
माल कही हम विशेष।
पढ़त सुनत संकट मिटै
जै जै नेमि जिनेस।

जेठ महीना सुकुल पाख
 तिथि पंचमि गुरुवार।
ता दिन संपूरन भई
जैमाला हितकार।

एक सहस नै सतक में  षटवरषै करि दूरि।
संवत सो जानौ सुधी सदा रहौ सुख पूरि।

धन कन बढ़ै अनेक बढै कीरति दिन दूनी
दिन दिन सुख सरसाय कुमति छिन छिन में ऊनी।

अनगन गुनगन गहै लहै पगपग पटुताई।
कल्मष दूर कल्यान होय ता घर में आई

पुत्र पौत्र परताप सौ संपूरन निव से जिया
 मनरंग लाल जा हृदय में बसत नेमि राजुलि पिया।

श्रावक धरमपाल मुसाहेब गंज साल विंदा लाल के सुपुत्र रतन बखान ही ।
अन्नजल के त्रसाय रहौ सु नगर आय अग्रवाल वंश गर्ग गोत सुबखान ही।
भादों जी की पूजा पाठक कथा रासा है विसाल हरष सहित लिख्यो अति सुखदान ही।
 विक्रम सुदित्य सार संवत सुनौरसरल मास तिथि दिन ताको करो सु बखान ही।

एक ऊन सन बीस तास पर षोडस जानो
पोष सुकुल तिथि पूनम ऐंतवार सुबखानो ।

पढ़े गुनै जो कोई ताहि आतम सुख भाय के
गुलजारी के पठन को लिखी सु मन वच काय के।
               भूल चूक सब सोंधियौ।




सोमवार, 30 जनवरी 2023

विवाह से जुड़ी कुछ चिंताएं


 विवाह को लेकर आज जैन समाज में और विशेषकर वरहिया जैन समाज में जो स्थिति बन रही है वह सचमुच डरावनी है। क्योंकि बड़ी संख्या में विवाह योग्य युवक और युवती जिनकी उम्र तीस से पैंतीस वर्ष या अधिक है, अविवाहित हैं। इनमें ज्यादातर वे हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं या वे हैं जिनके पास आकर्षक जाॅब नहीं है या फिर उच्च शिक्षित वे लोग हैं जिन्हें अच्छे पैकेज मिलते हैं और जो महानगरों में कार्यरत हैं। शादी के लिए ग्रामीण क्षेत्र का नाम सुनकर धुर ग्रामीण परिवेश में रहने वाली लड़की यदि नाक-भौंह सिकोड़ने लगे तो अचरज न करें। यह टीवी और इंटरनेट की चकाचौंध और उससे उपजी महत्वाकांक्षा का नतीजा है।लिहाजा मज़बूरन कई अभिभावकों को बिहार, बंगाल से मैनेज करके यानी खरीदफरोख्त करके बहुएं लाने की राह चुननी पड़ी। यह स्थिति कतई श्रेयस्कर नहीं कही जा सकती है।अब अगर कामकाजी लोगों की बात करें तो  वे पहले तो खुद को आर्थिक तौर पर मजबूत करना चाहते हैं  और जिंदगी में इस्टेब्लिस होना चाहते हैं फिर कहीं शादी के बारे में सोचना चाहते हैं।  महानगरों में जाॅब करने वाले को तो रिलेशनशिप का ऑप्शन भी सुलभ है और शायद इसीलिए वे या उनमें से ज्यादातर लोग विवाह की उम्र में भी विवाह को लेकर यों बेफिक्र हैं। अलबत्ता बच्चों के विवाह की चिंता उनके मां बाप को सताती रहती है । लेकिन कभी योग्य जीवन साथी न मिलने का रोना रहता है तो कभी आर्थिक असुरक्षा का बहाना बनाया जाता है और कभी दहेज भी एक फैक्टर होता है।इस स्थिति के लिए सिर्फ उनके माता पिता को दोषी ठहराकर पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं क्योंकि यह उनकी शुरुआती परवरिश का नहीं बल्कि पश्चिमी जीवन शैली का साइड इफेक्ट है।
                          आज के दौर में बच्चों को उच्च शिक्षा और महानगरों से दूर नहीं रखा जा सकता है। अपने सामाजिक संस्कारों और पश्चिमी जीवन मूल्यों के बीच तालमेल कैसे बैठाया जाए यहीं पर परिजनों की भूमिका अहम हो जाती है। लेकिन काम-धंधे की व्यस्तता या अपने बच्चों पर अतिविश्वास के कारण परिवार जनों से यहीं चूक हो जाती है और वे अपनी इस अहम भूमिका के निर्वहन में जाने अनजाने में गलती कर बैठते हैं। इसलिए जरूरी है कि अपने बच्चों से संवाद की कड़ी न टूटने दें और भावनात्मक रूप से उनका संबल बने रहें । क्योंकि जब उनके जीवन में भावनात्मक रिक्तता पैदा होगी तो वे उस खालीपन को किसी और तरह से भरने की कोशिश करेंगे। आज कामकाजी युवक -युवतियों के वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में जो समस्याएं आ रही हैं उनके मूल में अक्सर उनके विवाह पूर्व के उन्मुक्त जीवन की स्थितियां ही जिम्मेदार रहती हैं। इसलिए बेहद सतर्कता से इन स्थितियों को हैंडल करने की जरूरत है। ध्यान रहे कि प्रगतिशीलता के नाम पर उच्छृंखलता और सामाजिक रीति रिवाजों की अनदेखी की भारी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी। मैं यहां यह बात स्पष्ट करता चलूं कि  किसी प्रकार की रूढ़िवादिता का पोषण करना मेरा मंतव्य नहीं है लेकिन सारे रिवाज निरर्थक और कालबाह्य नहीं होते, यह बात समझना बेहद जरूरी है।देखने में आता है कि मां-बाप की प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति की परवाह न कर होने वाली लव मैरिज में जब हीनतर सामाजिक स्थिति वाले कमाऊ  युवक या युवती वैवाहिक बंधन में बंधते हैं तो ऐसे रिश्ते जीवन भर नासूर की तरह चुभते रहते हैं और जिसका कोई प्रायश्चित नहीं होता।घर वालों को जीवन साथी के चुनाव में बच्चों (विवाहार्थी) की इच्छा को अधिमान्यता तो देनी चाहिए लेकिन खुदमुख्तारी नहीं। वर्ना स्थिति हाथ से निकल जाती है।
             कोई व्यक्ति कब विवाह करता है यह उसकी मर्जी है लेकिन उसे कब विवाह करना चाहिए इस बारे में यह जानना उपयोगी और दिलचस्प होगा कि 24-25 वर्ष की उम्र में फर्टिलिटी रेट सबसे ज्यादा होता है और स्पर्म क्वालिटी सबसे अच्छी होती है।यह रिसर्च बताती है। इसलिए 35-36 या उससे अधिक उम्र में शादी होने पर होने वाले बच्चों के जीन की गुणवत्ता तुलनात्मक रूप से बेहतर नहीं होती और उनके मानसिक रूप से किसी न किसी समस्या से ग्रस्त होने की संभावना काफी ज्यादा रहती है। इसलिए सही समय पर ही सही फैसले लेने चाहिए।
                      हम सबको इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है। सामाजिक स्तर पर भी इस दिशा में सकारात्मक पहल किया जाना जरूरी है। सिर्फ एक -दूसरे पर दोष मढ़ने से यह समस्या हल होने वाली नहीं है। किसी का परिहास करने या उसे नीचा दिखाने के बजाय उसका सही मार्गदर्शन कीजिए।यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।


शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

वर्ष 1914 की जैन जनगणना और वरहिया जैन समाज


 अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा द्वारा ई.1914 में भारत की समस्त दिगंबर जैन जातियों की गणना कराई गई थी।इस जातीय जनगणना से दिगंबर जैन जातियों की जनसंख्या का पहली बार आधिकारिक रूप से एक स्थूल आकलन हो सका। यह डायरेक्टरी वेंकटेश्वर मुद्रणालय मुंबई से प्रकाशित हुई थी। इसमें सभी दिगंबर जैन जातियों की जनगणना के अलावा विभिन्न समाजों के प्रमुख लोगों की भी एक सूची तैयार की गई थी।इस उलेख्य सूची में वरहिया(वरैया) जैन समुदाय के 59 प्रमुख परिवारों को शामिल किया गया है। यह हमारे अतीत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। वरहिया जैन समुदाय की तत्समय जनसंख्या का ग्रामवार विवरण अकारादि क्रम से यहां प्रस्तुत है। इसके अनुसार कुल जनसंख्या 1512 है।
1-अमरोल-23
2-आमोल-5
3-अलवर-20
4-अलापुर-20
5-अमोला-103
6-आरोन-27
7-इटावली-15
8-उज्जैन-9
9-करई -23
10-करहिया-311
11-कानीबहेरी-9
12-कुलैथ-23
13-गुलगांव(सलारतपुरा)-4
14-गोपालपुरा-8
15-घरसोदी-5
16-घाटीगांव-6
17-चंदपुरा-16
18-चिंदौनी-1
19-चीनौर-43
20-चुरैलखेरा-9
21-चैतनगर(चैतग्राम)-13
22-छड़ेर-8
23-छड़ेरा-8
24-छीमक-10
25-जिगसोली-5
26-जौरा-57
27-जौरासी-10
28-टिकटौली-36
29-दीमानगंज-8
30-धमकन-7
31-धौंआ-47
32-धौलागढ़-19
33-नरवर-53
34-नरेला-7
35-नवगांव-3
36-पनिहार-5
37-पार-10
38-बड़नगर(मालवा)-1
39-बनवार-34
40-बैरसिया-8
41-भौंती-2
42-भोपाल-10
43-मगरोनी-115
44-मुरैना-5
45-मोहना-39
46-मोहलिया-4
47-रायपुर(गिर्द)-11
48-रिठौरा-23
49-रेंहट-44
50-लीटिया -10
51-वरकेगांव-23
52-बिलोखो-2
53-बिहारिया-3
54-सांतऊ-11
55-सतनवाड़ा-18
56-सभराई-8
57-सिमरिया-21
58-सुमावली-85
59-सिरसा-6
60-शिवपुरी-30
61-हथरया-13

         वरहिया जैन समुदाय के गौरवास्पद इतिहास से परिचय कराने के उद्देश्य से उस समय के प्रमुख परिवारों का विवरण अकारादि क्रम से यहां आगे दिया जा रहा है।हर प्रविष्टि में पहले निवास स्थान का उल्लेख है इसके पश्चात परिवार के मुख्य-मुख्य लोगों के नाम और इसके बाद कारोबार का उल्लेख है -

1-अमरोल(गिर्द)-श्री राधेलाल,फुंदीलाल जी-गल्ले का व्यापार
2-आमोल(नरवर)-श्री चुन्नीलाल, मोतीलाल जी-बजाजी
3-अलापुर(तवरघार)-श्री सेवालाल,ग्यासीराम जी -दुकान कठारखाना
4-आमोल(नरवर)-श्री मन्नूलाल, तुलाराम जी -साहूकारी
5-आमोल(नरवर)-श्री ताराचंद, खूबचंद जी-साहूकारी
6-आरोन(गिर्द)-श्री दुरगी,खूबी-साहूकारी
7-इटावली(ग्वा.रिया.)-हीरावन दे-बंजी
8-उज्जैन-श्री जुहारमल, पूनमचंद जी -परचून की दुकान
9-करई(गिर्द)-श्री रामलाल, गंगाराम जी -साहूकारी
10-करहिया(गिर्द)-श्री लेखराज,जगराम जी -साहूकारी
11-करहिया-श्री दीवानमल वृजलाल जी-साहूकारी
12-करहिया-श्री मिहरचंद, रामलाल जी -साहूकारी
13-कानीबहेरी(नरवर)-श्री दरयाब, रामलाल जी -बंजी
14-कुलैथ(ग्वा.रिया.)-कुल्लेमल पुत्र श्रीधर्मदास जी-बंजी
15-गुलगांव [सलामतपुर](भोपाल रिया.)-सेठ सुखलाल, रतनचंद जी -किराना
16-घरसोदी(गिर्द)-श्री काशीराम, परमसुख जी -बंजी
17-घाटीगांव(गिर्द)-श्री पन्नू,मानू-बंजी करना
18-चंदपुरा(ग्वा.रिया.)-श्री दौलती,ज्योति प्रसाद -बंजी
19-चिंदौनी(तवरघार)-श्री दुलीचंद खूबचंद जी -खेतीबाड़ी
20-चीनौर(गिर्द)-श्री धाराजीत, नंदलाल जी -साहूकारी
21-चुरैलखेरा(नरवर)-श्री दुल्ली, रामलाल जी -घी और गल्ले का व्यापार
22-चैतनगर(ग्वा.)-श्री भजनलाल, प्यारेलाल जी -साहूकारी
23-छड़ेर(तवरघार)-श्री शोभाराम,मनसाराम जी -दुकान कठारखाना
24-छड़ेरा(गिर्द)-श्री हरगोविंद, बालकिशन जी -बंजी
25-छीमक(गिर्द)-श्री सोनपाल, प्यारेलाल जी -साहूकारी
26-जिगसोली(ग्वा.रिया.)-श्री मूलचंद, राजाराम जी -बंजी
27-जौरा(तवरघार)-श्री मोहनलाल, महासुख जी-दुकानदारी
28-जौरासी(ग्वा.रिया.)-श्री रामलाल, पातीराम जी -बंजी
29-टिकटौली(ग्वा.रिया.)-श्री छीतरया, अमरजीत जी -बंजी, खेतीबाड़ी
30-धमकन(तवरघार)-श्री ललईं, मूलचंद जी -दुकानदारी
31-धौंआ(गिर्द)-श्री मोतीराम,रामजीमल जी -साहूकारी
32-धौलागढ़(नरवर)-श्री रतनलाल, बिहारीलाल जी -आढ़त,साहूकारी
33-नरवर(ग्वा.रिया.)-सेठ श्रीचंद पुत्र श्री इच्छाराम जी -साहूकारी
34-नरवर-सेठ चतुर्भुज पुत्र श्री किशुनचंद जी -साहूकारी
35-नरेला(तवरघार)-श्री गिरधारी लाल,गोलीराम जी -दुकान कठारखाना
36-नवगांव(गिर्द)-श्री कड़ोरेलाल,विनतीलाल जी -गल्ले का व्यापार
37-पार(गिर्द)-श्री उदैनंद,हरप्रसाद जी -साहूकारी
38-बनवार(गिर्द)-श्री बापूराम, रामलाल जी-बंजी
39-बनवार-श्री हरलाल, भोगीराम जी -साहूकारी
40-बैरसिया(भोपाल)-श्री धन्नालाल जी -हलवाईगीरी
41-मगरौनी(नरवर)-श्री मोतीलाल, पन्नालाल जी -साहूकारी
42-मुरैना(ग्वा.रिया.)-पं.गोपालदास जी -आढ़त
43-मोहना(गिर्द)-श्री पन्नूलाल,भूरासिंह जी-साहूकारी, गल्ले का व्यापार
44-रायपुर(गिर्द)-श्री चिरोंजी लाल, धनपाल जी-पटवारी
45-रिठौरा(तवरघार)-सेठ पन्नालाल, हीरालाल जी -साहूकारी
46-रेंहट(गिर्द)-श्री प्रतापचंद,कड़ोरेमल जी -साहूकारी
47-लीटिया(गिर्द)-श्री पातीराम,बहोरनलाल जी -साहूकारी, खेतीबाड़ी
48-वरकेगांव-(गिर्द)-श्री माणिकचंद, हंसराज जी -साहूकारी,बजाजी
49-बिलोखो(नरवर)-श्री गुलाबचंद, श्रीलाल जी -बंजी
50-विहारिया(उज्जैन)-श्री चुन्नीलाल जी -परचून की दुकान
51-सांतऊ[शांतक](गिर्द)-श्री दुर्गा प्रसाद, मोतीलाल जी -साहूकारी, खेतीबाड़ी
52-सतनवाड़ा(नरवर)-श्री गुलाबचंद, पन्नूलाल जी-साहूकारी,घी का व्यापार
53-सभराई(गिर्द)-श्री फोदलिया पुत्र श्री जानकीराम जी -साहूकारी,घी का व्यापार
54-सिमरिया(गिर्द)-श्री अमरचंद, नेकराम जी -गल्ले का व्यापार
55-सुमावली(ग्वा.रियासत)-श्री हरगोविंद, प्यारेलाल जी -साहूकारी
56-सुमावली-श्री फैलीराम,गुलजारी लाल जी -साहूकारी
57-सिरसा(गिर्द)-श्री झींगरीमल, कालूलाल जी -पंसारी
58-शिवपुरी(नरवर)-श्री गिरधारी भाई, पातीराम जी -हलवाईगीरी
59-हथरया(ग्वालियर रियासत)-श्री भागचंद, धनीराम जी -बंजी।
[यहां यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इस जनगणना में आगरा अंचल के शमसाबाद ,बड़ा नगला,वदेकेवास,डौकी,कुर्राचित्तरपुर,गढ़ी महासिंह आदि स्थानों में वरहिया जैन समाज के निवास का कोई उल्लेख नहीं है। जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि या तो ई.1914 में कोई वरहिया जैन इस क्षेत्र में निवास नहीं करता था या फिर जनगणना कार्य करने वाले लोगों से कोई भूल हुई है।जबकि जनगणना में कुर्राचित्तर पुर में एक जैसवाल परिवार के निवास का उल्लेख है यानी वे लोग इस क्षेत्र से परिचित थे। शमसाबाद में रहने वाले सिंघई परिवार तो बरौआ (गिर्द) से जाकर वहां बसे हैं। अन्य मामलों में भी शायद ऐसा ही रहा हो। सांतऊ निवासी श्रीमान दुर्गा प्रसाद जी (पहाड़िया) जिनका उल्लेख सूची में प्रविष्टि क्रमांक 51में है, लेखक के प्रपितामह हैं,जो ई.1928 के आसपास भिंड जिले के लहार कस्बे में आकर रहने लगे थे]




रविवार, 15 जनवरी 2023

लंबेचू जैन


  परंपरा से दिगंबर जैन समाज में 84 जातियां मानी गईं हैं।लंबेचू जाति इन्हीं में से एक है।ये यदुवंशी क्षत्रिय हैं। जो लंबकंचुक यानी तारों से गुंथा हुआ लंबा चोगा या अंगरखा जो एक प्रकार का कवच था,युद्ध में धारण करने के कारण लंबकंचुक नाम से विख्यात हुए हैं।लंबेचू शब्द लंबकंचुक का अपभ्रंश है।लंबेचू कृष्णवंशी हैं जिनका गौरवशाली अतीत है।इसी वंश में राजा लोमकर्ण या लम्बकर्ण हुए हैं जो लंबकांचन( गुजरात और राजस्थान के संधिप्रदेश में)देश के अधिपति थे। उनके वंशज होने के कारण भी यह वंश लंबेचू या लम्बकञ्चुक नाम से प्रसिद्ध हुआ।मतांतर से लंबेचू शब्द को लंबेचुहान से व्युत्पन्न मानकर चौहान क्षत्रियों से उनकी निकटता स्थापित की गई है। चौहानों और लंबेचुओ के निवास स्थान और गोत्रादि में किंचित साम्य से यह मत उचित जान पड़ता है। चौहान क्षत्रिय भी यदुवंशी हैं।इस प्रकार लंबेचू जैन क्षत्रिय हैं,यह बात असंदिग्ध रूप से स्थापित है।यह जाति काफी प्राचीन है। संवत् 142 में भद्दलपुर पट्ट के पट्टाधीश लोहाचार्य इसी समुदाय से थे।
      शौरीपुर(शौर्यपुर)/बटेश्वर के आस-पास लम्बकञ्चुक (लंबेचू) समाज  की बहुलता है। यह क्षेत्र लंबेचू समाज की देखरेख में है। शौरीपुर वटेश्वरके आस-पास जितने ग्राम हैं, वहां  लँबेचुओं के अनेक परिवार निवास करते हैं।इसी के पास  स्थित कचोराघाट ,जसवन्तनगर,सिरसागंज,खुरई,अटेर ,इटावा,वकेवर,करहल, भिंड में लंबेचू समाज के बड़ी संख्या में लोग रहते हैं।
लंबकांचन के शासक राजा लोमकर्ण जो लंबेचुओं के पूर्वपुरुष माने गए हैं,के बारह पुत्र हुए थे। उनसे ही इनके बारह गोत्र निकले हैं जो इस प्रकार हैं -

 1.सोनी ,2.बजाज, 3.रपरिया, 4. चंदवरिया ,5. राउत,,6..वकेवरिया, 7.मुजवार ,8.सोहाने, 9.चौसठथारी, 10.बरोलिहा, 11. पचोलये ,12.कुंअरभरये, ये बारह गोत्र प्रसिद्ध हुए। इनमें से प्रत्येक गोत्र सात उपगोत्रों में विभिजित हुआ जो सत्ता ( सप्तक यानी सात का समूह) कहलाया।
 
(1)-पहला सत्ता, सोनी गोत्र के सोनपाल जी से  चला।  
1. सोनी, 2. संघी, 3.पोद्दार, 4. चौधरी, 5. तिहैया, 6.मोदी, 7.कोठीवाल । यह पहला सत्ता(सप्तक) हुआ।  
यह नामकरण उनके पुत्रों के नाम, पदवी,व्यवसाय या निवास स्थान के आधार पर हुआ है।

(2)-दूसरा सत्ता ,बजाज गोत्र के श्री वीरसहाय से चला -
1. बजाज,2.  पटवारी, 3.गोहदिया, 4. मुड़हा, 5. वड़ोघर, 6.सेठिया, 7. तीनमुनैय्या ।

(3)-तीसरा सत्ता, रपरिया गोत्र के रतनपाल जी से चला -
1. कुदरा,2.अरमाल, 3. रुखारुवे, 4.शंखा,5. कसाहव ,6.(मानी)कानीगोह,7. सुहाभरे ।

(4)-चौथा सत्ता ,चंदवरिया गोत्र के  श्री चन्द्रमणि (चन्द्रसेन ) से प्रवर्तित हुआ-
 1.चन्दवरिया, 2. काकरभत्तले ,3. भत्तले,4. सागर,5. कसोलिहा ,6.असैय्या,7.वित्तिया ।

(5)-पाँचवां सत्ता ,राउत गोत्र के श्री जगसाह से प्रवर्तित हुआ।
1. राउत,2.भुंसीपादा,3.बावउतारू, 4.गगरहागा, 5. जीठ, 6. गुरहा, 7. पिलखनिया ।

(6)-छठवां सत्ता ,वकेवरिया गोत्र के श्री दीपचन्द्र जी चला। 1.वकेवरिया,2. गुजोहुनिया,3. गुझोनिया  जमेवरिया, 4. देमरा,5.माहोसाहू, 6.टंटे बाबू,7.जमसरिया।

(7)-सातवां सत्ता,मुंजवार गोत्र के  श्री मानपाल जी से चला -
1. मुंजवार,2. मेहदोले, 3.जखनिया ,4. छेढ़िया, 5.त्रेतरवाल, 6. दीदवाउरे ,7.दुधइया।

(8)-आठवां सत्ता,सोहाने गोत्र के श्री हरीकरण जी से प्रवर्तित हुआ।
1.सोहाने ,2.कोहला ,3.भजरोले ,4.कुर्कुटे,5.पडुकुलिया ,6. भण्डारी,7. जैतपुरिया ।

(9)-नोवां सत्ता,चोसठिथारी गोत्र के श्री चंपतराय जी से चला-
1.चोसठिथारी,2. कचरोलिया, 3.हिम्मतपुरिया ,4. बुढ़ेले, 5. हरोलिया ,6.बघेले ,7.इंदरोलिया ।

(10)-दशवां सत्ता,वरोलिया गोत्र के श्री मधुकरसाह से चला-
1. वरोलिया,2. वेदबावरे,3.रुहिया ,4.घिया,5. विलगइया ,6. कारे,7. शतफरिया ।

(11)-ग्यारहवां सत्ता,पचोलये गोत्र के श्री पीताम्बर दास जी से प्रवर्तित हुआ।
1. पचोलये,2. उड़दिया ,3.वैमर, 4.कालिहा ,5. मुरैय्या, 6.भण्डारिया 7.इटोदिया ।

(12)-बारहवां सत्ता,कुंवरभरये गोत्र के श्री गुमानराय जी से चला।
1. कुंअरभरये ,2.तिलोनिया ,3.सलेरिया 4.हरसोलिया ,5. सिंघी,6. पुरा 7.मझोने।

गोत्र और उपगोत्रों के भेद अलल कहलाते हैं और इस प्रकार लंबेचुओं में 84 अलल हैं जो इस प्रकार हैं-

1.चौधरी ,2. तिहइया,3. चन्दोरिया,4. वजाज ,5.संघई,6. कानूनगो, 7.पोद्दार,8.मोदी,9.कोठीवार, 10.रपरिया,11. वकेवरिया,12. पटवारी,13. पचोलये,14. राउत, 15.गोहदिया, 16. मुढ़ैया,17. कुंअरभरये ,18. मुजवार, 19. चोसठिथारी ,20. बड़ोघर,21. सेठिया,22. तीनमुनैया ,23. कुदरा ,24. भुसीपद, 25. बावतारू ,26.गगरहागा,27. रूखारुये,28. सुहाने ,29. शंखा,30. कांकरभत्तेले, 31. बरोलिया,32. मत्तले, 33. असइया 34.बित्तिया ,35. छेड़िया, 36. पिलखनिया,37. जीट ,38.गुझोनिया ,39.गुरहा, 40. माहोसाहू ,41. टाटेबाबू, 42.कोलिहा 43. जखेमिहा, 44.हरोलिया ,45. दीद बावरे ,46. जेतपुरिया,47. रुहिया ,48. मुरहइया ,49. वघेला ,50.वलगैय्या, 51. सलरैय्या, 52 कोलिहा ,53 देमरा, 54. गगरहागा,55. हिंडालिहा ,56 सिंहीपुरा ।यह छप्पन अलल तो  मौजूद हैं। लेकिन इनके अलावा 28 अलल लुप्त हो गए हैं।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

पद्मावती पुरवाल जैन


 
पद्मावती पुरवाल जैन और पद्मावती नगरी के बीच नाभि-नाल सम्बन्ध रहा है।यह नगरी ही पद्मावती पुरवालों की उद्गम स्थली रही है। मगधराज महाराज श्रेणिक/बिंबिसार(ईसापूर्व 544) के शासन काल में व्यापारिक श्रेणियों की वैश्य महासभा बनाने के उद्देश्य से पद्मावती नगरी के एक धनी श्रेष्ठी ने व्यापारियों का एक सम्मेलन आहूत किया था जिसमें देश भर से 84 स्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इस बात से पद्मावती नगरी की प्राचीनता, ऐतिहासिकता और उसका सांस्कृतिक महत्व रेखांकित होता है।अपभ्रंश भाषा के महाकवि रइधू ने (जो स्वयं पद्मावती पुरवाल समाज के एक रत्न हैं), अपने  'सम्मइ जिन चरिउ' ग्रंथ में  पद्मावती नगरी का 'पोमावइ'  के रूप में उल्लेख किया है। यह नगरी एक समय में बहुत समृद्ध थी। इसकी समृद्धि का उल्लेख खजुराहो से प्राप्त वि. सं. 1052 के शिलालेख में मिलता है। उसमें बताया गया है कि यह नगरी ऊंचे-ऊंचे गगनचुम्बी प्रासादों और भवनों  से सुशोभित थी। उसके राजमार्गों में बड़े-बड़े तेज तुरंग दौड़ते थे और उसकी चमकती हुई स्वच्छ एवं शुभ्र दीवारें आकाश से बातें करती थीं
इस वर्णन से हम सहज ही पद्मावती नगरी की विशालता का अनुमान कर सकते हैं और यह बहुत सहज और स्वाभाविक है क्योंकि प्राचीन समय में आवागमन, यातायात और व्यापार  का सबसे सुगम साधन  नदियां ही थीं।  पद्मावती नगरी के चारों ओर भी नदियां हैं। इसलिए पूर्व में यह समृद्धिशाली नगरी रही होगी इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
 वर्तमान में सिंध और पार्वती नदी के संगम पर ग्वालियर जिले में स्थित पवाया नामक एक छोटा सा ग्राम जो साहित्यिक और पुरातत्वीय सामग्री के आधार पर प्राचीन पद्मावती नगरी मानी जाती है। एक अभिलेख के अनुसार इसकी स्थापना त्रेता युग में पद्म राजवंश के एक राजा ने की थी ।
         तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का विहार पद्मावती नगरी में हुआ था। भगवान पार्श्वनाथ ने देश के अनेक भागों में विहार करके आर्हत धर्म का जो अतिशय प्रचार किया, उससे प्रभावित होकर अनेक आर्य, अनार्य जातियां उनके धर्म में दीक्षित हुईं। नाग, द्रविड़ आदि जातियों में उनकी मान्यता असंदिग्ध थी । वेदों और स्मृतियों में इन जातियों का उल्लेख वेद विरोधी व्रात्यों के रूप में  मिलता है ।
         वस्तुतः व्रात्य श्रमण संस्कृति की जैन धारा के अनुयायी ही थे । इन व्रात्यों में नाग जाति सबसे शक्तिशाली थी। तक्षशिला, उद्यानपुरी, अहिच्छत्र, मथुरा, पद्मावती, कान्तिपुरी, नागपुर आदि इस जाति के प्रसिद्ध केन्द्र रहे हैं । पार्श्वनाथ  नाग जाति के इन केन्द्रों में कई बार पधारे थे ।
            सर्व साधारण के समान राज परिवारों पर भी भगवान पार्श्वनाथ का व्यापक प्रभाव था। उस समय जितने व्रात्य क्षत्रिय राजा थे वे पार्श्वनाथ के उपासक थे।
        पद्मावती नगरी का उल्लेख विष्णु पुराण में भी मिलता है। जिसे नागों की तीन राजधानियों में से एक बतलाया है। अन्य राजधानियों में कांतिपुरी और मथुरा थी । इसकी पुष्टि वायु पुराण से भी होती है। जिसमें दो राजवंशों का उल्लेख है, एक पद्मावती के और दूसरे मथुरा के । इन दोनों राजवंशों में क्रमश: 9 और 7 राजा हुए।पवाया में प्राप्त पुरालेख से भी इस बात की पुष्टि होती है कि ईसा की प्रथम शताब्दी के प्रारम्भ में यहां नाग राजाओं का राज्य था। पद्मावती नगरी के नाग राजाओं के सिक्के  मालवा में कई जगहों पर मिले हैं। नागवंश का पराभव ईसा की चौथी शताब्दी के लगभग मध्य में हुआ। जब इनका राज्य गुप्त साम्राज्य में मिला लिया गया था।
     पद्मावती नगरी का उल्लेख संस्कृत के महाकवि वाण के 'हर्षचरित' में हुआ है। सुविख्यात नाटककार भवभूति के 'मालती माधव' में भी इसका विस्तृत उल्लेख मिलता है। जिसमें नगर की भौगोलिक स्थिति का विशद वर्णन किया गया है। यहां एक विश्वविद्यालय भी था जहां विदर्भ और सुदूरवर्ती प्रान्तों के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे | ग्यारहवीं शताब्दी में रचित 'सरस्वती कंठाभरण' में भी पद्मावती का वर्णन है जिसके अनुसार पौराणिक काल में पद्मावती नाम का एक जनपद था, जिसका प्रधान केन्द्र 'पद्मनगर' था।
       मध्यकाल में पद्मावती 40 कि.मी. पश्चिम की ओर स्थित नरवर के शासक विभिन्न राजपूत तथा मुसलमान राजाओं के अधिकार में रही। सन् 1506 में सिकन्दर लोदी ने जब नरवर पर विजय प्राप्त की और तो उसने पवाया को जिले का मुख्यालय बनाया। कहा जाता है कि सफदर खां ने, जो कदाचित् पहला प्रशासक था, परमारों द्वारा बनवाये किले में सुधार किया और उसका नाम अस्कन्दराबाद रखा जैसा कि फारसी अभिलेख में उल्लिखित है। मुगल सम्राट जहांगीर ने इसे ओरछा के वीरसिंहदेव को उसकी स्वामिभक्ति के प्रतिफल में दिया था। बुन्देला सरदार ने यहां शिव का दुमंजिला मंदिर बनवाया ।
    यहां सन् 1925, 1934, 1940 और 1941 में चार बार उत्खनन कार्य किये गये । खुदाई में ईस्वी सन् की पहली शताब्दी से लेकर आठवीं शताब्दी तक की अनेक पुरातात्विक महत्व की सामग्री मिली है। इनमें से एक मणिभद्र यक्ष की पूर्ण मानवाकार मूर्ति है जिस पर लगभग ईस्वी सन् की पहली शताब्दी के ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण है। खण्डहरों से उपलब्ध अनेक सिक्कों को एकत्र करके ग्वालियर के संग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया है।
       वर्षों तक उपेक्षित रहने के कारण पद्मावती नगरी का मूल स्वरूप तो नष्ट हो गया लेकिन ग्वालियर राज्य में उसके स्थान पर 'पवाया' नामक छोटा-सा गांव बसा हुआ है। अब यह मध्यप्रदेश प्रान्त के ग्वालियर जिले का एक गांव है जो दिल्ली से मुंबई  जाने वाली सेन्ट्रल रेलवे लाइन पर डबरा नामक स्टेशन से कुछ दूरी पर स्थित है। यह ग्वालियर मुख्यालय से 63 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
     यह पद्मावती नगरी ही पद्मावतीपुरवाल जाति का उद्गम  स्थल है। इस दृष्टि से वर्तमान 'पवाया ग्राम' का पद्मावतीपुरवालों के लिए विशेष और ऐतिहासिक महत्व  हैं भले ही आज वहां पर पद्मावती पुरवालों का निवास न हो लेकिन उसके आस-पास के क्षेत्रों में आज भी पद्मावती पुरवाल समाज के सैकड़ों परिवारों का निवास है। इक्ष्वाकु वंश परम्परा में हुए सोमवंशी नरेश जयकुमार जो हस्तिनापुर के प्रतापी शासक थे,को पद्मावती पुरवालों का पूर्वपुरुष बताया जाता है।जो कालांतर में धार्मिक, राजनीतिक कारणों से हस्तिनापुर से पलायन कर पद्म नगर में निवास करने लगे। पद्मावती नगरी पद्म नगर का ही अपर नाम है।
      अनेकान्त जून 1969 पृष्ठ 58 पर पं. परमानन्द शास्त्री ने 'जैन समाज की कुछ उपजातियां' शीर्षक लेख में लिखा है कि
पद्मावती पुरवाल सभी दिगम्बर जैन आम्नाय के पोषक हैं और बीसपंथ के प्रबल समर्थक हैं, प्रचारक हैं। पद्मावती पुरवाल ब्राह्मण भी पाये जाते हैं। यह अपने को ब्राह्मणों से संबद्ध मानते है। इस जाति के विद्वानों में ब्राह्मणों जैसी प्रवृत्ति पाई जाती है ।
इन्हीं पं. परमानन्द शास्त्री ने 'जैनधर्म का प्राचीन इतिहास भाग-2 पृष्ठ 458 पर लिखा है कि चौरासी जातियों में पद्मावती पुरवाल भी एक उपजाति है जो आगरा, मैनपुरी, एटा, ग्वालियर आदि स्थानों में रहती है। इनकी संख्या भी कई हजारों में है। यद्यपि इस जाति के कुछ विद्वान अपना उदय ब्राह्मणों से बतलाते हैं।
     ईसा की पहली शती में आसपास मथुरा, कान्तिपुरी, पद्मावती और विदिशा में नाग राजाओं का राज्य था। इनमें से कुछ को निर्विवाद रूप से सम्राट कहा जा सकता है। इन चारों नगरों में कान्तिपुरी और पद्मावती ग्वालियर क्षेत्र में आते हैं। पद्मावती वर्तमान में पवाया नाम के छोटे से ग्राम के रूप में विद्यमान है। कान्तिपुरी के स्थान पर कुतवार (सिंहोनिया)नामक ग्राम है जो मुरैना जिले में स्थित है। जिस समय ये दोनों स्थान महानगरों के रूप में बसे थे, उस समय गोपाद्रि(गोपाचल) गोपों अर्थात् गोपालकों की भूमि थी और उसका विशेष महत्व नहीं था।
       जैनियों की चौरासी उपजातियों में एक 'पद्मावती पुरवाल' भी है। इसी उपजाति में रइधू नामक अपभ्रंश के महाकवि  हुए हैं। वह अपने आपको 'पोमावई-कुल- कमल- दिवाकर लिखते है। कुछ पद्मावतीपुरवाल अपना उद्गम ब्राह्मणों से बतलाते हैं। जैन जाति के आधुनिक विवेचकों को पद्मावती पुरवाल उपजाति के ब्राह्मण प्रसूत होने पर घोर आपत्ति है लेकिन परंपरा पद्मावती पुरवालों में प्रचलित जनुश्रुति का समर्थन करती है। जिसे वे पूज्यपाद देवनन्दि कहते हैं वह पद्मावती के नाग सम्राट देवनन्दि है । वह जन्मना ब्राह्मण थे। उनकी मुद्रायें बड़ी संख्या में पद्मावती में प्राप्त हुई हैं जिस पर 'चन्द' का लाच्छन मिलता है और 'श्री देवनागान्य या 'महाराजा देवेन्द्र' श्रुति वाक्य उल्लिखित है। देवनाग का अनुमानित समय ईसा की पहली शती है।पद्मावती पुरवालों में प्रचलित अनुश्रुति तथा पद्मावती के देवनाग का इतिहास एक दूसरे के पूरक हैं। यह सर्वथा संभव है कि देवनन्दि या उनके किसी पुत्र ने जैनधर्म  अंगीकार कर लिया था और उसकी संतति पद्मावती पुरवाल जैन कहलाने लगी। ऐतिहासिक और राजनीतिक कारणों से भले ही पद्मावती पुरवाल अपनी मूल भूमि छोड़कर अन्यत्र चले गए  तो भी वे न तो पूज्यपाद देवनन्दि को भूले और न अपनी धात्री पद्मावती को ही भूले। इस प्रकार पद्मावती ( पुर) नगर के रहने वाले जन ही कालांतर में पद्मावती पुरवाल कहलाए । खंडेलवाल जैन समाज के बृहद इतिहास के विद्वान लेखक डा.कस्तूरचंद कासलीवाल ने पूज्यपाद(देवनदी) को पद्मावती पुरवाल माना है। वरहिया जैन समाज के रत्न ग्वालियर निवासी श्री रामजीत जैन, एडवोकेट ने पद्मावती पुरवाल जैन समाज का इतिहास लिखा है।जो इस समाज का पहला और व्यवस्थित अध्ययन है। जिसमें उन्होंने श्रमपूर्वक अनेक बिखरे सूत्रों को संजोया है।

प्राचीन साहित्य में इस जाति के सिंह और धार दो गोत्रों की चर्चा मिलती है। इस सदी के पूर्वार्ध में सिरमौर, पांडे और सिंघई गोत्र प्रचलन में थे। सामाजिक व्यवस्था में प्रधान को सिरमौर, पौरहित्य कर्म करने वाले को पांडे और प्रबंधक का दायित्व निभाने वाले को सिंघई नाम से संबोधित किया गया।
 उ. प्र. में  प्रचलित कुछ गोत्र हैं इस प्रकार हैं - 1. सिरमौर, 2. पांडे, 3. सिंघई, 4. कोड़िया, 5. कड़सरिया, 6. सिंह, 7. धार, 8. पाढ़मी। कुछ अन्य गोत्र  1. केड़िया,2.अजमेरा या श्रीमोर हैं। काफी अनुसंधान के बाद इस बारे में जो विवरण जुट सका। उसके अनुसार अंतिम गोत्र सूची इस प्रकार है -
1. सिंह, 2. उत्तम, 3. सरावगी, 4. सेठ, 5. नारे, 6. तिलक, 7. धार, 8. सिरमौर (श्रीमोर या अजमेरा), 9. पांडे, 10. कौन्देय, 11. चौधरी, 12. केड़िया, 13. पाढ़मी, 14. कड़ेसरिया, 15 सिंह, 16. सिंघई।

बुधवार, 11 जनवरी 2023

खंडेलवाल जैन

खण्डेलवाल जैन समाज समस्त दिगम्बर जैन समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है । इस समाज ने अपने उद्भव काल से लेकर आज तक जैन धर्म और संस्कृति को समृद्ध कर दिगंबर जैन समाज को गर्वोन्नत किया है । इस समाज का वर्तमान जितना स्वर्णिम है ,उनका अतीत भी उतना ही गौरवशाली रहा है । उत्तर भारत में खण्डेलवाल जैन समाज का सभी क्षेत्रों में बहुधा वर्चस्व रहा है । उसके लाड़ले सपूत समाज की सभी गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं और आज भी उसी गौरव को कायम रखे हुए हैं। खंडेलवाल जैन समाज राजस्थान, मालवा, आसाम, बिहार, बंगाल, नागालैंड, मणिपुर, उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों एवं महाराष्ट्र में बहुसंख्यक समाज रहा है और आज भी मुंबई, कलकत्ता, जयपुर, इन्दौर, अजमेर जैसे नगरों में उसकी बहुसंख्या है। इस समाज में अनेक आचार्य, मुनि, भट्टारक, क्षुल्लक, ब्रह्मचारी हुये हैं,जिन्होंने देश एवं समाज को प्रभावशाली मार्गदर्शन दिया है। सैकड़ों ,हजारों मन्दिरों के निर्माणकर्ता, प्रतिष्ठाकारक, मूर्ति प्रतिष्ठा कराने वाले अनेक धर्मनिष्ठ खंडेलवाल दिगंबर जैन समाज के रत्न हैं। खंडेलवाल समाज के लोग राज्य में प्रमुख और उच्च पदों पर पदस्थ रहे हैं और राज्य संचालन में सहयोगी रहे हैं। समाज में भी उनका बहुमान रहा है। इन्होंने सैकड़ों वर्षों तक जयपुर राज्य की अभूतपूर्व सेवा की एवं युद्ध भूमि में विजय-श्री का वरण किया। राजस्थान के सैकड़ों मन्दिर इसी समाज के द्वारा निर्मित है । अकेले जयपुर नगर से 200 से अधिक मन्दिरों का निर्माण इस समाज की अतीव धर्म-निष्ठा का उदाहरण है । सांगानेर, मोजमाबाद, टोडारायसिंह, लाडनूं, सुजानगढ़, सीकर के मन्दिरों के उन्नत शिखर आज भी उनकी गौरव गाथा कहते हैं। इस समाज की धार्मिक आस्था तथा व्रत उपवास, पूजा एवं भक्ति आदि कार्यों में रुचि से सारा दिगम्बर जैन समाज अनुप्राणित रहता है। इनके रीतिरिवाजों में श्रमण संस्कृति की झलक दिखाई देती है तथा उसका प्रत्येक सदस्य जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करता है । सारे देश में फैले हुए खण्डेलवाल जैन समाज संख्या की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है जो दस लाख के करीब है अर्थात् पूरे दिगम्बर जैन समाज का पांचवां हिस्सा है। खण्डेलवाल जाति का नामकरण खण्डेला नामक नगर के आधार पर हुआ है जो राजस्थान के सीकर जिले में ,सीकर से 45 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। खण्डेला के इतिहास की अभी पूरी खोज नहीं हो सकी है लेकिन श्री हर्ष की पहाड़ी पर जो पुरावशेष मिलते हैं उससे पता चलता है कि शैव पाशुपतों का केन्द्र बनने के पहिले यह नगर जैन संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा है। इसका पुराना नाम खंडिल्लकपत्तन अथवा खण्डेल गिरि था। भगवान महावीर के 10वें गणधर मेदार्य ने खण्डिल्लकपत्तन में आकर कठोर तपस्या की थी ऐसा उल्लेख आचार्य जयसेन ने अपने ग्रन्थ धर्मरत्नाकर की प्रशस्ति में किया है ।आचार्य जयसेन 11 वीं शताब्दी के महान साधक थे और अमृतचन्द्र वह सोमदेव की परंपरा के आचार्य थे ।

 "श्रीवर्धमाननाथस्य मेदार्यो दशमोऽजनि । गणभृद्दशधा धर्मो यो मूर्तो वा व्यवस्थितः || मेदार्येण महर्षिभिविहरता, तेये तपो दुश्चर। श्रीखंडिल्लक पत्तनान्ति करणाभ्यर्द्धिप्रभावात्तदा ॥ "

 खण्डेला का पूरा क्षेत्र ही अत्यधिक प्राचीन क्षेत्र रहा है । यहाँ पर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के एक अभिलेख में प्रसंगवश इस नगर का उल्लेख मिलता है। खंडेला के राजनैतिक इतिहास के बारे में शोध की काफी गुंजाइश है। प्राप्त विवरण के आधार पर यहाँ पर प्रारंभ में निरबाण चौहान (चौहान राजपूतों की एक शाखा) राजाओं का राज्य रहा है। हम्मीर महाकाव्य में भी खंडेला का नामोल्लेख है। महाराणा कुम्भा ने भी खंडेला पर अपनी विशाल सेना को लेकर आक्रमण किया था और यहां खूब लूटपाट की थी । सन् 1467 मे यहाँ उदयकरण का शासन था ऐसा वर्धमान चरित की प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है । रायमल खंडेला के प्रसिद्ध शासक रहे हैं और जो अपने मन्त्री देवीदास के परामर्श से मुगल सेना में भर्ती हुये ।अपनी वीरता एवं स्वामी भक्ति के सहारे मुगल बादशाह अकबर के कृपा पात्र बनकर उन्होंने खंडेला और अन्य नगरों की जागीर प्राप्त की थी । वे बराबर आगे बढ़ते रहे। रायमल जी के समय में ही खंडेला चौहानों के हाथों में से निकल कर शेखावतों के हाथों में आ गया था। विक्रम की प्रथम शताब्दी के प्रारम्भ में जब महाराज खण्डेलगिरि खंडेला के शासक थे तब खंडेला नगर अपने पूर्ण वैभव पर था और उस समय यहां 900 की संख्या में जिनालय थे । हजारों परिवार तो कोटिध्वज थे। नगर के सभी निवासियों का वैभव उत्कर्ष पर था। उत्तर भारत में खंडेला नगर जैनों का प्रधान केन्द्र था लेकिन स्वयं महाराज खण्डेलगिरि जैन होते हुये भी शैव धर्म की ओर झुके हुए थे। क्योंकि उनके सभी मन्त्री और पुरोहित शैव थे और उनका यज्ञों में गहरी आस्था और विश्वास था ।

     एक समय प्लेग की महामारी के प्रकोप से जब खंडेला में हजारों लोग असमय काल के गाल में समाने लगे और जीवन रक्षा के लिए यहां से पलायन करने को विवश हो गये तो महाराज खंडेलगिरि के इस विषय में चिंतित होने पर उनके मंत्रियों ने उन्हें नरमेध यज्ञ का परामर्श दिया। धूर्त मंत्रियों और श्रमणद्वेषी पंडितों ने षड्यंत्रपूर्वक नगर के बाहर एक उद्यान में साधनारत जैन साधुओं को यज्ञ में जीवित ही होम दिया। भले इस जघन्य कार्य में महाराज खंडेलगिरि की सहमति नहीं रही लेकिन इससे उनकी बहुत अपकीर्ति हुई। जैन मुनियों पर हुए इस घोर उपसर्ग और नरमेध का समाचार जब आचार्य अपराजित जिनका अपर नाम यशोभद्राचार्य था,को प्राप्त हुआ तो वह इस नरमेध कांड को लेकर बहुत चिंतित हुए। उन्होंने अपने पूरे संघ को एकत्र कर इस विषय में उनके साथ गंभीर विचार विमर्श किया। आचार्य यशोभद्र ने सबकी सम्मति से इस असाधारण स्थिति से निपटने के लिए आचार्य जिनसेन को ऐसे पापाचार के उन्मूलन के लिए खंडेला भेजा। प्लेग के भंयकर प्रकोप के बीच आचार्य जिनसेन कुछ साधुओं के साथ खंडेला नगर आए और नगर के बाहर उद्यान में ठहर गये । उन्होंने नगर में रहने वाले श्रावकों को बुलाया और इस असाध्य महामारी से बचने के लिए नगर खाली कर नगर के बाहर एक गुढ़ा (उपनगर) में आकर रहने को कहा ताकि उनकी जीवन रक्षा हो सके। सभी श्रावकों ने आचार्य जिनसेन के आदेश को शिरोधार्य किया। आचार्य जिनसेन ने अपनी आराधना और तपोबल से चक्रेश्वरी देवी को प्रसन्न किया और उनसे उपनगर में रहने वाले लोगों की जीवन रक्षा की प्रार्थना की। चक्रेश्वरी देवी के आशीर्वाद से उपनगर में रहने वाले सभी लोगों को महामारी रोग से मुक्ति मिल गयी। इसी बीच स्वयं महाराजा खण्डेलगिरि भी प्लेग से ग्रस्त होकर मरणासन्न स्थिति में पहुंच गये। सब ओर से निराश,हताश होकर उन्होंने भी उसी गुढ़ा (उपनगर) में आश्रय लिया, जहां आचार्य जिनसेन श्रावकों के साथ विराज रहे थे । अपनी शरण में आए खण्डेलगिरि को आचार्य श्री ने रोगमुक्ति और धर्मानुरागी होने का आशीर्वाद दिया। स्वास्थ्य लाभ के पश्चात् कृतज्ञ महाराज खंडेलगिरि ने भादों सुदी 13 रविवार विक्रम संवत् 101 के शुभ दिन खंडेला में विशेष दरबार लगाया गया। सभी सामंतों एवं दरबारियों के साथ आचार्य-श्री जिनसेन को भी वहां आमंत्रित किया।अपने संघ के कुछ साधुओं के साथ आचार्य-श्री के वहां पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ।सभी ने आचार्य-श्री की भूरि भूरि प्रशंसा की और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन किया। आचार्य श्री ने महाराजा खण्डेलगिरि को उनके पूरे परिवार के साथ जैन धर्म में दीक्षित किया और अहिंसा धर्म का कट्टरता से पालन करने का नियम दिलाया। इस अवसर पर महाराजा खण्डेलगिरि के साथ 13 अन्य चौहान परिवारों के सामन्तों को भी जैन धर्म मे दीक्षित किया। ( 1 ) महाराजा खण्डेलगिरि ( 2 ) राजा श्रीभावस्यंध जी (3) राजा श्री पूरणचन्द्र जी (4) राजा श्री योमसिंहजी (5) राजाश्री अजबसिंह जी (6) राजाश्री अभयराम जी (7) राजा श्री नरोत्तम जी (8) राजा श्री झांझाराम जी (9) राजा श्री जसोरामजी (10) राजा दमतारिजी (11) राजा श्रीभूधरमल जी (12) राजा श्री रामसिंह जी (13) राजा श्री दुरजनसिंहजी (14) राजा श्री साहिमलजी ।

   ये सब महाराजा खण्डेलगिरि के परिवार के होने के कारण इन्हें भी राजा की उपाधि प्राप्त थी। इसलिए इन सबको जैन धर्म में एक साथ दीक्षित किया गया। सभी इतिहासकार इस बात पर एक मत है कि यशोभद्राचार्य के लघु शिष्य आचार्य जिनसेन ने खण्डेला जाकर वहां के राजा खण्डेलगिरि को जैन धर्म में दीक्षित किया तथा राजा के कुटुम्ब को प्रथम साह गोत्र प्रदान किया । उनके सामन्तों को भी उसी समय जैन धर्मानुयायी बनाकर  आचार्य जिनसेन द्वारा 14 गोत्रों की स्थापना की गयी। इस घटना के समय के सम्बन्ध में कुछ मतभेद अवश्य है। क्योंकि कुछ इतिहासकार इसे विक्रम सम्वत् 2 मानते है तथा कुछ सम्वत् 101 मानते है । 

   डॉ.कैलाशचन्द जी जैन ,उज्जैन वालों की मान्यता है कि खण्डेलवाल जाति का उद्भव सम्भवतः 8 वीं शताब्दी में हुआ हो क्योंकि इससे पूर्व का अभी तक कोई इतिहास नहीं मिल सका है। जब खण्डेलवाल जाति अधिक संख्या में हो गई तो उसने गाँवों के नाम से गोत्र स्थापित कर लिये। 

      पं. फूलचन्द जी सिद्धान्त शास्त्री ने लिखा है कि जैन धर्म जाति प्रथा का अत्यन्त विरोधी रहा है लेकिन वह भी इस दोष से अपने की नहीं बचा सका । कहने के लिये इस समय जैन समाज में 84 जातियाँ है। लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जो दो हजार वर्ष से पहले ही अस्तित्व में आ गई थी ।

    पं० भंवरलाल जी पोल्याका ने महावीर जयन्ती स्मारिका वर्ष 1974 में सम्वत् 1879 में लिपिबद्ध की हुई एक पाण्डुलिपि में वर्णित खण्डेलवाल जाति के इतिहास दिया है और फिर साह गोत्र की एक वंशावली उद्धृत की है । इसकेपश्चात् पंडित जी ने उत्पत्ति काल पर लिखा है कि पाण्डुलिपियों में निर्दिष्ट सम्वत् 1 ( एक ) विक्रम सम्वत् 1 न होकर हर्ष सम्वत् है जो विक्रम सम्वत् 662 वर्ष पश्चात् चला था । आगे चल कर आपने लिखा है कि इनसे विक्रम सम्वत् 2-3 आदि की संगति कैसे बैठे। ये यथार्थ मे 101, 102, 103 आदि है और बोलने में इनको 1-2-3 आदि बोलते है । पोल्याका जी के अनुसार विक्रम सम्वत् 901 मे खण्डेलवाल जाति की उत्पत्ति हुई थी । आचार्य जिनसेन द्वारा खण्डेला राज्य के सभी राजपूतों ने जैन धर्म में दीक्षा प्राप्त की थी। इन राजपूतों की संख्या तीन लाख थी । इसलिये सभी राजपूत खण्डेलवाल जैन कहलाने लगे और उन्होंने हिंसा वृत्ति छोड़कर श्रावक धर्म के पालन का व्रत लिया । खण्डेलवाल जैन जाति जिसकी वर्तमान में वैश्य जाति में गणना की जाती है प्रारम्भ में क्षत्रिय थी । विगत दो हजार वर्षों से श्रावक धर्म का पालन करने और व्यापार वाणिज्य में संलग्न रहने के कारण वह वैश्य जाति में मान ली गयी । खण्डेलवाल जाति में खण्डेला में रहने वाले दूसरे जैन सम्मिलित नहीं थे । लेकिन वे किस जाति के रहे इसका कोई विवरण नहीं मिलता। कदाचित वे भी कालांतर में खण्डेलवाल जैनों में सम्मिलित कर लिये गये हों लेकिन इसकी कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती । यद्यपि खण्डेला नगर में जैन धर्म का पूर्ण प्रभाव था । महाराजा खण्डेलगिरि के जैन धर्म में दीक्षित होने के पूर्व भी वहां पर्याप्त संख्या मे जैन धर्मावलम्बी और जिनालय थे । वे सभी भगवान महावीर के 10वें गणधर मेदार्य के खण्डेला क्षेत्र में प्रभाव के कारण वहां जैन धर्मानुयायी बने होंगे लेकिन जब महाराजा खण्डेलगिरि ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया तो जैन धर्म वहां का राजधर्म बन गया इसलिये वहां जैन धर्म की अतिशय प्रभावना होने लगी । सैकड़ों की संख्या में मुनियों का विहार होने लगा और प्रथम पंच कल्याणक प्रतिष्ठा समारोह भी आचार्य जिनसेन के सानिध्य में संवत् 101 वैशाख शुक्ल तृतीया को सम्पन्न हुआ । इसके पश्चात् इसके आगे भी वहाँ पंच कल्याणक प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होते रहे । नये मन्दिरों का निर्माण, मूर्तियों की प्रतिष्ठा होती रही और खण्डेला के सारे क्षेत्र में जैन शासन की प्रभावना होती रही ।खण्डेला नरेश और उनके सामन्तों के परिवार सैकड़ों वर्षों तक अपने-अपने क्षेत्र में निवासरतर रहे और व्यापार व्यवसाय तथा राज्य प्रशासन में सहयोग देते रहे । खंडेला और उसके आसपास के ग्रामों में नवदीक्षित खंडेलवाल जैनों का वर्चस्व कायम हो गया और उनकी गणना वहां के संभ्रांत नागरिकों में होने लगी। राजाओं एवं जागीरदारों के वे ही प्रमुख व्यवस्थापक थे । राज्य के बड़े बड़े अधिकारियों को जहाँ दीवान या मन्त्री के नाम से पुकारा जाता था वहीं जागीरदारों के प्रमुख व्यवस्थापकों को कामदार कहा जाता था। कामदारा भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलता था । इनके परिवार बढ़ने पर इन्हें रोजगार के अन्य साधन अपनाने पड़े और जब खेती, व्यापार एवं सेवावृत्ति से भी काम नहीं चला तो आजीविका के लिए उनको बाहर जाना पड़ा। देशांतर में जाकर भी उन्होंने सभी क्षेत्रों में अपने झंडे गाड़े और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

    खंडेलवाल समाज के लोग सीकर, लाडनूं, नागौर,सांभर,नारायणा,चित्तौड़ , अजमेर, घटियाली, मालपुरा,आमेर, सांगानेर, इंदौर, उज्जैन, रतलाम, बड़नगर, लश्कर, मुंबई, नागपुर,वाशिम, वर्धा, अकोला,भिलाई, दुर्ग, छिंदवाड़ा, औरंगाबाद, हैदराबाद, दिल्ली आगरा, बिहार, बंगाल,असम, नगालैंड, मणिपुर यानी उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक आबाद हैं और अपने -अपने क्षेत्र में अग्रणी हैं। खण्डेलवाल दिगम्बर जैन समाज 84 गोत्रों में विभाजित है। इन गोत्रों का इतिहास भी उतना ही रोमांचक है जितनी उसकी उत्पत्ति है। लेकिन इतना अवश्य है कि प्रारम्भ से ही खंडेलवाल समाज में गोत्रों को अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त रही इसीलिये खण्डेलवाल जैन बन्धु अपने नाम के आगे गोत्र-नामों का उपयोग करते रहे है और इन्होंने जैन लिखने के स्थान पर गोत्र लिखने को अधिक वरीयता दी । कदाचित जयपुर, अजमेर, इन्दौर जैसे नगरों में जहां खण्डेलवाल समाज के हजारों परिवार निवास करते हैं और उनमें विभिन्न गोत्र वाले श्रावक शामिल हैं इसलिए सुस्पष्ट पहचान के लिये इस समाज में गोत्रों का उपयोग होने लगा हो । 

   अकारादि क्रम से उनकी गोत्र सूची निम्न प्रकार है-

 1. अजमेरा ,2. अनोपडा,3 अरडक,4. अंहकारया,5. कडवागर,6. कटारिया,7. काला,8. कासलीवाल,9. कुलभण्या,10. कोकराज,11. गदिया,12. गंगवाल,13. गिदोड्या,14. गोतवंशी ,15. गोधा - ठोल्या,16. चांदुवाड,17. चिरकन्या,18. चौधरी,19. चौवर्या,20. छाबड़ा,21. छाहड़,22. जगराज्या,23. जलभण्या / जलवाण्या,24. झांझरी,25. टोंग्या,26. दगड़ा,27. दरडोद्या,28. दुकड्या, 29. दोसी,30. नरपत्या,31. निगद्या,32. निगोत्या,33. निरपोल्या,34.पापडीवाल,35.पापल्या,36.पहाड़िया,37.पाटणी,38पाटोदी,39.पांडया-झीथर्या,40. पिंगुल्या,41. पीतल्या,42. पोटल्या,43 बज ( श्रामण्या ),44. बज ( मोहण्या ),45. बंब,46. बाकलीवाल,47. बिलाला,48. बिलाला दुतिक,49. बोरखण्ड्या,50. बोहरा,51. बैनाडा,52. भडसाली,53. भसावड्या,54. भागड्या,55. भांवसा,56. भूवाल,57. भूलाण्या,58. मूंछ/भौंच,59. मूलराज,60. मोठ्या, 61. मोदी,62. मोलसर्या,63. राजभद्र,64 राजहंस्या,65. रारा,66. राउंका/रांवका,67. रावत्या,68. लटीवाल,69. लुहाड्या,70. लोहट / लावट,71. लोहंग्या,72. वनमाली,73. विनायक्या,74. वैद,75. सरवाड्या,76. साखूण्या,77. सांभर्या,78. साह,79. सुरपत्या,80. सेठी,81. सोगाणी,82. सोहनी/सोनी,83 हलद्या, 84. क्षेत्रपाल्या 

   उक्त गोत्रों के अतिरिक्त विभिन्न इतिहास लेखकों ने 84 गोत्र नामावली में जिन अन्य गोत्रों को और सम्मिलित किया है उनके नाम निम्न प्रकार है-

    1.बांदरया 2. बिरल्या 3. ठग 4. पांवड्या 5. सेठी दूजा,6. लावठो,7. बबरा,8. मोल्या,9. पांड्या,10. पांड्या दूजा,11. बिबला,12. बिव,13. कुरल्या,14. सोहनी,15. कीकरवा,16. जेसवाल,17. वावसया,18. निरगन्धा। 

   उक्त गोत्रों के अलावा प्रशस्तियों में कुछ अन्य गोत्रों का भी उल्लेख मिला है उनके नाम निम्न प्रकार है- 

1. साधु गोत्र 2. ठाकुल्यावाल 3. मेलूका 4. नायक 5. खाटड्या 6. सरस्वती गोत्र 7. कुरकुरा 8. वोटवाड 9. काटरावाल 10 भसावड्या 11. बीजुवा 12 कांधावाल 13. रिन्धिया 14 सांगरिया ।