शनिवार, 11 जनवरी 2025

विमर्श -2


 पंडित श्री गोपालदास जी की ख्याति को,
दोनों हाथों से बटोरने के चक्कर में, उप-
-नाम "वरैया" रखने पर आमादा हैं कुछ लोग।
अनजाने में या जानबूझकर आखिर क्यों?
श्री रामजीत जी द्वारा संधानित तथ्यों पर
फेर रहे हैं पानी, यह साजिशन है या संयोग।

मैनपुरी के मूर्तिलेख में नाम 'वरहिया' ही लेखित है।
ग्राम करहिया के जिनमंदिर के यंत्रों पर यह रेखित है।

क्या जिद है फिर,यह बात जेहन में सबके आती है।
क्यों,महासभा पिछली  गलती दोहराती  जाती है।।

 

बुधवार, 8 जनवरी 2025

वरैया या वरहिया


 मूल पाठ वरैया नहीं वरहिया है, मेरे और कुछ अन्य साथियों द्वारा यह नेरेटिव चलाने पर मुझे 'वरैया' पाठ की स्वीकार्यता के पक्ष में किसी पत्रिका के कुछ पृष्ठ भेजे गए हैं। पंडित गोपालदास जी वरैया निर्विवाद रूप से अपने समय के एक प्रकांड विद्वान रहे हैं। जैन जगत में उनका बहुत समादर है। किंतु जो जिस उपनाम का व्यवहार करता है, सर्वत्र वही नाम उल्लिखित होता है। आदरणीय पंडित जी ने जैन आगम का गहन अध्ययन किया था और उन्होंने जैन ग्रंथों को सर्वसुलभ कराने और जैन विद्वान तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया था।जिस पर सभी को गर्व है और होना चाहिए लेकिन आदरणीय पंडित जी ने स्वजाति का इतिहास खंगालने की कभी कोई चेष्टा नहीं की क्योंकि यह सर्वथा अलग क्षेत्र है। उन्होंने तो जैन धर्म के मर्म को आत्मसात किया और आजीवन उसी का प्रचार प्रसार किया क्योंकि वही उनका जीवन लक्ष्य था।आमोल के पंडित छोटेलाल जी जिनकी कर्मस्थली उज्जैन रही है 'बरैया' उपनाम का व्यवहार करते थे और मालवांचल में उनकी ख्याति के कारण मालवांचल के परिवारों ने 'बरैया' उपनाम अपना लिया। पंडित गोपालदास जी वरैया की ख्याति के कारण अनेक लोगों ने इस नाम को अपनाया। अब पंडित गोपालदास जी वरैया की इसी ख्याति को भुनाने के लिए कुछ लोग 'वरैया' उपनाम को मूल पाठ ठहराने के पक्ष में न केवल तर्क गढ़ रहे हैं बल्कि हठधर्मिता दिखा रहे हैं। इसलिए मैं इस विषय में भ्रम का निवारण करने के लिए तथ्य रख रहा हूं। वरहिया जैन समाज के एकमात्र इतिहास "वरहियान्वय" से यह सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूं जिसके लिए हम सभी आदरणीय रामजीत जी जैन, एडवोकेट, ग्वालियर के  ऋणी और आभारी हैं।

"जनसाधारण में वर्तमान में 'वरैया' शब्द प्रचलित है जो वरहिया शब्द का अपभ्रंश है। स्मरण रहे कि इस समाज के छत्तीस गोत्र है, उनमें एक गोत्र वरैया भी है। वह छत्तीस गोत्र वरहिया समाज में निहित हैं।   वरैया गोत्र एवं वरहिया समाज फिर एक कैसे हो सकते हैं, यह सोचने की बात है। अभी तक ऐसा प्रचलन देखने में नहीं आया कि समाज और गोत्र दोनों एक ही नाम के हों। वास्तविकता यह है कि उसका मूल रूप वरहिया है।
वर्तमान तर्क युग में सीधी सादी बात भी गले नहीं उतरती। प्रमाण बिना कोई बात सत्य नहीं मानी जाती ऐसा कुछ चलन सा हो गया है। लेखन कला प्रारम्भ होने से पूर्व श्रुतज्ञान था । परम्परा से यही चला आ रहा था। इसी ज्ञान के आधार पर जब लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ तो अनेकों ग्रन्थों एवं शास्त्रों की रचना हुई। प्रामाणिकता के लिये तथ्य दिये जा रहे हैं।

      विक्रम की 15वीं 16वीं शताब्दी से इस समाज के विकास के बारे में पता चलता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी शहर के बड़े मन्दिर में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा है-चिन्ह बैल-धातु- 14 अ- आसन में शासन देवता गोमुखाकार गोमुख और चक्रेश्वरी तथा दो सिंह-लेख "सम्बत् 1545 वर्षे वैसाख सुदी 10 चन्द्र दिने श्री मूलसंघे, सरस्वती गच्छे ,बलात्कार गणे ,श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये भट्टारक श्री जिन चन्द्रदेवाः वरहिया-कुलोद्भव साहु लखे भार्या कुसुमा तयो पुत्र साहु मल्लू तस्य भार्या उदयश्री तस्य पुत्र चन्द्र ज्येष्ठ, सा. लहण तत्कनिष्ठ सा. छोटे तत्कनिष्ठ सा. वीरसिंह तत्कनिष्ठ सा. अर्जुन तत्कनिष्ठ सा. प्रभु तत्कनिष्ठ सा. पलटू तत्कनिष्ठ सा. बल्दु तेषां मध्ये सा. अर्जुन तस्य भार्या मता तेन अजुनेनेदं आदीश्वरबिंवं स्व पूजनार्थ करोपितां ।" यह कामताप्रसाद जैन की पुस्तक 'प्रतिमा-लेख संग्रह के प्रथम पृष्ठ एवं भट्टारक सम्प्रदाय पुस्तक सम्पादक जोहारपुर पृष्ठ 104 के लेखांक 262 पर दिया है।

श्रीपाल चरित - अषाढ़ बदी 8 वि. सं. 1651 में कविवर परिमल ने श्रीपाल चरित की रचना प्रारंभ की। इसमें उन्होंने अपने पूर्वजों का परिचय इस प्रकार दिया है-

गोवरि गिरिबहु उत्तम जान । सूरवीर वहां राजा मान। ता आगे चन्दन चौधरी । कीरति सब जग में विस्तरी
जाति वरहिया गुन गम्भीर । अति प्रताप कुल राज धीर। ता सुत रामदास परवीन | नंदन आसकरन शुभ दीन । ता सुत कुल मंडल परिमल्ल | वसे आगरे में तजि सल्ल।

वि. सं. की अर्ध सत्रहवीं शताब्दी में भी वरहिया नाम प्रचलित था। कलिकुण्ड यंत्र - ग्राम करहिया के जिन मन्दिर में वि. सं. 1841 का एक यंत्र है उसमें लेख निम्न प्रकार है-
" संवत् 1841 वर्षे मूल संघे, बलात्कारगणे ,सरस्वतीगच्छे, कुन्दकुन्दाचार्यान्वये श्री ज्ञानभूषण तद भट्टारक श्री विश्वभूषण तदाम्नाये तद् शिष्य आचार्य श्री ललितकीर्तिया उपदेशामदिय यंत्र करोपितम् वरहिया जाति कुम्हरिया गोत्रे साह रामदास .... आसकरण यंत्र करोपितम् ।
उपरोक्त वर्णित लेख पाँच सौ, चार सौ तथा दो सौ वर्ष  प्राचीन हैं। इनमें वरहिया शब्द का ही उल्लेख है । इससे यह तो स्पष्ट है कि मूल नाम वरहिया है। परन्तु विक्रम की 19वीं शताब्दी में वरैया शब्द का भी उल्लेख मिलता है। इसका कारण उच्चारण की सरलता ही हो सकता है ।
अतः उचित व वास्तविक शब्द
 वरहिया है ।इसमें सन्देह की गुंजाइश प्रतीत नहीं होती ।"
 ‌✍🏻 श्रीश राकेश जैन, लहार

सोमवार, 6 जनवरी 2025

विमर्श -1


  विगत वर्ष के उत्तरार्द्ध में वरहिया महासभा के लिए संपन्न हुए चुनावों में लोगों ने उत्साह से भाग लिया और एक नई नवेली कार्यकारिणी चुनकर आई। इनमें ज्यादातर लोग युवा हैं और उत्साह और उमंग से भरे हुए हैं।वरहिया समाज में प्रतिभावान लोगों की कमी नहीं है। लेकिन चूंकि हर व्यक्ति हर कार्य को करने में दक्ष और प्रवीण नहीं होता क्योंकि सभी की अपनी सीमाएं होती हैं इसलिए जिस व्यक्ति की जिस कार्य में विशेषज्ञता हो, उसे यदि वह कार्य या दायित्व सौंपा जाए तो वह उसे ज्यादा कुशलता से सम्पादित कर सकता है और इस तरह से नियोजित लोगों की टीम के समन्वयन का कार्य सम्बंधित निर्वाचित प्रतिनिधि को करना चाहिए।इस प्रकार समाज के विकास और उत्थान के कार्यों में समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता रहेगी और उनके बीच सामंजस्य बढ़ेगा।इस प्रकार लक्षित काम का श्रेय उसे सम्पादित करने वाले लोगों को मिले और समन्वयन करने वाले पदाधिकारी को टीम वर्क को बेहतर ढंग से लीड करने और निर्देशित करने का समुचित क्रेडिट मिले तो कोई समस्या ही नहीं होगी।रेलगाड़ी को भले ही इंजन अपनी ताकत से खींचता है लेकिन बिना डिब्बों की रेलगाड़ी नहीं होती। आजकल तो रेलगाड़ी में मल्टीपल यूनिट होते हैं जो खुद गतिशील रहकर रेलगाड़ी को खींच रहे इंजन की रफ्तार को बूस्ट करते हैं। इसलिए नई रेलगाड़ियों में डिब्बों की अपनी अहमियत है। यदि इस माॅडल पर समाजोन्नति के मिशन को लीड किया जाए तो फिर हमारा अभीष्ट लक्ष्य दूर नहीं होगा। ध्यान रहे कि किसी क्वाड्रिगा या चार घोड़े वाले रथ में जुते घोड़ों को एक  ही दिशा में दौड़ना पड़ता है अन्यथा परिणाम सभी को मालूम है।

बुधवार, 20 नवंबर 2024

वरहिया गौरव गान


श्री वीरमचन्द्र देव के वंशधरों की संततियां हैं हम।
धर्मालु,नैतिक,मूल्यनिष्ठ संख्या बल में हैं यद्यपि कम।
ये मूलसंघ,सरस्वतीगच्छ में शामिल एक उपजाति है।
जो गौरवशाली गण बलात्कारगण के अंतर्गत आती है।
हैं सभी 'वरहिया' कुंदकुंद के आम्नाय के अनुयायी।
जिस कारण उनकी चर्या में शुचिता स्वभावत: ही आई।
पंडित गोपालदास जी ने सौंपी है हमको जो थाती।
उनके द्वारा प्रज्वलित दीप की बुझने ना देंगे बाती।
उनके दिखलाए पथ पर चलकर आगे बढ़ते जाना है।
वरहिया जाति की कीर्ति पताका को नभ में फहराना है।






 

मंगलवार, 11 जून 2024

जैन भवन चुनाव 2024


आया फिर मौका चुनाव का। 

जैन भवन के रखरखाव का।। 

किसके सर दस्तार ~बंधेगी,

 ‌ कौन करेगा  ~   ~अगुआई ।

 थाती की रखवाली ~~ तय,

  करने की फिर बारी ~आई।।

 इसीलिए    ~ जिम्मेदारी से,

 करना   ~सबको   ~वोट है।

 और परखना भी है किसके,

  मन में कितना ~ ~ खोट है।

 जो भी पैनल हैं  ~  चुनाव में

 अपना विज़न करें  ~  स्पष्ट।

 ब्लूप्रिंट क्या है विकास  का 

यह भी बतलाएं, कर कष्ट। 

फिर पैनल कोई जीते  हारे 

हर्षित होवे ~ ~सबका मन। 

 अपनी तो ये अभिलाषा है 

 जीते  ~ केवल जैन भवन ‌।         

 (श्रीश राकेश जैन, लहार )                    

 

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

गोलापूर्व/गोलालारे जैन

(गोलपूर्व अन्वय के साहू गाले और साहू टुडा के परिवारों द्वारा स्थापित भूमिगत कक्ष में ई. 1145 (विक्रमी 1202) की भगवान आदिनाथ की पापोराजी में विराजमान मूर्तियां )
 

गोलापूरब, गोलाहरे(गोलालारे) यह जैन उपजाति  मुख्य रूप से सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिलों में निवास करती है। सामान्यतः सभी गोलपूरब व्यावहारिक रूप से दिगंबर जैन हैं जिनमें अल्प संख्या में हिंदू भी हैं। कुछ इलाकों में वे परवार वैश्यों के साथ रोटी -बेटी का व्यवहार  करते हैं जो दिगंबर जैन हैं।एक किंवदंती के अनुसार गोलापूरब एक पुरबिया व्यक्ति जो संभवतः बैस राजपूत थे‌, के अहीर जाति की एक  महिला के साथ संसर्ग से हुई संतानें हैं। गोला या गोलक नाम के साथ इस व्युत्पत्ति की संगति  बैठाई जाती है। गोलक शब्द का अर्थ किसी विधवा की जारज संतान होता है और जो नीच शब्द का समानार्थी है  जिसके साथ परसर्ग के रूप में पूरब या पुरबिया जुड़ा है। बर्ट्रेंड एन रस्सेल ने इस प्रकार गोलापूर्व वंश की उत्पत्ति को रेखांकित किया है।संयुक्त प्रांत में गोलाहरे या गोलालारे नामक वणिकों की एक छोटी उपजाति भी मौजूद रही है, जो झाँसी जिले से संबंधित है और यह गोलपूरबों का मूल स्थान बताया जाता है और ये सभी  धर्मत: जैन हैं। गोलापूरबों का यह समूह वह है जिसे मिस्टर क्रुक ने अपनी पुस्तक 'ट्राइब्स एंड कास्ट' में गोला शब्द से सम्बंधित और उससे व्युत्पन्न माना है ।ये लोग अनाज का व्यापार करते थे। संयुक्त प्रांत में गोलापूरब नामक कृषकों की एक जाति भी है, जो केवल आगरा जिले में निवासरत रही है।यह भी मान्यता है कि ये लोग सनाढ्य ब्राह्मणों की अवैध संतान हैं, जिनके साथ वे निकटता से जुड़े हुए मालूम होते हैं। हालाँकि, उनके कुल-नामों में, कई राजपूत कुलों के नाम और  निम्न-जाति से जुड़े  कुछ नाम भी शामिल हैं। मिस्टर क्रुक ने उनकी ब्राह्मणों से उत्पत्ति की संभावना को खारिज किया है।यह ध्यान देने योग्य है कि ये गोलपूरब एक कृषक जाति होते हुए भी, वैश्यों की तरह, दस्सा नामक एक उपजाति के रूप में वर्णित हैं, जिसमें अनियमित वंश के व्यक्ति शामिल हैं। वे विधवाओं के पुनर्विवाह को वर्जनीय मानते हैं और सभी मांस -मदिरा और प्याज- लहसुन के सेवन का निषेध करते हैं।इस तरह के रीति-रिवाज निश्चित रूप से एक कृषक जाति में अजीब मालूम होते हैं।ऐसा संभव प्रतीत होता है  कि संयुक्त और मध्य प्रांत में वैश्यों की गोलाहरे और गोलापूरब दोनों उपजातियां क्रमशः गोलापूरबों की इस कृषि कार्य में संलग्न रही जाति से जुड़ी हुई रही हैं। बहुत संभव है कि कालान्तर में इस खेती करने वाले समूह ने  जैन धर्म का परित्याग कर दिया हो, क्योंकि एक जैन व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण कृषि कर्म में प्रवृत्त नहीं रह सकता और ऐसा कार्य नहीं कर सकता जिसमें पशुओं का उत्पीड़न होता हो। उनके एक समूह ने वैश्य वर्ग की बेहतर सामाजिक स्थिति प्राप्त करने और स्वयं को कृषि कार्य करने वाले समूह से विभेदित करने के लिए जैन धर्म अपनाया होगा।खेती करने वाले  मध्य प्रांत के गोलापूरबों के बारे में दुर्भाग्यवश कोई विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है, जिससे इस परिकल्पना का अन्यथा परीक्षण किया जा सके। 

 गोलापूर्व समुदाय का उल्लेख करने वाले कई चंदेल -कालीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं। जिनमें जगतसागर झील ( धुबेला संग्रहालय में ) (वि. 1119 यानी 1062 ई.)उरदामऊ ( वि. 1149, 1171 यानी ई. 1092 और 1114), बहोरीबंद (1125 ई.), मऊ (वि
. 1199) शामिल हैं। , जतारा (वि.1199), अहारजी (वि. 1202), छतरपुर (वि.1202), पपोराजी (वि. 1202), मऊ (वि.1203), नवागढ़ (वि. 1195, 1203), महोबा (वि.1219) आदि। बहोरीबंद को छोड़कर, सभी प्राचीन शिलालेख धसान नदी (संस्कृत शब्द दशार्ण ) के आसपास पाए गए हैं ।

गोलापूर्व समुदाय से ऐतिहासिक रूप से जुड़े शहर मध्य प्रदेश में छतरपुर, टीकमगढ़, सागर और दमोह जिलों और उत्तर प्रदेश में ललितपुर जिले में इस समुदाय की अच्छी-खासी आबादी है।
ई.1769 में लिखे गए नवलशाह चंदेरिया के " वर्धमान पुराण " के एक वृत्तांत में कवि ने गोलापूर्व समुदाय के इतिहास का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने स्वयं के वंश, अपने पूर्वजों जो सुदूर प्राचीन काल में चंदेरी में रहते थे तथा 1634 ई. में उनके पूर्वजों द्वारा भेलसी में गजरथ प्रतिष्ठा कराने का उल्लेख है। खतौरा में भी उनके पूर्वजों के निवास का विवरण है।भेलसी में उनके पूर्वजों द्वारा बनवाया गया मंदिर आज भी मौजूद है। उनके अनुसार, गोलापूर्वजाति  की उत्पत्ति गोयलगढ़ नामक स्थान से हुई है। पंडित नाथूराम प्रेमी और पंडित मुन्नालाल रांधेलीय ने इस समुदाय की उत्पत्ति गोला नामक स्थान से हुई मानी है। इसकी पहचान ग्वालियर या बुन्देलखण्ड क्षेत्र के एक शहर गोलापुर या श्रवणबेलगोला शिलालेख में वर्णित गोल्ल देश नामक क्षेत्र के रूप में की गई है। भिंड/इटावा क्षेत्र में गोलालारे (संस्कृत में गोलाराडे) और गोलसिंघारे नामक दो जैन समुदाय मौजूद हैं जो इससे संबंधित हो सकते हैं। गोलापूरब नाम का एक ब्राह्मण समुदाय भी है जो आगरा क्षेत्र में सनाढ्य ब्राह्मणों की एक शाखा है और कहा जाता है कि उनकी उत्पत्ति सनाढ्य साम्हिया  के गोला गांव से हुई थी।
ऐसी भी मान्यता है कि गोलापूर्व प्राचीन इक्ष्वाकु वंश के वंशज हैं।  1864 में सैम के सौराई में मिले शिलालेख में कहा गया है कि मंदिर के निर्माता सिंघई मोहनदास इक्ष्वाकु वंश के थे, जो गोलापूर्व समुदाय के गोत्र पद्मावती और चंदेरिया के गोत्र थे। इस तरह के अन्य उल्लेख मध्य प्रदेश के नैनागिरि के कुछ शिलालेखों में भी मिलते हैं ।
 यमुना और नर्मदा के बीच के भाग या दशार्ण(धसान)नदी के किनारे अर्थात मथुरा से जबलपुर और भोपाल से ओरछा के भूभाग की पहचान गोल्ल देश के रूप में की गई है। आज भी इस भूभाग में गोलापूर्व जाति की बहुलता पायी जाती है। गोपाचल, ग्वालियर, महोबा, आदि इनके केंद्र माने जाते रहे है।
इसी क्षेत्र में चंदेलवंशी राजा यशोवर्धन हुए जिन्होंने श्रवण बेलगोला में दीक्षा ली और इस प्रकार गोल्ल देश से सम्बंध जुड़ने के कारण गोल्लाचार्य के नाम से विख्यात हुए ।जिसका उल्लेख श्रवण बेलगोला के अनेक शिलालेखों में मिलता है।
ईसा की तीसरी शताब्दी में हुए नंदी संघ के देशीयगण में आचार्य गुणनंदी संवत् 353 ई. 296 और आचार्य ब्रजनन्दी संवत् 364 ई.307 आदि आचार्यो के नाम का उल्लेख प्राप्त होता है। इसके साथ ही गोलापूर्व समाज में अनेक साधु आचार्य एवं विद्वान मनीषी हुए हैं। इसी समुदाय में श्री नवलशाह श्रेष्ठ विद्वान कवि हुए हैं जिन्होंने वर्धमान पुराण की रचना की है।  क्षुल्लक श्री चिदानंद, मुनिश्री क्षमासागर जी, पंडित बालचंद्र शास्त्री,साहित्याचार्य पन्नालाल जी इसी समुदाय के रत्न हैं।
गोलापूर्व जाति स्वाभिमानी, सच्चरित्र, धार्मिक, संयमी, दानी, एवं स्वाध्यायी, निष्ठावान रही है। इस समुदाय द्वारा  अनेक स्थानों पर जिन मंदिर, मूर्तियों की स्थापना का उल्लेख प्राप्त शिलालेखों में मिलता है।   
गोलापूर्व समाज ने 9 वीं - 10 वीं शताब्दी से नगर - नगर में अनेक मंदिर मूर्तियों की स्थापना की जिनके अनेक अवशेष आज भी गोल्ल देश की सीमा और उसके बाहर भी बहुतायत में प्राप्त होते है।

स्रोत: Tribes and Caste of the central province of India by Robert Vane Russell 

भारतीय दिग.जैन अभिलेख एवं तीर्थ परिचय :कस्तूरचंद जैन सुमन

जैन कला एवं स्थापत्य : भारतीय ज्ञानपीठ

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

बजरंगगढ़ अतिशय क्षेत्र


 

बजरंगगढ़ की स्थापना पूर्वी मालवा में गुना के निकट राघौगढ़ के शासक चौहान खींची वंश के राजा जयसिंह  (1797-1818 ई.) ने की थी। यह राघौगढ़ राज्य की दूसरी राजधानी थी । झारकोन किले के परिसर में स्थित यह नगर अतीत में जयनगर के नाम से जाना जाता था।राजा जयसिंह खींची ने इसका नाम अपने आराध्य बजरंगबली के नाम पर बजरंगगढ़ रखा। बजरंगगढ़ का किला प्राचीन है जो एक ऊंची पहाड़ी पर 72बीघे में फैला हुआ है । राजा जयसिंह ने इसका नवनिर्माण कराया था। पहले यहां यादवों का प्रभुत्व रहा है।इस किले में मोतीमहल, दरबारी बैठक, रनिवास, बजरंग मंदिर ,रामबाण तोप तथा राजा धीरजसिंह का चबूतरा है, जो दर्शनीय है। किले में अनेक कुण्ड भी हैं। यहीं श्री जगनेश्वर मंदिर तथा राजा जयसिंह के नाम का तालाब भी है तथा राम मंदिर, गणेश मांदिर, गोपाल मंदिर तथा छतरियां भी हैं। बजरंगगढ़ के किले से दो कि.मी. की दूरी पर पश्चिम दिशा में बीस भुजा देवी का मंदिर है जहां क्वार तथा चैत्र मास में नवदुर्गा का मेला लगता है। इस नगर में राजा जयसिंह ने एक टकसाल की स्थापना की थी,जहाँ सोने-चॉंदी व ताम्बे के सिक्के ढाले जाते थे। इन सिक्कों को जयसिंह शाही सिक्के कहा जाता था। यहाँ उन्होंने अपनी एक शिकारगाह भी स्थापित की थी। जयसिंह साहित्यिक अभिरुचि के व कलाप्रेमी शासक थे। उन्होंने प्रतापशाही जैसे कवियों को संरक्षण दिया।जिन्होंने जयसिंह रासो नामक काव्य रचना की। उन्होंने ईस्वी सन् 1794 में प्रख्यात ज्योतिर्विद वराहमिहिर के ग्रंथ वृहदजातक का हिन्दी पद्यानुवाद किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने कीर्ति कौमुदी नामक ग्रंथ की रचना की। राजा जयसिंह के समय में ही 'राघौगढ़ की होरी रची गई, जो बाद में राघौगढ़ का राज्यगान बन गई। अतिशय क्षेत्र बजरंगगढ़ लगभग 1200 वर्ष पुराना है, जो गुना जिले के पश्चिम में गुना-आरोन- सिरोंज मार्ग पर स्थित है। यह स्थान भगवान शांतिनाथ (18 फीट), कुंथुनाथ (10 फीट, 9 इंच) और अरहनाथ (10 फीट, 9 इंच) की खड्गासन (खड़ी मुद्रा) वाली आकर्षक चमत्कारी मूर्तियों के लिए विश्व में प्रसिद्ध है। जैन श्रेष्ठि श्री पाड़ाशाह ने मुख्य प्राचीन मंदिर का निर्माण विक्रम सवत 1236 (1181) मे करवाया था। एक किंवदंती के अनुसार श्री पाड़ाशाह को यहां पारस पत्थर प्राप्त हुआ था, जिसके कारण उन्होंने उससे बनाए गए सोने से इस मंदिर का निर्माण कराया। बजरंगगढ़ के शांतिनाथ मंदिर में अन्य तीर्थंकरों की मूर्तियां भी हैं। इसे अतिशय क्षेत्र भी कहा जाता है ।ऐसी मान्यता है कि यहाँ पूजा के लिए स्वर्ग से देवता आते हैं तथा यहाँ के अनेक व्यक्तियों ने अर्धरात्रि  में संगीत सुना है। यह भी मान्यता है कि विक्रम संवत 1943 (1886 ई.) में कुछ व्यक्तियों ने इन मूर्तियों को जब नष्ट करने का प्रयास किया तब अचानक यहाँ अग्नि प्रज्वलित हो गई। जिससे भयभीत होकर  वे अपराधी भाग गए।बजरंगगढ़ का नवनिर्मित जैन मंदिर 28 हजार वर्ग फुट में बनाया गया है । मंदिर की नींव 12-18 फुट गहरी है।इस मंदिर में रिइन्फोर्समेंट के लिए सरिए का इस्तेमाल नहीं हुआ है और लगभग 80 फीट घेरे वाला इसका पूरा गुंबद सिर्फ ईटों से बना है। किसी पिलर या पत्थर का कोई सहारा नहीं है बल्कि पूरा ढांचा ईंट, बजरी व सीमेंट के बल पर  टिका हुआ है। इसी तरह हॉल की 34 फीट चौड़ी छत भी बिना किसी सहारे के टिकी है। यह भी सिर्फ ईट से बनी हुई है।  करीब 3 करोड़ की लागत से इसका मूल ढांचा बनकर तैयार हो चुका है। सपाट छतों से लेकर गोल गुंबद तक सभी ईंट,बजरी और सीमेंट से बने हैं। इन ढांचों को अपनी जगह टिकाए रखने के लिए सदियों पुरानी आर्क या मेहराब तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। इस पुरानी तकनीक से बने किसी भी ढांचे की उम्र 400 से 500 साल तक रहती है। जबकि आरसीसी का ढांचा 100 साल से ज्यादा नहीं टिकता। संप्रति मंदिर निर्माण प्रगति पर है।इसका निर्माण मुनिपुंगव श्री सुधासागरजी महाराज की प्रेरणा से हो रहा है।यहां स्थित अन्य समवशरण जिनालय दर्शनीय हैं।मुख्य बाजार में स्थित भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित जिनालय का निर्माण श्री जीतूशाह द्वारा कराया गया है तथा दूसरे का निर्माण श्री हरिश्वन्द्र तारक ने करवाया है। तारक जी के मंदिर में आकर्षक भव्य चित्रात्मक त्रिकाल चौबीसी तैयार की जा रही है। बजरंगगढ़ में कार्तिक शुक्ल पंचमी को वार्षिक मेला लगता है। यहीं भगवान शांतिनाथ के जन्मदिवस को मनाने हेतु तप एवं मोक्ष कल्याणक उत्सव चौदह वर्ष पूर्व हुआ था। वर्तमान में पुराने मंदिर का स्वरूप बड़ी सीमा तक बदल चुका है। मंदिर के पुनर्निर्माण के कारण तीनों तीर्थंकरों के बाजू वाली दीवार पर जो मनोरम भित्तिचित्र अंकित थे, वे नष्ट हो गए। सौभाग्यवश ये भित्तिचित्र कुछ शोधार्थियों के प्रयासों से  धरोहर के रूप में डिजिटल रूप में  संरक्षित है।