किसी दुर्ग का इतिहास उससे सम्बन्धित देशवासियों की संस्कृति का इतिहास होता है।दुर्ग सामान्यतः किसी ऐसे ऊंचे स्थान,पहाड़ी आदि पर स्थित होते हैं जो भौगोलिक दृष्टि से समृद्ध और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुकूल हो। किसी दुर्ग की प्राकृतिक स्थिति उसे अजेय और सामरिक व राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।दुर्ग केवल प्रशानिक केंद्र या आश्रय स्थल नहीं हैं,इनकी क्रोड में विभिन्न राज्य सत्ताओं और सभ्यताओं के उत्थान पतन का इतिहास छिपा होता है। जिनमें मानव जाति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा,क्रंदन, रक्तपात और उल्लास अभिव्यंजित होता है।दुर्ग के स्थापत्य और वास्तु से समय विशेष की भवन निर्माण कला का निदर्शन होता है।
मध्यप्रदेश के महत्वपूर्ण दुर्गों में नरवरगढ़ का दुर्ग सामरिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से विशिष्ट और उल्लेखनीय है।यह शिवपुरी जिले के नरवर नगर में स्थित है। यह विंध्य पर्वतमाला की एक पहाड़ी पर 500 फुट की ऊँचाई पर खड़ा है और 8 वर्ग किमी के क्षेत्रफल पर फैला है। नरवर के दुर्ग का इतिहास राजा नल और दमयंती के अमर प्रेम का साक्षी और केंद्र बिंदु रहा है।इस दुर्ग के दूल्हा द्वार के पास कंगूरों की एक पंक्ति झुकी हुई है।राजा नल को उनके सौतेले भाई पुष्कर ने धोखे से जुएं में हरा दिया था(जिसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में आया है) और वह इतने सत्यनिष्ठ और बात के धनी थे कि वचनबद्ध होने के कारण अपना सब कुछ छोड़ कर जंगल की ओर पत्नी को लेकर चल पड़े थे। वो जब महल से निकले तो उनके सम्मान में महल के सारे कंगूरे श्रद्धा से झुक गए थे और तभी से उसी दिशा में झुके हुए हैं। कुलदेवी पसर देवी उनका रास्ता रोककर लेट गईं थीं।इस जनविश्वास में यह ध्वनित होता है कि राजा नल का इस निर्जीव दुर्ग के साथ भी कितना जीवंत रिश्ता और लगाव था।इस बात से प्रजा जनों के प्रति उनके दयालुतापूर्ण बर्ताव का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
इस दुर्ग के विषय में कई आख्यान और किंवदंतियां प्रचलित हैं।
तेजकरन (जिन्हें दूल्हा भी कहते हैं और जो राजा नल के वंशज हैं)के सम्बन्ध में दो किंवदन्तियां है - पहली यह कि प्रेमाहत दूल्हा जिस उत्तर-पश्चिमी दरवाजे से भागे थे उस दरवाजे का नाम दूल्हा दरवाजा पड़ गया। दूसरी किंवदंती यह है कि एक बार राजा दूल्हा(राजस्थान के लोकाख्यान ढोला-मारू के प्रसिद्ध नायक ढोला)और उसकी रानी मारु, मकरध्वज कुण्ड के बीच में चबूतरे पर बैठे थे। आनन्द-विभोर राजा रानी किसी तरह जल में डूब गए। इस घटना के पश्चात प्रत्येक श्रावण की पूर्णिमा को चबूतरा पर से हाथ उठता दिखाई देता था।एक बार एक सैनिक ने हाथ पर बाण चलाया, तब से हाथ दिखाई नहीं देता।एक और किंवदन्ती हैं जिसका वर्णन कनिंघम साहब इस प्रकार करते हैं कई शताब्दियों पूर्व दुर्ग शत्रुओं द्वारा घेर लिया गया। इस दुर्ग के निकट एक दूसरी पहाड़ी थी। इन दोनों पहाड़ों के बीच में एक रस्सी बंधी थी। राजा दुर्ग के सामनेवाली पहाड़ी पर अपने मित्रों के पास एक पत्र भेजना चाहते थे। यद्यपि राजा ने इस रस्सी पर से पत्र ले जाने वाले को अपना आधा राज्य देने की घोषणा की किन्तु किसी ने साहस न किया । अन्त में एक नटनी पत्र ले जाने को तैयार हुई और सबके समक्ष राजा को आधा राज्य देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध कर लिया।नटनी बड़ी कुशलता से रस्सी पर चलकर पत्र ले गई। जब वह पत्र देकर लौट रही थी एक सरदार ने राजा को मंत्रणा दी कि आधा राज्य बचाने का अवसर है। राजा ने रस्सी कटवा दी। फलस्वरूप नटनी गिरकर मर गई। उस समय से नटों ने कभी नरवर में प्रवेश नहीं किया।वे नरवर का रास्ता छोड़कर दूसरे रास्ते से निकल जाते हैं। कनिंघम द्वारा वर्णित नटनी की इस कहानी का एक दूसरा संस्करण भी प्रचलित है जिसके अनुसार लोहड़ी देवी जो एक तांत्रिक नटिनी थी। वह ग्वालियर की रहने वाली थी। नरवरगढ़ जब अपने वैभव के शिखर पर था,उस वक्त लोहड़ी नटिनी नरवर दुर्ग में पहुंची। उन्होंने कछवाह राजा से कच्चे धागे पर चलने का कलात्मक प्रदर्शन देखने का आग्रह किया। राजा से लोहड़ी नटिनी ने कच्चे सूत पर चलकर दिखाने की बात कही। उसके एवज में महाराजा से पुरस्कार मांगा। महाराजा ने कहा कि यदि ऐसा हुआ, तो नरवर का राज्य दे दूंगा। कच्चे धागे पर चलने से पहले नटिनी ने राजा के सभी हथियारों को अभिमंत्रित कर दिया। उसके बाद उसने कच्चे धागे पर चलना शुरू किया। राज्य चला जाने की दुश्चिंता से आशंकित मंत्री ने एक चर्मकार से रांपी मंगवाकर रख ली थी। जैसे ही नटिनी बुर्ज के पास आने को थी। मंत्री ने रांपी से धागा काट दिया।जिस कारण नीचे गिरने से नटनी की मौत हो गई। उसी स्थल पर लोहड़ी देवी का मंदिर है। नरवर दुर्ग के दक्षिणी दरवाजे के पास पहाड़ की तलहटी में एक छोटे-से चबूतरे पर यह मढ़िया बनी हुई है।इस मंदिर में मूर्ति नहीं है, केवल होम धूप की पूजा की जाती है। तभी से यह उक्ति लोक में प्रचलित है कि ‘नरवर चढ़े ने बेड़नी, ऐरच पकै न ईंट-गुदनौटा भोजन नहीं, बूंदी छपै न छींट’।
नरवर का इतिहास ग्वालियर दुर्ग से सदैव सम्बन्धित रहा। विक्रमी दसवीं शताब्दी के अन्त में ये दोनों दुर्ग कछवाहा राजपूतों के अधिकार में चले गए थे। 1186 वि. में इस पर प्रतिहारों का अधिकार हो गया। एक शताब्दी शासन करने के पश्चात जब सुलतान अल्तमश ने ग्वालियर को जीत लिया तो प्रतिहारों ने नरवर के दुर्ग में आकर शरण ली। विक्रम की 13वीं शताब्दी के अन्त में चाहुड़देव ने यह दुर्ग प्रतिहारों से छीन लिया। नरवर और उसके आसपास चाहुड़ वंश के सिक्के और शिलालेख मिले हैं। बाद में नरवर का यह दुर्ग ग्वालियर के तोमरों के अधीन आ गया।
जयस्तंभ नाम के एक पत्थर के खंबे पर तोमरों की वंशावली खुदी है ।यह खंबा नरवर दुर्ग से एक मील पूर्व की ओर है।
1563 वि. संवत् में सिकन्दर लोदी ने दुर्ग पर विजय प्राप्त की।सिकन्दर लोदी ने दुर्ग में कई मन्दिरों को तोड़ा और मस्जिदें बनवाईं। बाद में सिकन्दर लोदी ने यह दुर्ग राजसिंह कछवाहा को दे दिया जो प्राचीन स्वत्वाधिकारी थे।
विक्रम की 16वीं शताब्दी के मध्य में दुर्ग पर जयसिंह का शासन था। दुर्ग पर लोहे की 'शत्रु संहार' और 'फतेहजंग' नाम की दो तोपें पड़ी हैं, उनपर लेख खुदे हैं जिनमें राजा जयसिंह के नाम का उल्लेख है और 1753 वि.संवत अंकित है।
कछवाहा वंश के अन्तिम राजा मनोहरसिंह से महाराजा शिन्दे ने विक्रम की 19वीं शताब्दी के मध्य में नरवर को जीत लिया।
महाराजा दौलतराव शिन्दे के समय में अम्बाजी इंगले इस दुर्ग के प्रशासक थे। जिन्होंने विक्रमी संवत् 1857 में इस दुर्ग का जीर्णोद्धार किया।एक विशाल भवन अब भी इंगले की हवेली कहलाती हैं ।यह दुर्ग विंध्याचल की एक ढालू पर्वत श्रेणी पर समुद्रतल से 1000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। सिंधु नदी के मोड़ पर स्थित होने के कारण दुर्ग के पश्चिम और उत्तर की ओर नदी हैं। दुर्ग का घेरा लगभग 5 मील का है। विस्तार की दृष्टि से ग्वालियर राज्य में यह सबसे बड़ा दुर्ग है।दुर्ग की पत्थर की प्राचीर और अन्य दीवालों पर अनेक गढ़गजे हैं । विभाजक दीवालें दुर्ग को चार सुदृढ़ घेरों में विभाजित करती हैं। मध्य के घेरे को 'मझ लोक' कहते हैं । यह भाग खंडहर हो चुका है। पहाड़ी के पश्चिम भाग का घेरा दूल्हा अहाता' कहलाता है ।इसी भाग में दूल्हा दरवाजा स्थित है। जिसमें से अन्तिम कछवाहा राजा निकलकर भागा था।दुर्ग का दक्षिणी अहाता "मदार' अहाता कहलाता है, क्योंकि इस भाग में मदारशाह की मजार हैं। दुर्ग का धुर-दक्षिणी भाग 'गूजर' अहाता कहलाता है क्योंकि यहाँ पर गूजर रहते थे।नगर भी पत्थर की प्राचीर से घिरा है।
दूल्हा दरवाजा केवल बड़े बड़े पत्थर के ढोकों का बना है। इसमें चूना का प्रयोग नहीं किया गया । द्वार के पत्थरों पर सुन्दर शिल्पकारी है।पिसनहारी दरवाजा, जिसे आलमगीरी दरवाजा भी कहते हैं, सिरे पर बहुत ढालू है इसलिए उसमें सीढ़ियाँ लगा दी गई हैं। एक दरवाजा वीरनपौर अथवा सैयदों का दरवाजा कहलाता है क्योंकि इसके पास सैयद की दरगाह है। तीसरा द्वार गणेशपौर कहलाता है।सबसे ऊपर का द्वार हवापौर कहलाता है।मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व नरवर का दुर्ग भव्य मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध था किन्तु सिकन्दर लोदी ने विक्रम की 15वीं शताब्दी के अन्त में सब हिन्दू और जैन मन्दिरों को तुड़वा दिया। आजकल दुर्ग पर प्राचीन मंदिरों के कोई भी चिन्ह नहीं पाए जाते, यत्रतत्र खंडित मूर्तियों के टुकड़े मिलते हैं और हवापौर के निकट एक मन्दिर के कुछ अवशेष मिलते हैं। अन्य तीन मन्दिर बहुत पीछे के बने हैं, संभवत: कछवाहा राजपूत राजाओं ने बनवाए हैं।दीर्घ काल तक दुर्ग मुसलमानों के प्रभाव में रहा इसलिए दुर्ग पर अनेक मस्जिदें और दरगाहें हैं। सबसे प्राचीन मस्जिद सिकन्दर लोदी की बनबाई हुई है जो बड़ी मस्जिद कहलाती है । मस्जिद का आंगन बड़ा है। पश्चिम की ओर प्रार्थना भवन है, तीन ओर दालानें हैं। छत पर कोई गुम्बद नहीं है।मस्जिद पर दो लेख खुदे हैं, एक अरबी में है और दूसरा फारसी में। फारसी में लिखा हैं कि मस्जिद सिकन्दर लोदी ने हिजरी संवत 912 (1506) में बनाई। दूसरी मस्जिद हवापौर के पास है। इसमें भी तीन लेख खुदे हैं ।पहाड़ी के पूर्वी किनारे पर प्रसिद मुसलमान फकीर मदारशाह की दरगाह हैं।दुर्ग कछवाहे राजाओं के बनवाए हुए महलों के खंडहरों से भरा पड़ा है । यह महल मझलोक के पूर्वी भाग में हैं। यहां से सिंध नदी की घाटी का दृश्य दिखाई देता है । राजा के महल में अनेक आंगन हैं। प्रत्येक आंगन में एक सभा भवन, सिंहासन-गृह, दालान, स्नानागार, अन्तःपुर, आनन्दवाटिका और झूला है। महल काँच और चूने की सजावट से सजे थे और दीवालों पर सुन्दर चित्रकारी थी। यद्यपि महल टूटी फूटी अवस्था में है तथापि राजप्रासादों के अवशेषों से पता चलता है कि राजपूत राजाओं का जीवन आनन्दमय और वैभव पूर्ण था। इन सब महलों में बड़े महल को महाराजा माधौराव शिन्दे ने ठीक कराया था । यह कचहरी-महल कहलाता है। इसके एक भवन में लकड़ी के मंच पर चटाई बिछी रहती थी । लोगों का विश्वास था कि यह राजा नल की गद्दी है। इस भवन के ताकों और द्वारों पर काँच के टुकड़ों के बेल-बूटे हैं। शीशमहल में भी इस प्रकार के बेल-बूटे हैं।
लदाऊ बंगला के चारों ओर ढलवां छते हैं। इसी के पास एक घर में बैलों से चलने वाली एक बड़ी चक्की है ।लदाऊ बंगला के पास ही द्वीपमहल है, इसमें एक पत्थर के ढोके में कटा हुआ सुन्दर बड़ा नहाने का हौज है। हौज की बनाबट अंडाकार पुष्प की भांति है जिसमें छह कलियां हैं।राज-महलों के अहाते के बाहर, बहुत से सुदृढ़ और कई खण्डों वाले भवन हैं।जिनमें राज्य के पदाधिकारी तथा अन्य आश्रित जन रहते थे।
दुर्ग में अनेक छोटे बड़े ताल हैं। उनमें प्रमुख मकरध्वजताल, कटोराताल, छत्रताल, चन्दनताल, सागरताल,गौमुख-कुंड और बिशन-तलैया हैं।मकरध्वज-ताल सबसे बड़ा है । जनश्रुति के अनुसार इसे राजा मकरध्वज ने बनवाया था । यह 30 फीट गहरा है और इसका क्षेत्रफल 300 वर्गफीट है। यह मध्यकालीन हिन्दू शैली के अनुसार बनाया गया है। इसके पश्चिमी किनारे पर एक भवन है।उसमें एक पत्थर लगा है जिसमें एक बहती हुई नदी दिखाई गई है जिसके दोनों ओर देवी-देवताओं के चित्र हैं। साधारणत: लोग इन्हें पनिहारे कहते हैं। तालाबों के अतिरिक्त दुर्ग पर अनेक कुआं और बावड़ी भी हैं।
नरवर किले की तलहटी में अतिशयकारी उरवाहा जैन मंदिर स्थित है। पुरातन समय में नरवर में काफी संख्या में जैन मतावलंबी रहते थे जो अत्यंत धार्मिक और परंपरानिष्ठ थे। बताते हैं कि नरवर में अधिकांश जैन परिवारों के घरों में चैत्यालय स्थापित थे। नरवर के वरहिया जैन मंदिर में 140 के आसपास जो मूर्तियां हैं, वे उन्हीं चैत्यालयों से लाकर विराजमान की गई हैं।यह वरहिया जैन मंदिर स्थानीय चौधरी गोत्रीय वरहिया जैन जाति के श्रेष्ठी मानसिंह के वंशजों ने बनवाया था।इन प्रमाणों से यहां के लोगों की अध्यात्मिक जागृति ,धर्म के प्रति रुचि और अटूट श्रद्धा का पता चलता है।