बुधवार, 31 दिसंबर 2025

कामना


 नये वर्ष की, नई सुबह हो ~ मंगलमय।
सब हों सुखी,प्रसन्न ; न कोई भी हो भय।


पूर्ण मनोरथ हों, ~ जीवन में उन्नति हो।
त्यागें वैर,विरोध ; विमल सबकी मति हो।


एकसूत्र में बंधें ~ वरहिया जन सारे।
मनहर देव बनें, हम सब के रखवारे।


एक फर्श पर बैठें  सभी, विचार करें।
जो भ्रांति पनपीं हैं,सबका परिहार करें।


भलीभांति होवे सबको, यह बात विदित।
निहित एकता में रहता है सब  का हित।


हम पूज्य गुरुजी के ही सब अनुयाई हैं।
इस नाते हम सब एक और गुरु भाई हैं।


जब मंजिल सबकी एक चुनें क्यों राह अलग।
सब एक ओर ही चलें, रखें क्यों उलटे पग।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

बतकही -शादी की रस्में


 शादी विवाह की रस्मों में एक महत्वपूर्ण रस्म चढ़ाव की रस्म भी होती है। जिसमें वर पक्ष सप्तपदी से पहले जो शादी की प्रमुख और महत्वपूर्ण रस्म है, कन्यापक्ष के लोगों के सामने अपने पारिवारिक गहनों की नुमाइश करता है। जिससे कन्यापक्ष के लोग वरपक्ष की आर्थिक हैसियत का आकलन करते हैं।इस परिपाटी का उद्देश्य और औचित्य उस समय था जब रिश्ते नाई या मध्यस्थों के जरिए तय होते थे और आवागमन के सीमित साधनों की वजह से कन्यापक्ष से जुड़े सभी लोगों के लिए वर पक्ष के बारे में विशेष रूप से उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं होता था। चढ़ाव की यह नुमाइश वरपक्ष की आर्थिक सुदृढ़ता का कन्यापक्ष को एक अलिखित आश्वासन होता है। लेकिन आज के समय में जब लड़का लड़की और उनके परिवार वाले शादी तय होने के पहले कई बार औपचारिक और अनौपचारिक मुलाकातें करते हैं।एक दूसरे की सोशल मीडिया प्रोफाइल खंगालते हैं और विभिन्न सूत्रों से एक दूसरे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी जुटाते हैं तब ऐसी सूरत में चढ़ाव के जरिए दिए जाने वाले इस पारंपरिक आश्वासन का कोई औचित्य नहीं है। बेतहाशा मंहगाई के इस दौर में चढ़ाव ले जाना और शादी की गहमागहमी के बीच उनकी रखवाली करना बेहद जोखिम भरा काम है।कई बार दुर्घटनाएं भी हुईं है। चढ़ाव के गहनों से वर पक्ष की हैसियत का व्यवहारतया आकलन संभव भी नहीं है क्योंकि उन पर उनका नाम थोड़े ही अंकित रहता है और इस तात्कालिक प्रयोजन के लिए वे दूसरों से मांगकर जुटाए भी जा सकते हैं। इसलिए इस तरह की परिपाटी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

विवाह की सभी रस्में सामूहिक रूप से और समारोह पूर्वक निभाई जाती हैं।मटियाने की रस्म में शादी का खाना बनाने के लिए मिट्टी का चूल्हा बनाने के निमित्त गांव के बाहर जाकर किसी साफ स्थान से गाजे-बाजे के साथ मंगलाचार करते हुए मिट्टी लाने का रिवाज रहा है। आजकल मिट्टी के बने चूल्हों के बजाय गैस भट्ठी या लकड़ी व कोयले की रेडीमेड भट्ठियों का इस्तेमाल होता है लेकिन मटियाने की रस्म आज भी निभाई जाती है जो कालबाह्य हो चुकी है। इसका प्रयोजन इतना भर रह गया है कि मटियाने के बाद शादी वाले घर में न्यौत्हारियों के लिए औपचारिक रूप से सामूहिक रसोई शुरू हो जाती है।
 शादी की विभिन्न रस्मों में हल्दी मेंहदी की रस्में भी बेहद महत्वपूर्ण रस्में हैं जिसमें समारोह और मंगलाचार पूर्वक यथास्थिति वर या कन्या को मेंहदी, हल्दी लगाई जाती है। पहले ये रस्में सादगी के साथ लेकिन आमोद पूर्ण ढंग से निभाई जाती थीं।लेकिन अब इसमें  फिल्मी तड़का लग गया है। हल्दी मेंहदी की रस्मों के लिए खर्चीले भव्य सेट तैयार किए जाने लगे हैं।इनका एक अलग ड्रेस कोड लागू हो गया है जो टीवी सीरियलों की मेहरबानी है।यह शादी में आए मेहमानों के साथ ज्यादती से कम नहीं है क्योंकि उन्हें इन मौकों के लिए ड्रेस खरीदने पर गुंजाइश न होने के बावजूद अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। मूलत: शादी विवाह जो एक अनुष्ठान है, उसे अक्ल के अंधे लोग इवेंट में तब्दील करने पर आमादा हैं।
शादी विवाह के मौके पर खासकर वे लोग जिन्होंने नया-नया पैसा कमाया या कबाड़ा है,अपनी अमीरी का फूहड़ प्रदर्शन करने लगे हैं। पहले घर के बाहर गली में शामियाना लगाकर लोग शादी करते थे और फिर बाद में स्कूल भवन या मुहल्ले की किसी धर्मशाला से इस तरह के आयोजन करने लगे।इसी क्रम में विवाह- वाटिकाएं लोगों की अगली पसंद बनीं और अब लोगों पर रिसाॅर्ट का भूत सवार है।होड़ाहोड़ी में लोग दूसरों की नजर में अपना कद ऊंचा करने की ललक में खुद को कर्ज में धकेल रहे हैं। आयोजन स्थलों पर होने वाले बेतहाशा खर्च को नियंत्रित कर उस राशि का कोई अन्य रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है।हाल ही में ग्वालियर के एक कारोबारी जो अपनी बेटी की शादी को यादगार बनाने के लिए उसमें बॉलीवुड सिंगर बुलाना चाहते थे, ने मित्रों की समझाइश पर अपना इरादा बदलकर उसी मंडप से जहां वह अपनी बेटी की शादी धूमधाम से कर रहे हैं,11 साधनहीन परिवारों की बेटियों के हाथ पीले करने का सुखद और प्रेरणादायी निर्णय लिया है।

खाने के फेहरिस्त में भी जितना जोर व्यंजनों की रूपगत विविधता और क्वान्टिटी पर रहने लगा है उतना क्वालिटी पर नहीं है। क्योंकि दूसरों ने जो लकीर पहले से खींच रखी है उससे बड़ी लकीर खींचने की होड़ लगी है। इसलिए सलामी तोप की ही होगी फिर चाहे धमक से पूरा फाउंडेशन हिल जाए!


शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

दर्शन(शास्त्र)


 दर्शन(शास्त्र) या फिलासफी एक वैश्विक और समग्र विषय है। जैसे केमिस्ट्री और फिजिक्स वैश्विक और समग्र विषय हैं उसी तरह फिलासफी है। जीवन और जगत के बारे में मनुष्यों के मूलभूत प्रश्न, जिज्ञासाएं और चिंताएं साझी हैं।ग्रीक फिलॉसफर्स (प्लेटो, अरस्तू) और भारतीय ऋषि (याज्ञवल्क्य, कपिल) मूलतः एक ही तरह के प्रश्न पूछ रहे थे। दर्शन (Philosophy) का आधार मानव-चिंतन है जो सार्वभौम प्रश्नों पर  मंथन कर समाधान खोजता है। सांसारिक दु:खों से मुक्ति की छटपटाहट और उनसे निपटने के उपाय खोजने की चाहत तमाम भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद सभी मनुष्यों में समान है लेकिन इनके उत्तर संस्कृति, भाषा, परंपरा और ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित होने और विशिष्ट सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के कारण अलग-अलग मिलते हैं। स्थूल रूप से सत्ता मीमांसा, ज्ञान मीमांसा और मानवीय मूल्यों का विवेचन दर्शनशास्त्र का केंद्रीय विषय या प्रयोजन रहा हैं। जैसे -
जगत का मूल क्या है?
 ईश्वर, आत्मा, प्रकृति, चेतना आदि की वास्तविकता क्या है?
क्या वास्तव में अस्तित्व में है?
मनुष्य सत्य को कैसे जानता है?
इन्द्रिय, तर्क, अनुभूति और अंतःप्रज्ञा की भूमिका क्या है?
सत्य और भ्रान्ति में भेद कैसे किया जाए?
क्या अच्छा है और क्या बुरा?
नैतिक जीवन का आधार क्या होना चाहिए?
सौंदर्य, कला और आनंद का मान्य रूप क्या है?
ये सभी बिंदु दर्शनशास्त्र का केंद्रीय प्रयोजन रहे हैं दूसरे शब्दों में दर्शनशास्त्र मनुष्य और विश्व के बीच के गहनतम संबंधों को समझने का प्रयास है।

फिलासफी का स्वरूप वास्तव में वैश्विक है लेकिन क्षेत्रीय और भौगोलिक विविधता के फलस्वरूप विकसित हुए जीवन-बोध पर आधारित भिन्न सांस्कृतिक दृष्टियों के कारण दर्शनशास्त्र में अनेक विचार-सरणियों का विकास हुआ जो सामान्यतः school of philosophy कहलाते हैं। हिंदू स्कूल, बौद्ध और जैन स्कूल, इस्लामिक स्कूल इत्यादि दर्शनशास्त्र की विभिन्न विचार- सरणियां हैं जिन्हें बोलचाल में हिंदू दर्शन, बौद्ध या जैन दर्शन, इस्लामिक दर्शन कहा जाता है। जबकि वास्तव में ये school of thaught  या दर्शन(शास्त्र) की शालाएं या प्रवृत्तियां हैं।अकादमिक जगत में ज़्यादातर विद्वान इसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं।
भारतीय परम्परा में दर्शन का लक्ष्य केवल सत्य की खोज न होकर  मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति है। दर्शन शास्त्र को जीवन के दुःखों की निवृत्ति का एक वरेण्य साधन माना गया है।
आत्मा, परमात्मा, जगत, प्रकृति और पुरुष के बीच संबंध तथा 'सत्य या यथार्थ' क्या है और उसे पाने का साधन क्या है? व प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति आदि प्रमाणों के अध्ययन एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे आदर्शों को जीवन का सर्वोच्च  लक्ष्य माना गया है।
इसलिए भारतीय दर्शन में  विवेच्य केंद्रीय विषय-आत्मा का यथार्थ स्वरूप और मोक्ष की प्राप्ति है।

जबकि पाश्चात्य परम्परा में दर्शन अधिकतर तार्किक विश्लेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित हुआ है। जहाँ दर्शन का विवेच्य विषय-सत्य और ज्ञान की वस्तुनिष्ठ खोज व मानव-जीवन के नैतिक-सौंदर्य संबंधी प्रश्नों का समाधान खोजना है।

बुधवार, 17 सितंबर 2025

वरहिया समाज और चुनौतियां


 जिस  समाज का सामाजिक अनुशासन शिथिल हो जाता है। उसका सामाजिक ताना-बाना कमजोर होकर बिखरने टूटने लगता है। वरहिया समाज में दिन-ब-दिन बढ़ती स्वेच्छाचारिता एक चुनौती बनकर उभर रही है। पंचों के परंपरागत अनुशासन तंत्र के निष्क्रिय और प्रभावहीन होने के कारण समाज के स्तर पर उच्छृंखलता बढ़ी है। प्रभावशाली लोग मनमानी कर सामाजिक मूल्यों को धता बता रहे हैं। इन सबकी कीमत गरीब और सामान्य व्यक्ति अपनी परेशानियों से अकेले जूझकर चुका रहा है। समाज के स्तर पर उसे किसी तरह का सहयोग न मिल पाने से वह और टूट जाता है।यह स्थिति चिंताजनक है।आज सामान्य समाजजनों की पारिवारिक सुख-शांति को भी जमाने की नजर लग गई है। अपने बच्चों की गृहस्थी बसाने की चिंता में दुबले हो रहे लोग जब किसी तरह इस चिंता से पार पा लेते हैं तो कुछ ही दिनों में उनकी खुशियों को ग्रहण लग जाता है और हंसता खेलता पारिवारिक जीवन वैवाहिक विवादों की भेंट चढ़ जाता है। व्यक्तिगत समस्या कहकर इन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। व्यक्ति परिवार की इकाई है और परिवार समाज की इकाई है। इसलिए इस श्रृंखला की कुछ कड़ियां भी यदि कमजोर होंगी तो उसका नकारात्मक प्रभाव पूरी श्रृंखला और उसकी मजबूती पर पड़ेगा।इन विवादों को सुलझाने में सामाजिक स्तर पर प्रमुख और प्रभावशाली लोगों को अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।समाज की इस आत्मघाती उदासीनता के कारण ही लोगों को जो उचित समझ में आ रहा है वो कदम वह उठा रहे हैं। भले ही उसका दीर्घकालिक प्रभाव समाज और उनके स्वयं के लिए नकारात्मक और प्रतिकूल हो। समाज के लोगों के प्रतिकूल रवैए और समाज में उन्हें उचित रिस्पांस न मिलने के कारण ही समाज से बाहर जाकर विवाह की प्रवृत्ति पनप और बढ़ रही है।जिस पर अंकुश लगना चाहिए लेकिन यह तभी संभव होगा जब इसके लिए समाज में उचित वातावरण तैयार होगा। लेकिन समाज के नियामक और प्रशासी पदों पर बैठे लोग अपना क्रेडिट स्कोर बढ़ाने की जुगत में दिखावे के आयोजनों में व्यस्त हैं और जमीनी हकीकत से अपनी नजरें चुरा रहे हैं।यह न केवल गलत है बल्कि घातक भी है। जिसकी कीमत हमारी पीढ़ियां चुकाएंगी।

शनिवार, 13 सितंबर 2025

विवाह -एक अनुचिंतन


 यद्यपि सजातीय और सवर्ण विवाह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामाजिक स्तरण में तेजी से आ रहे बदलाव के परिप्रेक्ष्य में आज के समय में विवाह केवल 'कुलीनता' यानी वंश, जाति, आर्थिक स्तर आदि पर आधारित नहीं रह गया है।
जीवनसाथी का चयन अब अधिकतर विचारों के तालमेल समान शिक्षा और व्यवसाय जिससे उनके बीच सामंजस्य बन सके व एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने से उनके बीच के आपसी अच्छे बर्ताव जैसी व्यावाहरिक कसौटी पर होना उचित माना जाता है।केवल 'वंश और कुल' देखकर शादी करना, लेकिन स्वभाव/सोच में मेल न होना, जीवनभर की कठिनाइयाँ खड़ी कर सकता है।ऐसी स्थिति में विवाह पारिवारिक और सामाजिक उन्नति में सहायक होने के बजाय एक समझौता बन जाता है।इसलिए कुलीनता के नाम पर आत्मबलिदान के लिए विवश करने के स्थान पर वैवाहिक बंधन में बंधने वाले जोड़े की खुशी और संतुष्टि ज्यादा मायने रखती है।
धर्मशास्त्रीय नजरिए से देखें तो उच्च सामाजिक स्थिति वाले वर और निम्न सामाजिक स्थिति वाली कन्या के बीच विवाह को अनुलोम विवाह की श्रेणी में रखा जाता है और इसके विपरीत उच्च सामाजिक स्थिति वाली कन्या और निम्न सामाजिक स्थिति वाले वर के बीच विवाह को प्रतिलोम विवाह माना जाता है।धर्मशास्त्रों में अनुलोम विवाह को अपवाद स्वरूप स्वीकार किया गया है  हालांकि श्रेयस्कर तो नहीं, उसे पर सहनीय माना गया।किंतु प्रतिलोम विवाह को सामान्यतः अशुभ और समाज विरोधी बताया गया है, क्योंकि इससे पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था बिगड़ने का भय है। प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न संतान को अवर्ण या वर्णसंकर कहा गया है।
हालांकि सामाजिक उच्चता और निम्नता की यह अवधारणा परंपरागत रूप से वर्णाधारित है। लेकिन आज के अर्थ युग में इसका पैमाना अब धन बनता जा रहा है। फिर भी आज की परिस्थिति में और उच्च शिक्षित लोगों के बीच  अनुलोम/प्रतिलोम का यह पारंपरिक  विभाजन व्यावहारिक रूप से अब बहुत मायने नहीं रखता।
विवाह का मूल उद्देश्य गृहस्थ जीवन की सुख-शान्ति, सहयोग और अगली पीढ़ी का सुचारु पालन-पोषण है। इसलिए यदि दोनों परिवार और दम्पति मानसिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं तो  'अनुलोम' या 'प्रतिलोम' का भेद गौण हो जाता है।
केवल 'कुलीनता' की जिद के कारण अविवाहित रहना व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिए आज के युग में श्रेष्ठ वही विवाह है जिसमें वर-वधू के विचार, शिक्षा, संस्कार और व्यवहार का मेल हो।
पराशर ऋषि ने पाराशर स्मृति के अध्याय 2 में कहा है कि कलियुग में वर्णसंकर विवाहों से यथासम्भव बचना चाहिए, परंतु यदि विवाह कठिन हो तो गुण, संस्कार और आचरण को प्राथमिकता देना चाहिए।इसमें यह भी कहा गया कि विवाह का उद्देश्य धर्मपालन और संतति की शुद्धता है, न कि केवल कुलगौरव।
महाभारत के अनुशासन  पर्व में अध्याय 43 में भीष्म पितामह ने कहा है कि  "गुणहीन कुलवती कन्या से विवाह करने से गुणवती अकुलीन कन्या से विवाह करना श्रेष्ठ है।"अर्थात् यदि कन्या का कुल उच्च है परन्तु गुणहीन है, तो  गुणवान लेकिन अकुलीन कन्या का वरण करना श्रेष्ठ और उचित है।
इस प्रकार महाभारत और पाराशर स्मृति के प्रकाश में यह स्पष्ट  है कि कुल से बढ़कर गुण और संस्कार देखे जाने चाहिए।
इसलिए, यदि आज कुलीनता के कारण विवाह कठिन हो रहा है, तो धर्मशास्त्र और परम्परा दोनों यह मार्ग सुझाते हैं कि गुण, शिक्षा, आचरण और आपसी सामंजस्य को प्रमुख मानें।


शनिवार, 6 सितंबर 2025

क्षमावाणी/क्षमा दिवस

क्षमायाचना करना तभी प्रयोजन भूत है जब क्षमा याचना करने वाले व्यक्ति को उससे प्रमादवश या जानबूझकर अथवा अनायास हुई गलती का अहसास हो और उस गलती के लिए उसके मन में पश्चाताप हो तथा उस गलती को भविष्य में न दोहराने का अव्यक्त रूप से निहित संकल्प और प्रतिबद्धता हो। क्षमावाणी के इस महापर्व का यही वास्तविक उद्देश्य है।क्षमायाचना आत्मकल्याण की भावना से  उदात्तता और निर्मलता को लक्ष्य कर अपने व्यवहार का उत्तरोत्तर परिष्कार व परिमार्जन  के निमित्त किया जाने वाला एक आदर्श धार्मिक उपक्रम है। क्षमा याचना की फलश्रुति क्षमा दान के रूप में होती है। जिसमें क्षमादान करने वाला व्यक्ति बड़ा दिल दिखाते हुए उसके प्रति की गई गलती को अनदेखा कर क्षमा दान कर नि:शल्य हो जाता है। जिसमें उसकी निश्छलता और बड़प्पन दोनों झलकते हैं। लेकिन बार-बार और सायास गलती करने वाले व्यक्ति द्वारा क्षमा याचना करना और अनचीन्ही व अनजानी गलतियों के लिए क्षमा मांगना एक रस्म अदायगी या बड़प्पन का दिखावा भर है जो इस महान परंपरा का अभीष्ट नहीं है।
'खम्मामि सव्वे जीवाणां, सव्वे जीवा खमंतु मे,
मित्ति मे सव्व भूदेसु वैरं मज्झं ण केणवि' 
(मूलाचार- 2/7) 
'क्षमे सर्वजीवान् ,सर्वे जीवान् क्षमन्ताम् मम।
मैत्री मे सर्वभूतेषु ,वैरं मम न केनापि।'
मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ ,सभी जीव मुझे क्षमा करें।मेरा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव है। मेरा किसी से भी बैर नहीं है।

प्रकारांतर से यही बात इन पदों में कही है -
मिच्छामि दुक्कडं /
मिथ्यामि दुष्कृताम् /
मेरे दुष्कृत्य मिथ्या हों 
         
जाने-अनजाने जो कुछ भी भूल हुई हो।
या कोई प्रतिक्रिया  किंचित प्रतिकूल हुई हो।
‌या राग-द्वेषवश कुछ भी अनुचित लिखा कहा हो।
‌मन में जिसके कारण चुभता शल्य रहा हो।
क्षमा-पर्व पर मांग रहा हूं क्षमा आपसे।
मुझे मिले उन्मुक्ति हुए इस महापाप से।

 🙏🏻 श्रीश राकेश जैन 

 

 


 

शनिवार, 23 अगस्त 2025

मंगल कलश


  प्रायः सभी मांगलिक अवसरों पर कलश स्थापना की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। विवाह, गृहप्रवेश, व्रत, पर्व, पूजा जैसे मंगल प्रसंगों पर कलश स्थापना की जाती है। सभी भारतीय धर्मों में कलश स्थापना का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।कलश को अक्षय पात्र माना गया है। इसका आशय है कि जैसे कलश में जल भरा है, वैसे ही घर-परिवार में सुख, शांति और सम्पन्नता बनी रहे।नारियल,आम के पत्तों और जल से भरे कलश को "सजीव ब्रह्माण्ड" का प्रतीक माना जाता है।
कलश में रखा गया जल जीवन, शांति और समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए यह हर मांगलिक कार्य का प्रारम्भिक चरण  है।
 इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।कलश का आधार पृथ्वी, जल उसका जीवन, नारियल और पत्ते उसकी उर्वरता और सृजनशीलता का प्रतीक हैं। इससे मानव जीवन और ब्रह्माण्ड के बीच एकात्म का बोध कराया जाता है।कलश से जुड़े प्रतीकों में श्रीफल या नारियल और महत्वपूर्ण प्रतीक है।जिस प्रकार कलश जीवन और सृष्टि का प्रतीक है, उसी प्रकार श्रीफल  पूर्णता और फलप्राप्ति का द्योतक है।नारियल का गोल आकार ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।इसके भीतर का जल जीवन का बीज माना गया है।
जब इसे कलश पर स्थापित किया जाता है, तो यह सृष्टि की निरंतरता और प्रजनन शक्ति का जीवंत प्रतीक बन जाता है।
आम के पत्तों से सज्जित श्रीफल आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।आम के पत्ते केवल सज्जा सामग्री नहीं है बल्कि ये पत्ते समृद्धि, शांति और शुभता का प्रतीक माने जाते हैं। कलश पर लगने वाले आम की पाँच पत्ते  प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान इन पंचप्राण के प्रतिनिधि माने जाते हैं और ये हरे पत्ते नई ऊर्जा, उन्नति और उर्वरता के प्रतीक होते हैं।आम की पत्तियाँ वायु को शुद्ध करने और वातावरण में नमी संतुलित रखने में सहायक होती हैं और जल्दी नहीं मुरझातीं है।इसलिए कलश यदि ब्रह्माण्ड और जीवन का आधार है, तो श्रीफल उसका फल और समृद्धि है। दोनों मिलकर अक्षय मंगल, सुख-समृद्धि और पूर्णता के कारक माने जाते हैं।













सोमवार, 11 अगस्त 2025

वरहिया जैन -एक दृष्टि

 वरहिया जाति की उत्पत्ति की ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि, वरहिया पाठ की प्राचीनता विषयक विभिन्न प्रश्नों के उत्तर में एक सर्वथा नूतन पक्ष सामने उपस्थित हुआ है। उस पर भी दृष्टिपात करें और अपनी संतुलित और विचारपूर्ण प्रतिक्रिया दें -
ऐतिहासिक और भाषावैज्ञानिक दृष्टि से "वरहिया" एक स्थानवाची नाम है जो  मूल रूप से  वराह नामक क्षेत्र या नगर के निवासी लोगों का परिचायक है।
बाद में यह समुदाय के जातिगत नाम के रूप में स्थिर हो गया।
 यहां आगे संक्षेप में "वरहिया" शब्द के भाषाई विकास को दृष्टिगत रखते हुए 
उसके ऐतिहासिक-स्थानवाची मूल, संस्कृत-प्राकृत के ध्वनि-विकास सिद्धांत तथा  लोक-व्युत्पत्ति मूलक (श्रेष्ठ हृदय वाले) अर्थ पर विचार किया गया है।स्थानवाची (ऐतिहासिक) दृष्टि से यह वरहिया शब्द वराह क्षेत्र  नामक प्राचीन स्थान के नाम→  वराह → वरह → वरह + इया ( प्रत्यय) जुड़कर उसक सिद्ध हुआ और जो वराह क्षेत्र से आए लोगों के बोधक के रूप में ग्रहण किया गया है। इसके अलावा संस्कृत-प्राकृत ध्वनि-विकास की     दृष्टि से विचार करते हुए यह संस्कृत "वर्ह" = मोरपंख,पत्र ,चंवर के अर्थ में गृहीत होकर    वर्ह → वरह (प्राकृत) → वरह + इया (प्रत्यय) जुड़कर     चंवर/मोरपंख से जुड़ा (राजचिह्न, सेवा, प्रतीक) के बोधक के रूप में वरहिया शब्द- रूप निष्पन्न हुआ माना जाता है। हालांकि यह एक अनुमान मात्र है क्योंकि इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। तीसरे     लोक-व्युत्पत्ति मूलक (भावात्मक अर्थ) की दृष्टि से     विचार करने पर "वर" = श्रेष्ठ + "हिया" = हृदय →    वर + हिया = वरहिया     →श्रेष्ठ हृदय वाले व्यक्ति के बोधक के रूप में नैतिक पहचान और आत्म-गौरव से संपूरित व्यक्ति के अर्थ में हमारे सामने आता है। तीनों व्युत्पत्तियों में ध्वनि-रूप समान है, जिससे यह भ्रम और बहुअर्थीयता की स्थिति बनी है।लेकिन उपर्युक्त तीनों व्युत्पत्तियों में ऐतिहासिक-स्थानवाची व्युत्पत्ति मूलक अवधारणा सबसे तर्कसंगत, साक्ष्य-युक्त और ग्राह्य है। यद्यपि वरहिया शब्द का संस्कृत "वर्ह" से जुड़ाव संभाव्य है, पर सीमित प्रमाण होने से  यह अधिकतर ध्वन्यात्मक संयोग लगता है।लोक-व्युत्पत्ति मूलक "श्रेष्ठ हृदय" के रूप में निरूपण करने वाली अर्थ व्यंजना इस समुदाय की आंतरिक सांस्कृतिक व्याख्या है, जो 19वीं–20वीं सदी में नैतिक और गौरवपूर्ण पहचान के रूप में उभरी। 'वरहिया' शब्द कहीं कहीं 'वरैया' के रूप में व्यवहृत हुआ है लेकिन 
पुराने शिलालेखों और पांडुलिपियों में “वरहिया” पाठ को ही मौलिक और शुद्ध माना गया है; “वरैया” केवल एक अपभ्रंश यानी बोलचाल में आसानी की दृष्टि से प्रचलित रूप माना जाता है।‘वरहिया’ मूल पाठ है, जिसका  अनेक पुराने शिलालेखों (प्रतिमाओं के पादलेख), दस्तावेजों और पांडुलिपियों में संदर्भ आया है। 19वीं-20वीं शताब्दी में ‘वरैया’ रूप का बढ़ा प्रचलन बोलीगत सरलता का परिणाम माना जाता है ।
वरहिया" नाम जो ऐतिहासिक रूप से  वराह क्षेत्र नामक भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ा है। वराह क्षेत्र प्राचीन काल में उत्तरी-मध्य भारत में एक धार्मिक व सांस्कृतिक क्षेत्र रहा है ,जिसकी अवस्थिति  बुंदेलखंड और उसके आसपास के इलाकों में मानी जाती है।ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, वरहिया जैन समुदाय का मूल केंद्र बुंदेलखंड, ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों में था और आज भी यह इसका प्रवास क्षेत्र है।यह समुदाय जैन धर्म के दिगंबर आम्नाय से जुड़ा है, और यह समुदाय छोटे-छोटे कस्बों और नगरों में संगठित समाज के रूप में बसा रहा। विवाह और अन्य सामाजिक रिवाज पारंपरिक जैन पद्धति से होते हैं।भाषा प्रायः बुंदेली और हिंदी, लेकिन धार्मिक अनुष्ठान और प्रार्थनाओं में जैन शास्त्रीय संस्कृत-प्राकृत परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है।वरहिया जैन अन्य जैन जातियों जैसे पल्लीवाल,परवार, गोलालारे, खंडेलवाल, ओसवाल आदि से अलग पहचाने जाते हैं, और इनके बीच वैवाहिक संबंध कम ही होते हैं। प्राचीन और मध्यकाल में ये मुख्यतः कृषि, अनाज व्यापार, कपड़ा, और बैंकों (साहूकारी) के कार्य में संलग्न रहे।वरहिया जैन, धार्मिक दृष्टि से जैन समाज में सम्मानित व्यापारी-वर्ग में माने जाते हैं। इनके मंदिर और धर्मायतन बुंदेलखंड और उत्तर-मध्य भारत के कई शहरों में पाए गए हैं। ऐतिहासिक रूप से इस जाति की आर्थिक स्थिति मजबूत रही, क्योंकि यह व्यापार और वित्तीय कार्यों में अग्रणी थे।बुंदेलखंड में मिले अभिलेख (शिलालेख) और जैन मंदिरों की शिल्पकृतियों में वरहिया जाति के दानदाताओं के नाम मिलते हैं। अपने मूल क्षेत्र से इनका प्रव्रजन  मध्यकाल के आसपास (14वीं–17वीं सदी) में अन्य जैन व्यापारिक समुदायों के साथ हुआ।18वीं–19वीं शताब्दी में इस जाति के कई परिवार व्यापार और रोजगार के लिए उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, और मध्यप्रदेश के अन्य हिस्सों में बस गए।आज ग्वालियर और आसपास के क्षेत्र इनके पारंपरिक केंद्र माने जाते हैं।वराह क्षेत्र का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों जैसे जैन प्रबंध साहित्य जैसे प्रबंधकोष, प्रबंधचिन्तामणि, और कई "चरित्र कथाओं"और खासकर जैन और पौराणिक दोनों परंपराओं में मिलता है। ऐतिहासिक रूप से वरहिया (Varahiya) जैन समुदाय और वराह क्षेत्र के बीच संबंध के संकेत मिलते हैं, लेकिन यह जुड़ाव प्रत्यक्ष राजनीतिक राज्य जैसा सम्बन्ध न होकर,इसे भौगोलिक-ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के रूप में देखना समझना चाहिए।
यह संभवतः वर्तमान उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड क्षेत्र में फैला एक इलाका था।जैन साहित्य (विशेषकर विसंती कम्मट्ट और कुछ प्रबंध ग्रंथों) में वराह क्षेत्र का जिक्र क्षत्रिय वंशों और व्यापारी समुदायों के प्रवास से जुड़ा है।माना जाता है वरहिया जैन समुदाय के पूर्वज वराह क्षेत्र में रहते थे, फिर व्यापार और धर्म-प्रचार के कारण अन्य जगहों (विशेषकर राजस्थान, बुंदेलखंड, और उत्तर भारत) में फैल गए।




शनिवार, 28 जून 2025

बदलते परिवेश में विवाह संस्था

अधिकांश वरहिया समाज आज भी ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में निवासरत है। हालांकि बेहतर रोजगार की तलाश में बहुत सारे लोग नगरों में आकर निवास कर रहे हैं‌। जिनमें से अधिकांश के पास स्वयं के घर नहीं है और वे किराए के घरों में रहकर छोटे मोटे व्यवसाय या प्राईवेट नौकरी कर जीवनयापन कर रहे हैं। गांवों में शहरी चकाचौंध और आधारभूत सुविधाएं भले ही कम हों, लेकिन वहां लोगों की मूलभूत जरूरतें पूरी हो जाती है और वे बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। आमतौर पर इंटरमीडिएट के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को नजदीकी शहरों का रुख करना पड़ता है। इंटरनेट की सहज-सुलभता के कारण गांवों और शहरों का सांस्कृतिक अंतर लगभग खत्म हो चुका है। लेकिन ज्यों ही बच्चे नये शहरी परिवेश में आते हैं उनकी चाहतों को पंख लग जाते हैं।एकल परिवारों के कारण अधिकतर बच्चे अकेले ही या किसी रूम पार्टनर के साथ रहते हैं। अभिभावक के बिना बच्चे स्वछंद हो जाते हैं और सामाजिक वर्जनाएं टूटने लगती हैं।नये और अलग अलग सांस्कृतिक और धार्मिक सामाजिक मूल्यों वाले सहपाठियों के साथ भावनात्मक और व्यवहारात्मक स्तर पर अंतर्विनिमय के कारण उनका मूल्यबोध और विचारदृष्टि बदल जाती है। मूल्यों के इस टकराव के कारण वे दोहराव के शिकार हो जाते हैं जिस कारण परिवार में उनका व्यवहार अलग होता है और इससे इतर मित्रों के बीच उनका व्यवहार एकदम भिन्न होता है।इस छद्म को वे इस तरह ओढ़े रहते हैं कि उनके परिजनों को उनके व्यवहार में आए इस दुराव का कोई अंदाजा ही नहीं होता। चूंकि शिक्षा बेहतर जीवन की एक अपरिहार्य पूर्वशर्त बन चुकी है इसलिए शिक्षा से विमुख होने की बात तो कोई स्वप्न में भी नहीं सोच सकता है। नई संभावनाओं की आहट मिलते ही लड़कों की महत्वाकांक्षा उड़ान भरने लगती है लेकिन लड़कों की तुलना में लड़कियां ज्यादा स्वप्नदर्शी और संवेदनशील होती हैं।वे दूसरों से जल्द प्रभावित हो जाती है। व्यवहार में अधिक खुलापन उनके लिए अक्सर घातक सिद्ध होता है। जिसके कारण भौतिक और सामाजिक रूप से खामियाजा लड़की को ही भुगतना पड़ता है ‌क्योंकि छुरी तरबूज पर गिरे या फिर तरबूज छुरी पर गिरे दोनों ही स्थितियों में कटता तरबूज ही है। इसलिए जीवन के इस नाजुक पड़ाव पर लड़कियों की परवरिश बेहद सतर्कता के साथ करना जरूरी है।उनके साथ आपकी बेहतर अंडरस्टैंडिंग और बाॅन्डिंग उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती है। इस मामले में कोई भी लापरवाही अभिभावकों को हमेशा महंगी पड़ती है। शिक्षा व्यक्तित्व के समग्र विकास की कुंजी होने के साथ ही बेहतर रोजगार मिलने में मददगार बनती है इसलिए सभी अभिभावक अपने बच्चों को यथाशक्ति पढ़ाने लिखाने का प्रयास करते हैं और इस मामले में वे लड़का लड़की में कोई भेद नहीं करते। दुनिया में रुपए पैसे की बढ़ती अहमियत लोगों को पैसे के पीछे बेतहाशा भागने को प्रेरित करती है और इस मायावी उत्प्रेरण की वजह से आज इंसान पैसा कमाने की मशीन में तब्दील होता जा रहा है। पैसा उसके लिए साधन न रहकर साध्य बन गया है। लोगों की यह फिलासफी ही इस सारी गड़बड़ की मूल वजह है। ऐसे लोगों के लिए पैसा कमाना पहला लक्ष्य हो गया है ।जीवन के सुख और आनंद दोयम दर्जे पर हैं। वे लोग (स्त्री या पुरुष) अपनी सारी ऊर्जा पैसा कमाने में झोंक देते हैं। विवाह जैसी संस्था को वे अपनी राह का रोड़ा समझने लगते हैं और रोबो की तरह व्यवहार करते हैं। जब उन्हें विवाह की सुध आती है, गंगा में बहुत पानी बह चुका होता है।विवाह की सही या आदर्श उम्र चोबीस से छब्बीस वर्ष के बीच मानी जाती है जो विरल स्थितियों में तीस इकतीस वर्ष तक हो सकती है। विवाह भले ही सजातीय समुदाय में हो या विजातीय समुदाय में हो, बड़ी उम्र में विवाह एक मजबूरी में किया समझौता बन जाता है। आजकल विवाह के लिए लोगों की पसंद काफी बदल गई है।एक ट्रेंड के तौर पर गांव के बजाय शहर और व्यवसायी के बजाय नौकरीपेशा वर-कन्या को प्राथमिकता मिल रही है भले ही जीवन की गतिशीलता को ठहराव ग्रस ले और उसे पंगु बना दे।कुंडली मिलान का ढर्रा भी इसमें एक बड़ी बाधा है जबकि यह बात सिद्ध हो चुकी है कि इस तरह के मिलान का कोई तार्किक आधार नहीं है। दरअसल वर-कन्या का गांव या शहर का अथवा व्यवसायी या नौकरीपेशा होना जरूरी नहीं बल्कि वह एक बेहतर जीवनसाथी साबित हो,यह सुनिश्चित होना जरूरी है। उनके बीच शैक्षणिक और व्यावसायिक अनुरूपता के बजाय भावनात्मक तालमेल ज्यादा जरूरी है,इसलिए इस बात की बेहद जरूरत है कि आप समय रहते अपने बच्चों को जीवन की प्राथमिकताएं समझाएं। उन्हें एक संवेदनशील मनुष्य बना रहने दें और उनकी महत्वाकांक्षा को पंख लगाकर ईगल की तरह आकाश में सबसे ऊंचा उड़ने और पैसे कमाने वाले रोबो में तब्दील न करें। जहां तक संभव हो,सजातीय समुदाय को प्राथमिकता दें ताकि बेहतर सामाजिक सुरक्षा मिल सके।।

बुधवार, 21 मई 2025

आओ विचारें बैठकर

                             (चित्र : गूगल से साभार)
 

'हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।
आओ विचारें बैठकर हम ये समस्याएं सभी।'
दद्दा के शब्दों में कहूं मैं भी, तो क्या फिर हर्ज है।
लोगों को चेताना ही तो,कवियों का होता फर्ज है।
यों भी तो मुट्ठी भर हैं हम, संख्या हमारी न्यून है।
खांचों में उनको बांटना एक  खतरनाक जुनून है।
पहले तो पूर्वाग्रह हैं जो भी, सभी अपने  छोड़ दें।
 छोड़ें सभी कड़वाहटें दिल से दिलों को जोड़ दें।
हल खोजने की शर्त यह है दिल हमारे साफ हों।
गलती हुई हों अगर कुछ,वे गलतियां भी माफ हों।
क्यों न शुरू से प्रगति की, मिलकर इबारत हम लिखें।
बातों से और कामों से भी; सच्चे बनें,अच्छे दिखें।।
        ✍🏻 श्रीश राकेश जैन,लहार



 

 

सोमवार, 19 मई 2025

सास-बहू का मंदिर व तेली का मंदिर


    (चित्र : गूगल से साभार)

ग्वालियर दुर्ग परिसर में स्थित दर्शनीय स्मारकों में सास -बहू का मंदिर और तेली का मंदिर उल्लेखनीय हैं। सास-बहू का मंदिर जो सहस्रबाहु मंदिर का ही अपर नाम है 11 वीं सदी का जुड़वां मंदिर है।यह भगवान विष्णु और शिव को समर्पित है जिसका निर्माण 1093 ईस्वी में कच्छप घात वंशी नरेश महिपाल ने कराया था। सहस्रबाहु मंदिर के अद्वितीय शिल्प के अलावा उसका नाम भी लोगों में कुतूहल और उत्सुकता पैदा करता है।इस मंदिर में भगवान विष्णु को हजार हाथों के साथ दर्शाया गया था।जिस कारण इसका यह नाम पड़ा।कछवाहा नरेश महिपाल ने अपनी विष्णु भक्त पत्नी और शिवभक्त पुत्रवधू के निमित्त इन मंदिरों का निर्माण कराया था। मंदिर से एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जिससे यह तो ज्ञात होता है कि इस मंदिर को कछवाहा राजपूत राजा महिपाल ने 1093 ईस्वी में पूर्ण कराया लेकिन यह किस देवता को समर्पित है इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता। परम्परागत रूप से लोग इन जुड़वां मंदिरों को विष्णु और शिव के मंदिर मानते हैं।
लेकिन इस विषय में ग्वालियर के विद्वान और जैन इतिहासकार श्री रामजीत जैन, एडवोकेट का अभिमत सर्वथा भिन्न है और वे इसे एक जैन मंदिर मानते हैं। उनके मतानुसार एक भक्त राजपूत ने अष्टान्हिका व्रत के उपलक्ष्य में नन्दीश्वर द्वीप की अनुकृति पर इस जैन मन्दिर का निर्माण कराया था।नन्दीश्वर द्वीप जाने वाले देव-देवियों की मूर्तियाँ नृत्य एवं विभिन्न मुद्राओं में मन्दिर के सभी भागों में उत्कीर्ण करायी गईं। संभवतया मुस्लिम काल में इन मूर्तियों का भंजन कर दिया गया।बड़े मंदिर के साथ बने छोटे मंदिर की भी यही परिणति हुई लेकिन हैं ये मूलतः जैन मंदिर ही।इनका निर्माण सेतवाल जैन जाति के सहस्रबाहु गोत्र के श्रेष्ठी ने कराया था।सेतवाल जाति जैन समाज की 84 जातियों में से एक है और इसके 18 गोत्रों में एक गोत्र सहस्रबाहु है।इस कारण इस मंदिर का नामकरण सहस्रबाहु का मंदिर हुआ था।
दुर्ग परिसर की सबसे ऊंची संरचनाओं में से एक तेली का मंदिर है जो द्रविड़ शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है और भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण ईसा की 9वीं शती में प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासनकाल में हुआ। बताते हैं कि तेल व्यापारियों द्वारा दिए गए दान के धन से इस मंदिर का निर्माण किया गया था।इस कारण इसका तेली का मंदिर या तेलिका मंदिर नाम पड़ा।कई विद्वान इस मंदिर का काल 8वीं शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दी के आरंभिक काल के बीच मानते हैं। इतिहासकार इसे एक हिंदू मंदिर मानते हैं और यह शिव, विष्णु और मातृकाओं (मातृदेवियों) को समर्पित है। मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है।
जैन इतिहासकार श्री रामजीत जैन एडवोकेट के अभिमतानुसार यह मंदिर राजा आम (जो कन्नौज के राजा यशोवर्मन के पुत्र थे) की वैश्य पत्नी से उत्पन्न राज कोठारी के वंशज तोलाशाह ने बनवाया था। राज कोठारी को 'आम' के गुरु जैनाचार्य वप्पभट्टि सूरी ने जैन धर्म में दीक्षित किया था जो ओसवाल जाति में सम्मिलित हो गया था। उसकी आठवीं पीढ़ी में तोलाशाह हुआ। यह बहुत बड़ा न्यायी, ज्ञानी, मानी और धनी था। जैन धर्म का बड़ा अनुरागी था। उन्होंने द्रविड़ शैली के इस भव्य जिनालय का निर्माण कराया था। तोलाशाह के मन्दिर का अपभ्रंश रूप 'तेली का मन्दिर' नाम कालान्तर में लोक में प्रसिद्ध हुआ। यह भी मूलतः एक जैन मन्दिर है।जो भगवान आदिनाथ को समर्पित है।इसके चारों ओर वराटिका (मुख्य भवन से संलग्न छोटा उपवन)में जैन मन्दिर या मन्दिरों के पाषाण स्तम्भ तथा तीर्थंकर मूर्तियाँ रखी हुई हैं। ये मूर्तियां किस मन्दिर की है तथा खुले मैदान में क्यों रखी गई है। यह ज्ञात नहीं है। श्री रामजीत जी जैन की मान्यता है कि यह पुरासामग्री तेली के मन्दिर और उसके निकट बने हुए एक जीर्ण मन्दिर की हैं। इस मन्दिर के निकट एक जीर्ण-शीर्ण कमरा बना हुआ है। सन् 1844 में कनिंघम ने इस 35 फुट लम्बे और 15 फुट चौड़े कमरे को जैनों के 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मन्दिर माना है।

 

गुरुवार, 27 मार्च 2025

गुरुवर गोपालदास वरैया बेमिसाल हैं



 

कोई नहीं  है उनकी  समता का,
वैसी विलक्षण वक्तृत्व क्षमता का।
 

सम्मान उनको  मिला अपरंपार,
पर इससे ज्यादा के हैं वे हकदार।

संयत रहे, प्रतिकूलताओं में,
इस अर्थ में वे आत्मजेता थे।
पीढ़ियां उनको रखेंगी याद,
गुरुदेव ऐसे युग प्रणेता थे।

शास्त्रार्थ रण के निर्जयी गजकेसरी,
थीं मुग्ध जिन पर स्वयं मां वागीश्वरी।

 पंडित प्रवर,गुरुओं के गुरु,वाचस्पति,
व्यक्तित्व था ऐसा,ज्यों हों योगी यति।  

 वे सरलता और  सौम्यता की मूर्ति थे,

वे तर्कप्रिय थे ,न्याय की प्रतिमूर्ति थे। 

ज्ञान की अहर्निश प्रज्वलित मशाल हैं।

गुरुवर गोपालदास वरैया बेमिसाल हैं।।
  ✍🏻 श्रीश राकेश जैन, लहार

मंगलवार, 25 मार्च 2025

पंडित लेखराज जी वरैया


 पंडित लेखराज जी वरैया  गुरुवर्य पंडित गोपालदास जी वरैया के ही समकालीन थे।आपका जन्म  वरहिया जैन समाज के मातृस्थल और पौराणिक राजा नल की क्रीड़ा भूमि ऐतिहासिक  नरवर गढ़ के समीप स्थित करहिया ग्राम में विक्रम संवत्‌  1925 में हुआ था। इनका गोत्र 'पलैया' है। इनके पिताका नाम जगराम उपनाम जगोलेराम था । जो उस समय करहिया ग्राम जागीर के प्रमुख व्यवसायी थे। करहिया ग्राम में पठन-पाठन की समुचित सुविधा न होने के कारण इनके पिताजी ने  घर पर ही इनको पढ़ाने के लिए एक शिक्षक का प्रबन्ध किया था। पंडितजी की बाल्यकाल से ही  धर्म के प्रति गहरी रुचि थी।धर्म शास्त्र में दृढ़ श्रद्धा के कारण उन्होंने 18 वर्ष की आयु में ही कन्दमूल का आजीवन त्यागकर दिया था और चारित्रिक दृढ़ता के कारण आपकी अपने समय के आदर्श व्यक्तियों में गणना होती थी।आप अत्यंत सादगी के साथ रहते थे और सदैव साधारण श्वेत वस्त्र पहनते थे और सिर पर पगड़ी बांधते थे।वह सही मायने में सरलता की प्रतिमूर्ति थे। तड़क-भड़क और दिखावा आपको तनिक पसन्द न था।आप निर्मल स्वभाव, उदारचेता और धर्म चिंतन में संलग्न रहने वाले सज्जन व्यक्ति थे । आपकी विचक्षणता, सरलता और अध्ययनशीलता से उनके संसर्ग में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।इस कारण समाज में  उनकी बहुत ख्याति थी।इतनी ख्याति और  प्रतिष्ठा के बावजूद आपमें अहंकार का लेशमात्र भी न था।आप सदैव मां  जिनवाणी  की आराधना में तल्‍लीन रहते थे।आपने जीवन पर्यन्त जैनधर्म की सेवा करते हुए उसकी धर्म पताका फहराई। कहीं भी कोई भी धार्मिक उत्सव होने पर वह सदैव उसमें यथाशक्ति सहयोग करते थे। धर्म की साधना को उन्होंने अपना जीवन लक्ष्य बना लिया था। लेकिन क्रूर काल के जटिल मारक-पाश में बंधकर 53 वर्ष की अल्पायु में ही  विक्रम संवत्‌ 1978 में माघ शुक्ला 14 को यह नक्षत्र क्षत होकर सदैव के लिए अस्त हो गया।'वरैया विलास' पंडित जी एकमात्र उपलब्ध स्वतंत्र कृति है।जिसकी भूमिका पंडित कपूरचंद जी वरैया ने लिखी है और यह लश्कर निवासी प्रसिद्ध वस्त्र व्यवसायी  लक्ष्मीचन्द वरैया ने सन् 1950 में प्रकाशित कराई थी।यह कृति दो भागों में हैं। इसके  पूर्वार्द्ध में सम्पूर्ण पूजायें संग्रहीत है और उत्तरार्ध में स्तुति, विभिन्न गायन शैली में निबद्ध उपदेशात्मक भजन और जैन बारहखड़ी संकलित हैं।आपकी ये रचनाएं अत्यंत भावप्रवण कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों दृष्टियों से सुपुष्ट, अत्यंत प्रौढ़ और गेय हैं। पंडित जी को छंदशास्त्र का ज्ञान था और वह गायन में भी निपुण थे इसलिए उनकी सभी रचनाएं छंदोबद्ध हैं।पंडित जी की एकमात्र पुत्र संतान श्री जियालाल जी थे,जो एक व्यवसायी थे।करहिया के प्रसिद्ध व्यवसायी और साहूकार श्री सुआलाल जी व श्री गेंदालाल जी इन्हीं के यशस्वी वंशज रहे हैं।

श्री गोपाल दिगंबर जैन सिद्धांत संस्कृत विद्यालय, मुरैना

कुण्डलपुर के मेले में महासभा के अधिवेशन में यह सहमति हुई थी कि सहारनपुर में संचालित जैन महाविद्यालय पंडित गोपालदास जी वरैया की देखरेख में मुरैना में संचालित किया जाए। परन्तु वरैया जी की  मुंशी चम्पतराय जी के साथ पटरी नहीं बैठती थी। इसलिए पंडित जी ने उनके साथ और उनके अधीन रहकर इस काम को करना स्वीकार नहीं किया लेकिन  इसी समय उन्हें  स्वतन्त्र रूप से मुरैना में एक जैन पाठशाला शुरू करने का विचार आया।आपके पास पंडित वंशीधर जी पूर्व से ही अध्ययनरत थे।अब दो-तीन विद्यार्थी और भी जैन सिद्धान्त का अध्ययन  करने के लिए उनके पास आकर रहने लगे।कुछ सदाशयी लोग इन विद्यार्थियों का आर्थिक सहयोग करते थे और पंडित जी  इन्हें पढ़ा देते थे । धीरे-धीरे इस विद्यालय की ख्याति बढ़ती गई और इसके बाद कुछ अन्य विद्यार्थी भी अध्ययन के निमित्त यहां आ गये और कार्य की अधिकता के कारण एक व्याकरण का अध्यापक नियुक्त करने की आवश्यकता अनुभव हुई।जिसके लिये सेठ सूरजचन्द्र जी शिवराम जी ने 30₹ मासिक की आर्थिक सहायता देना स्वीकार किया। धीरे-धीरे छात्रों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि पण्डित जी को उसके लिये नियमित पाठशाला की स्थापना का निर्णय लेना पड़ा। सन् 1902 में बनी “जैन सिद्धान्त विद्यालय' नाम की यही पाठशाला आज पंडित गोपालदास संस्कृत महाविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है और इसके द्वारा जैन धर्म और जैन सिद्धांत के जानकार अनेकानेक विद्वान तैयार हुए हैं।इस पाठशाला की ख्याति समूचे जैन जगत में है। प्रारंभ में पाठशाला के साथ में  एक छात्रावास भी था। छात्रावास और उस समय पाठशाला के लिये बने भवन पर लगभग दस हजार रुपए खर्च हुए थे। पाठशाला और छात्रावास दोनों पर मोटा-मोटी 10000₹ वार्षिक का खर्च आता था।यह धनराशि पंडित जी को दान के रूप में प्राप्त होती थी। पंडित जी द्वारा रोंपा गया यह नन्हा पौधा आज विशाल वटवृक्ष बन गया है।जिसका परिसर काफी बड़ा और सर्वसुविधायुक्त है।पंडित गोपाल दास वरैया 19वीं सदी के धर्म और दर्शन के प्रकांड विद्वान और उच्च कोटि के शिक्षाविद् हैं, जिन्होंने शिक्षण में संस्कृत की उपेक्षा से व्यथित होकर अपने बूते   मुरैना में इस संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। जो धीरे-धीरे प्रदेश और देश का प्रसिद्ध शैक्षणिक केंद्र बन गया। पंडित जी सदैव निर्धन और असहाय छात्रों की आर्थिक सहायता करते थे। जैन जगत के चोटी के विद्वानों में अधिकांश इसी संस्थान की देन हैं।पंडित जी के देहावसान के बाद से विद्यालय प्रबंधन में स्थानीय जैसवाल समाज का डोमिनेंस रहा है। बाद में  श्री जवाहरलाल जी जैन (कुलैथ वाले) और श्री दिनेश कुमार जैन, एडवोकेट ने वरहिया जैन समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रबंधन समिति में उपस्थिति दर्ज कराई और उसमें प्रभावी रूप से अपना दखल बढ़ाया। वर्तमान में भी मुरैना में वरहिया जैन समाज के पांच -छह परिवार ही हैं। मुरैना का पंडित गोपालदास संस्कृत महाविद्यालय एक सार्वजनिक संस्था है जिसमें वर्तमान में वरहिया जैन समाज सहित सभी स्थानीय सर्वजातीय जैन समाज का प्रतिनिधित्व और प्रबंधकीय नियंत्रण है। इसलिए कुछ लोगों का यह उपालंभ या आरोप कि वरहिया जैन समाज और उसकी नियामक संस्थाओं ने मुरैना विद्यालय को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लिया और उस पर दूसरों को हावी क्यों होने दिया, गलत है। बिना तथ्यों की जानकारी किए आरोप प्रत्यारोप उचित नहीं है।
 

सोमवार, 10 मार्च 2025

पवाया/पद्मावती


पद्मावती जिसे आज पवाया के नाम से जाना जाता है।
 इसका उल्लेख विष्णु पुराण, बाणभट्ट कृत हर्षचरित, महाराजा भोज कृत सरस्वतीकंठाभरण आदि में आया है। महाकवि भवभूति के मालतीमाधवम् की अमर कथा इसी नगरी के इर्द-गिर्द घूमती है।भवभूति ने पद्मावती नगरी को गगनचुम्बी महलों, मन्दिरों, अट्टालिकाओं से सुसज्जित बताया है। कथा का नायक उस नगर में तत्वमीमांसा सीखने आता है। भवभूति ने स्वयं इसी नगर में शिक्षा ग्रहण की थी।
मालतीमाधवम् में उल्लिखित विवरण के अनुसार पद्मावती  सिन्धु, पारा/परा(पार्वती),लवणा/नून एवं मधुमती/महुअर नदियों की क्रोड में बसा एक समृद्ध नगर था जो सिन्धु और परा के संगम पर स्थित था। सिन्धु तथा मधुमती के संगम पर महादेव को समर्पित एक भव्य शिव मंदिर स्थित था। सर्वप्रथम एच एच विल्सन ने उज्जैन को पद्मावती के रूप में चिन्हित किया। परन्तु उज्जैन में क्षिप्रा अकेली नदी होने के कारण इस विचार को मान्यता प्राप्त नहीं हुई । स्वयं विल्सन ने ही दक्कन में औरंगाबाद के आसपास पद्मावती के अवस्थित होने की बात कही थी। फिर बाद में उन्होंने विष्णुपुराण का अध्ययन करते समय  बिहार में स्थित भागलपुर को प्राचीन पद्मावती नगरी के रूप में चिन्हित किया।
विष्णुपुराण में  नागवंशी राजाओं के मथुरा, कान्तिपुरी (मुरैना जिले में कुतवार/ महाभारतकालीन कुन्तिभोज।) और पद्मावती से शासन करने का उल्लेख आया है। अलेक्जेंडर कनिंघम ने मथुरा से निकटता के कारण शिवपुरी जिले के नरवर की पद्मावती के रूप में पहचान की। नरवर से कनिंघम को नागवंशी शासकों के सिक्के भी मिले थे जिससे उनका यह विश्वास और दृढ़ हुआ।
लेकिन बाद में एम वी लेले और एम बी गार्डे ने मालतीमाधवम् में वर्णित  नदियों के आधार पर ग्वालियर जिले में डबरा के निकट स्थित पवाया ग्राम को ही पद्मावती के रूप में पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर स्पष्टता के साथ चिन्हित किया। जिसे इतिहासविदों के बीच व्यापक मान्यता प्राप्त हुई।सन् 1920 में सर जॉन मार्शल के पवाया में आगमन से उत्खनन का सिलसिला शुरू हुआ जो 1942 तक चला। इसमें एक बड़ा ईंटों का बना मन्दिर, ताड़पत्र स्तम्भ, यक्ष मणिभद्र, सूर्य/नारायण की एक मूर्ति तथा वामनावतार की कथा से अलंकृत एक तोरण शीर्ष प्राप्त हुआ। ये सभी पुरावशेष ग्वालियर किले में स्थित गूजरी महल संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं।
 शिव मंदिर की इमारत कई शताब्दियों पुरानी है। ये वही स्थान प्रतीत होता है जो आठवीं शताब्दी में रचित मालतीमाधवम् में एक प्राचीन सुवर्णबिन्दु नामक शिवालय के रूप में वर्णित है। जिसमें उल्लेख आया है कि “यहाँ स्वर्णबिन्दु नामक पवित्र भगवान शिव हैं, जिन्हें किसी मानव ने स्थापित नहीं किया है, जो मधुमती और सिंधु नदी के संगम को पवित्र करते हैं।”  यह प्राचीन शिवलिंग अपनी अलौकिक दिव्यता बिखेरता हुआ आज भी मौजूद है।
मालतीमाधवम् में जिस शिवालय का वर्णन है वह मधुमती और सिन्धु के संगम पर स्थित था। लेकिन मधुमति/महुअर नदी यहाँ से कुछ मील दूर जाकर सिन्ध में मिलती है। डेढ़ हजार साल के लंबे कालखंड में कदाचित महुअर ने अपने मार्ग को किंचित परिवर्तित किया हो जो अब सिन्ध के समान्तर ही बहती है।   
 पवाया गाँव जो कभी वैभवशाली और समृद्ध महानगर रहा है  आज एक निहायत छोटा और पिछड़ा गाँव है। यहां के नाग शासक काफी शक्तिशाली और प्रभावशाली रहे हैं और इस बात का अनुमान तो हम पृथ्वी के शेषनाग के फन पर टिके होने के मिथक से सहज ही लगा सकते हैं।
         वायु पुराण में उल्लेख आया है कि नौ नागों ने चंपावती या पद्मावती पर और सात नागों ने मथुरा पर शासन किया था, लेकिन किसी के नाम का उल्लेख इसमें नहीं है। विष्णु पुराण में कथन आया है कि नागों ने पद्मावती, कांतिपुरी और मथुरा में शासन किया था।पवाया में पाए गए सिक्कों पर नौ से अधिक शासकों, भव, भीम, बृहस्पति, देव, गणपति, प्रभाकर, पुम, स्कंद, वसु, विभु, वीरसेन, वृष और व्याघ्र का उल्लेख है । नाग वंश का अंत चौथी शताब्दी  के उत्तरार्ध में हुआ जब उनका राज्य प्रभावशाली गुप्त साम्राज्य में विलीन हो गया। इनमें से कांतिपुरी की पहचान आधुनिक कुतवार/कोटवाल(यह गाँव मुरैना के पूर्व, ग्वालियर के उत्तर और गोहद के पश्चिम में आसन नदी के किनारे स्थित है। यह बानमोर से लगभग 18 किलोमीटर और ग्वालियर से 30 किलोमीटर दूर है । यह मुरैना से 22 किलोमीटर दूर है) गांव के रूप में की गई है जो पद्मावती के उत्तर-पूर्व में लगभग 75 मील और मथुरा के दक्षिण में लगभग उतनी ही दूरी पर स्थित है। ये तीनों स्थान एक दूसरे के बहुत निकट हैं, इसलिए ये तीन अलग-अलग नाग राजवंशों की राजधानियां नहीं हो सकतीं। मथुरा और कांतिपुरी में पाए गए सिक्के ज्यादातर गणपति नाग के हैं।ये तथ्य हमें यह संकेत देते हैं कि देश के इस भाग में एक ही नाग शासक का साम्राज्य था जिसकी राजधानी पद्मावती थी और मथुरा, कांतिपुरी और विदिशा, जहां नागवंशी शासकों के सिक्के पाए गए हैं, नाग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान थे।
साहित्यिक साक्ष्य के अलावा, पद्मावती नगरी के कुछ अभिलेखीय संदर्भ भी हैं। खजुराहो के वैद्यनाथ मंदिर का एक शिलालेख, जिसकी तिथि 1000-1001 ई. है, पद्मावती की अप्रतिम सुंदरता का वर्णन करता है। शिलालेख में उल्लेख है, "पृथ्वी की सतह पर एक अद्वितीय (नगर) था, जो ऊंचे महलों से सुसज्जित था, जिसके बारे में दर्ज है कि इसे स्वर्ण और रजत युग के बीच पृथ्वी के किसी शासक, लोगों के स्वामी, जो ब्राह्मण जाति का था, ने स्थापित किया था, (एक ऐसा शहर जिसे) इतिहास में पढ़ा जाता है (और) पुराणों में पारंगत लोग इसे पद्मावती कहते हैं। पद्मावती नामक यह सबसे उत्कृष्ट (नगर), अभूतपूर्व तरीके से बनाया गया था, महलों की गलियों की ऊंची पंक्तियों से भरा हुआ था, (और) यह चमकदार महलनुमा आवासों से भरा था जो बर्फीले पहाड़ की चोटियों जैसे लगते थे।”
        गार्डे ने सन् 1916 में साहित्यिक साक्ष्य के अलावा गांव में पाए गए पुरातात्विक अवशेषों और भवभूति के मालती माधव नाटक में वर्णित पद्मावती के परिवेश के आधार पर पवाया ग्राम को पद्मावती नगरी के रूप में चिन्हित करने की एम वी लेले की स्थापना का समर्थन किया।पवाया गांव सिंध और पार्वती नदियों के संगम पर स्थित है। गांव से लगभग 3 किमी दक्षिण पश्चिम में सिंध नदी पर एक झरना है। इस झरने के बगल में धूमेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। महुआर नदी लगभग 3 किमी दक्षिण में सिंध में मिलती है। इस संगम पर शिवलिंग को सहारा देने वाला एक मंच है, संभवतः वह स्थान जहाँ नाटक में वर्णित प्राचीन सुवर्णबिंदु था। नून/लवणा नदी पवाया से लगभग 7-8 किमी दूर सिंध में मिलती है।

गुरुवार, 6 मार्च 2025

डोभ कुंड शिलालेख


 डोभ कुंड (ग्वालियर ) से प्राप्त प्रसिद्ध शिलालेख में जैन धर्मप्रेमी कच्छपघात वंशी राजा विक्रमसिंह तथा जायसवाल श्रावकों का उल्लेख है।यह शिलालेख विक्रम संवत 1145 का है जिसे  डोभ कुंड के मंदिर में सन्‌ 1866 में केप्टन डब्ल्यू आर मेलविले ने खोजा था,जो एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम दो में पृष्ठ 232-40 पर संकलित है। यह जिनालय के निर्माण की प्रशस्ति है । इस  प्रशस्ति की रचना श्री विजयकीर्ति महाराज ने की थी ।  जिसको उदयराज ने  पाषाण पर लिखा था और तिल्हण ने उत्कीर्ण किया था।यह मंदिर आज भले ही भग्नावस्था में हो, लेकिन उसकी स्थापत्य कला चमत्कृत करती है।यहां का मूर्ति शिल्प बेजोड़ है। मंदिर में 81 फीट के चबूतरे पर चौबीसी का निर्माण किया गया है।चौबीसी के चारों ओर एक प्लेटफार्म पर गजरथ का निर्माण कर इसे सुंदरता प्रदान की गई है।कलात्मक चौबीसी के प्रत्येक भाग पर तीर्थंकर विराजमान थे, पर अब ये खाली हैं। बताते हैं किे मंदिर के प्रवेशद्वार पर दो कलात्मक स्तंभ थे, जो अब नहीं  हैं। डोभ का प्राचीन नाम चडोभ है।राजा विक्रम सिंह कच्छपघात ने डोभ की राजगद्दी संभालने और डोभ को राजधानी का दर्जा देने के बाद जैनाचार्य शांति देव के प्रभाव में आकर यहां नगरवासियों के माध्यम से एक भव्य और विशाल जिनालय का निर्माण कराया था।इन जैन मुनि के शिष्य विजय कीर्ति ने नागरिकों को इस मंदिर के निर्माण में सहभागिता के लिए प्रेरित किया था। राजा द्वारा मंदिर के प्रबंधन में सभी का सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से  मंदिर के संचालन के निमित्त 'विंशोपक कर' का प्रावधान किया था जिस कारण अनाज के रूप में कर वसूला जाता था,जो प्रत्येक गौणी पर एक विंशोपक अनाज कर के रूप में तथा तेल निकालने का कारोबार करने वालों को भी इसी परिमाण में मंदिर के लिए तेल दान देना होता था।विंशोपक से आशय इकाई के बीसवें भाग से है।राजा विक्रमसिंह ने मंदिर के प्रबंधन में सौकर्य की दृष्टि से महाचक्र ग्राम में चारगोणी गेहूं बोने योग्य खेत तथा रजकद्रह के पूर्व में एक बाग कूप सहित प्रदान किया था तथा  दीपकादि के लिये कुछ घड़े तेल के प्रदान किये थे और इस आशय की राजाज्ञा जारी की थी कि भविष्य में भी उनके परवर्ती राजा इसका पालन करते रहेंगे।डोभ कुंड से प्राप्त अभिलेख का उसके विषय में इस परिचयात्मक विवरण के साथ मैं यहां इस प्रयोजन से उल्लेख कर रहा हूं ताकि 'वरैया' पाठ की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़े गए  निराधार तर्क की निरर्थकता रेखांकित कर सकूं। आदरणीय पंडित सुगनचंद जी आमोल वालों (पंडित जी के अलावा कुछ अन्य लोगों का भी यह अभिमत हो सकता है) ने ग्वालियर के विद्वान पंडित हरिहर निवास द्विवेदी के दैनिक भास्कर में सन् 1986 के आसपास लिखे एक लेख (जिसकी प्रति अब उपलब्ध नहीं है) का हवाला देकर उन्होंने मुझे डोभ कुंड के शिलालेख में उल्लिखित विंशोपक और 'वरैया' शब्द के बीच सहसम्बंध और विंशोपक माप की वरैया शब्द (माप के लिए इस्तेमाल होने वाली एक टोकरी, उनके कथनानुसार)से तुल्यता स्थापित करते हुए बताया कि विंशोपक संग्रहण का दायित्व संभालने वाले समुदाय को ही कालान्तर में वरैया नाम से संबोधित किया जाने लगा। मेरे लिए यह एक नूतन अवधारणा थी इसलिए मैंने पंडित जी के इस दावे का परीक्षण करने के लिए 'एपीग्राफिया इंडिका वोल्यूम 2' और 'मध्यप्रान्त, मध्यभारत और राजपूताने में जैन स्मारक' पुस्तकें  जिनमें डोभ कुंड का अभिलेख संकलित किया गया हैं,यत्नपूर्वक जुटाईं और उनका अध्ययन किया। जिससे पता चला कि उक्त दावा एक कपोल-कल्पना मात्र है और डोभ स्थित जिनालय के निर्माण में जो लोग संलग्न थे,वे जायसवाल/जैसवाल समुदाय से थे।यह तथ्य अभिलेख से स्पष्ट है और विंशोपक से आशय उपार्जन के बीसवें भाग से रहा है और वरैया शब्द से उसका दूर या निकट का कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि पान की खेती के लिए बने झुरमुटों में बांस की जिन पनालियों का इस्तेमाल किया जाता है,वे 'बरई' कहलाती हैं और पान की खेती करने वाले लोगों को 'बरैया' नाम से संबोधित किया जाता है।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

वरहिया जैन और वैवाहिक चुनौतियां

वरहिया जैन समाज में पढ़े-लिखे लड़के-लड़कियों की कमी नहीं है। हमारी नई पीढ़ी शिक्षा के हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन करती हुई दिखाई देती है। लेकिन विवाह के मामले में वरहियाजनों के बीच इतर जैन समाज में रिश्ते करने को प्रमुखता देने और उन्हें महिमा मंडित करने का ट्रेंड जोर पकड़ रहा है, खासकर लड़कियों के मामले में। ऐसे रिश्तों पर दबी जुबान से चर्चा करते और अंगुलियां उठाते लोग अक्सर मिल जाते हैं लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है इसकी पड़ताल करने की कोई जहमत नहीं उठाना चाहता। अव्वल तो उच्च शिक्षित कन्या के अनुरूप सजातीय वर नहीं मिलता और यदि संयोग से मिल जाता है तो कभी लड़के के नखरे नहीं मिलते तो कभी उसके मां-बाप और नजदीकी रिश्तेदारों जैसे मामा,नाना के नखरे नहीं मिलते। वर पक्ष की कथित रूप से रुपए पैसों की कोई मांग न होने के बावजूद शादी के खर्च की राशि का आकलन करने के लिए परोक्ष रीति से कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। जबकि अन्य समाज के लोग दुल्हन को ही सबसे बड़ा दहेज मानकर सुशिक्षित कन्या को बहू के रूप में अपनाने को सहज और सहर्ष तैयार हो जाते हैं क्योंकि लिंगानुपात की जटिल समस्या से सभी समाज जूझ रही हैं।इस समय वरहिया जैन समाज के बीसियों लड़के विवाह की देहली सीमा पार कर चुके हैं यानी ओवरएज हो चुके हैं और एक बड़ी संख्या में विवाह की देहलीज पर बैठे हैं। इनमें से कुछ तो कम पढ़े-लिखे होने की वजह से मात खा रहे हैं तो कुछ दूरदराज देहात में रहने की वजह से कन्या पक्ष की प्राथमिकता सूची में नहीं है। इसके अलावा लड़के वालों के पास शुरू में जब विवाह प्रस्ताव आते हैं तो वह ना-नुकुर करते हैं।कई बार इस ना-नुकुर की वजह जेन्युइन होती है तो कई बार इसके पीछे बेहतर रिश्ते की तलाश और शादी के बजट को लेकर मोल-तोल की मंशा होती है।लड़के पक्ष के रिश्ते से इंकार की सूरत में कई लड़की पक्ष वाले क्षुब्ध होकर लड़के के बारे में गलत भ्रांतियां फैला देते हैं। जिसकी वजह से समाज में उसकी एक नकारात्मक छवि बन जाती है।जो उनकी राह में कांटे भर देती है।"तुम अगर हमको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी गैर को चाहोगे तो मुश्किल होगी" की तर्ज पर कुछ परिवार विला वजह की दुश्मनी पाल लेते हैं।इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि हाथठेला लगाने और मामूली प्राइवेट नौकरी करने वाला भी अपनी बेटी का हाथ अपनी आर्थिक हैसियत से ज्यादा बड़ी हैसियत वाले घर में देना चाहता है। हालांकि एक बेटी के बाप के लिए ऐसा सोचना गलत तो कतई नहीं है लेकिन इस सूरत में भी उसके ढेर सारे किंतु परंतु वर पक्ष को परेशानी में डाल देते हैं। जिस तरह इन दिनों अपने नौनिहाल का स्कूल में दाखिला कराते वक्त स्कूल प्रबंधन अभिभावकों से बेढंगे सवाल पूछकर उसके दिमाग का दही करते हैं , कमोबेश वैसी ही स्थिति लड़की वाले के सामने लड़के के परिवार की हो जाती है। लड़की वाले के पास भले ही खुद का घर न हो वाहन के नाम पर टूटी साइकिल भी न हो लेकिन लड़के का पक्का घर होना चाहिए और उसके पास चारपहिया गाड़ी होना चाहिए। परिवार ज्यादा बड़ा न हो ताकि घर के कामकाज में लड़की को न खटना पड़े। बहरहाल ताली दोनों हाथों से बजती है।इस दुरवस्था के लिए समाज के दोनों पक्ष जिम्मेदार हैं। लेकिन इस प्रकरण का सबसे दु:खद पहलू यह है कि समाज से ब्रेन ड्रेन हो रहा है। हमारी सुशिक्षित और सुयोग्य लड़कियां समाज से बाहर जा रही हैं और हमें अपनी बहुएं एससी और ओबीसी वर्ग से मैनेज करके लानी पड़ रही हैं। समकक्ष समाजों में हमें समुचित रिस्पांस नहीं मिलता है।इतर जैन समाज के लोग हमारी लड़कियां तो स्वीकार करते हैं लेकिन अपनी लड़की सजातीय समुदाय में ही ब्याहना चाहते हैं। यदि दोनों ओर से रिस्पांस मिले तो ज्यादा कठिनाई नहीं हो।आने वाले समय में वरहिया जैन समाज की सामाजिक स्थिति का यदि काल्पनिक चित्र खींचें तो वह बहुत भयावह नजर आता है। जातीय गौरव और रक्त की शुद्धता का आग्रह जिसका हम दंभ भरते नहीं अघाते, वह दूर की कौड़ी होगी। समाज में संस्कारहीन लोगों की एक पूरी पीढ़ी दिखाई देगी। क्योंकि संतान पर सबसे ज्यादा प्रभाव मां का ही होता है और जो संस्कार बच्चों को मां की घुट्टी में यानी बचपन में मिलते हैं उनका प्रभाव जीवन में स्थायी होता है। लेकिन लगता है समाज के पुरोधाओं को इन सब बातों से कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। क्योंकि वे सभी इन आशंकाओं से बेखबर नजर आ रहे हैं। सभी अपनी छवि चमकाने की कवायद में जुटे हैं और चमचेनुमा लोग उनके इर्द-गिर्द इकट्ठे होकर उनके झूठे अहंकार के गुब्बारे में हवा भरकर उन्हें सच्चाई से रूबरू ही नहीं होने देते।
 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

विमर्श -4


 वे ही हैं सरपंच कुछ भी फैसला लें।
उनका ही है मंच कुछ भी फैसला लें।
जिसे चाहें उसे 'तनखैया' बता दें।
गगनचुंबी को झुका नीचे गिरा  दें।
वरहिया  या  वरैया अथवा  बरैया,
वही होगा मान्य,जो वे तय  करेंगे।
तथ्य से उनको नहीं कुछ वास्ता है,
समर्थन वे स्वयं का निश्चय करेंगे।
हर तरफ इनका ही है अब दबदबा।
बह रही है आज इनकी ‌~  ‌ही हवा।
कौन इनसे उलझकर पंगा ~करेगा?
व्यर्थ में खुद ही को क्यों नंगा करेगा?
रिश्तेदारी टूटने का डर  ~ दिखाकर ,
आगापीछा सभी को उनका जताकर।
अंततः उनका ~ही पूर्वाग्रह  मनेगा !
उनका हठ ही सर्वसम्मत मत बनेगा!
इसलिए कुछ भी न कहना उचित है।
इस विषय में मौन रहना ~उचित है।
    


सोमवार, 20 जनवरी 2025

वरहिया हैं, वरहिया ही रहेंगे


 जो वर्ह से नि:सृत है,अभिप्राय जिसका श्रेष्ठ है।
कोई जहां न कनिष्ठ है एवं न कोई ज्येष्ठ है ।
जिनका रहा धर्माचरण के प्रति सदा अनुराग है।
दुर्व्यसन, पापाचार, हिंसा वृत्ति सबका त्याग है।
नलपुर की पावन क्रोड में,जिसका विमल शैशव खिला।
नि:सर्ग का आशीष जिसको बाल्यावस्था से मिला।
इक्ष्वाकुवंशी रक्त जिनकी धमनियों में बह रहा।
अभिमान रखना है सदा अक्षुण्ण,उनसे कह रहा।
जो मूल्य और आदर्श अपने पूर्वजों ने जिये हैं।
उपकार जो हम पर हमारे अग्रजों ने  किए हैं।
उनका रखेंगे मान,चाहे कष्ट जितने सहेंगे।
जिनका हृदय है श्रेष्ठ ऐसे वरहिया बन रहेंगे।
दोनों भुजाओं को उठा,उद्घोषकर यह कहेंगे।
हम वरहिया थे,वरहिया हैं,वरहिया ही रहेंगे।।




शनिवार, 18 जनवरी 2025

नरवरगढ़


 
किसी दुर्ग का इतिहास उससे सम्बन्धित देशवासियों की संस्कृति का इतिहास होता है।दुर्ग सामान्यतः किसी ऐसे ऊंचे स्थान,पहाड़ी आदि पर स्थित होते हैं जो भौगोलिक दृष्टि से समृद्ध और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुकूल हो। किसी दुर्ग की प्राकृतिक स्थिति उसे अजेय और सामरिक व राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।दुर्ग केवल प्रशानिक केंद्र या आश्रय स्थल नहीं हैं,इनकी क्रोड में विभिन्न राज्य सत्ताओं और सभ्यताओं के उत्थान पतन का इतिहास छिपा होता है। जिनमें मानव जाति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा,क्रंदन, रक्तपात और उल्लास अभिव्यंजित होता है।दुर्ग के स्थापत्य और वास्तु से समय विशेष की भवन निर्माण कला का निदर्शन होता है। 

मध्यप्रदेश के महत्वपूर्ण दुर्गों में नरवरगढ़ का दुर्ग सामरिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से विशिष्ट और उल्लेखनीय है।यह शिवपुरी जिले के नरवर नगर में स्थित है। यह विंध्य पर्वतमाला की एक पहाड़ी पर 500 फुट की ऊँचाई पर खड़ा है और 8 वर्ग किमी के क्षेत्रफल पर फैला है। नरवर के दुर्ग का इतिहास राजा नल और दमयंती के अमर प्रेम का साक्षी और केंद्र बिंदु रहा है।इस दुर्ग के दूल्हा द्वार के पास  कंगूरों की एक पंक्ति झुकी हुई है।राजा नल को उनके सौतेले भाई पुष्कर ने धोखे से जुएं में हरा दिया था(जिसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में आया है) और वह इतने सत्यनिष्ठ और बात के धनी थे कि वचनबद्ध होने के कारण अपना सब कुछ छोड़ कर जंगल की ओर पत्नी को लेकर चल पड़े थे। वो जब महल से निकले तो उनके सम्मान में महल के सारे कंगूरे श्रद्धा से झुक गए थे और तभी से उसी दिशा में झुके हुए हैं। कुलदेवी पसर देवी उनका रास्ता रोककर लेट गईं थीं।इस जनविश्वास में यह ध्वनित होता है कि राजा नल का इस निर्जीव दुर्ग के साथ भी कितना जीवंत रिश्ता और लगाव था।इस बात से प्रजा जनों के प्रति उनके दयालुतापूर्ण बर्ताव का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

इस दुर्ग के विषय में कई आख्यान और किंवदंतियां प्रचलित हैं।
तेजकरन (जिन्हें दूल्हा भी कहते हैं और जो राजा नल के वंशज हैं)के सम्बन्ध में दो किंवदन्तियां है - पहली यह कि प्रेमाहत दूल्हा जिस उत्तर-पश्चिमी दरवाजे से भागे थे उस दरवाजे का नाम दूल्हा दरवाजा पड़ गया। दूसरी किंवदंती यह है कि एक बार राजा दूल्हा(राजस्थान के लोकाख्यान ढोला-मारू के प्रसिद्ध नायक ढोला)और उसकी रानी मारु, मकरध्वज कुण्ड के बीच में चबूतरे पर बैठे थे। आनन्द-विभोर राजा रानी किसी तरह जल में डूब गए। इस घटना के पश्चात प्रत्येक श्रावण की पूर्णिमा को चबूतरा पर से हाथ उठता दिखाई देता था।एक बार एक सैनिक ने हाथ पर बाण चलाया, तब से हाथ दिखाई नहीं देता।एक और किंवदन्ती हैं जिसका वर्णन कनिंघम साहब इस प्रकार करते हैं कई शताब्दियों पूर्व दुर्ग शत्रुओं द्वारा घेर लिया गया। इस दुर्ग के निकट एक दूसरी पहाड़ी थी। इन दोनों पहाड़ों के बीच में एक रस्सी बंधी थी। राजा दुर्ग के सामनेवाली पहाड़ी पर अपने मित्रों के पास एक पत्र भेजना चाहते थे। यद्यपि राजा ने इस रस्सी पर से पत्र ले जाने वाले को अपना आधा राज्य देने की घोषणा की किन्तु किसी ने साहस न किया । अन्त में एक नटनी पत्र ले जाने को तैयार हुई और सबके समक्ष राजा को आधा राज्य देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध कर लिया।नटनी बड़ी कुशलता से रस्सी पर चलकर पत्र ले गई। जब वह पत्र देकर लौट रही थी एक सरदार ने राजा को मंत्रणा दी कि आधा राज्य बचाने का अवसर है। राजा ने रस्सी कटवा दी। फलस्वरूप नटनी गिरकर मर गई। उस समय से नटों ने कभी नरवर में प्रवेश नहीं किया।वे नरवर का रास्ता छोड़कर दूसरे रास्ते से निकल जाते हैं। कनिंघम द्वारा वर्णित नटनी की इस कहानी का एक दूसरा संस्करण भी प्रचलित है जिसके अनुसार लोहड़ी देवी जो एक तांत्रिक नटिनी थी। वह ग्वालियर की रहने वाली थी। नरवरगढ़ जब अपने वैभव के शिखर पर था,उस वक्त लोहड़ी नटिनी नरवर दुर्ग में पहुंची। उन्होंने कछवाह राजा से कच्चे धागे पर चलने का कलात्मक प्रदर्शन  देखने का आग्रह किया। राजा से लोहड़ी नटिनी ने कच्चे सूत पर चलकर दिखाने की बात कही। उसके एवज में महाराजा से पुरस्कार मांगा। महाराजा ने कहा कि यदि ऐसा हुआ, तो नरवर का राज्य दे दूंगा। कच्चे धागे पर चलने से पहले नटिनी ने राजा के सभी हथियारों को अभिमंत्रित कर दिया। उसके बाद उसने कच्चे धागे पर चलना शुरू किया। राज्य चला जाने की दुश्चिंता से आशंकित मंत्री ने एक चर्मकार से रांपी मंगवाकर रख ली थी। जैसे ही नटिनी बुर्ज के पास आने को थी। मंत्री ने रांपी से धागा काट दिया।जिस कारण नीचे गिरने से नटनी की मौत हो गई। उसी स्थल पर लोहड़ी देवी का मंदिर है। नरवर दुर्ग के‌ दक्षिणी दरवाजे के पास पहाड़ की तलहटी में एक छोटे-से चबूतरे पर यह मढ़िया बनी हुई है।इस मंदिर में मूर्ति नहीं है, केवल होम धूप की पूजा की जाती है। तभी से यह उक्ति लोक में प्रचलित है कि ‘नरवर चढ़े ने बेड़नी, ऐरच पकै न ईंट-गुदनौटा भोजन नहीं, बूंदी छपै न छींट’।
 

नरवर का इतिहास ग्वालियर दुर्ग से सदैव सम्बन्धित रहा। विक्रमी दसवीं शताब्दी के अन्त में ये दोनों दुर्ग कछवाहा राजपूतों के अधिकार में चले गए थे। 1186 वि. में इस पर प्रतिहारों का अधिकार हो गया। एक शताब्दी शासन करने के पश्चात जब सुलतान अल्तमश ने ग्वालियर को जीत लिया तो प्रतिहारों ने नरवर के दुर्ग में आकर शरण ली। विक्रम की 13वीं शताब्दी के अन्त में चाहुड़देव ने यह दुर्ग प्रतिहारों से छीन लिया। नरवर और उसके आसपास चाहुड़ वंश के सिक्के और शिलालेख मिले हैं। बाद में नरवर का यह दुर्ग ग्वालियर के तोमरों के अधीन आ गया।
जयस्तंभ नाम के एक पत्थर के खंबे पर तोमरों की वंशावली खुदी है ।यह खंबा नरवर दुर्ग से एक मील पूर्व की ओर है।
1563 वि. संवत् में सिकन्दर लोदी ने दुर्ग पर विजय प्राप्त की।सिकन्दर लोदी ने दुर्ग में कई मन्दिरों को तोड़ा और मस्जिदें बनवाईं। बाद में सिकन्दर लोदी ने यह दुर्ग राजसिंह कछवाहा को दे दिया जो प्राचीन स्वत्वाधिकारी थे।
विक्रम की 16वीं शताब्दी के मध्य में दुर्ग पर जयसिंह का शासन था। दुर्ग पर लोहे की 'शत्रु संहार' और 'फतेहजंग' नाम की दो तोपें पड़ी हैं, उनपर लेख खुदे हैं जिनमें राजा जयसिंह के नाम का उल्लेख है और 1753 वि.संवत अंकित है।
कछवाहा वंश के अन्तिम राजा मनोहरसिंह से महाराजा शिन्दे ने विक्रम की 19वीं शताब्दी के मध्य में नरवर को जीत लिया।
महाराजा दौलतराव शिन्दे के समय में अम्बाजी इंगले इस दुर्ग के प्रशासक थे। जिन्होंने विक्रमी संवत् 1857 में इस दुर्ग का जीर्णोद्धार किया।एक विशाल भवन अब भी इंगले की हवेली कहलाती हैं ।यह दुर्ग विंध्याचल की एक ढालू पर्वत श्रेणी पर समुद्रतल से 1000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। सिंधु नदी के मोड़ पर स्थित होने के कारण दुर्ग के पश्चिम और उत्तर की ओर नदी हैं। दुर्ग का घेरा लगभग 5 मील का है। विस्तार की दृष्टि से ग्वालियर राज्य में यह सबसे बड़ा दुर्ग है।दुर्ग की पत्थर की प्राचीर और अन्य दीवालों पर अनेक गढ़गजे हैं । विभाजक दीवालें दुर्ग को चार सुदृढ़ घेरों में विभाजित करती हैं। मध्य के घेरे को 'मझ लोक' कहते हैं । यह भाग खंडहर हो चुका है। पहाड़ी के पश्चिम भाग का घेरा दूल्हा अहाता' कहलाता है ।इसी भाग में दूल्हा दरवाजा स्थित है। जिसमें से अन्तिम कछवाहा राजा निकलकर भागा था।दुर्ग का दक्षिणी अहाता "मदार' अहाता कहलाता है, क्योंकि इस भाग में मदारशाह की मजार हैं। दुर्ग का धुर-दक्षिणी भाग 'गूजर' अहाता कहलाता है क्योंकि यहाँ पर गूजर रहते थे।नगर भी पत्थर की प्राचीर से घिरा है।  
 दूल्हा दरवाजा केवल बड़े बड़े पत्थर के ढोकों का बना है। इसमें चूना का प्रयोग नहीं किया गया । द्वार के पत्थरों पर सुन्दर शिल्पकारी है।पिसनहारी दरवाजा, जिसे आलमगीरी दरवाजा भी कहते हैं, सिरे पर बहुत ढालू है इसलिए उसमें सीढ़ियाँ लगा दी गई हैं। एक दरवाजा वीरनपौर अथवा सैयदों का दरवाजा कहलाता है क्योंकि इसके पास सैयद की दरगाह है। तीसरा द्वार गणेशपौर कहलाता है।सबसे ऊपर का द्वार हवापौर कहलाता है।मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व नरवर का दुर्ग भव्य मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध था किन्तु सिकन्दर लोदी ने विक्रम की 15वीं शताब्दी के अन्त में सब हिन्दू और जैन मन्दिरों को तुड़वा दिया। आजकल दुर्ग पर प्राचीन मंदिरों  के कोई भी चिन्ह नहीं पाए जाते, यत्रतत्र खंडित मूर्तियों के टुकड़े मिलते हैं और हवापौर के निकट एक मन्दिर के कुछ अवशेष मिलते हैं। अन्य तीन मन्दिर बहुत पीछे के बने हैं, संभवत: कछवाहा राजपूत राजाओं ने बनवाए हैं।दीर्घ काल तक दुर्ग मुसलमानों के प्रभाव में रहा इसलिए दुर्ग पर अनेक मस्जिदें और दरगाहें हैं। सबसे प्राचीन मस्जिद सिकन्दर लोदी की बनबाई हुई है जो बड़ी मस्जिद कहलाती है । मस्जिद का आंगन बड़ा है। पश्चिम की ओर प्रार्थना भवन है, तीन ओर दालानें हैं। छत पर कोई गुम्बद नहीं है।मस्जिद पर दो लेख खुदे हैं, एक अरबी में है और दूसरा फारसी में। फारसी में लिखा हैं कि मस्जिद सिकन्दर लोदी ने हिजरी संवत 912 (1506) में बनाई। दूसरी मस्जिद हवापौर के पास है। इसमें भी तीन लेख खुदे हैं ।पहाड़ी के पूर्वी किनारे पर प्रसिद मुसलमान फकीर मदारशाह की दरगाह हैं।दुर्ग कछवाहे राजाओं के बनवाए हुए महलों के खंडहरों से भरा पड़ा है । यह महल मझलोक के पूर्वी भाग में हैं। यहां से सिंध नदी की घाटी का दृश्य दिखाई देता है । राजा के महल में अनेक आंगन हैं। प्रत्येक आंगन में एक सभा भवन, सिंहासन-गृह, दालान, स्नानागार, अन्तःपुर, आनन्दवाटिका और झूला है। महल काँच और चूने की सजावट से सजे थे और दीवालों पर सुन्दर चित्रकारी थी। यद्यपि महल टूटी फूटी अवस्था में है तथापि राजप्रासादों के अवशेषों से पता चलता है कि राजपूत राजाओं का जीवन आनन्दमय और वैभव पूर्ण था। इन सब महलों में बड़े महल को महाराजा माधौराव शिन्दे ने ठीक कराया था । यह कचहरी-महल कहलाता है। इसके एक भवन में लकड़ी के मंच पर चटाई बिछी रहती थी । लोगों का विश्वास था कि यह राजा नल की गद्दी है। इस भवन के ताकों और द्वारों पर काँच के टुकड़ों के बेल-बूटे हैं। शीशमहल में भी इस प्रकार के बेल-बूटे हैं।
लदाऊ बंगला के चारों ओर ढलवां छते हैं। इसी के पास एक घर में बैलों से चलने वाली एक बड़ी चक्की है ।लदाऊ बंगला के पास ही द्वीपमहल है, इसमें एक पत्थर के ढोके में कटा हुआ सुन्दर बड़ा नहाने का हौज है। हौज की बनाबट अंडाकार पुष्प की भांति है जिसमें छह कलियां हैं।राज-महलों के अहाते के बाहर, बहुत से सुदृढ़ और कई खण्डों वाले भवन हैं।जिनमें राज्य के पदाधिकारी तथा अन्य आश्रित जन रहते थे।
दुर्ग में अनेक छोटे बड़े ताल हैं। उनमें प्रमुख मकरध्वजताल, कटोराताल, छत्रताल, चन्दनताल, सागरताल,गौमुख-कुंड और बिशन-तलैया हैं।मकरध्वज-ताल सबसे बड़ा है । जनश्रुति के अनुसार इसे राजा मकरध्वज ने बनवाया था । यह 30 फीट गहरा है और इसका क्षेत्रफल 300 वर्गफीट है। यह मध्यकालीन हिन्दू शैली के अनुसार बनाया गया है। इसके पश्चिमी किनारे पर एक भवन है।उसमें एक पत्थर लगा है जिसमें एक बहती हुई नदी दिखाई गई है जिसके दोनों ओर देवी-देवताओं के चित्र हैं। साधारणत: लोग इन्हें पनिहारे कहते हैं। तालाबों के अतिरिक्त दुर्ग पर अनेक कुआं और बावड़ी भी हैं। 

नरवर किले की तलहटी में अतिशयकारी उरवाहा जैन मंदिर स्थित है। पुरातन समय में नरवर में काफी संख्या में जैन मतावलंबी रहते थे जो अत्यंत धार्मिक और परंपरानिष्ठ थे। बताते हैं कि नरवर में अधिकांश जैन परिवारों के घरों में चैत्यालय स्थापित थे। नरवर के वरहिया जैन मंदिर में 140 के आसपास जो मूर्तियां हैं, वे उन्हीं चैत्यालयों से लाकर विराजमान की गई हैं।यह वरहिया जैन मंदिर स्थानीय चौधरी गोत्रीय वरहिया जैन जाति के श्रेष्ठी मानसिंह के वंशजों ने बनवाया था।इन प्रमाणों से यहां के लोगों की अध्यात्मिक जागृति ,धर्म के प्रति रुचि और अटूट श्रद्धा  का पता चलता है।

   

 






बुधवार, 15 जनवरी 2025

विमर्श 3(पंडित/विद्वान)


 

लोक व्यवहार में पंडित विशेषण सामान्यतः ब्राह्मणों के लिए प्रयोग होता है।पंडित का शाब्दिक अर्थ है -ज्ञानी या पांडित्यशाली। जैन समाज में पंडित से आशय कर्मकांड की विधा में प्रवीण व्यक्ति से होता है।पूजा और अनुष्ठान कराने में कुशल व्यक्ति को पंडित कहा जाता है। शास्त्रों का पारायण कर उनकी व्याख्या करने वाले भी पंडित जी कहलाते हैं। जबकि इसके समांतर विद्वान शब्द से आशय  विद्यावान से होता है। विद्वान व्यक्ति जिज्ञासु,उद्भावनाशील,तर्कप्रवण और ज्ञान की शाखा-विशेष का ज्ञाता होता है।इस दृष्टि से यद्यपि पंडित और विद्वान दोनों का क्षेत्र अलग है फिर भी एक ही व्यक्ति पंडित और विद्वान दोनों हो सकता है। लेकिन विडंबनापूर्ण स्थिति तब हो जाती है जब वे एक-दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण की अनधिकार चेष्टा करते हैं और जब कर्मकांडी पंडित हर क्षेत्र में टांग अड़ाना और लालबुझ्झकड़ी देना शुरू कर देते हैं तो बात बनने के बजाय बिगड़ जाती है।इन दिनों समाज में विद्वान कम और पंडित ज्यादा हैं क्योंकि कर्मकांड के क्षेत्र में जहां एक ओर ज्यादा अर्थ लाभ है वहीं समाज में मिलने वाला बहुमान एक अतिरिक्त आकर्षण है।जिस पंडित के पास फचफची सरस्वती होती है उसे लोक में ज्यादा प्रमुखता प्राप्त होती है लेकिन विद्वान के लिए यह कोई पूर्वशर्त नहीं है।

चौरासी जैन जातियां


 चौरासी जाति

अथ मनरंग कीर्ति चौरासी जाति की जयमाल लिख्यते।।

दोहा।।

श्री नेमीस्वर चरनजुग।। तारन तरन जहाज।।

नमो मदन मारन मेले।। मदन मत्त मृगराज।।1।।

श्री सिवदेवी नंद को। जूना गढ़ गिरनारि।।

भयो महोत्सव शुभ तहा।। सुनिये सब नरनारि।।2।।

जाति चौरासी जैन मत, देस – देस के आन।।

चारि छोहनी भीर सब।। इकठी भई महान।।3।।

माल भई जिन चंद जी।। नित कर इंद्र बनाय।।

लेवे को भविजन सकल।। उमगे चित हरषाय।।4।।

जौन जौन सुभ देस के।। आये भवि उमगाय।।

तौन तौन के नाम सुभ।। कछु कहिये चित लाय।।5।।

।।छंद पद्धड़ी।।

कौसल कासी सुभ देस जान। कास्मीर और कौंरूबषान।।

तैलंग्ग अंग अरू वंग देस। करनाट लाट अरू घोटवेस।।6।।

वागड वन्वर पुनि और किंलग। मालवा मध्य चित्तौड चंग।।

गुजरात सकल सुभ सिंधु चोल। निज निज भेषन को धरि अमोल।।7।।

सोरठ द्रावड मह चीन चीन। बंगाला मागध जो प्रवीन।।

अंभोज पोद्र केरल मनाय। सुभ देस मलै गिरि सकल आय।।8।।

सौ वीर अवंतिक पुनि उनाट। वीजापुर अरू सुंदर विराट।।

मरहट मेवातरू माड़वार। पंचाल देस अरू सिग ठुँठार।।9।।

कालिंजर गगहर कक्ष देस। वीसाल मनोहर गौड वेस।।

कुरूजंगल तिरऊत है विनोद। सौरम्य तिलोरक कहयौ मोद।।10।।

सुभ कालकीट सोहै किरात। अरू पुंड मल्ल त्रिकिंलग जात।।

वैदुर्भ सुकुरू अरू सुभ्य देस। पुनि चेदी उद सोमधृ देस।।11।।

सुभ कामरूप अरू अघ्न होय। प्रातर दुसार्न पुन्नाट सोय।।

पाडता उसीर सुभ है कसे। उद्दू विद्रुम अरू अघ चेर।।12।।

सोहै अरद्र पुनि विड वषान। पुह कलावती कारूक सुजान।।

हीरन्य और सुभ कूल संग। सौरम्य जोध आये सुचंग।।13।।

अम्मेर मंगलावति सुजोय। पुनि पांडु और पांडल मनोय।।

जोडाहल कहिये सूरमंद। कुल कम्म अंदु जानौ अमंद।।14।।

काँर्च सौभद्र रूवल्स जान। गंभीर भोट कुंकुन बषान।।

इत्यादि देस औरऊ अनेक। सब इकटे में धरि हिय विवेक।।15।।

—दोहा—

तहा इंद्र सचि आइके। माला रची सुभाय।

कछु ताको वरनन करौ। जा सुनि चित हरषाय।।16।।

—भुजंगम प्रयात छंद—

महा गंधकारी महा रूपधारी। लगे पुष्प नाना संभारी संभारी।।

चमेली सुचंपा घेनेरे घेनेरे। सुवंधूक जाही जुही के भले रे।।17।।

गुलाला गुलाबी सदा सो गुलाबा। भले दावदी गुंजते भौरसावा।।

गुथी कल्प साषी तने पुष्पलाई। लगाये महा कंज बेला चुनाई।।18।।

महा नाग मुक्ता लगे जासु माही। चुनी सो चुनी चारू सोभा लषाही।।

कही पीत आभा कही स्याँमताई। कही रक मानिक्य सोभा धिकाई।।19।।

कहीं स्वेत माला विराजै विसाला। लगे वङ्का के षंड की सोभ आला।।

कही लागि पन्ना महा काँति कारी। चऊवोर जाने निजाभा विभारी।।20।।

वनी माल अैसी कहाँ सोभ जाकी। बनाई भई वैस वज्जी तियाकी।।

धरी नाभ आगे महा सोभ पाई। चढ़ाई रची नाथ को आप लाई।।21।।

तहा राजरने अनेकान आये। भले सेठि साहू विना गंतु धाये।।

षडे देवदेवी चहूँ वोर घेरे। करै सव्द जै जै महा भक्ति पेरे।।22।।

षगी और षगेसा महाँ तेजधारे। चरै चारि हूँ धा जिनाज्ञा विथारे।।

वहा जाति चौरासि यौ जैन केरी। भँई आइ भेला सुमेला घनेरी।।23।।

वजामै वहा दुंदुभी देव तारी। नगारें वजै सर्व आनंदकारी।।

वजै ताल मिरदंग नाना नवीन। वजै वंस कणसाल कानू नवीना।।24।।

नटै नाटकी नाटिनी नाटनी के। कटै पाप संताप सारे तिन्ही के।।

महा भामिनी को किलारा व गामै। चलै भाँति सो भाव अछे बतामै।।25।।

सजै नृत्य संगीत संगीत गामै। वड भावसों देव ताली वजामै।।

भेल पाद विन्यास की रति ल्यामै। मिलै ताल सौं छुद्र घंटी वजामै।।26।।

—दोहा—

अैसो उत्सव जह भयौ। कहत न पावत पार।।

अब चौरासी जाति के। नाम कहौ निरधार।।27।।

—नाराच छंद—

षडायना सुगोड गंगरानिया वषानिया। अचीतवाल कोरवाल दूसरे सुवानिया।।

षडेलवाल वोसवाल श्री श्रिमाल जानिया। वघेलवाल अग्रवाल जैसवाल मानिया।।28।।

लंवेचूवाल श्रीयमाल धाकडा जुरे घने। सहेलवाल ऊँवडे संडेरिया गने गने।।

माढवा लवायडी कपोल जाति के भने। दसौरवाल पल्लिवाल गोल लार के घने।।29।।

नरायना सुनागरीय काँथडा चितोडिया। भटेर गोल पूर्व और भट्ट नागरे भिया।।

घनोरवाल रैकवाल झारिड़ी सवालिया। चतुर्थ और पंचमा सुजाय ला कराहिया।।30।।

सुलाडवाल सूरिवाल जंवुसार धाइया। श्रीयगौड जाति के अनेक लोग आइया।।

कहे सुनार सिंघ पोर सेरिहीय है घने। गुरू सुवाल जेहरान डेडुवाल सोहने।।31।।

—अडिल छंद—

षडवड गोल संगारे मेठ तवालही। टठतवाल पुरवाल वरहिया है सही।।

मगलवाल अरू पुकरवाल हर सौरिया। वध नो राज लहराक है अन दौरिया।।32।।

हर दौरा श्रीमाली नाना वाल जू। माडाहाडा सेरहिया अकनाल जू।।

करनसिया मझ करा कहे कोलापुरी। साचौरा गृह पत्तीना गद्रह कीकुरी।।33।।

सकल जाँगरा पोरवार कर वारजे। सोरठिया पुरवार कठन है लारजे।।

भले अयोध्या पूरब आनंद सो चले। पद्मावति पुरवार पवयडा हे भले।।34।।

वासक माको मठी अटस परवार है। कहे दसेरा पोरवार हितकार है।।

औ माली पुरवार सकल ये जानिया। निज निज भाषा बोलत आनंद मानिया।।35।।

चार्चा संग्रह ग्रंथ महा अभिराम है। ता मधि जिनमत जाति चौरासी नाम है।।

ताहि देषि हम इहा लिषी सुनियौ सही। भूल जहा कछु होय तहा सोधौ कही।।36।।

—सोरठा—

अैसे सब ही जात—भेला है मेला भयौ।

निज निज मन हरषात।। उमगे माला लेन को।।37।।

—दोहा—

और अनेकन भूपसों।। मागै माल वढाय।

ताको वरनन करते हौ।।सुनऊ भब्य मनलाय।।38।।

—नाराच छंद—

नवाय माथ जोरि हाथ नाभ माल दीजियै। मगाय देव हेमराशि सो भंडार कीजिए।।

सहस वीर जांगरा दिनार भावसाँ। हजार दै चलीस गौड माँग ही छचावसों।।39।।

षडेलवाल यौं कहै असी हजार लीजियै। दिनार सेक जाति की दया दयाल कीजियै।।

षडायना सुलछदेत है वडी उमंग सौ। द्विलछ देय श्रीयमाल माल को अभंग सौ।।40।।

सुचारि लछ श्री श्रिमाल आठ लछ दूसरे। वघेलवाल आठ दून देत दावसौ भरे।।

बत्तीस लाष जैसवार तास दून धाकडा। नारया सु अस्सि लाष ऐक कोटि काथडा।।41।।

दिनार देय देय हाथ जोडि जोडि माग ही। गुनानुवाद गाय गाय सीस को नवाय ही।।

अचीतव दोय कोटि लछ देत वानिया। करोरि चार कोरवाल आठ गंगरानिया।।42।।

सुवोसवाल मोतिया अमोल देत है घने। अनेक रत्न अग्रवाल देत है बिना गने।।

अमोल लाल मालकाज श्रीयमाल देत है। लुटाय के जिनेन्द्र पै सुफूल माल लेत है।।43।।

सडैसि सुपल्लिवाल दूमडे षेड जहाँ। कहै अनेक कोठरी षजाने लीजियै महाँ।।

कपूर जाफरान की सुगाडिया भराय के। सहेलवाल औलवेचू देत आय आय के।।44।।

वनाय रत्न सो जडी लगाम जीन पाषरे। अमोल येक जाति के अनेक सोभ को धरे।।

नरायना चितोडिया सनागरी मगाय के। बिना गने तुरंग देत सीस को नवाय के।।।।45।।

भट्टेरगौल पूर्व और गौल लार के घने। गयद साजि साजि वेस भेस सो सुहावने।।

महा उतंग स्याम जेम नील भू धरा लसै। मगाय देत माल हेत इंद्र नाग को हसौ।।46।।

चतुर्थ और पंचमा अनेक दसे देवही। लुटाय माल मालकाज श्री जिनेन्द्र से वही।।

घनोरवाल यौ कहै हमै न माल देऊगे। भराय घौ जहाज मै कितेक दाम लेऊगे।।47।।

इत्यादि वानिया समस्त आप आपु को सवै। सो येक येकू सो अधिक देत दाम है जवै।।

पवित्र पाप नाशनी जिनेन्द्र माल लेन को। उछाह सो षडे जहां महान द्रव्य मो।।48।।

अनेक सूम यौ कहै भले सुलछ देत है। टाय दाँम आपने सुफूल माल लेत है।।

कठोर व्रूर चेत्त के महात्म देषित जैन को। चले सुवाग मोडि मोडि होस नाहि वैन को।।49।।

अनेक देषि भूपती बड़ा अचंभ मान ही।। महाप्रताप जैन धर्म को हियै पछाँन ही।

कहै पुकारि यौ छित्तीस नाथ चाल दीजियै। जितेक राज लक्ष्मी सवै हमारि लीजियै।।50।।

—सोरठा— गुरू बोले सुनि बात। वैसे माला ना मिलें।।

महाश पुन्य अवदात।होय जास को पाव ही।।51।।

—त्रोटक छंद—

जिन भौम वनावहि भावधरे। प्रतिबीब शिरावहि जो सुथरे।।

इकठी चवरासिऊँ जाति करै। िषयाजन की सब पीर हरै।।52।।

जिन जज्ञ रचै छल छिद्र बिना। कछु मान वडाइन करै अपिना।।

सब संघ चलाय वनै संघ ही। परभावन अंग करै व ही।।53।।

प्रिय वैन कहै सवसाँ हित के। नहि पालहि झूठ भले चित के।।

इत के वित के नहि वैन सुनै। मन मै जिनराज सरूप गुनै।।54।।

लक्ष्मी वऊ धर्म विषै षरचै। न करै कवहूँ मिथ्या परचै।।

अरचै पद पंकज नेमतने। चरचै गुरजो निग्रंथ भने।।।55।।

वह सास्त्र सुनै जिएमो सुदया। उपजै विनसै ससरी अदया।।

यहि भाँति अनेकन पुन्य मिया। करि पावहि माल अमोल जिया।।56।।

सबको यहि भांति संबोध कियौ। तब ही सिंघराय बुलाय लियौ।।

अति आनंद पूरित माल दई। नृप सिंघ तवे हरषाय भई लियौ।।57।।

नर जो जिन माल अमोल लहै गनियो। नर जन्म सुफल वहै।।

प्रगटै जस लोक विषै जिहि को। अति पुन्य भंडार भरै तिहि को।।58।।

जिहि की लक्ष्मी न घटै कबहूँ। दिन दून बढै परचै जवऊँ।।

यह लोक प्रसिद्ध कहै सगरे। जित धर्म तितै लक्ष्मी वमरै।।59।।

बिन धर्म रमा वुध यौ उचरै। विधवा त्तिय ज्यौं नहि सोभ धरै।।

मनरंग सदा चितमें धरियै। जिनधर्म दयामय विस्तरियै।।60।।

तरियै करि सो निज आतम को। हरियै सु अज्ञान महातम को।।

परिये न भवोदधि मै फिरिकै। करियै यह काज महा थिर कै।।61।।

—दोहा—

यह चौरासी जाति की। माल कही हम वेस।।

पढत सुनत संकट मिटै। जै जै नेमि जिनेस।।62।।

जेठ महीना सुकुल पष। तिथि पंचमि गुरुवार।।

ता दिन संपूरन भई। जैमाला हितकार।।63।।

येक सहस नै सतक मै। षटवरषै करि दूरि।।

संवत सो जानौ सुधी सदा रहौ सुष पूरि।।64।।

—छप्पै—

धन कन वढै अनेक वढै कीरति दिन दूनी

दिन दिन सुष सरसाय कुमति छिन छिन मै ऊनी

अनगन गुनगन गहै लहै पगपग पटुताई।

कलमल दर कल्यान होय ता घर मै आई। पुत्र पौत्र परताप सौ।

संपूरन निव से जिया। मँनरंग लाल जा ऊदै मौ। वसत नेमि राजुलि पिया।।65।।

—सवैया—

श्रावक धरमपाल मुसाहेव गंज साल विंदा लाल के सुपुत्र रतन वषान ही अन्नजल के त्रसाय रहौ सु नगर आय अग्रवाल दंस गग्र्ग गोत सुवषान ही। भादौ जी की पूजा पाठक कथा रासा है विसाल हरष सहित लिष्यौ अति सुषदान ही। विक्रम सुदित्य सार संवत सुनौरसरल मास तिथि दिन ताको करौ सु वषान ही।

—छप्पै छंद—

येक ऊनसन बीस तास पर षोडस जानो।

पोह सुकुल तिथि और जान पूनम सुवषानो येतवार दिन सार राति के पूरन कीनो।

पढै गुनै जो कोई ताहि आतम सुष भइनं गुलजारी के पठन को लिषी सु मन वच काइ के। भूल चूक सब सोंधियौ।


सोमवार, 13 जनवरी 2025

शातियाल की शैलकृतियां


 पाक अधिकृत कश्मीर में हिमालय और हिंदुकुश पर्वतमाला के मध्य शातियाल और रायकोट क्षेत्र सिंधु नदी के दक्षिणी तट पर, पूर्व में दारेल घाटी और पश्चिम में तांगिर घाटी के बीच स्थित है। यह स्थल यात्रियों, व्यापार कारवां और रेशम मार्ग पर तीर्थयात्रियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण स्थल था। इस यात्रा मार्ग का उपयोग करने वाले विभिन्न संस्कृतियों के लोगों ने यहां अपनी उपस्थिति के जो निशान छोड़े हैं, उन्हें आज भी इस क्षेत्र के शैल उत्कीर्णन, संस्कृति, ज्ञान और सामाजिक प्रथाओं में देखा जा सकता है। यह स्थान हजारों वर्षों से मानवता के लिए एक सांस्कृतिक संगम रहा है जो अपने प्राचीन इतिहास और धार्मिक मान्यताओं के लिए अद्वितीय है। इस क्षेत्र में मिलने वाली चट्टानों पर उकेरी गईं मूर्तियां और  शिलालेख न केवल प्रागैतिहासिक मानव सभ्यता के प्रमाण हैं, बल्कि इनमें श्रमण धर्म के विकास और प्रभाव के भी संकेत मिलते हैं। यहां मिली मूर्तियों और चित्रों में श्रमण धर्म के विभिन्न पहलुओं, जीवन गाथाओं, ध्यान, और तपस्या का चित्रण किया गया है।जो इस क्षेत्र में श्रमण धर्म के उपदेशों जैसे अहिंसा, सत्य, और अपरिग्रह के पालन का प्रमाण प्रस्तुत करता है।1980 में, एक जर्मन मानवविज्ञानी प्रोफेसर कार्ल जेटमार और पाकिस्तान के प्रसिद्ध पुरातत्वविद्, प्रोफेसर अहमद हसन दानी ने इस क्षेत्र में प्राचीन शैलकृतियों की महान संपदा की व्यवस्थित रूप से जांच करने और इसे दुनिया के सामने पेश करने के लिए उत्तरी क्षेत्रों में पाक-जर्मन पुरातत्व मिशन की शुरुआत की थी।कराकोरम मार्ग पर शातियाल और रायकोट क्षेत्र में लगभग 100 किलोमीटर तक फैले विस्तार में प्राचीन शैल चित्रों की एक विशाल खुली और विस्तृत गैलरी है। जिसमें 50,000 से अधिक शैल उत्कीर्णन और 5,000 शिलालेख हैं, जो 9 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 16 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक के हैं, जिस में से कुछ लगभग 2,900 साल पुराने हैं। नक्काशी में जानवर, त्रिकोणीय मानव आकृतियाँ , मन्नत स्तूप और तपस्या में लीन यतियों के चित्र दिखाई देते हैं। जिन्हें कुछ लोग बोधिसत्व तो कुछ अन्य जैन तीर्थंकर के उत्कीर्णन मानते हैं।सबसे पुरानी नक्काशी में पत्थर के औजारों से नक्काशी किए जाने के संकेत मिलते हैं। जबकि बाद की बौद्ध छवियों को तेज धातु के औजारों का उपयोग करके जोड़ा गया था,जो इस क्षेत्र में औजारों और प्रौद्योगिकी के विकास का एक स्पष्ट संकेतक है। यहां मिलने वाली प्राचीन लिपियों में खरोष्ठी, ब्राह्मी, सोग्डियन, चीनी, तिब्बती, प्रोटो-शारदा और यहां तक कि प्राचीन हिब्रू भी शामिल हैं। अधिकांश लेखन ब्राह्मी लिपि में हैं। ये शिलालेख अतीत की संस्कृति, यहां रहने वाले समुदायों और क्षेत्र के आगंतुकों की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को समझने में एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ शिलालेखों में शासकों की तिथियों और नामों का उल्लेख है, जिससे विद्वानों को इस क्षेत्र के इतिहास के कालक्रम को समझने की गहरी अंतर्दृष्टि मिलती है।चट्टानों पर की गई नक्काशी में मानव विकास का एक संपूर्ण शानदार अध्याय छिपा है।


वरहिया पाठ विमर्श


 मूल पाठ वरहिया अथवा वरैया है,यह मुद्दा इन दिनों सुर्खियों में छाया है। वरैया पाठ को बनाए रखने के आग्रह का आधार पंडितवर्य गोपालदास जी वरैया द्वारा अपने नाम के साथ किया वरैया उपनाम का व्यवहार है। पंडित गोपालदास जी वरैया निर्विवाद रूप से अपने समय के एक प्रकांड विद्वान रहे हैं। जैन जगत में उनका बहुत समादर है। किंतु जो जिस उपनाम का व्यवहार करता है, सर्वत्र वही नाम उल्लेखित होता है। आदरणीय पंडित जी ने जैन आगम का गहन अध्ययन किया था और उन्होंने जैन ग्रंथों को सर्वसुलभ कराने और जैन विद्वान तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य किया था।जिस पर सभी को गर्व है और होना चाहिए लेकिन आदरणीय पंडित जी ने स्वजाति का इतिहास खंगालने की कभी कोई चेष्टा नहीं की,क्योंकि यह सर्वथा अलग क्षेत्र है। उन्होंने तो जैन धर्म के मर्म को आत्मसात किया और आजीवन उसी का प्रचार प्रसार किया क्योंकि वही उनका एकमेव जीवन लक्ष्य रहा।आदरणीय पंडित जी का जन्म वर्ष 1867 ईस्वी में यानी आज से 158 वर्ष पूर्व हुआ था।19वीं शती तक इस विषय में कोई पुरातात्विक गवेषणा अथवा अनुसंधान का कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं हुआ था। इसलिए उस समय इस बात को लेकर कोई अभिमत या आग्रह होने का कोई प्रश्न ही नहीं था।जब वर्ष 1944 ईस्वी (वि.संवत्2000) में स्याऊ ग्राम में अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरैया महासभा की स्थापना हुई और 1980 ईस्वी में अखिल भारतीय दिगंबर जैन वरैया महासभा का पुनर्गठन हुआ तब ऐसा कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं था। इसलिए इस विषय में यह  कहना कि उस समय के विद्वतजनों ने इस विषय में कोई प्रतिवाद नहीं किया, बेहद बचकाना तर्क है।1987 ईस्वी में आदरणीय श्री रामजीत जी जैन, एडवोकेट की इस विषय में लिखी पुस्तक"वरहियान्वय"के प्रकाशित होने के बाद जब लोग इन नये तथ्यों से रूबरू हुए तब इस विषय पर समाज में विमर्श शुरू हुआ और खोजे गए पुरातात्विक साक्ष्यों के प्रकाश में वरहिया उपनाम को अपनाने का आग्रह भी बढ़ा। यद्यपि उस समय भी कुछ लोग जो आदरणीय पंडित गोपालदास जी वरैया की ख्याति को भुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे, पंडित जी के नाम से पहचाने जाने की लालसावश  "वरैया" उपनाम को बनाए रखने के पक्ष में लामबंद थे और वही स्थिति कमोबेश आज भी है। चूंकि पंडित गोपालदास जी वरैया उपनाम का व्यवहार करते थे इसलिए जहां भी उनका प्रसंग या संदर्भ आया है स्वाभाविक रूप से वरैया उपनाम ही प्रयोग हुआ है। पंडित जी के कारण "वरैया" उपनाम जैन जगत में समादृत होने से 19वीं शती के बहुत सारे लोगों ने इस नाम का व्यवहार किया। उदाहरण स्वरूप- श्री प्यारेलाल वरैया,श्री लेखराज वरैया,श्री कपूरचंद वरैया,श्री भगवती प्रसाद वरैया इत्यादि।लोगों ने अपने प्रतिष्ठान पर भी वरैया नाम लिखवाया। लेकिन "वरैया" उपनाम का व्यवहार ग्वालियर जनपद तक ही सीमित रहा है।आमोल निवासी पंडित छोटेलाल जी बरैया जिनकी कर्मस्थली उज्जैन रही है,का समूचे मालवांचल में काफी समादर रहा है।वह स्थानीय जैन जगत के सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं। उनके प्रभाव के कारण उज्जैन, रतलाम, जावरा के सजातीय परिवारों ने "बरैया" उपनाम अपनाया। और ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है क्योंकि 'महाजनो येन गत: स पंथ:'। अतएव इस प्रकार प्रचलन रूप में अपनाया गया "वरैया" नाम व्यवहार इसे प्राचीन और मूल पाठ ठहराने के पक्ष में प्रमाण के रूप में ग्राह्य नहीं हैं? "वरहिया" पाठ की प्राचीनता के पक्ष में उपलब्ध प्रथम साक्ष्य पंडित जी के जन्म से 400 वर्ष पूर्व का,वर्ष 1489 ईस्वी (वि.संवत्1545) का मैनपुरी के बड़े मंदिर में विराजित भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा का पादलेख है।जिसमें स्पष्टतया "वरहिया कुलोद्भव"  उल्लेख आया है। दूसरा उपलब्ध साक्ष्य श्रीपाल चरित के रचयिता कविवर परिमल्ल (जो सोलहवीं शती के हैं जिन्होंने श्रीपाल चरित की रचना वर्ष 1595 ईस्वी (वि.संवत 1651) में प्रारंभ की थी),को डाक्टर कस्तूरचंद कासलीवाल ने अपनी पुस्तक "बाई अजीतमति एवं समकालीन कवि" में 'वरहिया' जात्युत्पन्न बताया है और यह पुस्तक वर्ष 1984 ईस्वी में यानी "वरहियान्वय" के प्रकाशन से 3 वर्ष पहले की है। इन दोनों साक्ष्यों के स्नेपशाॅट मैंने यहां प्रमाण के लिए लगाए हैं।तीसरा उपलब्ध साक्ष्य करहिया ग्राम के जिन मंदिर में प्रतिष्ठित कलिकुंड यंत्र जो वर्ष 1785 ईस्वी ( वि.संवत 1841) का है। उसमें "वरहिया जाति,कुम्हरिया गोत्रे" उल्लेख सुस्पष्ट है(संदर्भ - वरहियान्वय)। कलिकुंड यंत्र का स्नेपशाॅट भी इस ब्लॉग पोस्ट में अंत में दिया है।आश्चर्य तो तब होता है कि कुछ लोग श्री रामजीत जी जैन के इतिहास को ही खारिज करने पर आमादा हैं।"वरैया" शब्द में दन्त्योष्ठ्य 'व' है लेकिन उसका उच्चारण सामान्यतः ओष्ठ्य 'ब' जैसा होता है। इसलिए वरैया शब्द का उच्चारण बरैया की तरह होता है।बरैया जाति मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित है। इसलिए उससे सुभेदित यानी डिफ्रेंशियेट करने की दृष्टि से भी वरहिया उपनाम का व्यवहार उचित है। वरहिया जाति की गोत्र सूची में 36 गोत्र शामिल हैं जिनमें वरैया गोत्र भी एक गोत्र है और यह बात निर्विवाद है। किसी गोत्र के नाम पर जाति का नाम होने का एक भी उदाहरण ढूंढ़ने पर भी देखने को नहीं मिलता! यहां यह भी विचारणीय है कि क्या एक ही गोत्र नाम अपनाने पर हम सभी परस्पर बंधु-बांधव यानी सगोत्र नहीं होंगे?

खंडेलवाल जैन जाति के बृहद् इतिहास के पृष्ठ 41 पर दिगंबर जैन जातियों की तुलनात्मक सूची में संवत् 1852 की पांडुलिपि में वरहिया पाठ है तथा सन् 1914 ई.की दिगंबर जैन डायरेक्टरी में वरैय्या/वरैया पाठ आया है।इस प्रमाण के आधार पर भी वरहिया पाठ अधिक प्राचीन है। हां, बीसवीं शती में वरैया उपनाम प्रचलन में था।श्री मनरंगकीर्ति की जयमाल के 32वें छंद की पहली अर्धाली में 'वरहिया' पाठ आया है।श्री नवल शाह जो 18वीं शती के प्रसिद्ध विद्वान कवि हैं, उनके द्वारा ई.1770 में रचित 'श्री वर्धमान पुराण' जो पंडित पन्नालाल जी साहित्याचार्य के संपादकत्व में ई.1942 में सूरत से मुद्रित और प्रकाशित हुआ, में कवि परिचय खंड में  विभिन्न जैन जातियों के परिचय के प्रसंग में पृष्ठ 417 पर 'वरहिया' नाम आया है।उसका स्नेपशाॅट भी यहां प्रमाण के रूप में दिया है।
 महासभा का पंजीयन जो त्रुटिवश या अज्ञानतावश अथवा जानबूझकर वरैया नाम के साथ किया गया है जो महासभा के तत्कालीन पदाधिकारियों की एक गंभीर तथ्यात्मक गलती है,को सुधारकर ठीक करने के बजाय उसी गलत लीक को पीटना भयंकर किस्म का यथास्थितिवाद या सुविधावाद है।जब हथेली पर रखे आंवले की तरह सारा निष्कर्ष हस्तामलकवत् है फिर यह हठधर्मिता क्यों? मेरा किसी के प्रति कोई राग-द्वेष नहीं है और न मैं समाज के किसी राजनीतिक गुट या लाॅबी का हिस्सा हूं। मैं सिर्फ प्रमाणों और तथ्यों के साथ खड़ा हूं। आशा है इस विस्तृत विमर्श के बाद इस विषय में सभी शंकाएं निर्मूल हो चुकी होंगी और इस विषय पर किसी मीमांसा की अतिरिक्त आवश्यकता नहीं होगी।